सिंगरौली: इंसान और ईमान का नरक कुंड

अमिलिया में एस्‍सार कंपनी का विरोध करती ग्रामीण औरतें

पिछले महीने मीडिया में लीक हुई एक 'खुफिया' रिपोर्ट में भारत की इंटेलिजेंस ब्‍यूरो ने कुछ व्‍यक्तियों और संस्‍थाओं के ऊपर विदेशी धन लेकर देश में विकास परियोजनाओं को बाधित करने का आरोप लगाया था। इसमें ग्रीनपीस नामक एनजीओ द्वारा सिंगरौली में एस्‍सार-हिंडाल्‍को की महान कोल कंपनी के खिलाफ चलाए जा रहे आंदोलन का भी जि़क्र था। स्वतंत्र पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव  ने पिछले दिनों सिंगरौली का दौरा किया. प्रस्तुत है एस्‍सार-हिंडाल्‍को और इंटेलिजेंस ब्‍यूरो की पड़ताल करती इस रिपोर्ट की तीसरी और आख़िरी क़िस्त।

पहली और दूसरी क़िस्त भी पढ़ें

अविश्वाीस की ज़मीन 
सिंगरौली का इलाका बहुत पिछड़ा और सामंती रहा है। यहां हमेशा से ब्राह्मणों और राजपूतों का वर्चस्वा रहा है। लोगों की मानें तो अब भी ऐसे गांव यहां पर हैं जहां कोई निचली जाति का दूल्हाच अपने पैरों में चप्प ल पहन कर गांव के रास्तें से नहीं जा सकता। यह बात अलग है कि अधिकतर आदिवासी बहुल गांवों में ऊंची जातियों की संख्या  नगण्य‍ रही है, मसलन अमिलिया में ज्याददा आबादी खैरवार, यादव, गोंड, साकेत और चार बैगा परिवारों से मिलकर बनी है जबकि राजपूत और ब्राह्मणों के दो-चार परिवार हैं। फिर भी यहां के सरपंच संतोष सिंह हैं जो कि राजपूत हैं और महान कंपनी के हमदर्द हैं। इसी तरह बुधेर गांव में सिर्फ एक ब्राह्मण परिवार है और ज्यामदातर यादव हैं। कंपनियों को यहां पैर जमाने में इसलिए आसानी हुई क्योंकि ऊंची जातियां स्वा भाविक रूप से उनकी सहायक बन गईं। अमिलिया गांव में करीब 75 फीसदी लोगों ने एस्साचर-हिंडाल्कोू को अपनी ज़मीन नहीं दी है, फिर भी दबाव के तहत 345 एकड़ की रजिस्ट्री  कंपनी के नाम हो चुकी है। नतीजा यह हुआ है कि गांव की आबादी दो हिस्सों  में बंट गई है। एक वे जिन्हों ने कंपनी को ज़मीन लिखवाई है और दूसरे वे जिन्हों ने अपनी ज़मीनें देने से इनकार कर दिया है। इसकी स्वाहभाविक परिणति यह हुई है कि ज़मीन न देने वालों ने जहां महान संघर्ष समिति बनाकर लड़ाई शुरू की, उसके उलट कंपनी के हमदर्द लोगों ने महान बचाओ समिति बना ली। संघर्ष समिति के कृपा यादव बताते हैं कि महान बचाओ समिति में सब कंपनी के लोग हैं और वे लोग हमेशा संघर्ष समिति के कार्यक्रमों से उलट अपने कार्यक्रम करते हैं व गांव वालों को बहकाते हैं।

