किस्सा-ए -रिफाइनरी इन राजस्थान: अभिषेक श्रीवास्तव

संघर्ष संवाद के पाठकों से हम चुनावी बरसात की आस में राजस्थान के बाड़मेर में रिफाइनरी को लेकर चली धींगामुश्ती का हाल दो किश्तों में साझा कर चुके हैं. प्रस्तुत है लोकतंत्र और समाज की बुनावट की पड़ताल करती इस रिपोर्ट की तीसरी और आख़िरी क़िस्त।

 पहली और दूसरी क़िस्त भी पढ़ें 


बालोतरा यहां से करीब 15 किलोमीटर रह जाता है। हम हाइवे पर बालोतरा की तरफ आगे बढ़ने के बजाय वापस पीछे आते हैं जहां से एक सीधा राजमार्ग तैयार किया जा रहा है। एक ओर की सड़क नई-नई बन कर तैयार है और उस पर ईंटें रखी हुई हैं ताकि कोई वाहन न गुज़र सके। दूसरी तरफ की सड़क के नाम पर सिर्फ रेत है। स्थानीय लोग इसी सड़क से आते-जाते हैं। रास्ते में पचपदरा का शिलान्यास स्थल पता करते हुए हम आगे बढ़ते हैं। अस्सी साल के बूढ़े से लेकर 12 साल के बच्चे तक को उसका ठिकाना मालूम है। रास्ते में हजारों गायों का झुण्ड बिखरा हुआ चर रहा है और बीच-बीच में नमक के छोटे-छोटे पहाड़ खड़े दिखते हैं। बालोतरा में बीए में पढ़ने वाला मेरा नौजवान साथी महेंदर बताता है कि यहीं नमक की छोटी-छोटी ढेर सारी खदानें हैं जिनसे नमक निकाला जाता है। उस निर्जन रेतीले इलाके में करीब आधा घंटा मोटरसाइकिल से चलते हुए हम एक जगह रुक जाते हैं। निर्माणाधीन रास्ते से हट कर एक खुले रेतीले मैदान में नई-नई कोलतार की पट्टी बनी दिखती है जो अचानक बीच से शुरू होती है और एक वृत्ताकार में जाकर मिल जाती है। उस वृत्त के बीच में अंगरेजी का ‘‘एच’’ अक्षर सफेद चूने से पोता हुआ है। यही वह हेलीपैड है जहां सोनिया गांधी का हेलिकॉप्टर रिफाइनरी का शिलान्यास करने 22 सितम्बर को उतरा था।

हजारों हेक्टेयर सफेद और रेतीली धरती के बीचोबीच खड़े हम चारों ओर नज़र दौड़ाते हैं। न कोई इंसान, न मवेशी, सिर्फ नए बन रहे राजमार्ग से उड़ती धूल है और बीचोबीच चाबी के आकार का काला हेलीपैड। करीब आधे घंटे हमने शिलान्यास का पत्थर खोजा, लेकिन कुछ भी हाथ नहीं लगा। बायतू में लोगों ने हमें बताया था कि यहां से पत्थर कब का गायब हो चुका है। बात सही निकली। काफी दूर दो लोग बैठे हुए दिखे। हमने उनके पास जाकर पूछा कि शिलान्यास का पट्ट कहां है। उन्होंने बताया कि शिलान्यास के बाद अधिकारी उसे जोधपुर ले गए क्योंकि उन्हें डर था कि रिफाइनरी का विरोध कर रहे लोग कहीं उसे उखाड़ न फेंकें। बताते हैं कि इसी सन्नाटे में सिर्फ डेढ़ महीने पहले पूरे राजस्थान से लाखों की जनता इकट्ठा हुई थी एक सपने को पूरा होते देखने के लिए। इस जगह को देखकर आश्चर्य होता है कि कभी यहां कुछ ऐसा हुआ होगा, कोई मजमा लगा होगा, किसी रिफाइनरी का बीज बोया गया होगा। जिस धरती पर नमक होता हो, वहां आखिर कौन सा बीज फल सकता है?

