बेहतर भविष्य का घोषणापत्र

गुजरात के साणंद में 1 से 3 मार्च  2014 तक  'रोजी रोटी अधिकार अभियान' का पांचवां सम्मेलन संपन्न हुआ। इस दौरान जनहित खासकर वंचित वर्गों के अधिकारों की पैरवी करते हुए इस हेतु सतत संघर्ष का संकल्प भी लिया गया। इसी के साथ सांप्रदायिकता और विकास के गुजरात मॉडल को नजदीक से देखा और समझा गया। गौरतलब है कि  इस सम्मेलन में न सिर्फ भारत की बल्कि पूरे विश्व विशेषकर दक्षिण एशिया के देशों की सामाजिक आर्थिक व राजनीतिक स्थिति पर भी विचार किया गया। पेश है सचिन कुमार जैन का आलेख;

देश के 15 राज्यों से विभिन्न सामाजिक संगठनों, जनसंगठनों, संस्थाओं और समुदाय के 2000 से ज्यादा लोग गुजरात के साणंद में “रोजी-रोटी अधिकार अभियान“ के सदस्य के रूप में पांचवें अधिवेशन में सम्मिलित हुए। इन सभी ने सामाजिक समानता, शोषण से मुक्ति, बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित करने और बेहतर समाज की स्थापना के लिए चल रहे सभी अहिंसात्मक जमीनी जनसंघर्षों और आन्दोलनों के प्रति अपनी एकजुटता प्रकट की। सम्मेलन में विभिन्न आंदोलनों एवं संघर्षों में शहादत देने वालों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

अपने घोषणपत्र में अभियान ने स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव, कुपोषण, सतत भुखमरी के शिकार होकर मर जाने वाले बच्चों, महिलाओं, पुरुषों और तीसरे लिंग वाले समुदायों के प्रति संवेदना व्यक्त की। साथ ही  उल्लेख किया कि मातृत्व सेवाओं का अभाव महिलाओं का जीवन खत्म कर देता है। इन सबको बचाया जा सकता है। दस्तावेज में उन सभी मेहनतकशों व हजारों किसानों के प्रति भी श्रद्धांजलि अर्पित की गई हैं, जिन्हें शोषणकारी नीतियों के खिलाफ अपनी आजीविका को बचने का संघर्ष करते हुए आत्महत्या करना पड़ी। साथ ही उन लोगों को भी श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने साम्प्रदायिक और जातिगत हिंसा में अपना जीवन खो दिया है।
वर्तमान परिस्थितियों की निंदा करते हुए कहा गया कि देश की आजादी के 67 साल बाद भी बड़ी आबादी को भोजन, पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा जैसे बुनियादी हक भी उपलब्ध नहीं हैं। इसी के साथ दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, महिलाओं, निशक्तजनों और तीसरे लिंग के लोगों के साथ लगातार हो रहे भेदभाव की भी निंदा की गई।

घोषणापत्र में कहा गया कि देश के लोकतंत्र में जिस तरह असहमति व्यक्त करने वालों, जनआन्दोलनों और गरीब समर्थक नीति निर्माण के लिए संघर्ष करने वालों को दबाया जा रहा है, उससे सभी बहुत चिंतित हैं। यहाँ तक कि किसानों, मजदूरों, महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों, छात्रों, युवाओं, लैंगिक अल्पसंख्यकों सहित सभी तबकों के अहिंसक-शांतिपूर्ण जनआन्दोलनों और अधिकार मांगने वाले मेहनतकश लोगों को भी राज्य बहुत ही ताकतवर और क्रूर तरीके से कुचल रहा है। भारतीय लोकतंत्र में विरोध और असहमति व्यक्त करने के लिए दायरा सीमित होता जा रहा है। सम्मेलन में भोजन के अधिकार, लोकतंत्र की मजबूती और सामाजिक न्याय के प्रति संघर्ष जारी रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई हैं।

पितृसत्तात्मक व्यवस्था और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के विरुद्ध चल रहे संघर्षों और जनसमर्थक लोकतान्त्रिक राजनीतिक ताकतों के रूप में संघर्ष कर रहे सभी आन्दोलनों के साथ खड़े होने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की गई। इसी के साथ डब्ल्यूटीओ, मुक्त व्यापार समझौतों, अन्य अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों और फसलों पर जीएम तकनीक के प्रयोगों को अनुमति दिए जाने की भर्त्सना करते हुए बताया गया कि इनके माध्यम से देश की खाद्य संप्रभुता की व्यवस्था और संभावनाओं को खत्म करने की कोशिशें की जा रही हैं। 
नवउदार पूंजीवाद, भ्रष्ट शासन व्यवस्था, लोकतांत्रिक मूल्यों को खत्म करने के प्रयासों, प्रकृति संसाधनों की बेशर्म लूट और नागरिक संगठनों के संघर्षों का गला घोंटने की सरकारों की लगातार चल रही कोशिशों के परिणामस्वरुप ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत इमारत खंडहर हो गयी है और सरकार पर से लोगों का भरोसा उठता गया है। आजादी के बाद अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ था। अमीरों के उपभोग के लिए लोगों के आजीविका के संसाधनों और सार्वजनिक-निजी साझेदारी के नाम पर सामुदायिक संपत्तियों को छीने जाने और कारपोरेट समूहों के लाभ के लिए देश के प्राकृतिक संसाधनों को बांटे जाने की नीतियों और कामों की कड़ी भर्त्सना की गई।

