आदिवासी अस्मिता और विकास : राष्ट्रीय सम्मलेन, अक्टूबर 14-15, 2014


मध्य प्रदेश के जबलपुर में आगामी 14-15 अक्टूबर, 2014 को ‘‘आदिवासी अस्मिता और विकास’’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन महाकौशल साझा जन-पहल के तत्वावधान में किया जा रहा है। संगोष्ठी का उद्घाटन आदिवासी विकास परिषद के अध्यक्ष तथा सांसद श्री फग्गन सिंह कुलस्ते द्वारा 14 अक्टूबर को पूर्वान्ह 11 बजे सम्पन्न होगा। भारत की अनुसूचित जातियों और जनजातियों के पूर्व आयुक्त डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे।

जनजातीय समाज की परम्पराओं, रूढ़ियों, उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक सम्पदाओं और विवाद निपटान के रूढ़िक ढंग का संरक्षण और परिरक्षण करते हुए उनके समग्र विकास की व्यवस्था सुनिश्चित करने का भारत के संविधान में विशेष प्रावधान विद्यमान हैं।

पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में कानूनों को जनजातीय समाज के हित में अनुकूलन करके लागू करने बाबद जनजातीय सलाहकार परिषद की व्यवस्था है। राज्य को तदाशय के सुझाव देने हेतु सक्षम इस संवैधानिक संस्था से जनजातीय समाज का जीवंत तालमेल होना आवश्यक है।

पांचवीं अनुसूची वाले भारत के सभी 9 राज्यों में पंचायत का विस्तार कानून (पेसा) 24 दिसम्बर, 1996 से लागू है, किन्तु इसे प्रभावशील बनाने हेतु नियम नहीं बनाए गए हैं, अतः जनजातीय समाज अपनी परम्पराओं के अनुसार आपसी विवाद निपटाने तथा सामुदायिक और प्राकृति संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन करने के अधिकार से वंचित हैं।

पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में नगरीय निकायों बाबद विशेष प्रावधान तैयार करने सांसद, श्री दिलीप सिंह भूरिया की अध्यक्षता में गठित समिति ने 17 जुलाई, 2004 को अपनी रिपोर्ट माननीय राष्ट्रपति महोदय को सौंप दी थी। दस साल बीतने के बावजूद उसे प्रभावी बनाने हेतु कानून संसद ने पारित नहीं किया है। इसलिए पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में संविधान सम्मत नगरीय निकायों के गठन का कार्य नहीं हो पाया है।

मध्यप्रदेश का 20 प्रतिशत भू-भाग तथा छत्तीसगढ़ का 60.57 प्रतिशत भू-भाग पांचवीं अनुसूची में वर्गीकृत है। इसके अलावा अनेक ऐसे क्षेत्र हैं, जहां जनजातीय समाज की आबादी 60 प्रतिशत से अधिक होने के बावजूद पांचवीं अनुसूची में शामिल नहीं किए गए हैं। ऐसे क्षेत्रों को पांचवीं अनुसूची में शामिल करना वहां निवासरत् जनजातीय समाज के कल्याण हेतु आवश्यक है।

औपनिवेशिक काल के दौरान और स्वाधीनता उपरांत जनजातीय समाज के वनों पर अधिकारों में कटौती के कारण उनके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करने अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून तथा नियम 2008 से प्रभावशील है। इस कानून के तहत जनजातीय समाज तथा परम्परागत रूप से वन निवासी समुदाय को वन भूमि के व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार प्रदान करने की प्रक्रिया जारी है।

कानून की मंशा और लिखत के बीच उलझाव पैदा करके पात्रों को इस कानून के लाभ से वंचित रखने की वन विभाग की नीयत के चलते लगभग 50 फीसदी लोगों के आवेदन निरस्त किए गए हैं। संशोधित नियम 2012 में कानून की लिखत में व्याप्त त्रुटियों को दुरूस्त किया गया तथा दिशा-निर्देश जारी हुए हैं। इसके बावजूद जनजातीय समाज को कानून का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।

