भोपाल गैस त्रासदी : और हमें देखते रहे !


आज 3 दिसम्बर को भोपाल गैस त्रासदी को 30 साल हो रहे हैं. 3 दिसम्बर 1984 भारतीय इतिहास का बहुत ही दुखद दिन है – जब भोपाल दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिकीय त्रासदी का साक्षी बना जिसमें तक़रीबन 20,000 लोगों की मौत हुई और हजारों लोग घायल हुए. इस खतरनाक गैस के लीक होने से करीब पांच लाख से ज्यादा की आबादी प्रभावित हुई और इस घटना के कारण उनतीस साल बाद भी भोपाल में हर दिन एक मौत हो रही है। पेश है चिन्मय मिश्र का भोपाल गैस त्रासदी का विशलेषण करता आलेख जिसे हम सप्रेस से साभार आपसे साझा कर रहे है ।
भोपाल गैस त्रासदी को इस 3 दिसंबर को 30 बरस हो जाएंगे। त्रासदी में अनुमानतः 15 हजार से 22 हजार लोग मारे गए थे और 5,70,000 भोपाल निवासी या तो घायल हुए या बीमार और अब तक घिसट-घिसटकर अपना जीवन जी रहे हैं। इन तीस वर्षों में कांग्रेस, भाजपा, कम्युनिस्ट, समाजवादी, तृणमूल से लेकर अन्नाद्रमुक व द्रमुक जैसे क्षेत्रीय दल केंद्र सरकार  पर काबिज हुए और चले गए। यानि ताज उछाले भी गए और तख्त गिराए भी गए, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। लेकिन हम देखते ही रहे।

इन तीन दशकों में न्यायालयों से आए एकमात्र फैसले में कुछ लोगों को नामालूम सी प्रतीत होने वाली सजाएं भी हुई और वे जमानत पर छूट गए। इस पूरी त्रासदी का मुख्य सूत्रधार वारेन एंडरसन अपनी 90 बरस से अधिक की आयु प्राप्त कर अमेरिका में चैन की नींद सो गया और हम यहां दस्तूर की तरह हर बरस उसका पुतला जलाते और अगले बरस का इंतजार करते रहे। प्रभावितों के संगठन अपनी लंबी थका देने वाली संघर्ष याया के बावजूद डटे रहे हैं, लेकिन वे भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाए। कलंक भरे इन तीन दशकों ने भारत नामक राष्ट्र की परिकल्पना और उसके सरोकारों पर बढ़े प्रश्न खड़े किए हैं। भोपाल के थानों में आज यूनियन कार्बाइड के अधिकारियों के बजाए संभवतः पीड़ितों पर अधिक मुकदमें दर्ज हैं। इससे जाहिर होता है कि लोकतंत्र में अंततः सरकारें अपने ही लोगों के सामने होती हैं।

न्यायालयीन व कानूनी प्रक्रिया की आड़ में भोपाल गैस त्रासदी पीड़ित कमोवेश धीरे-धीरे दुनिया छोड़ रहे हैं और कुछ वर्षों में उनके संस्मरण भी संभवतः हिरोशिमा परमाणु बम प्रभावितों की तरह सारी दुनिया को झकझोरेंगे। परंतु यहां स्थितियां भिन्न हैं। हिरोशिमा युद्ध का शिकार हुआ था और यहां हम कथित विकास का शिकार हुए हैं। हां, एक समानता जरूर है कि इन दोनों ही त्रासदियों में अमेरिका की शत-प्रतिशत भागीदारी थी। एक में सरकार के और दूसरे में कंपनी के माध्यम से। यानि युद्ध हो या विकास दोनों में अमेरिका का व्यवहार एक सा ही होता है। गौरतलब है सन् 1973 में ऑस्कर पुरस्कार को ठुकराते हुए प्रसिद्ध अभिनेता मार्लन ब्रांडो ने कहा भी था कि एक स्तर के बाद अमेरिका अपना प्रभुत्व स्थापित करने में दोस्ती  व दुश्मनी की सीमा को भूलकर एक सी क्रूरता पर आमादा हो जाता है। अपने अनूठे लेख एनिमल फार्म भाग-2 में अरुंधति राय, तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश का भाषण कुछ इस तरह लिखती हैं, “अमेरिका में हम अलमारी में बम नहीं, प्रेत रखते हैं। हमारे प्रिय प्रेतों के भी प्यार से बुलाने वाले नाम हैं। उन्हें शांति, स्वाधीनता और मुक्त बाजार कहा जाता है। उनके असली नाम क्रूज मिसाइल, डेजी कटर और बंकर बस्टर है। हम क्लस्टर बम भी पसंद करते हैं। हम उसे क्लेयर कहकर बुलाते हैं। वह सचमुच बहुत खूबसूरत है और बच्चे उसके साथ खेलना पसंद करते हैं और फिर वह उनके चेहरे पर फट पड़ती है और उन्हें लंगड़ा लूला बना देती है या मार देती है।“