संघर्ष समिति के सदस्यत विजय शंकर सिंह अपने संदर्भ में कहते हैं, ''ये बात तो ठीक है कि ब्राह्मण-राजपूत कंपनी के साथ हैं, लेकिन सब नहीं हैं। जो गरीब होगा वो कंपनी के साथ क्योंअ जाएगा। इससे क्यार फर्क पड़ता है कि हम राजपूत हैं, लेकिन हम ता कंपनी के खिलाफ ही हैं।'' शहर में मेरी जिन लोगों और कार्यकर्ताओं से बात हुई, सबकी बातचीत में अपने आप ''ब्राह्मण-ठाकुर'' का जिक्र एक न एक बार ज़रूर आया। सीपीएम के गुप्ता्जी के मुताबिक ऊंची जातियों ने अपने स्वा-र्थ में पूंजी का दामन थाम लिया है और आज की स्थिति ऐसी है कि सिंगरौली के परियोजना क्षेत्र वाले गांवों में वर्ग विभाजन और जाति विभाजन दोनों ही एक साथ एक ही पैटर्न पर देखने में आ रहा है। जो कंपनी के खिलाफ है, वह अनिवार्यत: गरीब और निचली जाति का है।

जाति का यह ज़हर सिर्फ सामान्ये लोगों में ही व्यािप्तव नहीं है बल्कि लंबे समय से आंदोलन कर रहे यहां के कथित आंदोलनकारी कार्यकर्ताओं के बीच भी अपनी-अपनी जातियों के हिसाब से कंपनी से दूरी या निकटता बनाने की प्रवृत्ति मौजूद है। एक कार्यकर्ता नाम गिनवाते हुए बताते हैं कि पिछले बीसेक साल में जिन लोगों के हाथों में यहां के मजदूरों-किसानों के संघर्ष की कमान रही, उन्होंेने कैसे आखिरी मौके पर अपनी ऊंची जाति का लाभ लेते हुए कंपनियों से डील कर ली।

रवि शेखर बताते हैं, ''इसी का नतीजा है कि आज सिंगरौली में जब कोई नया चेहरा दिखता है तो सबसे पहले लोगों के दिमाग में यही खयाल आता है कि आया है तो दो अटैची लेकर ही जाएगा।'' पिछले वर्षों में जिस कदर यहां पैसा आया है और बंटा है, उसने सामान्यस और सहज मानवीय बोध को ही चोट पहुंचाई है। बैढ़न में राजीव गांधी चौक पर समोसे की दुकान के बगल में पहली शाम जब कुछ लोगों से मिलने हम पहुंचे, तो मेरे कुछ पूछने पर जवाब देने से पहले ही मेरे सामने ऐसा ही एक सवाल उछल कर आया, ''पहले ये बताइए कि किसके यहां से आए हैं। क्योंम आए हैं।'' अपने बारे में बताने पर टका सा जवाब मिला, ''ठीक है, बहुत पत्रकार यहां आते हैं और झोला भरकर ले जाते हैं। आप बुरा मत मानिएगा। यहां का कुछ नहीं हो सकता। आए हैं तो अपना काम बनाकर निकल लीजिए।''    

लोग यहां धीरे-धीरे खुलते हैं। आसानी से उन्हें  किसी पर भरोसा नहीं होता। उनका भरोसा कई बार तोड़ा जो गया है। सवाल सिर्फ घरबार, पुनर्वास और नौकरी का नहीं है। इसे समझने के लिए एक उदाहरण काफी दिलचस्पस होगा। सिंगरौली में जब एनटीपीसी लगा था, तो कहा गया था कि परियोजना क्षेत्र के आठ किलोमीटर के भीतर बिजली मुफ्त दी जाएगी। कई साल तक ऐसा नहीं हो सका। उसके बाद नियमों में बदलाव कर के आठ को पांच किलोमीटर कर दिया गया। फिर भी यह लागू नहीं किया जा सका। फिर मध्यकप्रदेश सरकार ने अपनी मांग बताई, तो एनटीपीसी ने कहा कि हम तो 32 मेगावाट ही दे सकते हैं। यह मांग से काफी कम मात्रा थी। आज तक यह ''नियम'' सिंगरौली में लागू नहीं हो सका है और इसका सबसे बड़ा प्रहसन यह यह कि सामान्यक लोगों के बिजली के बिल इस बार 2000 से 65000 रुपये तक आए हैं। लोग अब ऐसी बातों पर हंसते हैं और हंस कर टाल देते हैं।  