बीज फले या नहीं, पेड़ से फल तोड़ने की तैयारी फिलहाल चालू है। राजमार्ग का काम धड़ल्ले से चल रहा है। गांव वाले, जिनके लिए कम से कम एक रास्ता तो हुआ करता था, अब मुंह ढंक कर रेत में मोटरसाइकिलों का संतुलन बनाने में जुटे हैं।यह रास्ता पुराने वाले बाड़मेर-जोधपुर हाइवे से जाकर जहां मिलता है, उससे कुछ पहले एक झील में बैठे प्रवासी पक्षी नज़र आए। झील के ऊपर गर्द का भयानक गुबार था। शायद ये पक्षी अगले साल यहां आकर धोखा खा जाएं। यहां से कुछ ही आगे झाड़ियों में छुपी हुई अंग्रेजों के ज़माने की कुछ डिबियानुमा पुरानी गेरुआ इमारतें बमुश्किल नज़र आईं। एक इमारत पर पीले रंग की पृष्ठभूमि में काले अक्षरों से लिखा था ‘‘पचपदरा’’। भीतर की दीवार पर ‘‘उत्तर रेलवे वेतन वितरण तिथि सूचना’’ की एक तालिका सफेदी में पुती हुई थी। यह पचपदरा स्टेशन था। कभी यहां रेल आया करती थी। स्टेशन की इमारत के सबसे ऊपर हलके अक्षरों में पढ़ने में आया, ‘‘टीआई 1939’’। बाहर नए बन रहे राजमार्ग के ठीक किनारे इकलौता पत्थर लगा था, ‘‘यह रेल संपत्ति है।’’ इस तरह के दूसरे पत्थरों पर हाइवे चढ़ चुका है। बस इस रेल संपत्ति पर ही कब्जा बाकी रह गया है। इसी रास्ते हम पचपदरा के बस स्टैंड की ओर धीरे-धीरे चले आए।

इलाका देखने के बाद रिफाइनरी के लिए पचपदरा के चुनाव पर जानकारों की आपत्तियां और भंवरलाल की बातें याद आईं। जो कुछ पिछले पांच साल में बायतू में हुआ, वह अब पचपदरा में दुहराया जा रहा है। एक राजमार्ग बन रहा है और राज करने के सौ सपने उसके साथ पल रहे हैं। जमीनों का दाम आसमान पर है। अंगरेज यहां नमक के लिए रेल लेकर आए थे। नए अंगरेज पेट्रोल के लिए हाइवे लेकर आ रहे हैं। हाइवे आएगा तो वो सब आ सकता है जो अब तक नहीं पहुंचा। लेकिन असल सवाल ये है कि हाइवे जिसके नाम पर बनाया जा रहा है, वह रिफाइनरी कब आएगी? इसका जवाब मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन नहीं। पचपदरा बस स्टैंड के पास चाय बेचने वाले शिव कहते हैं, ‘‘रिफाइनरी का हमें क्या करना? आए तो ठीक, मगर उस बहाने कुछ हो तो रहा है कम से कम। अशोकजी (गहलोत) ने इतना तो किया ही है।’’

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जो किया है, वह साफ दिख रहा है। बाड़मेर से जोधपुर के बीच नए-नए रंगे-पुते भारत निर्माण राजीव गांधी सेवा केंद्र रेत के बीच खड़े हो गए हैं, हालांकि सब पर ताला जड़ा हुआ है। हर सरकारी अस्पताल के बाहर स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हैं, हालांकि मोबाइल हेल्थ वैन का काम केयर्न और ऐसी ही निजी कंपनियां संभाल रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के कार्यक्रमों में केयर्न आधिकारिक साझीदार है और रोडवेज़ की बसों में लगे उसके विज्ञापन लोगों से तंबाकू छोड़ने का आह्वान कर रहे हैं। एक ज़माने में अकेले उदयपुर जिंक सिटी के नाम से जाना जाता था जिसे बाद में वेदांता सिटी कहा जाने लगा। आज देश का सबसे बड़ा जिला जैसलमेर पवन ऊर्जा कंपनी सुजलॉन के हवाले है तो दूसरे सबसे बड़े जिले बाड़मेर का पर्याय केयर्न बन चुका है। शिक्षा की दर गिरी है, बलात्कार बढ़े हैं, पलायन की स्थिति भयावह हुई है, खेती में रियल एस्टेट घुस चुका है तो सुजलॉन के खंबों पर बैठ कर करेंट लगने से मोरों की मौत हो रही है। सवाल उठता है कि क्या शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन, पर्यावरण, जागरूकता पर मारवाड़ के इलाके में काम करने वाला कोई भी नहीं? क्या यहां सिर्फ सरकार है और कंपनी? देश के सबसे पिछड़े इन जिलों के लोग खुद ही क्यों नहीं आगे आ रहे?