तो हम विकास के अमेरिकी क्लेयर से खेल रहे हैं? विश्व व्यापार संगठन को लेकर हुआ हालिया टीएफए समझौता भारत के गरीबों व किसानों के लिए क्लेयर से कम साबित नहीं होगा। परंतु इस सबके बीच सवाल यह उठ रहा है कि अंततः हमारी सरकारें कर क्या रही हैं? भोपाल गैस कांड में मृतकों की बढ़ती संख्या को लेकर दायर मुकदमें में अब तो म.प्र. सरकार हिस्सेदारी ही नहीं करना चाहती। केंद्र सरकार के एजेंडे से तो यह त्रासदी बहुत पहले बाहर हो चुकी है और सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, जिला न्यायालय व सत्र न्यायालय पिछले तीस वर्षों से अपने-अपने तर्कों और कानून के दायरों में इस मामले में न्याय करने हेतु प्रयासरत हैं। मजेदार बात यह है कि भारत की सरकारें उद्योग स्थापित करने की औपचारिकताएं पूरा करने के लिए समय सीमा तय करने में दिन रात एक कर रही हैं। वहीं अपनी इस आपाधापी में यह भूल रही हैं कि राज्य का या व्यवस्था का मुख्य कार्य व्यापार को प्रोत्साहित करना नहीं वरन उसके शासन की परिधि में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति फिर वह चाहे अमीर हो या गरीब न्यायपूर्ण व्यवस्था उपलब्ध कराना है। यह बात ही समझ से परे है कि भोपाल गैस पीड़ितों को न्याय व मुआवजा दिलवाना किस तरह सिर्फ गैर सरकारी संगठनों की ही जवाबदारी बनकर रह गया?

वहीं दूसरी और देश व दुनियाभर के संगठनों की आवाजें सरकार को इस दिशा मेें बाध्य क्यों नहीं कर पा रही हैं? सन् 1984 के बाद अमेरिका के कमोवेश सभी राष्ट्रपति और भारत के अधिकांश प्रधानमंत्रीयों ने एक दूसरे के देशों का औपचारिक दौरा किया है। लेकिन इस मामले पर कभी भी कोई सार्थक या स्पष्ट चर्चा सामने नहीं आई। इस गणतंत्र दिवस पर बराक ओबामा विशेष अतिथि के रूप में आ रहे हैं। क्या भारत सरकार उनसे इस विषय पर बात करने का साहस दिखाएगी? गैस प्रभावित अब अमेरिका के न्यायालयों में भी न्याय की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें हर जगह से निराशा ही हाथ लग रही है। बीसवीं सदी के नौवे दशक में हुई त्रासदी को इक्कीसवीं सदी का पहला दशक भी किसी परिणिति पर नहीं पहुंचा पाया। हमारी सारी लड़ाई अब मृतकों की संख्या और मुआवजे के इर्दगिर्द समेट दी गई है। ऐसा अनायास नहीं हुआ। सब कुछ एक सोची समझी रणनीति के तहत हुआ और पीड़ित समुदाय इस मकड़जाल में फंस गया और अब वह बाहर निकलने के लिए जितने अधिक हाथ पैर मारता है उतना ही उलझता जाता है।

भोपाल से लेकर दिल्ली तक और दिल्ली से लेकर अमेरिका तक लोग इस 3 दिसंबर को पुनः इस त्रासदी के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करेंगे। ऐसी खबर है कि केनेडा का वाद्यवृंद इस अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम भोपाल में देगा। इस दिन के लिए बनाए गए विशिष्ट गाने की एक पंक्ति का भावार्थ है, ''उस दिन जो हवा चली वह आपके लिए विकास का जहर भरा उपहार लाई।'' मूल बात यह है कि वह जहरीला विकास अब और अधिक विनाशकारी ढंग से हमारे सामने आ रहा है और हमारा शहरी मध्य वर्ग उस विकास के यशोगाथा गायन में मंजीरा बजा रहा है।

ऐसेे में आज की सबसे बड़ी जरूरत है कि हम विरोध करने की बंधी-बंधाई रस्मों से बाहर निकले और इस त्रासद दिन को विकास की नई अवधारणा के मूल्यांकन का दिन माने। हम सभी देख रहे हैं कि सरकारों की निगाहें कहीं हैं और निशाना कहीं और। हमेें अब उनकी आंखों में आंखे डालने के बजाए उस स्थान
ध्यान लगाना होगा जहां पर कि वे निशाना लगाना चाहते हैं। कैग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्रों) की वजह से राष्ट्र को प्रत्यक्ष करों की गैरअदायगी से सीधे-सीधे 84 हजार करोड़ रु. का नुकसान हुआ है और यदि पूरी कर हानि की गणना करें तो यह राशि करीब 1.75 लाख करोड़ रु. तक पहुंचती है। वहीं भोपाल गैस पीड़ित कितने मुआवजे की मांग कर रहे हैं? मगर सरकारों को इस तरह से सोचने की आदत ही नहीं है। जनआंदोलनों कोशिश होना चाहिए कि सरकारों को इस तरह से सोचने की आदत पड़े। देशभर में चल रहे संघर्षों को अब नए सिरे से विमर्श करना होगा और एकजुटता बनानी होगी। कुछ ऐसे उपाय सोचने होंगे जिससे कि शासन तंत्र को उनके पास आने को मजबूर होना पड़े और पीड़ित को याचक बनने की पीड़ा से मुक्ति मिल सके।

हमने ताज भी उछाल दिए, तख्त भी गिरा दिए लेकिन मनचाहा निजाम उस नए मसनद पर अभी तक नहीं बैठा पाए।


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