आगरा - लखनऊ एक्सप्रेस वे : भीषण सर्दी में किसान अनशन पर


उत्तर प्रदेश के कनौज जिले के फगुहा गांव के हिमनापुर मोड़ पर एक्सप्रेस वे के लिए जमीन न देने की जिद पर किसान अड़े हैं। पिछले 26 दिनों से लगातार अनशन जारी है। भीषण सर्दी व कोहरे के मौसम के चलते  दर्जनों किसान बेमार हो चुके है. सरकार अभी भी अपनी जिद्द पर अड़ी है. कृषि-भूमि बचाओ मोर्चा, उत्तर प्रदेश के साथी डा. परमानन्द सिंह यादव  की रिपोर्ट;

स्वच्छन्द बाजार प्रेरित व केन्द्रित आर्थिक मॉडल के मात्रात्मक नियंत्रण तथा दबाव के वशीभूत होकर राज्य अब पूजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के एजेन्ट के रुप में कार्य करने लगे हैं। तथाकथित विकास के नाम पर किसानों को उजाड़कर उन्हें रसातल में ढ़ंकेला जा रहा है। पिछले दो दशकों से विभिन्न परियोजनाओं, तथा एक्सप्रेस वे बनाने के लिए किसानों की कृषि के जमीनों का अधिग्रहण इतनी तीव्र गति से किया जा रहा है कि किसान अब सरकारी वेन्टीलेटर पर जीनें के लिए मजबूर हो गया है।

50 गांवों से गुजरेगा ग्रीन एक्सप्रेस-वे

आगरा-लखनऊ प्रवेश नियंत्रित एक्सप्रेस-वे (ग्रीन फील्ड परियोजना) 50 गांवों से होकर गुजरेगा। इसके लिए करीब 3200 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया जाना तय है। इसमें सदर तहसील के फगुआ, बेहरिन, वनपुरा नरायनपुर्वा, पचोर, गागेमऊ, गोवा, मतौली व लोहामढ के राजस्व गांव चयनित किए गए है। इसी तरह तिर्वा तहसील में बहसुइया, पिपरौली, भुन्ना, कड़ेरा, सिकरोरी, सियापुर काछी, अलमापुर, सतसार, बलनापुर, पट्टी, अलीपुर अहाना, बस्ता व ठठिया गांव इसके दायरे में हैं। छिबरामऊ तहसील में सकरहनी, देवपुर, सिकंदरपुर, बरगावां, नगला खेमकरन, तेरारब्बू, बझेडी, नरमऊ, हुसेपुर, सौरिख, तालग्राम, मुसाफिरपुर, अयूबपुर, रसूलपुर, सलेमपुर रैपालपुर, सुल्तानपुर, गोरखपुर हरभानपुर, मुंडाला, बिरौली, अमोलर, त्योर, रनुआ, मिश्राबाद, डडौनी, नगला बिशुना, बहादुर मझिगवां, भीखमपुर सानी, जलालपुर दीनदारपुर, बेहटा खास राजस्व गांव सम्मलित हैं। आगरा से लखनऊ प्रवेश नियंत्रित एक्सप्रेस वे (ग्रीन फील्ड) का काम जल्द शुरू कराने के लिए कहा है। 270 किमी की छह लेन वाले एक्सप्रेस वे को बनाने में करीब 9500 करोड़ का खर्च आएगा।
प्रमुख शहरों को बाईपास से जोड़ा जाएगा : एक्सप्रेस वे का रूट आगरा से शुरू होकर फिरोजाबाद, इटावा, मैनपुरी, कन्नौज और हरदोई होते हुए लखनऊ तक आएगा। रास्ते में पड़ने वाले प्रमुख शहरों को बाईपास के जरिये एक्सप्रेस वे से जोड़ा जाएगा।
10.25 मीटर की होगी हरित पट्टीः एक्सप्रेस वे में हरियाली का खास तौर पर ध्यान रखा जाएगा। इसके दोनों ओर लगभग 10.25 मीटर तक हरित पट्टी विकसित की जाएगी। प्रस्तावित एक्सप्रेस वे कस्बों व गांवों से दूर होगा।
