जनवादी आंदोलनों पर दमनकारी नीति अस्वीकार्यः महान संघर्ष समिति

पुलिस दमन के बीच महान संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री से एस्सार का खनन लाइसेंस रद्द करने और ग्रामीणों के वनाधिकार की रक्षा करने की मांग की


5 अगस्त 2014। भोपाल। कई सामाजिक संगठनों के समर्थन के साथ महान संघर्ष समिति ने सरकार से सिंगरौली के महान जंगल में एस्सार व हिंडाल्को को प्रस्तावित कोयला खदान के विरोध में चल रहे आंदोलन पर शुरू दमनकारी नीति को समाप्त करने के लिए चेताया। आज भोपाल में एक संवाददाता सम्मेलन में महान संघर्ष समिति के सदस्यों ने इस बात पर जोर दिया कि ग्राम सभा या कोई भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया दमनकारी वातावरण में आयोजित नहीं किया जा सकता है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि मुख्यमंत्री को तत्काल एस्सार के खदान को रद्द करने के के लिए कदम उठाने की जरुरत है जिससे महान के प्राचीन जंगलों को लूट से बचाया जा सके। करीब 54 गांवों के 50 हजार से अधिक लोगों की जीविका को रौंदते हुए एस्सार को खदान का लाइसेंस दिया गया है। महान संघर्ष समिति ने  मुख्यमंत्री से तत्काल इन गांवों में वनाधिकार कानून लागू करने की मांग की है।

अमिलिया निवासी व महान संघर्ष समिति के सदस्य हरदयाल सिंह गोंड ने बताया, “हमलोग पुलिस और प्रशासन के दबाव को झेल रहे हैं और हमारा अपराध बस इतना है कि हम लगातार अपने जंगल को बचाने की कोशिश कर रहे हैं’’। किसी भी तरह के मुआवजा को लेने से इन्कार करने वाले गोंड ने कहा कि अब हमसे अपने जंगल का मुआवजा लेने को कहा जा रहा है लेकिन सच्चाई है कि हम जंगल से जितना लेते हैं, उसका मुआवजा देना नामुमकिन है। इसलिए राज्य सरकार को हमारे अधिकार सुनिश्चित करने होंगे। सरकार उधोगपतियों के हाथ की जागीर नहीं हो सकती।

करीब एक हफ्ते पहले ही जिला कलेक्टर एम सेलवेन्द्रन ने महान संघर्ष समिति और अन्य ग्रामीणों के साथ बैठक करके फर्जी ग्राम सभा पर बात की थी और नया ग्राम सभा आयोजित करवाने की घोषणा भी की थी। ग्रीनपीस की सीनियर कैंपेनर प्रिया पिल्लई ने कहा, “इस घोषणा के एक हफ्ते के भीतर ही ग्रीनपीस के संचार यंत्र (मोबाईल सिग्नल) और सोलर पैनल को अमिलिया गांव से जब्त कर लिया गया। उसी रात दो वनाधिकार कार्यकर्ताओं अक्षय और राहुल गुप्ता को बिना गिरफ्तारी वारंट के आधी रात को गिरफ्तार किया गया।

हमलोगों को एफआईआर की कॉपी भी नहीं दिखायी गयी, जबकि इस संबंध में हमने सिंगरौली एसपी को चिट्ठी लिखकर उनसे सहयोग करने की बात कही है”।

पिल्लई ने सवाल उठाया कि इस तरह की दमनकारी नीति का क्या मतलब है?  राज्य प्रशासन क्यों महान क्षेत्र के लोगों का संवाद दुनिया से खत्म करना चाहता है। हर हाल में ग्राम सभा को परदे के पीछे आयोजित नहीं की जा सकती।

अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी जंगल और अधिकार को बचाने के लिए संघर्षरत कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की निंदा की। सामाजिक कार्यकर्ता माधुरी बहन ने कहा, “सरकार की इस तरह की दमनकारी नीति स्वीकार नहीं की जा सकती। वनसत्याग्रहियों को सताया जा रहा है। कॉर्पोरेट हितों के लिए आम लोगों से वन और अन्य संसाधनों की चोरी देश के लिए आपदा साबित होगी। यह दुखद लेकिन सच है कि इस लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध के लिए भी जगह नहीं है”।

ग्रीनपीस ने महान में कार्यकर्ताओं की अवैध गिरफ्तारी के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, एशियन मानवाधिकार आयोग तथा संयुक्त राष्ट्र विशेष प्रतिवेदक को भी लिखा है । महान संघर्ष समिति और ग्रीनपीस कार्यकर्ताओं ने जनजातीय मामलों के केन्द्रीय मंत्री जोएल ओराम को एक ज्ञापन सौंपकर मांग की कि सरकार महान में निष्पक्ष ग्राम सभा करवाए तथा लोगों के अधिकारों की रक्षा करे।

संवाददाता सम्मेलन में “पावर फॉर द पीपुल” नाम से एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की गयी, जिसमें महान वन क्षेत्र के ग्रामीणों का महान जंगल में निर्भर सामाजिक और आर्थिक हालात का अध्ययन किया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दो गांवों (अमिलिया और बुधेर) के 60 प्रतिशत लोगों के पास एक एकड़ से भी कम जमीन है। ग्रामीणों का आर्थिक स्रोत का आधार वनोपज ही है क्योंकि सिर्फ खेती से वे अपनी आर्थिक जरुरत पूरी नहीं कर पाते हैं। साथ ही 37 प्रतिशत लोगों के पास अपनी भूमी नहीं है, इनमें ज्यादातर वे गरीब लोग हैं जिन्हें सामुदायिक वनाधिकार नहीं दिया जा सका है।

प्रिया पिल्लई ने बताया कि यह रिपोर्ट बताती है कि इन ग्रामीणों के आय का स्रोत वनोपज ही हैं। नतीजतन, अगर इन गरीबतम लोगों से ‘विकास’ के नाम पर जमीन ली जाती है तो ये मुआवजे के भी हकदार नहीं होंगे। जिला कलेक्टर ने एक साथ ही सामुदायिक वनाधिकार, मुआवजा और ग्राम सभा करवाने पर बात की लेकिन यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि प्रशासन इतने अनौपचारिक रुप से मुआवजा और वनाधिकार पर बात नहीं कर सकता।

प्रस्तावित कोयला खदान से 54 गांवों के 50 हजार से ज्यादा लोगों की जीविका खत्म हो जाएगी। गोंड ने कहा,  “सबसे पहले सभी 54 गांवों के सामुदायिक वनाधिकार को मान्यता मिलनी चाहिए और उन्हें परियोजना की जानकारी उनके मूल भाषा में दी जानी चाहिए। इसके बाद लोगों को निर्णय करने का अधिकार मिलना चाहिए कि उन्हें जंगल चाहिए या नहीं लेकिन अभी तक किसी भी गांव में एक भी सामुदायिक वनाधिकार कानून को लागू नहीं किया जा सका है”।

महान कोल ब्लॉक परियोजना ने वनाधिकार कानून के अलावा वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत कई सारे नियमों का उल्लंघन किया है। प्रिया पिल्लई ने बताया कि इस परियोजना में वन सलाहाकार समिति के सलाहों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है। साथ ही वन व पर्यावरण मंत्रालय को संचयी आकलन रिपोर्ट के बारे में भी समझना चाहिए क्योंकि इस क्षेत्र में कई और परियोजनाएँ भी आने वाली हैं।
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