राजस्थान के मज़दूर कंपनियों के हवाले, सरकार ने बदले श्रम कानून

राजस्थान सरकार द्वारा विभिन्न श्रम एवं औद्योगिक कानूनों में संशोधन कमोवेश उन परिस्थितियों में लौटना है जहां से संघर्ष कर दुनियाभर के मजदूरों ने अपने अधिकार प्राप्त किए थे। देशभर की ट्रेड यूनियनों, जनसंगठनों एवं गैरसरकारी संगठनों की इस विषय पर चुप्पी चौकाने वाली है। बढ़ते पूंजीवाद व उपभोक्तावाद की दौड़ में मानव अधिकारों के उल्लंघन की अनदेखी समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। पेश है गौतम मोदी का आलेख जिसे हम सप्रेस से साभार आपसे साझा कर रहे है.

राजस्थान सरकार द्वारा कारखाना अधिनियम में संशोधन का निर्णय समय की गति को दो सौ वर्ष पीछे ले गया है। संशोधन के अनुसार अब विनिर्माण प्रक्रिया में वर्तमान 10 की बजाए 20 कामगार जुड़े होने पर ही कारखाना अधिनियम में पंजीयन अनिवार्य होगा। यानि कि अब 19 कामगारों तक कारखाने के अंदर सुरक्षा प्रबंध से संबंधित कानूनी बाध्यता नहीं रहेगी। इस संशोधनों ने काम के घंटों, साप्ताहिक छुट्टी और बेहतर कार्य स्थितियों से संबंधित कानूनी संरक्षण को भी कमतर कर दिया है। सार्वभौमिक सुरक्षा के संघर्ष के परिणाम के तौर पर अनेक देशों में उन्नीसवीं शताब्दी में प्रथम कारखाना अधिनियम अस्तित्व में आया था। दूसरी ओर राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्तावित संशोधन हमें दो शताब्दी पीछे ले जा रहे हैं। सन् 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी के पश्चात कामगारों की सुरक्षा एवं स्वास्थ्य जोखिमों के दृष्टिगत कारखाना अधिनियम 1948 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए थे और नियोक्ता की जवाबदारी सुनिश्चित की गई थी।

कारखाना अधिनियम में संशोधन के साथ ही राजस्थान ने ठेका (संविदा) मजदूर (नियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम 1970, प्रशिक्षु अधिनियम 1961 एवं औद्योगिक विवाद अधिनियम 1948 की महत्वपूर्ण धाराओं में भी संशोधन किए हैं। ठेका मजदूर अधिनियम में संशोधन के अनुसार इस अधिनियम के लागू होने की सीमा 50 या अधिक कर दी गई है। जबकि देशभर में (राजस्थान सहित) वर्तमान में यह सीमा 20 या इससे अधिक है। ऐसे वातावरण में जहां कि लघु एवं मध्यम उद्योगों द्वारा कामगारों संख्या कम करके बताई जाती है, एक ही पते पर अनेक कारखानों की अनुमति प्राप्त हो जाती है और बिना किसी रुकावट से कारखाने के अंदर एक और कारखाना संचालित हो जाता है वहां 100 से भी ज्यादा कामगारों के काम करने के बावजूद वह संस्थान अब कारखाना अधिनियम एवं ठेका मजदूर अधिनियम के दायरे में बाहर ही रहेगा।

प्रशिक्षु अधिनियम मेें हुए संशोधनों के अनुसार, प्रशिक्षुओं को मिलने वाला प्रशिक्षु मुआवजे को नियोक्ता भी “साझा“ कर सकता है। इसी के साथ नियोक्ता को इस बात की स्वतंत्र्ाता दे दी गई है कि वह प्रशिक्षण अवधि के दौरान प्रशिक्षु को बर्खास्त भी कर सकता है और इसमें अस्थाई या संविदा श्रेणी में रखे गए प्रशिक्षु भी शामिल हैं। आजकल कम वेतन और अधिकारों से मुक्ति पाने के लिए यूनियन से बचने एवं सामुहिक मोलतोल के मद्देनजर विनिर्माण क्षेत्र में बड़ी संख्या में प्रशिक्षुओं को नियुक्त किया जाता है। इस संशोधनों का लक्ष्य इस प्रक्रिया को कानूनी संरक्षण उपलब्ध करवाना है। हालांकि सरकार कौशल निर्माण और नौकरीशुदा कर्मिकों की बात कर रही है, लेकिन इस संशोधन में प्रभावशाली ढंग से कुशल कामगारों को कामगारों की परिभाषा से बाहर कर उन्हें प्रशिक्षुकों की श्रेणी में डाल दिया है।

