फुकुशिमा अब और नहीं: भारत-जापान परमाणु समझौते का विरोध करें

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे इस छब्बीस जनवरी को राजपथ पर होने वाले सरकारी तामझाम के मुख्य अतिथि हैं और उनके दौरे का एक मुख्य एजेंडा भारत-जापान परमाणु समझौता तय करना है. फुकुशिमा के बाद जापान ने जब अपने सारे अणु-बिजलीघर बंद कर दिए हैं, भारत को यह तकनीक बेचना अपने कारपोरेटों को घाटे से उबारने का खतरनाक तरीका है जिसका विरोध होना चाहिए। जापान खुद कोई बना-बनाया रिएक्टर नहीं बेचेगा बल्कि मीठीविर्डी/कोवाडा और जैतापुर में अमेरिकी और फ्रांसीसी कंपनियों की प्रस्तावित अणु-भट्ठियों के महत्वपूर्ण पुर्जे मुहैय्या कराएगा इसीलिये ये देश जापान में अणु-विरोधी आंदोलन तेज होने के बावजूद वहाँ की सरकार पर भारत के साथ समझौता करने का दबाव बनाए हुए हैं.

परमाणु तकनीक के अपने अन्तर्निहित खतरे हैं जिनको कभी खत्म नहीं किया जा सकता. परमाणु दुर्घटनाओं के अलावा इसमें सामान्य संचालन के दौरान होने वाले विकिरण, मजदूरों को होने वाली बीमारियाँ, खतरनाक परमाणु कचरे का मसला और पचास-साठ साल बाद संयंत्र की उम्र पूरी हो जाने के बाद भी इसके अनवरत सुरक्षा के प्रश्न शामिल हैं, जिनका उत्तर सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में परमाणु उद्योग के पास नहीं है, इसीलिए हर जगह इन संयंत्रों का विरोध हो रहा है और जापान, जर्मनी, स्वीडन, स्वित्ज़रलैंड, इटली और ताइवान जैसे देशों में जनविरोध के कारण सरकारों को परमाणु कार्यक्रम बंद करने पर मजबूर होना पड़ा है.


जनहित से जुड़े हर मोर्चे पर असफल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने कार्यकाल के आख़िरी दिनों में हरियाणा के फतेहाबाद के गोरखपुर में परमाणु संयंत्र की आधारशिला रखने 13 जनवरी 2014 को जा रहे हैं. महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के साथ परमाणु संयंत्र उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियां हैं ये उन्होंने हाल में खुद कहा है. फतेहाबाद के किसान, ग्रामीण और आम लोग पिछले चार बरसों से इस प्रस्तावित प्लांट का विरोध कर रहे हैं. इस लंबे संघर्ष में तीन किसान साथियों ने अपनी जान भी गंवाई है.