औद्योगिक कॉरीडोर के रूप में करेंगे विकसितः मुख्य सचिव ने कहा कि एक्सप्रेस वे को औद्योगिक कॉरीडोर के रूप में विकसित किया जाएगा। एक्सप्रेस वे के पास इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, शिक्षण संस्थान व मेडिकल संस्थानों की स्थापना के अवसर बनेंगे। आगरा, फिरोजाबाद व मलिहाबाद जैसे पर्यटन व उद्योगों से जुड़े शहरों के बीच तीव्रगामी व्यापारिक सुविधा उपलब्ध होगी। पश्चिम उत्तर प्रदेश के इलाकों और राजधानी के बीच यातायात त्वरित और सुगम हो जाएगा। पीपीपी मॉडल पर बनेंगी फोर लेन सड़कें : स्टेट हाइवे डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत अधिक ट्रैफिक वाली सड़कों को पीपीपी मॉडल के जरिये फोर लेन बनाने के लिए एक माह के अंदर कार्ययोजना तैयार की जाएगी।
ऐसे हालात में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आगरा - लखनऊ एक्सप्रेस वे के निर्माण हेतु जमीनों का अधिग्रहण करना कितना जायज है? वास्तविकता यह है कि यू0पी0 में मायावती सरकार के दौरान नोएडा से आगरा को जोड़ने वाला यमुना एक्सप्रेस वे के जबाब में सपा सरकार द्वारा  आगरा से लखनऊ के बीच आगरा -लखनऊ  एक्सप्रेस वे बनाने की योजना बनाकर किसानों की जमीनों का अधिग्रहण करके अपने ड्रीम प्रोजेक्ट को अमलीजामा पहनाना चाहती है। विधान सभा में अनुपूरक बजट में इसके लिए 450 करोड़ रुपये का इन्तजाम भी कर दिया गया है। यह एक्सप्रेस वे पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के तहत बनेगा। सात जिलों से होकर गुजरने वाला करीब 270 किलोमीटर लम्बा ड्रीम प्रोजेक्ट (आगरा - लखनऊ ग्रीनफिल्ड एक्सप्रेस वे) के निर्माण पर लगभग 10,500 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है और इसके लिए करीब 3200 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया जाना तय है। इस एक्सप्रेस वे को यमुना एक्सप्रेस वे से भी जोड़ने का प्लान है ताकि नोएडा से लखनऊ 5-6 घंटे में पहुचा जा सके। सरकार के अनुसार 8 लेन वाला यह एक्सप्रेस वे पर्यावरण के अनुकूल होगा तथा आगरा से लखनऊ 6 घंटे के बजाय 3‐30 घंटे में पहुचा जा सकता है। बाढ़ से बचने के लिए जमीन की सतह से काफी उचॉंई पर एक्सप्रेस वे होगा। एक्सप्रेस वे पर 4 डेवलपमेन्ट सेन्टर बनंेगे। इनमें कृषि मण्डी, मालगोदाम, खाद्य-प्रसंस्करण इर्काइंयां, शीतगृह, औद्योगिक केन्द्र, स्वास्थ्य केन्द्र, विद्यालय तथा औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान बनाये जायेंगे। इसके साथ ही आगरा लिंक रोड, फिरोजाबाद लिंक रोड, कन्नौज लिंक रोड तथा लखनऊ लिंक रोड अर्थात चार लिंक रोड भी बनेंगे। इस एक्सप्रेस वे के बनाने के पक्ष में सरकारी तर्क कुछ इस प्रकार दिया जाता है-
  • यात्रा के समय को कम करने के लिये तेजी से आगे बढ़ने हेतु गलियारा प्रदान करना। 
  • यमुना के उत्तरी छोर के मुख्य नगरों/वाणिज्यिक केन्द्रों को जोड़ना 
  • मैनपुरी तथा सैफई की तरह आस - पास के क्षेत्रों के विकास को सुनिश्चित करना। 