रिलायंस के सासन अल्‍ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्‍ट का कनवेयर बेल्‍ट और रिलायंस मार्ग नाम की सड़क
कुछ नई चीज़ों पर लोगों को भरोसा कायम हुआ था। पता चला कि उसे भी देर-सबेर टूटना ही था। मसलन, एक स्थारनीय महिला हैं मंजू जी, जो एनटीपीसी विंध्यूनगर की पुनर्वास कॉलोनी नवजीवन विहार में 40 बटा 60 के प्लॉ ट में रहती हैं। बिहार के वैशाली की रहने वाली हैं। इन्हों ने पिछले दो दशक की अपनी सिंगरौली रिहाइश में विस्थाॉपन का दंश झेला है लेकिन अपनी मेहनत और समझ बूझ के चलते आज सामान्यि खुशहाल जीवन बिता रही हैं। वे आजकल सरकारी स्कूझलों में मिड डे मील की आपूर्ति करती हैं। खाना घर की औरतें ही मिल कर बनाती हैं जिससे बाहरी रसोइये का खर्चा बचता है और उनकी बच्ची को अच्छीत शिक्षा हासिल होती है। मंजू करीब एक दशक तक समाजवादी पार्टी से जुड़ी रही थीं, लेकिन उन्हें  आम आदमी पार्टी में इस बार नई उम्मी द दिखी थी। उन्हों ने आम आदमी पार्टी की तरफ से इलाके में काफी सामाजिक काम किया और जब चुनाव का वक्त। आया तो नियम के मुताबिक पर्याप्तं प्रस्तायवकों के दस्ततखत लेकर पार्टी मुख्याुलय में उम्मींदवारी के लिए भेज दिया। अपेक्षा से उलट संसदीय चुनावों में यहां से उम्मीकदवार पंकज सिंह को बना दिया गया जो ग्रीनपीस से जुड़े रहे थे।

मंजू हंसते हुए कहती हैं, ''पता नहीं क्यार हुआ, समझ में ही नहीं आया। अब तो चुनाव के बाद कुछ पता ही नहीं चल रहा है कि पार्टी है भी या नहीं। पंकज भी कई दिनों से नहीं दिखे हैं।'' उन्हेंा टिकट क्योंक नहीं मिला, इस बारे में पूछने पर वे कहती हैं, ''सब जगह तो देखिए रहे हैं कि टिकट किसको मिला। हस्तांक्षर करवाने वाला मामला तो बस दिखाने के लिए कि पार्टी में लोकतंत्र है। मेहनत हम लोगों से करवाया और उम्मीवदवार ऊपर से गिरा दिया।'' उधर पंकज सिंह, जो ग्रीनपीस की नौकरी छोड़ने के बाद चुनाव प्रचार के लिए बैढ़न में जहां एक मकान में किराये पर रह रहे थे, अब वे वहां नहीं रहते। मका न कई दिनों से बंद पड़ा है।

धुंधलाती उम्मीद
अपनी महान नदी और उससे लगे महान के जंगल को बचाने के लिए ग्रामीणों के पास नियमगिरि के संघर्ष के मॉडल से चलकर एक उम्मीचद ग्राम सभा के नाम से चलकर आई थी। उन्हेंर बताया गया था कि कानूनी दायरे में किस तरह संघर्ष संभव है और ग्रामसभा अगर चाहे तो परियोजना व जमीन अधिग्रहण को खारिज कर सकती है। बीते साल 6 मार्च को यहां अमिलिया, बुधेर और सुग्गोज गांव में ग्रामसभा आयोजित की गई। ग्रामसभा में कुल 184 लोगों की मौजूदगी थी लेकिन जब दस्ता वेज सामने आए तो पता चला कि कुल 1125 लोगों के दस्तौखत उसमें थे। नाम देखने पर आगे साफ़ हुआ कि इसमें 10 ऐसे लोगों के दस्त।खत थे जो काफी साल पहले गुज़र चुके थे। इसके अलावा ऐसी तमाम महिलाओं और पुरुषों के भी दस्त खत थे जो ग्रामसभा में आए ही नहीं थे। यह खबर काफी चर्चित हुई और आज भी ग्रीनपीस के दफ्तर में या गांवों में कोई पत्रकार पहुंचता है तो लोग सवा साल पुरानी इस घटना का जि़क्र करते हैं। इस मामले पर नेशरल ग्रीन ट्रिब्यूपनल में एक याचिका भी सात लोगों के नाम से दायर है। अभी तक इसकी ग्रामसभा के निर्णय की स्थिति अस्पूष्टय है। ताज़ा खबरों के मुताबिक कंपनी के हमदर्द समूह महान बचाओ समिति ने दोबारा ग्रामसभा रखवाने का प्रस्ताैव भेजा है और जिला कलक्ट्र सेल्वेंभद्रन ने अगले एक माह के भीतर इसे आयोजित करने का आश्वाहसन दिया है।

