नर्मदा घाटी करें पुकार, डूबे नहीं मानव अधिकार...!

गुजरी 11 अप्रैल 2015 से ओंकारेश्वर बाँध में 189 मीटर से ऊपर पानी भरे जाने के विरोध में शुरू हुआ  जल सत्याग्रह का आज छठां दिन है । अब तक 191 मीटर तक जल भर दिया गया है, इससे अनेक किसानों के खेत बिना पुनर्वास के डुब गए हैं। इस अमानवीय डूब के खिलाफ 25  विस्थापित जल सत्याग्रह कर रहे है। कल 15 अप्रैल से नर्मदा बचाओ आंदोलन के बैनर तले नासिक विभागीय आयुक्त कार्यालय पर अनिश्चितकालीन धरना भी शुरू कर दिया है  पेश है नर्मदा बचाओ आंदोलन की विज्ञप्ति;

सरदार सरोवर विस्थापितों ने नासिक विभागीय आयुक्त कार्यालय पर धावा बोला ।

विस्थापितों ने मांगों के साथ अनिश्चितकालीन धरना घोषित किया ।


15 अप्रिल 2015। नासिक:  नर्मदा घाटी के महाराष्ट्र के सरदार सरोवर से विस्थापित सैंकड़ो आदिवासियों ने विभागीय आयुक्त, नासिक के कार्यालय का कब्ज़ा करते हुए अपनी मांगो पर शासन को चुनौती दी ।

यह अनिश्चितकालीन धरना आज से शुरू करते हुए, नूरजी पाडवी ने कहा कि ‘’हमारी ज़िन्दगी डूबाने वाला कार्य, जोकि बाँध को 122 मी. से 139 मी. तक बढाते हुए चल रहा है, उसे देखकर हम चुप नहीं बैठ सकते । हम यहाँ खोजते हुए आए है, कहाँ है हमारी सरकार? कहाँ है हमारे नुमयिंदे?’’

हमारी ज़मीन 1993-94 से सरदार सरोवर बाँध के कारण डूबी हुई है और आजतक हमें ज़मीन के बदले ज़मीन नहीं मिली, उसके बाद भी सरकार बाँध की ऊचाई और आगे बढाते हुए हमे और डूबोने का अधिकार किस न्यायालय से शासन को प्राप्त हुआ है? ‘’ यह सवाल पूछते हुए पुन्या वसावे, सोमावल पुनार्वसाहट के सरपंच ने शासन को चुनौती दी ।

आयुक्त श्री एकनाथ डवले जी मुंबई में किसी बैठक के लिए गए है, इसलिए कार्यालय भवन की पहली मंजिल तक पहुँच कर करीबन 400 आदिवासी बहन –भाइयों ने उनसे मिलने की आस में अपना डेरा डाला हुआ है । जबतक हमें ज़मीन के साथ पुनर्वास, वसाहटों में भी नीतिअनुसार सभी को ज़मीन न मिलना, वन अधिकार की प्रक्रिया आगे न बढ़ना, रोज़गार में भ्रष्टाचार आदि सभी मुद्दों पर चर्चा ही नहीं, निर्णय नहीं मिलता, जबतक हम नहीं हटेंगे, यह घोषणा भी करदी गयी ।

मोदी शासन ने लिया निर्णय, महाराष्ट्र की नुमयिंदी कमज़ोर और दसों बैठकों के बाद भी विस्थापितों की सूची तक अंतिम न करने से हुआ है । 1200 परिवारों का पुनर्वास बाकी होते हे भी बाँध को आगे बढाने की मंज़ूरी महाराष्ट्र ने कब और कैसे दी, इसकी जांच ज़रूरी है ।   सरदार सरोवर के एक बूँद पर भी अधिकार ना पाने पर और केवल बिजली के लिए करोंडो रुपयों का पूँजी निवेश होने पर भी अपने लोगो की बलि देना महाराष्ट्र के लियें कहाँ तक न्यायपूर्ण है ? सरदार सरोवर में भरा आधा-अधूरा जलाशय का 20% पानी भी जब की गुजरात सरकार नहरों से नहीं उठा रही है क्योंकि नहरे ही बहुत कम बनायीं है, तैयार नहीं है, तब ऊचाई (17 मी. से ) बढाकर पुनर्वास के बिना आदिवासियों की ज़िन्दगी डूबोना अत्याचार नहीं तो और क्या है ?
 
पिछले 30 सालों से लड़कर आंदोलन के विविध संघर्षो, उपवास, पानी से टकराने का जल संघर्ष, ज़मीन हक सत्याग्रह आदि के ही कारण कहीं 10 से 11,000 परिवारों को ज़मीन मिल पाई है । लेकिन आज भी 40,000 से अधिक परिवार मध्य प्रदेश में डूब का सामना करने वाले हैं और वहीँ महाराष्ट्र के 1200 परिवार भी शासन पुनर्वासित नहीं करती । यही कारण है कि आज सर्वोच्च अदालत में भी कानूनी संघर्ष जारी रखते हुए, हमें मैदान में उतर आना पड़ा है । नर्मदा घाटी की एतेहासिक, पुरातत्व की धरोहर, यहाँ जंगल ही नहीं, वृक्षों का आच्छादन भी है, उसे नष्ट करने की बात कैसे हो सकती है ? ये सवाल उठाते हुए निश्चय व्यक्त किया की वे यहीं डटेंगे ।

आदिवासियों के गीत और नारों से बाँध की कथा और अन्याय की व्यथा गूंजते हुए कार्यक्रम चला । कार्यालय बैनरों से सजाया गया । मानों एक जन-संसद बैठ गयी । उसमे चर्चा के लिए बुलाया गया राशनिंग व रोज़गार के प्रमुख अधिकारीयों को । एक एक गाँव में भ्रष्टाचार, कानून-नियमों का उलंघन किस तरह से हो है, उसकी हकीक़त रखी गयी । दोनों मुद्दों पर क्या अपेक्षित है, इस पर चर्चा हुई....कल निर्णय का आग्रह हुआ ।
आयुक्त आज मध्य-रात्री को पधारेंगे और कल उनके साथ चर्चा होगी....लेकिन निर्णायक अंत कब होगा-देख लिया है, देखेंगे ।
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