नर्मदा घाटी में हजारों आदिवासियों ने ज़ाहिर किया मालिकाना हक !

भू.अर्जन निरस्त होने से सरदार सरोवर को नए  2013 कानून की  चुनौती !

बडवानी (मध्य प्रदेश) नर्मदा घाटी के सरदार सरोवर प्रभावित बडवानी जिले के गाँवों के सेंकडो किसानो मजदूरों मछुआरो ने जिलाधीश कार्यालय पर जाकर अपने व्यक्तिगत आवेदन देकर यह ज़ाहिर किया की डूब.क्षेत्र की जिन ज़मीनों का तथा मकानों या अन्य संपत्ति का 5 या अधिक साल (कई गाँवों में 10 तो कहीं 15 साल पहले भी ) पहले भूमि अधिग्रहण हुआ था लेकिन शासन ने आजतक उस संपत्तिका भौतिक कब्ज़ा नहीं लिया और जो उन प्रभावितों के कब्ज़े में आज भी है उसका मालिकाना हक उन्हें फिर से प्राप्त हुआ है ।

यह घोषणा 'भूमि  .अर्जन पुनर्वास और पुनव्यस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013'  की धारा 24(2) के तहत 24 अगस्त की बडवानी में हुई हजारो प्रभावितों की विशाल रैली  में हो चुकी थी लेकिन आज गाँव.गाँव के लोगो ने अपने व्यक्तिगत आवेदन पत्रों के साथ जिलाधीश महोदय के कार्यालय पर जाकर अधिकृत रूप से उन पत्रों को सादर करते हुए यह मांग की है की प्रशासन और शासन यह अधिकार मान कर भूमि स्वामियों को ऋण पुस्तिका जल्द से जल्द अदा करें ।  यही स्थिति में 'भूमि .अधिग्रण कानून 1894 ' के तहत पूर्व में अधिग्रहित जिन मकानों की है उन मकानों के मालिको को भी  1-1-2014 से अपना हक फिर से प्राप्त हुआ है इसलिए इसके प्रमाण पत्र भी प्रशासन देकर वर्षो पूर्व का भ.अर्जन व्यपगत होने की नोंध करे, वह भी तत्काल ।

ज़ाहिर है की सालो पहले भू.अर्जन करके  सरदार सरोवर जैसी जिस परियोजना में नहि पुनर्वास की (वह भी लाखो की) तैयारी/ योजना उपलब्ध होती  है, ना  उसके लिए आवश्यक वित्तीय या ज़मीन जैसे संसाधन और नाही परियोजना के लागत के लिए ज़रूरी आर्थिक व्यवस्था या पर्यावरणीय कानून व शर्तो के पालन के लिए भी  कोई आयोजन.....ऐसी परियोजना के लिए  भी अर्जेंसी धारा भी लगा कर भूमि, मकान, कुंए, पेड़ पाइप.लाइन जैसी सम्पति का भू.अर्जन किया जाता है  उस समय की गाइडलाइन्स (शासकीय बाज़ार मूल्य)  के आधार पर बहुत कम मुआवजा देकर उन्हें भू अधिगृहित के बाद शासकीय योजनाओं के कई लाभों से (जैसे की कर्जा) वंचित रखा जाता है  इतने कम मुआवज़े से जैसे की सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र के प्रभावित पुनर्वास स्थल पर दूसरा मकान भी  नहीं निर्माण कर सकते है ।  पुनर्वास नीति  में मूल मकान के जैसा ही दूसरा मकान का निर्माण करने के लिए ज़रूरी इतनी रकम मुआवज़े के रूप में देना ज़रूरी था, लेकिन नहीं दिया गया।  कईयों का मकान सर्वेक्षण नज़रिया पद्धति से हुआ तो कईयों का बाक़ी रह गया ।

पुनर्वास के लाभ वैकल्पिक ज़मीन या घर.प्लाट सुवधाए  और मूल गाँव में थे वैसे और उतने तमाम सार्वजनिक स्थल ही आज तक किसी भी सरदार सरोवर डूब क्षेत्र के सभी परिवारों को मध्य प्रदेश शासन नहीं दे पाई ।

साल दर साल में पुनर्वास में धांधली, प्राप्त मुआवजा या अन्य लाभों  से दलाल और उनसे जुड़े अधिकारियों से लूट और भ्रष्टाचार इत्यादि बबाद पोल खोल होती रही, जांच आयोग उच्च न्यायलय से गठित होने से जांच भी 2008 से जारी रही है इससे स्पष्ट है की हज़ारो सरदार सरोवर विस्थापितों को कानूनी पुनर्वास नहीं मिलाद्य ऐसी इस्तिथि में आजए अपनी अधिग्रहित संपत्ति पर अपना भी भौतिक कब्ज़ा होते हुए अपना मालिकी हक जो नए भू.अर्जन कानून 2013 की धारा 24 (2) के तहत फिर से प्राप्त हुआ है ए उसे लेकर सरदार सरोवर के हज़ारो प्रभावितए अंशत: कई विस्थापित किसान मजदूरों मछुआरो का संघर्ष एक नए दौर में प्रवेश कर चूका है । इन हज़ारो परिवारों का लाखों लोगो का  हक कोई छीन नहीं सकता है ।  कानून इसके बारे में स्पष्ट है और पिछले कुछ महीनो में सर्वोच्चय अदालत से प्राप्त फैसलों से भी अधिग्रहण से जबरन संपत्ति छीने गए परिवारों को नए सिरे से मिले हकों की निश्चिती हो चुकी है ।

बडवानी जिले के गाँव वासियों ने 24 अगस्त  2014 के रोज़ इसकी सर्वप्रथम शुरुआत की शासन को चेतावनी दी जिसके गवाह रहे देश भर के विभिन्न संगठनो के सेंकडो साथी । आज उससे आगे का कदम व्यक्तिगत आवेदन पत्र ले जाकर  जिलाधीश महोदय को प्रसुत करते हुए रखा गया है ।  नर्मदा घाटी के लोग और हमारे आन्दोलन की ओर से देश भर के किसान भूमिहीन मजदूर और सभी को जो ब्रिटिश कालीन जबरन अधिग्रहण के कानून के आज तक भुक्त भोगी रहे है, हमारा ऐलान है की वह भी अपना हक विस्थापित करे।

देश में बढता विस्थापन और अन्याय, गैर बराबरी और विकास के  नाम पर मेहनत एवं प्रकृति के आधार पर सादगी और स्वालंबन से जीते आये लोगो पर होता आया अन्याय, अत्याचार और मुआवजा, पुनर्वास आदि में भ्रष्टाचार को चुनौती देने का यह एक रास्ता और मौका भी है ।

सरदार सरोवर को गैर कानूनी रूप से 17 मी. ऊंचाई बढाकर पहले से ही अधिक डूब और अन्याय करने को 12 जून 2014 के निर्णायक को इस आंदोलनकारियो की कानूनी पहल से चुनौती दी गई है ।  शासन प्रशासन प्रतिक्रिया ही नहीं 2013 का कानून सर्वदलीय मंज़ूरी संसद में पाकर ही लाया गया था, तो विभिन्न दलों को भी इस पर अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी ।


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