फिलहाल, अमिलिया, बुधेर, बन्धोकरा, खराई, नगवां, सुहिरा, बंधा, पिडरवा आदि कुल 54 प्रभावित होने वाले गांवों के लोग कंपनी और प्रशासन से बचते-बचाते इस ग्रामसभा की उम्मीआद में हैं। वे एक बात तो समझ चुके हैं कि ग्रामसभा भी उनकी समस्याक का असल इलाज नहीं है। जहां तक स्थाएनीय प्रशासन और पुलिस में उत्पीकड़नों से जुड़ी शिकायत का सवाल है, तो इस इलाके में यह एक बेहद भद्दा मज़ाक बनकर रह गया है क्योंकि स्था़नीय पुलिस चौकी बन्धोदरा स्थित एस्साहर कंपनी के प्लांऔट के भीतर मौजूद है। सुहिरा के पास एक नई पुलिस चौकी की इमारत कब से बनकर तैयार है, लेकिन आज तक उसमें पुलिस चौकी को स्था नांतरित करने का आश्वा सन ही मिल रहा है। बेचन लाल साहू कहते हैं, ''कोई भी शिकायत लिखवानी हो तो पहले आपको कंपनी के मेन गेट पर गार्ड के यहां रजिस्टमर में अपना नाम पता लिखना होगा और उसकी अनुमति से ही आप पुलिस चौकी जा सकते हैं। बताइए, इससे बड़ा मज़ाक और क्यास होगा।''

स्थासनीय प्रशासन, संस्था एं, सरकारी और निजी कंपनियां व रसूख वाले ऊंची जाति के लोग- इन सबका एक ऐसा ख़तरनाक जाल सिंगरौली में फैला हुआ है जिसे तोड़ना तकरीबन नामुमकिन दिखता है। इसके बावजूद कुछ बातें उम्मीफद जगाती हैं। मसलन, करीब नब्बेि साल के कड़क सफेद मूंछों वाले एक बुजुर्ग हनुमान सिंह को आप हमेशा राजीव गांधी चौक पर बैठे देख सकते हैं। वे पुराने समाजसेवी हैं और आज तक इसी काम में लगे हुए हैं। 25 जून की दोपहर वे कोई आवेदन लिखवाने के लिए संजय नामदेव के पास कालचिंतन के दफ्तर आए हुए थे। जबरदस्तद उमस और गर्मी में पसीना पोंछते हुए वे संजय से कह रहे थे, ''जल्दीप लिखो संजय भाई। आज जाकर कलेक्टमर को दे आऊंगा। नहीं सुनेगा तो फिर से अनशन पर बैठ जाऊंगा।''