  • एनएच - 91 सिपच पहले से ही भीड़-भाड़ है और जो अलीगढ़, एटा, उन्नाव आदि शहरों के बीच से गुजरता है, शहरों के साथ - साथ एनएच को राहत देना। 
  • वाणिज्यिक के साथ ही साथ ताजमहल देखने आने वाले पर्यटकों के वाहनों के चलने से उत्पन्न प्रदूषण तथा कार्बन पद चिन्ह को कम करना। 
  • वाहन ईंधन लाभ क्षमता सुधार करना, वाहनों के टूटन - फूटन व क्षरण को रोकना और उनके साजो लागत कम करना। 
  • कृषि, बागवानी और दूध उत्पादों को प्रमुख शहरों में कम समय में सुगमता से भेजने के लिये पश्चिमी उत्तर - प्रदेश  के किसानों को सुविधा मुहैया कराकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना। 
  • आपूर्ति के आन्दोलन में तेजी लाने और यमुना बाढ़ व अन्य आपात स्थितियों के दौरान प्रभावित क्षेत्रों के लिये मदद हेतु सुविधाजनक मार्ग प्रदान करना। 270 किलोमीटर लम्बा तथा 110 मीटर चौड़े एक्सप्रेस वे में 8 इंटरचेंज, 5 मुख्य टोल प्लाजा, इंटनचेंज पर 7 टोल 1 प्लाजा, 80 अन्डरपास, 1 रेल ओवर व्रिज, 2 बड़े पुल, 38 छोटे पुल, 68 कार्ट ट्रैक पार , 70 वाहन अन्डरपास, तथा पुलियों का निर्माण किया जायेगा।
निजी क्षेत्रों के हाथ खड़ा करने के बाद सरकार ने अपने स्तर पर एक्सप्रेस वे बनाने की सम्भावनाओं पर विचार करते हुए परियोजना के लिए जमीनों का अधिग्रहण शुरु कर दी है। हालॉंकि सरकार अब भी निजी विकासकर्ताओं के मान - मनौव्व्ल में जुटी है। सरकार ने कम्पनियों से सम्पर्क करके उनसे निविदा प्रपत्र को नए सिरे से तैयार करने की पेशकश की है तथा कम्पनियों की शर्तों के मुताबिक निविदा प्रपत्र में फेरबदल कर उन्हें मनाने का प्रयास सरकार द्वारा किया जा रहा है आखिर ऐसा क्यों किया जा रहा है? क्या सरकारी उद्देश्यों के मुताबिक जैसा की सरकार एक्सप्रेस वे बनाने के पक्ष में दे रही है, इसके पूरा होने पर किसान आत्मनिर्भर बनकर सम्पन्न हो जायेंगे? नहीं। फिर सरकार इस परियोजना को बनाने के लिये कटिबद्ध क्यों है? कारण स्पष्ट है कि किसानों को उजाड़कर निजी कम्पनियों के मालिको को लाभ पहुचाने की गरज से सरकार एक्सप्रेस वे बनाना चाहती है। इसीलिए सरकार जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया न अपनाकर किसानों से समझौता करके जमीन खरीदने की तैयारी कर रही है। समझौता करने का मुख्य कारण यह है कि अगर जमीन अधिग्रहण कानून के तहत प्रोजेक्ट के लिये जमीन अधिग्रहित की जाती है तो प्रोजेक्ट की लागत काफी बढ़ जायेगी, क्योंकि किसानों को मुआवजा अधिक देना पड़ेगा। इसलिए सरकार किसानों से समझौता करके जमीन खरीदना चाहती है। जबकि सरकार दावा करती है कि इससे किसानों को फायदा होगा तथा उन्हें रकम का भुगतान जल्दी और आसानी से हो जाएगा।  सरकार का यह दावा हास्यास्पद, झूठा , वोगस तथा किसान विरोधी है।


