परमाणु 'स्वच्छ' ऊर्जा से गंदा होता पर्यावरण

आज से करीब 50 वर्ष पूर्व आस्ट्रेलिया में परमाणु हथियारों के लिए हुए परीक्षणों की वजह से वहां के देशज निवासी एवं उनकी पैतृक भूमि, वन,  वनस्पति, पानी, हवा एवं वातावरण सभी कुछ प्रदूषित हो गया है। पांच दशकों के बाद भी स्थितियां काबू में नहीं आ पा रही हैं। हमारे राजनीतिक परमाणु ऊर्जा को स्वच्छ ऊर्जा बता रहे हैं। जबकि दूसरी ओर वैज्ञानिक तथ्य बता रहे हैं कि प्लूटोनियम 239 कम से कम 24000 वर्षों तक सक्रिय रहता है। परमाणु हथियारों की समाप्ति भी क्या इस संकट से हमारी सभ्यता को बचा पाएगी ? पेश है सप्रेस से साभार नीना भंडारी का महत्वपूर्ण आलेख;

स्युकोलेमन-हासिल्डिनी नामक एक कोकाथा-मुला देश महिला तब तीन वर्ष की थी जब ब्रिटेन ने पश्चिमी आस्टेªलिया के तट पर स्थित मोंटे बेल्लो द्वीप एवं दक्षिण आस्टेलिया के ईमु फील्ड एवं मारालिंगा में परमाणु हथियारों का परीक्षण किया था। सन्1952 से 1963 के   मध्य कुल 12 बड़े परीक्षण किए गए जिसने जहां स्यु एवं उसका परिवार और समुदाय जिस विशाल क्षेत्र में रहता था उसे प्रदूषित कर दिया था। स्यु अपने बुजुर्गों द्वारा उस क्षेत्र की स्वस्थ जलवायु एवं जीवनशैली का वर्णन करते हुए कहती हैं, ‘‘जब परीक्षण प्रारंभ हुए तब उस क्षेत्र में देशज लोग रह रहे थे। परीक्षण के निकटस्थ क्षेत्रों के अनेक लोग या तो तुरन्त मारे गए या बीमार पड़ गए। पहले परमाणु बम का नाम   था - ‘टोटेम 1‘ जो कि व्यापक क्षेत्र में फैला और उससे फैले ‘‘काले कोहरा‘‘ की वजह से अनेक लोेग मारे गए या अंधे हो गए एवं बहुत बीमार भी पडे़।  उनका कहना है, ‘‘हमारे समुदाय केे बुजुर्ग लोेग ‘‘नुल्लाबोर धूल के तूफान‘‘ का जिक्र करते हैं, जो कि मारालिंगा परीक्षणों का परिणाम था । हम लोग उस स्थान पर नहीं थे, लेकिन धूल एक जगह पर नहीं टिकी। हवा उसे जहां ले गई वह वहां गई। लोग कैंसर से मर रहे थे और हमारे लिए यह एक नई स्थिति थी। ‘‘उन्हें आस्टेलिया न्यूक्लीयर फ्री अलायंस (ए एन एफ ए) द्वारा विकिरण पर हो रहे एक सेमिनार में समझ मेें आई थी।

देशज लोगों ने सन्1997 में ए. एन. एफ. ए. का गठन किया था जिसे पहले अलायंस अगेंस्ट यूरेनियम के नाम से जाना जाता था। इसमें आस्टेªलिया के अनेक देशज समुदायों के लोग एवं गैर सरकारी संगठन इसमें शामिल थे। देशज लोगों के लिए यह भूमि ही उनकी संस्कृति का आधार है। वह यह सुनकर स्तब्ध रह गई थी कि जो जंगली झाड़ी से निकला भोजन वह खाते हैं वह संभवतः संदूषित हैं। उसका कहना था कि यह (झाड़ियां) हमारे भोजन का सुपर मार्केट है, और हमारी औषधियों का औषधालय है, और इनकी देखभाल हमारा धर्म है। यह अर्थहीन है कि आप देशज हैं या नहीं क्योंकि देश के इस भाग में परिवारों में असामयिक बीमारी और मृत्यु एक सामान्य बात है। कैंसर एक बड़ी समस्या है और लोग थायराइड से भी बड़ी मात्रा में पीड़ित हैं।

परीक्षण के समय प्रजनन संबंधी समस्याएं,मृत शिशु जन्म एवं जन्म के समय अपंगता सर्वव्याप्त हो गई थी, लेकिन  विकिरण  की समस्या वंशानुगत हस्तांतरित होती जा रही है। वह चाहती हैं कि परमाणु हथियारों पर स्थायी प्रतिबंध लगे एवं जिस यूरेनियम से यह तैयार होता है उसे जमीन के अंदर दबा रहने दिया जाए। गत वर्ष राष्ट्रीय सरकारों,संयुक्त राष्ट्र एजेंसी एवं नागरिक समाज पहली बार ओस्लो (नार्वे) में परमाणु हथियारों के मानवों पर प्रभाव विषय पर आयोजित पहले सम्मेलन में मिले थे। इसके बाद अक्टूबर 2014 में मेक्सिको में ऐसी ही बैठक में संयुक्त राष्ट्र संघ के 193 में से155 सदस्य देश मिले और उन्होंने सं. रां साधारण सभा हेतु साझा वक्तव्य भी तैयार किया। इससे परमाणु हथियारों के विरुद्ध वातावरण का निर्माण पुनः आंरभ हुआ है।