उनकी उम्र और जज्बाट देखकर एक उम्मीाद जगी, तो मैंने उनसे शहर के बारे में पूछा। वे बोले, ''यहां सब खाने के लिए आते हैं। अब देखो, पहले यहां साडा (विशेष क्षेत्र प्राधिकरण) था, फिर नगर निगम बना और अब नगरमहापालिका बन चुका है। दो सौ करोड़ रुपया नगरमहापालिका को आया था यहां के विकास के लिए। सामने सड़क पर देखो, एक पैसा कहीं दिख रहा है? ये गंदगी, कूड़ा, नाली... बस बिना मतलब का सात किलोमीटर का फुटपाथ बना दिया और बाकी पैसा खा गए सब। हम तो जब तक जिंदा हैं, लड़ते रहेंगे।'' उनका आशय बैढ़न के राजीव गांधी चौक से इंदिरा गांधी चौक के बीच सड़क की दोनों ओर बने सात किलोमीटर लंबे फुटपाथ से था, जिसका वाकई में कोई मतलब नहीं समझ आता।

उस शाम हम जितनी देर चौराहे पर सीपीएम के दफ्तर में कामरेड गुप्‍ताजी के साथ बैठे रहे, कम से कम चार बार बिजली गई। राजीव और इंदिरा चौक के बीच शहर की मुख्यं सड़क कही जाने वाली इस पट्टी से रात दस बजे अंधेरे में गुज़रते हुए नई नवेली मोटरसाइकिल पर एक शराबी झूमता दिखा, एक सिपाही एक हाथ में मोबाइल लिए उस पर बात करते और दूसरे हाथ से मोटरसाइकिल की हैंडिल थामे लहरा रहा था, तो एक तेज़ रफ्तार युवक हमसे तकरीबन लड़ते-लड़ते बचा। रवि शेखर बोले, ''यहां हर रोज़ एक न एक हादसा होता है। पहले ऐसा नहीं था। जिस दिन मुआवज़ा मिलने वाला होता है, लोगों को इसकी खबर बाद में लगती है लेकिन मोटरसाइकिल कंपनियों को पहले ही लग जाती है। वे बिल्कु ल कलेक्ट्रे ट के सामने अपना-अपना तम्बूा गाड़कर ऐन मौके पर बैठ जाती हैं। इस तरह बाज़ार का पैसा घूम-फिर कर बाज़ार में ही चला जाता है।'' 

ग्रीनपीस के बैनर तले एक कंपनी के खिलाफ ग्रामीणों का संघर्ष सिंगरौली में ज्या-दा से ज्याधदा एक मामूली केस स्टतडी हो सकता है। कैमूर की इन वादियों में कोयला खदानों, पावर प्लांटों, एल्युममीनियम और विस्फो टक कारखानों के बीचोबीच मुआवज़े और दलाली का एक ऐसा बाज़ार अंगड़ाई ले रहा है जहां सामंतवाद और आक्रामक पूंजी निवेश की दोहरी चक्कीऔ में पिसते सामान्य  मनुष्योंं से उनकी सहज मनुष्य ता ही छीन ली गई है और उन्हेंत इसका पता तक नहीं है। यह सवाल ग्रीनपीस या उसके किसी भी प्रोजेक्टज से कहीं ज्या दा बड़ा है। आज का सिंगरौली इस बात का गवाह है कि कैसे विदेशी पूंजी और उससे होने वाला विकास लोगों को दरअसल तबाह करता है। लाखों लोगों को बरबाद करने, उनसे उनकी सहज मनुष्यलता छीनने व इंसानियत को दुकानदारी में तब्दी ल कर देने के गुनहगार वास्तीव में विश्वय बैंक व अन्यक विदेशी अनुदानों से यहां लगाई गई सरकारी-निजी परियोजनाएं हैं। विकास के नाम पर यहां तबाही की बात अमेरिकी अटॉर्नी डाना क्ला‍र्क ने कई साल पहले कही थी, लेकिन अब तक इस देश की इंटेलिजेंस एजेंसियां इस बात को नहीं समझ पाई हैं। सिंगरौली इस बात का सबूत भी है कि या तो हमारी इंटेलिजेंस एजेंसियों में इंटेलिजेंस जैसा कुछ भी मौजूद नहीं है या फिर गैर-सरकारी संस्थारनों की भूमिका पर आई उसकी रिपोर्ट दुराग्रहपूर्ण राजनीति से प्रेरित और फर्जी है।

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