किसान विरोधी सिफारिशों के खिलाफ संसद मार्च और धरना

आज 31 जनवरी 2014 को दिल्ली के जंतर मंतर पर किसानों का संसद मार्च और धरना आयोजित किया गया. वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के  उच्च स्तरीय कार्यकारी समूह (डब्ल्यू.जी.ई.ई.पी.) ने देश के पश्चिमी घाट के 6 राज्यों के 4156 गांवों को पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील मानकर यहाँ पर ज़मीन पर विशेष प्रतिबन्धित लगाने की सिफारिश की है. यहाँ पर लोग जमीन पर निर्माण और विकास की गतिविधियों जैसे अस्पताल, पुस्तकालय, विद्यालय यहां तक कि पालतुपशुओं के बाड़ भी नहीं बना पायेगे। सरकारी जमीन से व्यक्तिगत जमीन में परिवर्तन पर प्रतिबन्ध, जमीन पर खेती करने वाले किसानों यहां तक कि आदिवासियों को जमीनों के पट्टे प्राप्ति पर रोक लगा देगा। अखिल भारतीय किसान सभा के बैनर तले 6 प्रभावित राज्यों के हजारों किसानों ने इन प्रावधानों के विरोध में प्रदर्शन किया है. पेश है अखिल भारतीय किसान सभा का पर्चा;

पश्चिमी घाटों के बारे में वहां की जनता की जायज चिंताओं पर बिना उचित ढंग से विचार किये संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन 2 की सरकार का पश्चिमी घाटों के बारे में उच्च स्तरीय कार्यकारी समूह (एच.एल.डब्ल्यू.डी.) की सिफारिशों को सिद्धानत के रूप में स्वीकार करने का फैसला करना और इन 6 राज्यों के 4156 गांवों को पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील मानकर अधिसूचित करने के कदम की पश्चिमी घाटों के क्षेत्रों की जनता में काफी आलोचना हुई है एवं विरोध प्रदर्शन हुए हैं। किसान एवं आम जनता क्षेत्र में बुनियादी विकास के कार्यों और जनता की जीविका के बारे में रोक से व्याकुल हैं। अनेकों आन्दोलनों एवं विरोध कार्रवाइयों में हजारों लोग भाग ले रहे हैं। सभी राजनीतिक दल, सामाजिक और जन आन्दोलन इन विशाल विरोध संघर्षों का समर्थन कर रहे हैं।

जैव-विविधता के क्षेत्र में पश्चिमी घाट पूरी दुनिया के आठा महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक हैं। क्षेत्र में जैव-विविधता एवं र्प्यावरण के प्राकृतिक संरक्षण के महत्व पर कोई सन्देह या विवाद नहीं है लेकिन ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक श्री माधव गाडगिल की अध्यक्षता में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी-विभान विशेषज्ञ दल की रिपोर्ट पर्यावरणकी सुरक्षा सुनिश्चित करने और लोगों की जीविका की रक्षा करने के बीच संतुलन बनाने में असफल रही है। वास्तव में इस सच्चाई की उपेक्षा करती है कि इस क्षेत्र के लोग सबसे अधिक प्रभावशाली पर्यावरण के संरक्षक रहे हैं और वहीं साथ रहकर सक्रियता पूर्वक वन्य जीवन एवं क्षेत्र की जैव-विविधता की रक्षा की है। एच.एल.डबल्यू.जी. रिपोर्ट लोगों की उचित चिन्ताओं का समाधान करने में असफल रही है और उसने केवल डब्ल्यू.जी.ई.ई.पी. की सिफारिसों को कमजोर किया है।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के कार्यालयी मेमेरेण्डम (ज्ञापन पत्र) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि विशेष प्रतिबन्धित/निषिद्ध जमीन का कोई इस्तेमाल नहीं होगा। ई.एस.ए. इस्तेमाल किया जायेगा। डब्ल्यू.जी.ई.ई.पी. की गाइड लाइन (खण्ड-1, पृष्ठ संख्या 41,42) कहती है कि जंगलात से सामान्य उपयोग, कृषि से सामान्य, कृषि जमीन को जंगल की जमीन में बदलने को छोड़कर (पेड़ों की फसल के लिए) जमीन के उपयोग को बदलने की अनुमति नहीं है सिर्फ इस अपवाद को छोड़कर जब स्थानीय लोगों की बढ़ती हुई जनसंख्या को बसाने के लिए मौजूद गांव के क्षेत्र को बढ़ाने की जरूरत हो। यह हमेशा के लिए सभी तरह के निर्माण और विकास की गतिविधियों जैसे अस्पताल, पुस्तकालय, विद्यालय यहां तक कि पालतुपशुओं के बाड़ बनाने पर भी रोक लगाता है। एच.एल.डबल्यू.जी. इस धारा में कोई परिवर्तन या संशोधन नहीं किया है। स्थानीय लोगों में इस अवैज्ञानिक सिफारिस से भारी बेचैनी पैदा हुई हैं इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

रासायनिक उर्वरकों के पूरी तरह प्रतिबन्ध के साथ, सरकारी जमीन से व्यक्तिगत जमीन में परिवर्तन पर प्रतिबन्ध जमीन पर खेती करने वाले किसानों यहां तक कि आदिवासियों को जमीनों के पट्टे प्राप्ति पर रोक लगा देगा। जंगल की जमीन पर गैर जंगल से सम्बंधित कार्य की गतिविधि पर प्रतिबन्ध आदिवासियां और पारम्परिक तौर से जंगल में रहने वाले निवासियों को वन अधिकार कानून के लिए गंभीर चिन्ता का मामला है। पर्यावरण के संवेदनशील क्षेत्रों का सीमांकन और निशानदेही अवैज्ञानिक थी। अनेकों भारी आबादी वाले क्षेत्रों को जब्त करके उन्हें वहां से बाहर किया गया। दुग्ध प्रसंस्करण, मांस प्रसंस्करण, सब्जी से तेल निकालने की इकाई और अस्पताल आदि को लाल उद्योगों की सूची में रखा गया है लेकिन पर्यावरण एवं वन मंत्रालय इन उपरोक्त वर्णित श्रेणी को इस कानून से बाहर रखने के लिए तैयार नहीं है। उच्च स्तरीय कार्यकारी समूह ने अपनी प्रस्तुत कार्य योजना रिपोर्ट में जंगल एवं वन संरक्षण के लिए फण्ड के अलावा खेती में जैविक उर्वरकों के उपयोग को आगे बढ़ाने में मदद करने के लिए या कृषि में सब्सिडी बढ़ाने के लिए कोई विशेष फण्ड के निधा्ररण की सिफारिश नहीं की है।

इस संदर्भ में, अखिल भारतीय किसान सभा ने अपनी निम्नलिखित मांगें रखीं-
  1. उच्च स्तरीय कार्यकारी समूह की रिपोर्ट में सिफारिशों को तत्काल रोका जाय।
  2. पश्चिमी घाट पर्यावरण विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट एवं उच्च सतरीय कार्यकारी समूह की रिपोर्ट की जांच के लिए वैज्ञानिकों और जनता के प्रतिनिधियों का एक विशेषज्ञ समूह बनाया जाय।
  3. पर्यावरण की सुरक्षा एवं पश्चिमी घाटों के क्षेत्रों की जनता की जीविका के बीच संतुलन सुनिश्चित किया जाय।
अखिल भारतीय किसान सभा देश के सभी लोगों से अपील करती है कि पश्चिमी घाटों के क्षेत्र के किसानों की न्यायोचित मांगों का समर्थन करने के लिए एक जुट हों।



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