बीकानेर में मरु विकास एवं शोध संस्थान नाम का एनजीओ चलाने वाले रामेश्वर लाल शर्मा जवाब में बताते हैं, ‘‘कुछ साल पहले तक यहां सामाजिक संस्थाएं जमीनी काम कर लेती थीं। अब कंपनियों को लगने लगा है कि जब उन्हें अपने कारोबार का दो परसेंट सामाजिक कामों पर (सीएसआर) खर्च करना ही है, तो वे खुद सामाजिक क्षेत्र में उतर आई हैं और सरकारों के साथ साठगांठ कर के संस्थाओं की जगह को खा गई हैं। नतीजा यह हुआ है कि फंडिंग कम या खत्म होने के कारण अपने को बचाए रखने के लिए पुरानी सामाजिक संस्थाओं ने कंपनियों के साथ हाथ मिला लिए हैं।’’ शर्मा इसे संस्थाओं और उनके संचालकों की मजबूरी के तौर पर गिनाते हैं, लेकिन बात इतनी आसान नहीं है। भंवरलाल चौधरी की संस्था लोक कल्याण संस्थान में संयोजक भीकाराम बताते हैं कि पहले यहां बच्चों की शिक्षा पर क्राइ(चाइल्ड राइट्स एंड यू) का काम था। उसका प्रोग्राम बंद होने के बाद दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने बायतू में प्रवासी मजदूरों पर प्रोजेक्ट शुरू कर दिया और उनकी संस्था इसमें जुड़ गई। इसकी स्वाभाविक परिणति यह हुई कि धीरे-धीरे सरोकार खत्म हुए और आज की तारीख में उनकी संस्था केयर्न कंपनी का सीएसआर भी करती है। भीकाराम के मुताबिक जमीनी काम करने वाले समूहों के कंपनीपरस्त हो जाने का एक बड़ा नुकसान यह हुआ है कि अब जनता के असंतोष और विरोध को मैनेज करने का काम शुरू हो गया है।

लीलाणा में दर्जी की दुकान से जमीन अधिग्रहण के विरोध वाले जो ज्ञापन हमें मिले थे, उन पर रिफाइनरी समर्थकचौधरी के भी दस्तखत थे। हमने चौधरी से इस संबंध में जब पूछा, तो उन्होंने खुलकर केयर्न का सीएसआर करने की बात स्वीकार की। उन्होंने कहा, ‘‘मेरी अच्छी उठक-बैठक है उसके अधिकारियों के साथ। उन्होंने ही मुझे बताया था कि रिफाइनरी का लगना मुश्किल है।’’ हमने पूछा, ‘‘फिर आप विरोध और धरने में लीलाणा क्यों गए थे?’’ उन्होंने जवाब दिया, ‘‘मैंने वहां जाकर उन लोगों से कहा था कि आप उचित मुआवजे की मांग करो, 10-15 लाख प्रति बीघा तक मांगो, बच्चों की शिक्षा, पुनर्वास, आदि की मांग करो। उन लोगों ने एक करोड़ मांग लिया। अब आप देखो कि एक करोड़ तो गुड़गांव में भी जमीन का दाम नहीं है। सोचिए, इसके कारण लोगों का कितना नुकसान हो गया।’’ लोगों का नुकसान? रिफाइनरी के अब तक नहीं लगने से हुए नुकसान के आकलन में लोग कहां से आ गए? सवाल ये है कि रिफाइनरी यहां नहीं लगने से असल नुकसान आखिर किसका हुआ है? कोई नुकसान हुआ भी है या नहीं?