तमाम विरोधों के बावजूद इस वक्त दुनिया में करीब 17000 परमाणु हथियारों का भंडारण है जबकि शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद रूस एवं अमेरिका ने बड़ी मात्रा में इन हथियारों को नष्ट किया है। आस्ट्रेलिया के समूहों का मानना है कि यह सही वक्त है जबकि आस्टेªलिया भी उन देशों में शामिल हो जाए जो कि परमाणु हथियारों के विरोध में है। हाल ही में रेडक्रास द्वारा यहां किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि 10 में से 8 आस्टेªलियाई नागरिक इन हथियारांे के खिलाफ हैं। गौरतलब है विकिरण के प्रभाव समय व स्थान तक सीमित नहीं हैं। इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य, कृषि और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता रहेगा। गौरतलब है आस्टेªलिया के देशज समुदायों में अब यूरेनियम के दुष्प्रभावों को लेकर जागरुकता बढ़ती जा रही है।

सन्1984 में समुदायों की परमाणु परीक्षण संबंधी बढ़ती चिंताओं के मद्देनजर आस्टेªलिया की सरकार ने मारालिंग रायल कमीशन का गठन किया। इसमें विकिरण के प्रभाव एवं रेडियोएक्टिव पदार्थ एवं जहरीले पदार्थों के निपटान के दौरान संपर्क में व्यक्तियों के संरक्षण को ध्यान में रखा गया था । रोजमेरी नामक एक कार्यकर्ता का कहना है कि गुप्त फाइलें सन् 2003 तक यानि परमाणु परीक्षण के 50वर्ष बाद तक तो उपलब्ध ही नहीं थीं। यहां सभी को मालूम था कि प्लूटोनियम 239 को इस क्षेत्र में खुले में रखा गया था। यह जहर मिट्टी  में आ   गया है, हवाओं के माध्यम से सब ओर फैल गया और लोग इसी में सांस ले रहेे हैं। इतना ही नहीं जंगली झाड़ी जिन्हें आप खाते हैं वह भी प्रदूषित हो चुकी है।

गौरतलब है इस संदूषण के बावजूद कुछ लोगों का दावा है कि यह क्षेत्र सुरक्षित है और वे इस क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देना चाहते हैं। इस पूर्व परीक्षण स्थल की सफाई की जिम्मेदारी संघीय सरकार की है। मारलिंगा क्षेेत्र की सफाई के निरीक्षण के लिए सरकार द्वारा नियुक्त एलन्ष पार्किसन्स का कहना है कि यहां पर व्यापक प्रदूषण है और करीब 100 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को अभी भी साफ किया जाना है। यह प्लूटोनियम 239 है और आगामी 24000 वर्ष बाद भी यहां उसमें से आधा तो मौजूद रहेेगा।

रोजमेरी का कहना है कि परमाणु परीक्षण के परिणाम स्वरूप अनेक लोगों की तो तत्काल  मृत्यु हो गई थी, लेकिन कई लोग लंबी बीमारी के साथ जीवन बिता रहे हैं, जिनमें कैंसर व विकलांगता प्रमुख हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग मानसिक अवसाद व मानसिक बीमारियों से भी ग्रस्त हैं। इसके जबरदस्त विपरीत सामाजिक प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। इसने न केवल संस्कृति का नाश किया है बल्कि लोेगों को और भी अंधेर में धकेल दिया है। परमाणु निषेध के पैरोकार चाहते हैं कि सरकार इस    विध्वंस में अपनी भूमिका स्वीकारे एवं यूरेनियम के खनन पर रोक लगाए। ए. एन. एफ. ए. की बैठक में यह बात सामने आई है कि आस्टेªलिया के सैन्य प्रशिक्षण के दौरान 40 हजार राउंड यूरेनियम बुझे हथियार तैनात किए गए थे। इससे स्वास्थ्य पर पड़ रहे विपरीत प्रभावों का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि सरकार संबंधित शोध के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराए। साथ ही पीड़ितों को यथोचित मुआवजा भी दें तथा बीमार लोेगों की चिकित्सा प्रक्रिया पर भी पुनर्विचार करे। इसके अलावा जिन लोगों की  जमीनें अधिग्रहित की गई थीं या बर्बाद हुई हैं उन्हें भी पर्याप्त मुआवजा दिया जाए। वैसे लोगों को आशा है कि विएना सम्मेलन की वजह से त्रासदी के बचे लोगों में उम्मीद जगी है और वे एक परमाणु हथियार मुक्त विश्व के सपने की आकांक्षा रख रहे है।

(नीना भंडारी ,आस्ट्रेलिया के सिडनी में विदेशी संवाददाता हैं एवं इंटर प्रेस सर्विस और  इन डेप्थ न्यूज जैसी अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के लिए लिखती हैं। )

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