भू-अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द कराने के लिए देश भर में होगा किसान आंदोलन : डॉ सुनीलम

भूमि अधिग्रहण का अध्यादेश भाजपा का किसानों के प्रति रुख को साफ़ करता है !

अध्यादेश की प्रति मिलते ही यह बिलकुल साफ़ हो गया है कि जितना हमने सोचा था, यह अध्यादेश उससे भी ज्यादा दमनकारी और किसानों के हितों के विरुद्ध है और भाजपा के कोर्पोरती चरित्र को जाहिर करता है;
  1. इससे पहले निजी उद्देशों के लिए किया जाने वाला अधिग्रहणए कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत श्निजी कंपनियोंश् तक ही सीमित था । अब यह किसी भी ष्निजी संस्थाश्ए जिसमें स्वामित्व या  साझेदारीए  गैर सरकारी संगठन या किसी अन्य संस्था शामिल हैंए के लिए बढ़ा दिया गया है ।
  2. बुनियादी सुविधाओं के नाम पर अब सरकार निजी शिक्षण संस्थानों और निजी अस्पतालों के लिए जमीन का अधिग्रहण कर सकते हैए जिन्हें पहले मूल अधिनियम से बाहर रखा गया था. (सेक्शन 1 b (i)  में शंशोधन)
  3. रक्षा से संबंधित सभी परियोजनाओं को छूट दी गई है । महत्वपूर्ण बात यह है कि श् रक्षा श् की परिभाषा में अब श्कोई भी परियोजना जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैश् और श्रक्षा उत्पादनष् को शामिल किया गया है । इस परिभाषा में सभी प्रकार की ढांचागत परियोजनाएं और निजी स्वामित्व वाली परियोजनाएं  आ सकती हैं. (नए सेक्शन 10 A  का जोड़ा जाना)
  4. मूल अधिनियम ने उन किसानों को राहत दी थी जिनकी भूमि 5 साल से अधिक समय से अधिग्रहित तो कर ली गयी थी लेकिन अब तक प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी द्य ऐसे किसानों को नए कानून के तहत मुआवजे का लाभ दिया जाना था। लेकिन अब यह संशोधन लाभ केवल उन मामलों तक ही सिमित करता है जिन में देरी किसी भी न्यायिक आदेश या लंबित मामले के कारण नहीं हुई थी द्य इसकी समयसीमा भी अब ५ से बढाकर १० कर दी गयी है. (सेक्शन 24 (2) में संशोधन)
  5. किसी भी सरकारी अधिकारी द्वारा इस अधिनियम के उल्लंघन के लिए सजा का जो कड़ा प्रावधान मूल अधिनियम में थाए अब उसे उलट दिया गया है। पहले विभाग के प्रमुख को जिम्मेदार ठहराया गया था अगर  उल्लंघन उनके ज्ञान और मिलीभगत के साथ हुआ हो तो द्य संशोधन इस प्रावधान को न सिर्फ हटाता है बल्कि वास्तव में ब्ब्च् की धारा 197 के तहत सरकार के अधिकारियों के लिए विशेष उन्मुक्ति प्रदान करता है। संशोधन के हिसाब से सरकार से मंजूरी के बिना इस अधिनियम का उल्लंघन करने के लिए किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं हो होगी । (सेक्शन 87 में संशोधन)
  6. 5 साल के भीतर अगर अधिकृत भूमि का उपयोग नहीं होता तो उसे मूल मालिक को लौटने का प्रावधान हटा दिया गया है । अब सरकार बिना उपयोग किये हुए भी भूमि अपने पास लंबे समय तक रख सकती है, अगर परियोजना के लिए निर्धारित अवधिष् लंबी हो तो. (सेक्शन 101 में संशोधन)
  7. सरकार ने खुद को नए कानून को लागू करने में आई किसी भी श्कठिनाई को हटानेश् के लिए नए नोटिफिकेशन जारी करने की समय सीमा को दो से बढाकर पांच साल कर लिया हैए ताकि किसानों के जमीन की लूट आशन बनी रहे । (सेक्शन 113 में संशोधन)
समाजवादी समागम के राष्ट्रीय संयोजक, जनआन्दोलनों के राष्ट्रीय समन्वय के राष्ट्रीय संयोजक, किसान संघर्ष समिति के कार्यकारी अध्यक्ष एवं पूर्व विधयक डॉ सुनीलम ने भू-अधिग्रहण के संबंध में लाये गए अध्यादेश को कार्पोरेट को किसानो की लूट की छुट देने वाला किसान विरोधी अध्यादेश बत्ताते हुए नए अध्यादेश को तत्काल रद्द करने की मांग की है. डॉ सुनीलम ने कहा कि भू अधिग्रहण कानून किसानो के पक्ष के सभी प्रावधानों को संसोधित कर कानून को अंग्रेजी राज के कानोंन से भी बदत्तर बना दिया है जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.