इस लंबी और जटिल कहानी के शायद ये आखिरी सवाल थे जिनका जवाब हमें भंवरलाल से हुई बातचीत के अंत में की गई एक पेशकश में मिला, जब रिफाइनरी की राजनीति पर हो रही बातचीत को उन्होंने अचानक दूसरी ओर मोड़ दिया और अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर बिजली के खंबे में फंसे मोरों की तस्वीर दिखाने लगे। वे बोले, ‘‘ये जो जैसलमेर में सुजलॉन वाले बिजली के खंबों का मामला है न, उसमें हम पीआईएल (जनहित याचिका) पर जाने का सोच रहे हैं। इस बारे में हमने तहलका के (नाम गोपनीय) से पहले बात की थी, लेकिन अच्छा हुआ कि आप आ गए। आप ऐसा करो कि दिल्ली में इस मुद्दे पर मीडिया एडवोकेसी कर लो, लीगल काम हम कर लेंगे। करीब सौ किलोमीटर की बिजली की लाइन होगी, कंपनी को करोड़ों के नुकसान का मामला बनता है...।’’ मैंने कौतूहल से कहा, ‘‘हां, तब तो कंपनी को बड़ा नुकसान हो जाएगा। उसे सारे खंबे हटाने पड़ जाएंगे।’’ उन्होंने जवाब दिया, ‘‘कंपनी खंबे थोड़ेही हटाएगी, पीआईएल डालते ही उसके लोग भागकर इधर आएंगे... समझौते की मेज़ पर... आप तो ऐसा करो, कि स्टोरी में हमारा नाम भी आ जाए। अच्छी मजदूरी मिल जाएगी... कम से कम एक करोड़ का तो नुकसान है ही, कुछ तो देगा...।’’ शुरू में मेरे सवालों पर वे असहज थे, लेकिन अब असहज होने की बारी मेरी थी। मेरा चेहरा देखकर चौधरी बोले, ‘‘सीएसआर भी मिल सकता है सुजलॉन का...।’’ ‘‘...और मोरों का क्या?’’ ये मेरा अगला सवाल था, जो मैंने नहीं पूछा। इसके बाद मैंने राजस्थान में किसी से कोई सवाल नहीं पूछा।

बाड़मेर के बायतू से शुरू होकर पचपदरा में खत्म होने वाली इस कहानी का एक अहम सिरा सूर्यनगरी जोधपुर में जाकर खुलता है जो अशोक गहलोत का चुनाव क्षेत्र है। लोग कहते हैं कि इस बार जोधपुर के चुनाव में पीने के पानी का संकट एक अहम मुद्दा है। कितनी दिलचस्प बात है कि सरकार ने प्रस्तावित रिफाइनरी को प्रतिदिन 50 से 60 लाख गैलन पानी मुफ्त में इंदिरा नहर से देने का वादा किया है। इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि यहां के लोग इस बात को जानते भी हैं। दरअसल, यहां के लोग बड़े समझदार हैं। वे और भी कई बातें जानते हैं। मसलन, वे यह भी जानते हैं कि न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। इसीलिए वे फिलहाल चुप रह कर बस अपनी धरती की कीमत को तौल रहे हैं। उन्हें तत्काल सिर्फ एक काम करना है-कांग्रेस और भाजपा में से किसी एक का चुनाव। उसी हिसाब से उन्हें तत्काल अपने-अपने शिलान्यास स्थलों का फैसला भी करना है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही साथ कंपनी मुफ्त पेशकश की तरह आतीहै। यहां आपको चुनने की छूट नहीं है, कि हम तो बिना कंपनी के कांग्रेस या भाजपा लेंगे! कंपनी दोनों के साथ नत्थी है। यह पेशकश इतनी बुरी भी नहीं, क्योंकि इसका एक भरा-पूरा पैकेज है जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, खेती, मजदूरी, पशु-पक्षियों की रक्षा, जागरूकता आदि तमाम नेमतें अलग-अलग प्रोजेक्टों के माध्यम से अलग-अलग वक्त पर लोगों को मिलनी हैं। पिछले चार साल से हालांकि ये सारे काम स्थगित हैं क्योंकि राजस्थान में फिलहाल एक सबसे बड़ा काम हो रहा है-लोग कहते हैं कि यहां एक रिफाइनरी लग रही है।
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