पिछले साल सितम्बर के आखिरी हफ़्ते में अमेरिका की अपनी आखिरी यात्रा में प्रधानमन्त्री ने वेस्टिंगहाउस कम्पनी को गुजरात के मीठीविर्डी में प्रस्तावित अणुबिजलीघर के लिए परमाणु दायित्व कानून से पूरी छूट को खुलेआम बतौर उपहार पेश किया. भोपाल दुर्घटना के उनतीसवें साल में देश के आम लोगों की हिफ़ाजत और ज़िन्दगी के इस सौदे की चौतरफ़ा निन्दा के बाद सरकार को यह कदम वापस लेना पड़ा, हालांकि प्रधानमन्त्री ने अमेरिकी कम्पनियों को भरोसा दिलाया कि अणुबिजलीघरों के संचालक के बतौर सरकारी कम्पनी परमाणु ऊर्जा कारपोरेशन दुर्घटना की स्थिति में पुर्जों के आपूर्तिकर्त्ताओं से मुआवजा वसूलने के अपने अधिकार का उपयोग नहीं करेगी. वैसे मनमोहन सिंह से इससे इतर कोई आशा भी नहीं की जा सकती क्योंकि वे खुद भोपाल के मामले में दशकों बाद भी त्रासदी और उपेक्षा झेल रहे लोगों के साथ खड़े होने की बजाय ये चिन्ता जता चुके हैं कि भोपाल मामले में अमेरिकी कम्पनियों को ज़्यादा खींचे जाने से भारत में निवेश का माहौल खराब होगा. इस अमेरिका यात्रा के कुछ ही हफ़्तों बाद फ़िर अक्टूबर में रूस यात्रा के दौरान भी यही किस्सा दुहराया गया और तमाम कोशिशों के बाद भी रूस के साथ कूडनकुलम में तीसरे और चौथे रिएक्टरों के लिए समझौता नहीं हो पाया क्योंकि रूसी कम्पनी भी बिना दायित्व प्रावधान के भारत से सौदा करने पर अड़ी है. ठीक यही किस्सा फ़्रांस के साथ है और महाराष्ट्र के जैतापुर में अरेवा कम्पनी की परियोजना रुकी पड़ी है. रिलायंस और लार्सन ऐंड टुब्रो जैसी अपेक्षाकृत छोटी कम्पनियां भी अपने लिए ऐसा ही अबाध बाज़ार चाहती हैं. सरकार ने अपने पसंदीदा विशेषज्ञों और उद्योगजगत के देसी-विदेशी पैरवीकारों को लेकर एक समिति गठित की है जो इन कम्पनियों के लिए संसद द्वारा 2010 में पारित परमाणु दायित्व कानून से बचने का रास्ता सुझाएगी. लोगों की सुरक्षा से जुड़े इस अहम मसले पर सरकार के इस रुख से साफ़ हो जाता है कि देश का पूरा सिस्टम खुलेआम परमाणु लॉबी का बन्धक बन गया है.


प्रधानमंत्री की परमाणु-प्रेम को लेकर स्वतंत्र विशेषज्ञों और जैतापुर, कूडनकुलम, मीठी विरदी, कोवाडा सरीखी जगहों पर चल रहे आन्दोलनों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं. ऐसे समय में जब पूरी दुनिया इस खतरनाक तकनीक से पीछा छुडा रही है और हरित एवं टिकाऊ तकनीकों को अपना रही है, हमारे देश की सरकार अमेरिका, फ्रांस और रूस को किए गए वादे निभाने के लिए परमाणु संयंत्र लगा रही है. गोरखपुर में लग रहा प्लांट वैसे तो स्वदेशी तकनीक का है, लेकिन इन कुछ स्वदेशी प्लांटों पर भी सरकार का जोर इसीलिए है कि पूरी ऊर्जा नीति को परमाणु-केंद्रित बनाया जाए जिससे नए रिएक्टर आयातित हों और विदेशी कारपोरेटों का फ़ायदा हो. इस चक्कर में विकेन्द्रीकृत और जन-केंद्रित ऊर्जा एवं विकासनीति का मौक़ा और संसाधन हम खो रहे हैं जो हमारे देश के लिए अधिक ज़रूरी है.

प्रधानमंत्री ने हाल ही में अपनी प्रेस कांफ्रेंस में महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर अपनी असफलता स्वीकार करते हुए भी कहा कि उनका मूल्यांकन इतिहासकार करेंगे. लेकिन असल में मनमोहन सिंह का मूल्यांकन वे डॉक्टर और आपदा-प्रबंधक करेंगे जिनको इस परमाणु-दुह्स्वप्न को झेलेंगे, जादूगोड़ा से लेकर कूडनकुलम तक वे आदिवासी और ग्रामीण करेंगे जो इस खतरे को झेल रहे हैं और अपनी आवाज उठाने के लिए देशद्रोही घोषित किए जा रहे हैं. मनमोहन सिंह का मूल्यांकन विदर्भ में आत्महत्या करने वाले तीन लाख किसानों के बच्चे करेंगे.

भारत और जापान के बीच इस खतरनाक परमाणु समझौते के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने के लिए इस पोस्टर को प्रिंट करें और उसको हाथ में ली हुई अपनी तस्वीर इस फेसबुक इवेंट पेज पर साझा करें- https://www.facebook.com/events/262774790547186/

सारी तस्वीरों का एक कोलाज बनाकर दिल्ली और बाकी जगहों में विरोध-प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

धन्यवाद। 





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