भू-अधिग्रहण : आग को सरकारी न्यौता

विकास हित में भूमि अधिग्रहण को सरकार और उद्योगों के लिए सुगम बनाने की मोदी सरकार की पहल ने मानो आग को न्यौता दे दिया है। सन 2013 का भू-अधिग्रहण कानून बदलने के अध्यादेश से देशभर में किसानों के बीच जो असंतोष फैला उसका एक नतीजा दिल्ली के ग्रामीण मतदाताओं के मतदान में दिखा, जिन्होंने भाजपा को एक भी सीट नहीं दी और जिस आम आदमी पार्टी को उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में ठुकराया था उसकी झोली भर दी। पेश है आउटलुक से साभार नीलाभ मिश्र का आलेख;

इस मसले पर पैदा किसानों के असंतोष ने जहां जनआदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय, एकता परिषद तथा विभिन्न किसान संगठनों को ताजा आंदोलनात्मक कार्रवाई के लिए प्रेरित किया वहीं जनलोकपाल अभियान की विफलता के बाद से निढाल पड़े अण्‍णा हजारे में भी नई फूंक भर दी। साथ ही कांग्रेस से लेकर पूर्व जनता दल के विभिन्न घटकों और अन्य क्षेत्रीय विपक्षी दलों को भी तालमेल की राजनीति के लिए एक साझा मसला दे दिया। यहां तक कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भी अकाली दल, शिवसेना और स्वाभिमान पक्ष जैसे घटकों को बिलगा दिया तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के विभिन्न घटकों और भारतीय जनता पार्टी के भी मोदी से हतप्रभ सूरमाओं के लिए भी शंका की एक लीक खींच दी। कुल मिलाकर मोदी तेवर कैसे भी दिखाएं, उनके सामने कुआं और खाई की स्थिति मुंह बाए खड़ी है। इसलिए सरकार ने सार्वजनिक संकेत भी दोतरफा और अंतर्विरोधी दिए हैं।

एक तरफ सरकार ने मंजूरी के लिए अपना अध्यादेश संसद के सामने पेश किया है और अपने सांसदों को ललकारा है, भूमि अधिग्रहण के मसले पर जनता के बीच विपक्षियों के फैलाए इस 'मिथक’ को ध्वस्त करो कि सरकार का अध्यादेश और प्रस्तावित विधेयक किसान विरोधी है। आश्चर्य नहीं कि आनन-फानन में भाजपा ने प्रधानमंत्री को प्रतिध्वनित करते कई ट्वीट किए और दावा किया कि सरकार तो किसानों का मुआवजा चार गुना बढ़ा रही है। दूसरी तरफ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने किसानों एवं भूमि अधिग्रहण पर अलग राय रखने वाले अन्य विपक्षियों और एनडीए के सहयोगियों की चिंताओं पर संवाद के लिए एक कमेटी बनाकर यह संकेत दिया कि जरूरत पड़ी तो सरकार कुछ समझौते कर सकती है। लेकिन मोदी अड़ें या झुकें दोनों ही हालतों में उन्हें नुकसान की भरपाई के तरीके ढूढ़नें होंगे।

झुकते हैं तो यह तमाम तरह के विपक्षियों के सामने मोदी की हार मानी जाएगी। मजबूत नेता की उनकी सावधानी पूर्वक निर्मित छवि में भी छेद हो जाएंगे। कॉर्पोरेट जगत का विश्वास भी उनमें डगमगाने लग जाएगा। भारत में निवेश के लिए खुले हाथों आमंत्रित की जा रही अंतरराष्ट्रीय पूंजी इसे वादाखिलाफी या नेतृत्व की कमजोरी मान सकती है। खून चख चुका विपक्ष नए हमलों के लिए रणनीतियां तलाशने लग जाएगा।

अगर मोदी अड़ते हैं और संसद के संयुक्त सत्र में बहुमत कर बुलडोजर चलाकर नया भू-अधिग्रहण कानून पास करवा लेते हैं तो उसे लागू करने का संकट आएगा। असंतुष्ट और आशंकित किसानों का जगह-जगह भड़का प्रतिरोध कुचलने के लिए सरकार को बल का प्रयोग करना पड़ेगा। इससे ग्रामीण मतदाता और भड़केंगे जिसका असर कानून व्यवस्था और आने वाले चुनावों पर पड़ सकता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आंदोलनकारी किसानों के मंच से घोषणा की कि वह दिल्ली में नया भू-अधिग्रहण कानून नहीं लागू करेंगे। यह कहकर उन्होंने तमाम विपक्ष शासित राज्यों के सामने यह विकल्प भी पेश कर दिया कि वे चाहें तो अपने-अपने राज्यों में यह केंद्रीय कानून न लागू करें। अब अगर भाजपा शासित राज्यों के किसान यह देखेंगे कि विपक्ष शासित राज्यों में यह कानून नहीं लागू हो रहा तो उनका भी असंतोष और बढ़ेगा। वे भी भाजपा नीत अपनी राज्य सरकारों पर भी अन्य राज्यों की तरह आचरण का दबाव बना सकते हैं। कुल मिलाकर पास भी हो जाए तो नया कानून हर जगह सुगमता से लागू होने में कई कठिनाईयां पेश आएंगी। यह परिस्थिति कॉर्पोरेट अपेक्षाओं पर भी पूरी तरह खरी नहीं उतरेगी। इस हालत में भी उनका विश्वास बनाए रखने के लिए मोदी को अन्य प्रयास करने होंगे।

कुल मिलाकर विकास की जिन अपेक्षाओं को लेकर नरेंद्र मोदी और कॉर्पोरेट जगत चल रहे हैं उसके अंतर्विरोध वे नही देख पा रहे हैं। भारत जैसे अनगिनत वर्गीय और क्षेत्रीय विषमताओं एवं असंतुलन वाले देश में केंद्र विकास की भैंस एक ही लाठी से नहीं हांक सकता। कहने को मोदी सरकार किसानों का भला करने का दावा कर रही है लेकिन भू- अधिग्रहण के लिए उनकी सहमति, उनपर पड़ने वाले विस्थापन आदि सामाजिक असर का मूल्यांकन और पुनर्वास उन्मुख मुआवजे के सर्वमान्य सिद्धांत की उपेक्षा किसानों और कृषि आधारित आजीविका वाले अन्य तबकों के हित में नहीं ही कही जा सकती। हमारे उपर्युक्त विश्लेषण के अनुसार यह देश के समग्र विकास की राह में सामाजिक, राजनीतिक रोड़े ही पैदा करेगी।


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