राजस्थान की भाजपा सरकार का देश के श्रम कानूनों के मूलभूत ढांचे में परिवर्तन के  प्रयास को औद्योगिक विवाद अधिनियम (आईडीए) 1948 के अनुच्छेद 5-बी में संशोधन से साफ समझा जा सकता है। इस अधिनियम की धारा 25 के अनुसार जिस भी कारखाने में 100 से अधिक कामगार हों उसे संस्थान बंद करने या कर्मचारियों की छंटनी हेतु पूर्व अनुमति ल्ोना अनिवार्य है। औद्योगिक विवाद अधिनियम के अध्याय 5-ब में तालाबंदी, छंटनी या बंद करने को ल्ोकर दो स्पष्ट प्रावधान हैं, (अ) संस्थान द्वारा इस हेतु बताए गए कारणों की विश्वसनीयता एवं उपयुक्तता (ब) कामगारों के हित। राजस्थान सरकार इस अधिनियम के अंतर्गत वर्तमान प्रावधान जो कि 100 कामगार है को बढ़ाकर 300 पर ले जाना चाहती है और इस हेतु वह कोई संतोषजनक कारण भी नहीं बताना चाहती। इस संशोधन के लागू होते ही 299 या उससे कम कामगारों वाले कारखाने जो कि अध्याय 5-अ से संचालित होतेथे को कर्मचारियों को बर्खास्त करने/छंटनी करने या ले-ऑफ (तालाबंदी) एवं संस्थान को बंद करने के लिए किसी पूर्व सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी।

औद्योगिक विवाद अधिनियम में हुए संशोधनों में “धीरे कार्य करो“ की विस्तृत परिभाषा दी गई है और अनुच्छेद 5 में इसे “खराब श्रम प्रक्रिया“ बताया गया है। यदि किसी कामगार को “धीरे कार्य करो“ जिसमें “नियम से काम करो“ भी शामिल है को अपनाने के लिए छंटनी, ले-ऑफ या बर्खास्त किया जाता है (इसमें उत्पादन का तयशुदा या औसत या सामान्य स्तर का उत्पादन भी शामिल है या लक्ष्य प्राप्त नहीं हो पाता है) तो भी तो यह संशोधन प्रस्तावित करता है कि कामगारों को किसी भी प्रकार के मुआवजे की पात्रता नहीं होगी।

वर्तमान संशोधन राजस्थान सरकार के सन् 1958 के उस प्रगतिशील कदम को भी वापस ले लेगा जिसमें कि ठेका श्रमिक को भी कामगार की परिभाषा में शामिल किया गया था। इसी के साथ संस्थान  में कामगारों की संख्या की गणना में ठेका श्रमिकों की गणना छूट की वजह से नियोक्ता अपने यहां इनकी संख्या 299 से नीचे रखने में आसानी से सफल हो जाएंगे। इतना ही नहीं मान्यताप्राप्त यूनियन के लिए जहां पहले 15 प्रतिशत कामगारों की ही सदस्यता अनिवार्य थी अब इसे बढ़ाकर 30 प्रतिशत किया जा रहा है। इससे ट्रेड यूनियनों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो जाएगा। इस प्रकार किया गया प्रत्येक संशोधन कामगारों के अधिकारों पर मूलभूत हमला है और नियोक्ताओं द्वारा अक्सर की जाने वाली अनुचित श्रम प्रक्रियाओं को सुरक्षा कवच उप  लब्ध कराना है।

राजस्थान की भाजपा सरकार द्वारा प्रस्तावित संशोधन देश के संविधान के अनुच्छेद 254 का उल्लंघन है। ज्ञातव्य है इसे बाद में न्यायिक समीक्षा ने भी उचित ठहराया था। इसमें स्पष्टतौर पर कहा गया है कि राज्यों को राष्ट्रीय कानूनों में संशोधन का अत्यंत सीमित अधिकार है और यह कठिनाईयों को निवारण और राज्य के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के विचार हेतु ही किए जा सकते हैं। पिछले दो दशकों के विकास के ढांचे ने निवेश को लेकर राज्यों के बीच तीव्र प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी है और इसकी परिणिति भूमि अनुदान, करों में छूट और गुजरात के मामले में तो निजी कंपनियों को बड़ी रकम के असुरक्षित ऋण या कमोवेश ब्याज रहित ऋणों के रूप में हुई है। राजस्थान भी अब नियमन में कमी कर रहा है जिससे मजदूरी में कमी आएगी और इससे राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा भी कटु होगी।

जहां तक कामगारों के अधिकारों की बात है पिछले दो दशकों से श्रम अधिकार लागू करने वाली प्रणाली पूरी तरह से निष्क्रिय है। यह तथ्य भी है कि छंटनी या बंद किए जाने वाले वातावरण का सामना केवल वहीं किया जा सकता है जहां पर कि लोकतांत्रिक यूनियनें आक्रामक तरीके से अपने सदस्यों को अधिकार दिलवाएं। ल्ोकिन यूनियन की अनुपस्थिति में बड़ी संख्या में कामगार सुरक्षाहीन हो जाएंगे। राजस्थान की भाजपा सरकार का निर्णय न तो निष्कपट है और न ही यह महज राजस्थान तक सीमित है। इसे केंद्र सरकार के उस निर्णय के तारतम्य में देखा जाना चाहिए जिसमें कि उसने कारखाना अधिनियम एवं प्रशिक्षु अधिनियम में संशोधन की अनुमति दी है। यह औद्योगिक कर्मचारियों पर राजनीतिक हमला है और उनके द्वारा यूनियन की सदस्यता लेने के उस अधिकार का अतिक्रमण भी है जिसके माध्यम से वह कार्यस्थल पर एवं रोजगार संबंधी अपने अधिकारों को सुरक्षित रख पाते थे। (सप्रेस)

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