“गुजरात के कथित विकास मॉडल” को पूरी तरह से खारिज करते हुए बताया गया कि “गुजरात के शोषणकारी विकास मॉडल” ने न केवल असमानता को और बढ़ाया है, बल्कि नवउदार पूंजीवादी व्यवस्था के साथ-साथ पितृसत्तात्मक ताकतों को भी ज्यादा मजबूत किया है। इसके अलावा यह विकास मॉडल गरीब और हाशियों पर खड़े समुदायों के विरोध को कुचलेगा एवं हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक एवं जनकल्याणकारी ताने-बाने को नेस्तनाबूत कर देगा। ऐसी ताकतों के खिलाफ गुजरात में चल रहे संघर्षों और आन्दोलनों के साथ एकजुट रहने और संघर्ष में उनके साथ रहने की भी घोषणा की गई।

सभी मेहनतकशों की ओर से कहा गया कि हम सबने खेती की व्यवस्था को संरक्षित किया है। देश की किसान आधारित खाद्य सुरक्षा और संप्रभुता ही हमारी व्यवस्था की रीढ़ है और ये ही हमारे जनसंघर्ष की मूल ताकत है। अतएव सभी मेहनतकश वर्गों के इज्जत से जीवन जीने के लिए आवश्यक वेतन, काम की सुरक्षा, बेहतर और शोषण मुक्त मानवीय कार्यदशाएं, श्रम कानून के कठोर क्रियान्वयन और सामाजिक सुरक्षा (जिसमें पेंशन, मातृत्व लाभ, स्वास्थ्य सेवा समाहित हैं) हेतु प्रभावी कानूनी अधिकारों को हासिल करने के लिए संघर्ष करने और इस मंतव्य से चल रहे संघर्षों को समर्थन देने का भी प्रण लिया गया। यह मान्यता भी दोहराई गई कि खाद्यसुरक्षा को केवल खाद्य संप्रभुता से ही प्राप्त किया जा सकता है। इसके अलावा मांग की गई कि सभी बच्चों, पुरुषों, महिलाओं और तीसरे लिंग से सम्बंधित लोगों को पर्याप्त, विविधता और गुणवत्ता पूर्ण पोषक भोजन सहित अनिवार्य सेवाएं मिलना चाहिए।

घोषणापत्र्ा में स्वीकार किया गया कि कई राज्यों में अभियान के लगातार संघर्ष और समन्वित प्रयासों के चलते लोगों के बुनियादी अधिकारों (जैसे रोजगार गारंटी, व्यापक सार्वजनिक वितरण प्रणाली, विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन, लोकव्यापिकृत आईसीडीएस, मातृत्व लाभ और सामाजिक सुरक्षा पेंशन आदि) को हासिल करने में उल्लेखनीय सफलता मिली है। यह संघर्ष उर्जा भी देता है। प्रपत्र्ा में मांग की गई कि प्राकृतिक आपदाओं, सांप्रदायिक-जातिगत हिंसा एवं विस्थापन से प्रभावित लोगों की आजीविका और पोषण सहित खाद्य सुरक्षा का हक सुनिश्चित किया जाए।

दक्षिण एशिया खासतौर पर मध्य और उत्तर-पूर्वी भारत, कश्मीर घाटी, उत्तरी श्रीलंका, युद्धग्रस्त अफगानिस्तान आदि क्षेत्रों के उन लोगों को जिनकी जिंदगियां टकराव और हिंसा ने छीन ली है, के संघर्षों को याद करते हुए कहा गया कि खाद्यसुरक्षा के अधिकार को संरक्षित करने के लिए शान्ति अनिवार्य है। इस क्षेत्र में शांति बहाल करने, नागरिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने, लोकतान्त्रिक तरीकों से संघर्ष-प्रदर्शन करने और टकराव को खत्म करने के लिए स्थान सुरक्षित होना चाहिए।

लोगों के भोजन और अन्य संबधित हकदारियों के लिए एकजुट संघर्ष के अभियान को जारी रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए, खाद्य संप्रभुता और जल-जंगल-जमीन जैसे संसाधनों के संरक्षण, किसानों और कृषि के संरक्षण, वंचित समूहों के मुद्दों और लोकतंत्र को सुरक्षित करने की दिशा में अभियान को आगे ले जाने का संकल्प भी लिया गया। भोजन के अधिकार को हासिल करने के लिए चल रहे वैश्विक आन्दोलनों के साथ एकजुटता अभिव्यक्त करते हुए और भोजन के अधिकार के लिए दक्षिण एशियाई आंदोलन के लिए काम
करने का भी निर्णय इस सम्मेलन में लिया गया। (सभार: सप्रेस)
  
 सचिन कुमार जैन सक्रिय समाजकर्मी एवं विकास संवाद भोपाल से संबद्ध हैं।
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