अधूरी है सामाजिक न्याय की यात्रा- अखिलेन्द्र के उपवास का पांचवां दिन

विभिन्न संगठनों, पत्रकारों व बुद्धिजीवियों ने आकर दिया समर्थन, उर्मिलेश, डॉ. सुनीलम, चितरंजन पहुँचे उपवास पर
आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह का दस दिवसीय उपवास आज पांचवें दिन भी जारी रहा। आज भी उपवास पर बैठे अखिलेन्द्र का चिकित्सीय परीक्षण करने डॉक्टर नहीं पहुँचे जिस पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया गया।
अखिलेन्द्र का यह उपवास कॉरपोरेट घरानों व एनजीओं को लोकपाल कानून के दायरे में लाने, रोजगार के अधिकार को नीति निर्देशक तत्व की जगह संविधान के मूल अधिकार में शामिल करने, साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक बिल को संसद से पारित कराने, कृषि योग्य भूमि के कॉरपोरेट खरीद पर रोक लगाने, कृषि लागत मूल्य आयोग को वैधानिक दर्जा देने, राष्ट्रीय भूमि उपयोग नीति व सर्वागीण जनपक्षीय खनन नीति बनाने, कॉरपोरेट पर टैक्स बढ़ाने, शिक्षा-स्वास्थ्य-कृषि समेत जनहित के मदों पर खर्च बढ़ाने, राष्ट्रीय वेतन नीति बनाने, महंगाई रोकने के लिये वायदा कारोबार पर रोक लगाने, ठेका व दिहाड़ी श्रमिकों को नियमित करने, अति पिछड़ों, पिछड़े-दलित मुसलमानों, आदिवासियों के सामाजिक न्याय के अधिकार, हिफाजत, इंसाफ, जम्हूरियत और कानून का राज स्थापित करने समेत आम नागरिक की ज़िन्दगी के लिये महत्वपूर्ण सवालों पर हो रहा है।
अखिलेन्द्र के उपवास का समर्थन सीपीआई (एम) के महासचिव कॉमरेड प्रकाश करात, वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता और सीपीआई के पूर्व महासचिव कॉमरेड ए. बी. वर्धन, सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष न्यायमूर्ति राजेन्द्र सच्चर, पूर्व वित सचिव एसपी शुक्ला, अर्थशास्त्री सुलभा शास्त्री, सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव डॉ. प्रेम सिंह, प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. दीपक मलिक ने किया है।
उपवास पर आज लिये राजनीतिक प्रस्ताव में कहा गया कि सामाजिक न्याय की यात्रा अभी भी अधूरी है अति पिछड़े, पिछड़े दलित मुसलमान और आदिवासियों को आज तक सामाजिक न्याय का अधिकार नहीं मिला है।कारापेरेट धराने और उनके हितों के लिये काम करने वाले दल आज लम्बे संघर्षो के बाद हासिल सामाजिक न्याय के अधिकारों को ही खत्म करने की कोशिश में लगे हैं। इसके खिलाफ चौतरफा आंदोलन वक्त की जरूरत है। प्रस्ताव में अति पिछड़े और पिछड़े मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग में से अलग आरक्षण कोटा देने, दलित मुसलमानों व ईसाइयों को अनुसूचित जाति में शामिल करने, कोल को आदिवासी का दर्जा देने की माँग सरकार से की गयी।
आयोजित सभा को सम्बोधित करते हुये अखिलेन्द्र ने कहा कि कॉरपोरेट घरानों ने पूरे राजनीतिक तन्त्र को भ्रष्ट कर दिया है। राजनीतिक व नौकरशाही तन्त्र से गठजोड़ कायम कर वह हमारे प्राकृतिक संसाधनों व सरकारी खजाने समेत बहुमूल्य राष्ट्रीय सम्पदा की लूट में लिप्त है। इसी तरह फोर्ड फाउंडेशन जैसी साम्राज्यवादी एजेंसियों के फंड से संचालित एनजीओ हमारे राष्ट्रीय जीवन में भ्रष्टाचार के खतरनाक स्रोत हैं। उनकी बढ़ती घुसपैठ के हमारे स्वतंत्र नीति निर्णयों तथा सुरक्षा के लिये गम्भीर निहितार्थ हैं। लेकिन एनजीओ कारोबार भी लोकपाल के दायरे के बाहर है। इसलिये उन्होंने कॉरपोरेट और एनजीओ को लोकपाल के दायरे में लाने की माँग उठायी। उन्होंने कहा कि बगैर जनपक्षिय नीतियों को लागू किये और लोकतान्त्रिक अधिकारों व सामाजिक न्याय की गारंटी के सुशासन की बात महज दिखावा है।
अखिलेन्द्र के उपवास को 10 फरवरी 2014 को पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चितरंजन सिंह, एनएपीएम के डॉ. सुनीलम, किसान मंच के विनोद सिंह समेत वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, आनंद स्वरूप वर्मा, अनिल चमाडिया, आनंद प्रधान, राजेश जोशी, अरूण पाण्डेय, चंद्र भूषण, रामशिरोमणि शुक्ला, जेएनयू प्रो. कुलदीप कुमार, गांधीवादी रामधीरज समेत तमाम पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने भी जंतर-मंतर पर पहुँचकर उपवास का समर्थन किया।
साभार: हस्तक्षेप
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