ये प्यास है बड़ी : नर्मदा का हर रोज 30 लाख लीटर पानी निगलेगा कोका कोला !

   कोका कोला को प्रतिदिन 30 लाख लिटर्स नर्मदा का पानी....
    मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात के आदिवासी-किसान, खेती, संपदा की बरबादी क्यों?
    सरदार सरोवर पर पुनर्विचार जरूरी।

बड़वानी (मध्य प्रदेश ): गुजरात से यह खबर आयी है कि नर्मदा का जल जो सरदार सरोवर के द्वारा राज्य को मिल रहा है उसमें से, कोेेका कोला प्लान्ट को जो 500 करोड रू. के पूंजी निवेश के साथ साजंद, जिला खेडा में शुरू हो रहा है, उसे बडा हिस्सा मिलने वाला है। हर रोज करीबन् 30 लाख लिटर्स पानी कोका कोला की निर्मिती के लिए दिया जाएगा जब कि साजंद में लगी और लगने वानी फैक्टरीयों के लिए 90 लाख लिटर्स पानी प्रतिदिन पहले से ही दिया जाना तय है। 20 लाख लिटर्स तो आज ही, साजंद में बसी टाटा और फोर्ड जैसी गाडियों निर्माण करने वाली कंपनीयों को दिया जा रहा है। सरदार सरोवर की सच्चाई और मूल योजना का उल्लंघन अब सामने आ चुका है।


कोका कोला के कई प्लान्टस के सामने देश भर में कई संघर्ष चल रहे है कि वह फैक्टरी लाखों लिटर्स पानी खीचकर भूजल को नष्ट करती है और झूठे दावों के बावजूद क्षतिपूर्ति नहीं करती है, तब नर्मदा का पानी उन्हें करीबन् मुफ्त में देना एक विडंबना ही है।

गुजरात, महाराष्ट्र ,मध्यप्रदेश, के आदिवासी गाॅव और जंगल, तथा मध्यप्रदेश के मैदानी  क्षेत्र के, बडी जनसंख्या के, अतिउपजाऊ, खेत जमीन के गाव, खेती, लाखों पेड, मंदिरे, मजिस्दे, सभी डूबोंकर, उसके विनाश को कच्छ- सौराष्ट्र की प्यास बुझाने के लिए तथा उत्तर गुजरात की सिंचाई के लिए समर्थनीय बनाकर यह परियोजना आगे धकेली गयी है। लेकिन अब कोका-कोला जैसे, उपभोग की वस्तु बनाने के लिए नर्मदा का पानी प्राथमिकता के साथ देने की साजिश रची गयी है। कोका-कोला जैसे प्लान्ट को पानी देकर, इर्दगिर्द की कंपनीयों को भी पानी देकर उन्हें जमीन भी आरक्षित करने से गुजरात शासन अब कच्छ-सौराष्ट्र या उत्तर गुजरात को, खेती की सिंचाई याने खेतीहरों के पक्ष में इस योजना के लाभ मोडना छोड रही है। जाहीर है कि करीबन् 4 लाख हेक्टर्स सरदार सरोवर के लाभ- क्षेत्र की जमीन कमदवजपल या अ-राजपत्रित करना (लाभ से वंचित करना) गुजरात सरकार षुरू कर चुकी है। पानी और जमीन की उपयोगिता बदलने से जब कि परियोजना की लाभ-हानि और उद्देष्य तथा ब्यौरा ही बदल गया है, तब भी मध्यप्रदेष और महाराष्ट्र षासन इस पर नहि आपत्ति उठा रही है, नहि पुनर्विचार की मांग कर रही है। नर्मदा बचाओ आंदोलन चाहता है इस पर समाज विचार करे।

सरदार सरोवर परियोजना की लागत, शासन से जून 2014 में किये गये वक्तव्य के अनुसार, जो मूल 4200 करोड थी, अब 90,000 करोड रू. हो चुकी है। सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में 40 से 45 हजार परिवार आज भी निवासरत है, जिसका कानून अनुसार, खेती या वैकल्पिक आजीविका देकर पुनर्वास होना बाकी है। पुनर्वास स्थलों पर सभी सुविधाएँ न होते हुए इन तमाम पुनर्वास के मुद्दों/कार्यो में करोडों के भ्रष्टाचार की जाँच मध्यप्रदेष हाईकोर्ट से नियुक्त न्याय, श्रवण षंकर झा आयोग द्वारा जारी है। ऐसे स्थिति में संपूर्ण परियोजना पर पुनर्विचार कब्जें में आज तक रही है जमीन /मकान /कुएँ/पेड आदि संपदा के हकदार भूअर्जन संबंधी नये कानून, 2013 (धारा 24) के अनुसार फिर एक बार मूल गाववासी हो चुके हैं। इसलिए भी इस संपदा को डूबाना या बरबाद करना न्यायपूर्ण और कानूनी नहीं है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन चाहता है कि इस पर समाज के संवेदनषील तबके और सरकार भी तत्काल ध्यान दे और सरदार सरोवर के संपूर्ण पुनर्विचार की मांग करते हुए, बांधों को आगे बढाने, हजारों परिवार, खेती की भूमि और सार्वजनिक संपदा, पुरात्तव षास्त्रीय धरोहर भी बरबादी से बचाए।


मेधा पाटकर          भागीरथ कँवचे             देवेन्द्र तोमर                   

विष्वदीप पाटीदार         राहुल यादव

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