जुड़ती नदियाँ, बिखरता जीवन: केन-बेतवा नदीजोड़ परियोजना और आदिवासी विस्थापन

क्या है केन – बेतवा नदी गठजोड़

देश की तीस चुनिन्दा नदियों को जोड़ने वाली राष्ट्रीय परियोजना में से एक है केन – बेतवा नदी गठजोड़ परिजोना । इस लिंक हास्यास्पद पहलु ये है कि ग्रेटर गंगऊ बांध बन जाने के बाद दो बड़े बांध धसान नदी, माताटीला जल विहीन होंगे । रनगँवा बांध एक डूब क्षेत्र का बांध है इसमे बारिश का जल ठहरने से यह बांध की स्थति में है इसका क्षेत्रफल बड़े दायरे में विस्तार लिए है वही दौधन बांध को केन में तटबंध बनाकर रोका गया है जिसे गंगऊ बैराज कहते है ।

गंगऊ बैराज के अपस्ट्रीम से 2.5 किलोमीटर दूर दौधन गाँव में केन नदी पर ही 173.2 मीटर ऊँचा ग्रेटर गंगऊ बांध बनाया जाना है . यानि 24 किलोमीटर के दायरे में तीन बड़े बांध केन को घेरेंगे । इससे धसान नदी में पानी कम हो जायेगा जिसका असर माताटीला डैम पर पड़ेगा और अगर ऐसा हुआ तो केन बेतवा में पानी देने काबिल ही नही बचेगी।

कैमूर की पहाडिय़ों में अठखेलियां करने वाली केन और 500 किमी के सफर में 20 से ज्यादा बांधों से लदी बेतवा नदी है । केन नदी पर डोढऩ गांव में 9,000 हेक्टेयर में बांध की झील बनेगी। केन नदी की कुल लम्बाई से कुछ कम 212 किलोमीटर लम्बी कंक्रीट की नहर से केन नदी का पानी बरुआ सागर ( झाँसी ) में बेतवा नदी में डाला जायेगा । इसमे 72 मेगावाट के दो बिजलीघर भी प्रस्तावित है, केन जबलपुर के मुवार गाँव से निकलकर पन्ना की तरफ 40 किलोमीटर आकर कैमूर पर्वत मालाओं के ढलान पर उत्तर दिशा में आती है। तिगरा के पास इसमे सोनार नदी मिलती है ।

पन्ना जिले के अमानगंज से 17 किलोमीटर दूर पंडवा नामक स्थान पर इसमे 6 नदी क्रमशः मिठासन, श्यामरी, बराना छोटी नदियों का संगम होता है ।

छतरपुर जिले की गौरिहार तहसील को छूती हुई यह बाँदा ( उत्तर प्रदेश ) में प्रवेश करती है ,रास्ते में इसमे बन्ने,कुटनी,कुसियार,लुहारी आदि सहायक नदी मिलती है ।

दौधन बांध 1915 में बना था इसके समीप ही ग्रेटर गंगऊ डैम बनाया जाना है। कमोवेश बुंदेलखंड के अन्य बांधो की तरह ये सबसे बड़ा बांध विश्व बैंक के कर्जे से आदिवासी को विस्थापित करने और किसानो को पानी की लूट के लिए मजबूर करेगा । बुंदेलखंड के ईको सिस्टम का उलट जाना तो बांध के दंश में शामिल है ही।
आशीष सागर दीक्षित

सरकारी दस्तावेजो की माने तो पन्ना टाइगर रिजर्व पार्क के अन्दर बसे चार गाँव वर्ष 2010 में ही  विस्थापित कर दिए गए थे । लेकिन हकीकत में गाँव आज भी आबाद है । वहां प्राथमिक स्कूल में मध्यान्ह भोजन बन रहा है l  गरीब किसान मुआवजे की ताक में लगातार कर्जदार बनता जा रहा है । वहां सरकारी घुसपैठिये पहले की तरह आते – जाते है । आदिवासी के साथ ये विडंबना है कि विस्थापन के डर से वे न तो महानगरो में रोजगार के लिए जा पा रहे है और न खेतो में ।

पन्ना टाइगर रिजर्व पार्क और  बफर जोन ( प्रतिबंधित क्षेत्र ) में शामिल कुल 10 ग्राम विस्थापित किये जाने है । लेकिन जनसूचना अधिकार में 1 जुलाई वर्ष 2010 को जल संसाधन मंत्रालय ने लिखित जवाब दिया कि दौधन बांध ( ग्रेटर गंगऊ ) से प्रभावित होने वाले 10 गाँव में चार गाँव मैनारी,खरयानी , पलकोहा, एवं दौधन को वनविभाग विस्थापित कर चुका है । शेष छह गाँव में शुकवाहा, भोरखुआ, घुघरी,बसुधा,कूपी और शाहपुरा है जिन्हें विस्थापित किया जाना है l करीब 8500 किसान इससे प्रभावित होंगे लेकिन सरकारी आंकड़ो में मात्र 806 किसानो के विस्थापन का ज़िक्र है । इस दोहरेपन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अकेले दौधन ग्राम की जनसँख्या 2500 है ।

जंगलो से पकड़े जा रहे बाघों की तरह ये आदिवासी भी वनविभाग के गुलाम बनाये जा रहे है l इन्हे भी लोकतंत्र में वन्य जीवो की तरह आज स्वतंत्रता की दरकार है l बांध की जद में आने वाले आदिवासी पार्वती, शिवनारायण यादव ने बेबाकी से कहा कि 50 लाख रूपये मुआवजा चाहिए प्रति परिवार, जान देंगे मगर जमीन मुफ्त में नही देंगे , हमारी पीढ़ियाँ इन जंगलो की प्रहरी रही है जिसे वनविभाग ने उजाड़ दिया है ।