डॉ सुनीलम ने कहा कि किसानों ने बड़ी कुर्बानिया दे कर तथा सतत आन्दोलन चलाकर कई बार राज्य सरकारे पलटकर अंग्रेजो के बनाये हुए भू-अधिग्रहण कानून को रद्द कराने में सफलता प्राप्त की थी. डॉ सुनीलम ने कहा कि नए भू.अधिग्रहण कानून को बनाने के लिए संसदीय समिति के समक्ष सुश्री मेधा पाटकर जी के नेतृत्व में कई बार जन आन्दोलनो के राष्ट्रीय समन्वय का पक्ष रखा गया था. संसदीय समिति के अध्यक्ष इंदौर से भाजपा की सांसद तथा अब वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष थी सभी दलों की सहमती के आधार पर संसद में चर्चा के बाद सर्वसम्मति से भू अर्जन में पारदर्शिता एवं सही पुर्नवास कानून 2013 पारित क्या गया था.

डॉ सुनीलम ने कहा कि हाल ही में संपन्न हुए संसद सत्र के दौरान सरकार द्वारा भू-अधिग्रहण कानून में संसोधनो को लेकर चर्चा न कराया जाना यह बताता है कि केंद्र सरकार संसदीय लोकतंत्र को ठेंगा दिखाकर कार्पोरेट की सेवा के लिए दृढसंकल्पित है. पीपीपी प्रोजेक्ट के लिए 70 तथा निजी कंपनियों के लिए 80 फीसदी प्रभावित किसानों की सहमति की अनिवार्यता के प्रावधान को समाप्त किया जाना, सोशलइम्पेक्ट अध्ययन की अनिवार्यताए न्यूनतम बहुफसली खेती की जमीन के अधिग्रहण करने के प्रावधानों को समाप्त करने तथा धारा 24 (2) में 5 वर्ष की समय सीमा समाप्त करने से विकास परियोजनाओं के नाम पर जमीन की लूट को क़ानूनी मान्यता मिल जाएगी. एनएपीएम, किसान संघर्ष समिति ने कहा कि अंग्रजो के 1894 में बनाये गए कानून में बदलाव इसलिए किया गया था ताकि विकास के नाम पर जबरदस्ती किए जा रहे अधिग्रहण से किसानो के साथ हो रहे तीब्र टकराव को समाप्त किया जा सकेद्य वर्तमान अध्यादेश टकराव को बढाएगा देश में अशांति पैदा होगी.

डॉ सुनीलम ने बताया कि मोदी सरकार के गठन के बाद से ही यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि सरकार द्वारा अब तक बने जनमुखी कानूनों में बदलाव किया जाएगा पहले श्रम कानून बदलने तथा अब भू-अधिग्रहण अध्यादेश लाने से वह आशंका सही व्यक्त हुई है उन्होंने कहा कि तारा (रायगढ़) में 10-11 अगस्त को आयोजित समाजवादी समागम में, 31अक्टूबर - 2 नवम्बर, पुणे में आयोजित एनएपीएम के राष्ट्रीय अधिवेशन में तथा ढिंकिया ओड़िसा में 29-30 नवम्बर को आयोजित जनसंघर्षो के राष्टीय सम्मलेन में भू-अधिग्रहण को लेकर राष्टीय आंदोलनों की रुपरेखा तय की गई थी. आगामी 12 जनवरी 2015 को मुलताई में तीनों समूहों के प्रतिनिधि मिलकर भू-अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द कराने की रुपरेखा तय करेंगे.

डॉ सुनीलम ने कहा कि मुलताई में आयोजित किए जा रहे 17वें शहीद किसान स्मृति सम्मेलन में केंद्र सरकार के भू-अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द कराने को लेकर जनसंगठनों द्वारा किसान घोषणा पत्र 2015 जारी किया जायेगा तथा भावी आन्दोलन की रूप रेखा पर चर्चा करेंगे.
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