भारत के संविधान में विकास को परिभाषित नहीं किया गया है। बाजार केन्द्रित विकास और आर्थिक वृद्धिदर को बढ़ाने के लिए सरकारों ने कुछ वर्षों से विभिन्न कानूनों को शिथिल करने का सिलसिला चलाया है। पेसा तथा वनाधिकार कानून भी इस प्रक्रिया में शामिल है। कार्पोरेट घराना और कम्पनियों को लाभ पहुंचाने के लिए वन कानून को भी शिथिल किया जा रहा है। विकास की परियोजनाओं के कारण करोड़ों आदिवासी और अन्य ग्रामवासी विस्थापित होकर दर-दर भटक रहे हैं।

विकास के अधिकार की अंतर्राष्ट्रीय संधि (1987), जनजातीय समुदायों के अधिकारों की उद्घोषणा 2008, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की संधि क्र. 107 और 169 का भारत में पालन नहीं हो रहा है। 1986 में संयुक्त राष्ट्र ने विकास के अधिकार की उद्घोषणा तैयार की, जिस पर भारत सहित अनेक राष्ट्रों ने हस्ताक्षर किए हैं। इस संधि के अनुसार विकास सभी नागरिकों का अधिकार है। विकास की परियोजनाओं के तीन मापदण्ड निर्धारित किए गए हैं - 1) प्रभावित व्यक्तियों की सहमति; 2) परियोजना में निर्मित संसाधन में भागीदारी; तथा 3) विस्थापन के बाद प्रभावितों का आजीविका के संसाधनों पर अधिकार।

सरकार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि दर को विकास का पैमाना मानती है इसलिए भूमि को संसाधन के रूप में देखा जाता है। भूमि को सम्पत्ति माना जाता है, आजीविका का साधन नहीं है। सम्पत्ति सम्पन्न वर्ग के पास एकत्र होती है, इसलिए भारत में भूमि का स्वामित्व किसान के नियंत्रण से निकलकर धन्नासेठों या कार्पोरेट घरानों के नियंत्रण में केन्द्रित हो रहा है।

एक सरकारी अध्ययन के अनुसार भारत की 60 प्रतिशत आबादी का देश की कुल भूमि के 5 प्रतिशत पर अधिकार है जबकि 10 प्रतिशत जनसंख्या का 55 फीसदी जमीन पर नियंत्रण है। इसी प्रकार भारत की सकल घरेलू उत्पाद का 70 फीसदी हिस्सा मात्र 8200 लोगों के पास एकत्र हो चुका है। इन परिस्थितियों में भूमि और आजीविका के मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना जन-संगठनों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण हो गया है।
महाकौशल साझा जन पहल जन-संगठनों का मंच है, जो जनजातीय समाज के संवैधानिक अधिकारों और उनकी अस्मिता का बचाव करते हुए समग्र विकास के लिए प्रयासरत् है। विस्थापन को मानवाधिकार सम्मत बनाने के लिए और प्रभावितों के क्षमता-विकास हेतु भी कार्य कर रहा है।

14-15 अक्टूबर, 2014 को ‘‘आदिवासी अस्मिता और विकास’’ विषय पर जबलपुर में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन महाकौशल साझा जन-पहल के तत्वावधान में किया जा रहा है। संगोष्ठी का उद्घाटन आदिवासी विकास परिषद के अध्यक्ष तथा सांसद श्री फग्गन सिंह कुलस्ते द्वारा 14 अक्टूबर को पूर्वान्ह 11 बजे सम्पन्न होगा। भारत की अनुसूचित जातियों और जनजातियों के पूर्व आयुक्त डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे। अखरा, रांची के श्री मेघनाथ एवं बिजू टोपो (फिल्मकार) भी इस संगोष्ठी में शिरकत करेंगे। हम आपसे आग्रह करते हैं कि कृपया संगोष्ठी में शरीक होकर अपने अनुभव बांटे तथा महत्वपूर्ण विचारों से परिचर्चा को फलदायी बनाने में सहयोग करें।

कृपया अपनी सहभागिता सुनिश्चित् करने की सूचना निम्न ई-मेल पर प्रेषित करें और आगमन का कार्यक्रम सूचित करने का कष्ट करें।

राजकुमार सिन्हा राजेश तिवारी
महाकौशल साझा जन-पहल बरगी बांध विस्थापित एवं
(09424385139) प्रभावित संघ (09424659385)

जयन्त वर्मा राहुल बैनर्जी हल्के सिंह परस्ते
संवाद, जबलपुर खेडूत मजदूर चेतना संगठन अदिवासी अधिकार संघ,
(09425151871) अलीराजपुर (07509652637) सिहोरा, जबलपुर

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