सरकारी कागज कहते है आदिवासी लोगो का पुनर्वास मध्यप्रदेश सरकार के ‘ राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण,वन विभाग,मध्यप्रदेश (एन.टी.सी.ए.) के माध्यम से किया जाना है । इन परिवारों के पुनर्वास – विस्थापन आदि  कार्य केंद्र सरकार की वर्ष 2007 एवं मध्यप्रदेश सरकार की आदर्श विस्थापन नीति में दिए गए मापदंडो के अनुरूप किया जायेगा। जिसमे आदिवासी के आर्थिक,सामाजिक,सांस्कृतिक आजीवका के साधनों की व्यवस्था की जानी है । गौरतलब है कि हाल ही में केंद्र की मोदी सरकार ने इस परियोजना को स्वीकृति दी है । पूर्व कांग्रेसी केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस परियोजना से पर्यावरण में दखलंदाजी होने के चलते अनुमति नही दी थी। पिछले दस वर्षो से गाँव रह – रहकर  सर्वे कार्य चल रहा है l इस बात का अहसास कराने के लिए कि घर से बेघर होने के लिए किसी भी क्षण तैयार रहो ।

उल्लेखनीय है कि प्रवास सोसाइटी ने टीम के साथ  इस परिक्षेत्र के गाँवो का दो दिवस भ्रमण किया है । आदिवासी परिवारों से बातचीत की गई जिसमे कई परिवारों के बुजुर्ग , युवा साथी शामिल रहे है । बांध क्षेत्र से प्रभावित होने वाले शुकवाहा गाँव के बलवीर सिंह, दौधन गाँव के गुबंदी कोंदर( अध्यापक ), मुन्ना लाल यादव और पलकोहा गाँव के ग्राम प्रधान जगन्नाथ यादव अपना अपने पूर्वजो को याद करते हुए विस्थापन का दर्द बतलाते है । प्रधान ने दावा किया है कि वनविभाग की निगहबानी में रहते है यहाँ दलित आदिवासी ।

आदिवासियों के लिए दिखलाये गए सब्जबाग से इतर बड़ी बात ये है हमें कभी इस बांध के बारे में कुछ नही बतलाया जाता है, उधर प्रति बीपीएल परिवार को मात्र 40,000 रूपये मुआवजा 2010 में मिली जनसूचना में जानकारी दी गई ।  तीन वर्ष पूर्व बांध परियोजना में लगभग 7,614.63 करोड़ रुपया खर्च का अनुमान था जो अब बढ़कर 11 हजार करोड़ रुपया के करीब है । यानि केंद्र सरकार आदिवासियों के पुनर्वास पर 1 हजार करोड़ रूपये भी खर्च नही करना चाहती है। इस केन – बेतवा लिंक में नहरों के विकास पर 6499 हेक्टेयर सिंचित कृषि जमीन अधिग्रहीत की जानी है। आदिवासी परिवारों की माने तो 40 हजार में तो बमीठा कसबे में ही आवास की जमीन नही मिलेगी छतरपुर,खजुराहो की तो बात ही अलग है । इनके अनुसार 2 लाख रूपये एक परिवार को मुआवजा सरकार के हिसाब से होता है एक परिवार को। केन – बेतवा नदी गठजोड़ की डीपीआर के मद्देनजर कोई संवाद आज तक आदिवासी लोगो के साथ केंद्र या मध्यप्रदेश की राज्य सरकार ने स्थापित नही किया है। वे इसकी परिकल्पना मात्र से निःशब्द हो जाते जब ये बात पत्रकारों के तरफ से निकलती है कि आपको तो विस्थापित किया जा चुका है कागजो में। लेकिन उनके निःशब्द होने में व्यवस्था के प्रति आक्रोश साफ दिखता है । सवाल उठता है कि विस्थापन हुआ है तो मुआवजा किसको दिया गया ? वे आज भी यही क्यों बसे है ?


पन्ना टाइगर के जंगलो में जो कोंदर, सोर आदिवासी कभी  मालिक हुआ करते थे आज वनविभाग के मर्जी बगैर एक लकड़ी तक जंगलो से नही उठा पाते है । गंगली सब्जियां तो दूर की बात है। बकौल श्यामजी कोंदर मेरा बचपन इन्ही जंगलो में गुजरा है जब उन यादो की तरफ पलटता हूँ तो जंगल शब्द व्यंग्य सा लगता है ! वो विशाल कैमूर का जंगल तो इन्ही वनविभाग के आला अफसरों ने लूट लिया । मोटे – मोटे पेड़ो के दरख़्त रात के अंधेरो में शेर की चमड़ी की तरह बेच दिए गए है l  बाघ,चीतल,हिरनों और अन्य का बसेरा हुआ करता था यहाँ मगर अब तो पट्टे वाले लाये हुए जोकर बसेरा करते है यहाँ जिन्हें कभी – कभार देखकर लोग पूर्णमासी के चाँद की तरह खुश हो लेते है l अब तो यहाँ मैदान और तबाही हाँ वो जंगल भी है जिनमे आदिवासी की लोक परम्परा अपनी अस्मिता को बचा पाने की जद्दोजहद अवसाद से लबालब है ।
 

  

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