आगरा - लखनऊ एक्सप्रेस वे फिरोजाबाद, इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, हरदोई, मलिहाबाद से होकर लखनऊ तक पहुचेगा। जिन इलाकों से होकर यह एक्सप्रेस वे गुजरेगा वहॉं के किसानों तथा गॉंव वालों के विरोध के चलते सर्वेक्षण दल को वापस जाना पड़ा । आगरा के फतेहाबाद गांव के किसानों के उग्र तेवर तथा विरोध के कारण यहां के खेतों का सर्वेक्षण करने आये एक दल को मजबूरन लौटना पड़ा । किसानों ने बताया कि हमारे पास आजिविका के लिए खेतों के अलावा कुछ भी नहीं है। यही कारण है कि इस परियोजना के लिए जमीन देना हमारे लिए सम्भव नहीं है। जिला उप - मजिस्ट्रट और राजस्व अधीक्षक भी किसानों को समझानें - बुझानें में नाकाम रहे। इतना ही नहीं मैनपुरी मार्ग पर बने 127 मकानों का गिरना तय है। इसी प्रकार से जिन - जिन लोगों के खेत तथा मकान इस एक्सप्रेस वे में जायेंगे या गिराये जायेंगे ऐसे तमाम लोग जिसमें मुख्यतः किसान हैं इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। फिर भी सरकार अपने ड्रीम प्रोजेक्ट को बनाने के लिये कटिबद्ध है। सरकार कहती है कि कृषि, बागवानी और दुग्ध उत्पादों को कम समय में सुगमता से प्रमुख शहरों में पहुंचाकर लाभ कमाने से किसान आत्मनिर्भर बन जायेंगे। जब किसानों की जमीन ही छिन जायेगी तो क्या वे सड़कों पर खेती, बागवानी और पशुपालन करके उत्पादों को पैदा करेंगे? असल में सरकार सब्जबाग दिखलाकर किसानों की कृषि- भूमि एनकेन प्रकारेण हथियाकर पूजीपतियों के लाभ बचत के मार्ग को प्रशस्त करना चाहती है। चूकि नोएडा इन्डस्ट्रियल क्षेत्र है और वहॉं के फैक्टरियों के उत्पादित माल को कम समय में लखनऊ तक सरल तथा सुगम तरीके से पहुचाया जा सके इसी खातिर सरकार इस एक्सप्रेस वे को बनाने की जल्दबाजी कर रही है न कि किसानों की भलाई के लिए। असलियत यह है कि इसी खेती पर किसान तथा खेतिहर मजदूर शारीरिक श्रम करके अपना तथा अपने परिवार का भरण - पोषण करते हैं । कृषि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। एक्सप्रेस वे बनाकर कृषि को कमजोर करने का मतलब है देश की अर्थव्यवस्था को पूजीपतियों के हाथों में गिरवी रखना और किसानों की आत्मनिर्भरता पर चोट करना।

राष्ट्र के विकास का अर्थ सिर्फ पूंजीपतियों का विकास नहीं है बल्कि इसका सही तथा वास्तविक अर्थ है किसानों, मजदूरों का विकास । देश का किसान कितना सहनशील है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कृषि क्षेत्र की कमाई अर्थात किसानों की कमाई 25.65 प्रतिशत में से 24.26 प्रतिशत हिस्सा किन गैर कृषि क्षेत्रों पर खर्च किया जाता है क्योंकि मात्र इसका 1.39 प्रतिशत भाग ही कृषि के विकास पर खर्च किया जाता है। असल में कृषि क्षेत्र की कमाई का इतना बड़ा भाग उन गैर कृषि क्षेत्रों पर खर्च किया जाता है जो देश के जीडीपी में परोक्ष रूप से(शारीरिक श्रम करके) कोई योगदान नहीं करते। यह ध्रुव सत्य है कि मुद्रा अर्थात पैसा शारीरिक श्रम से ही पैदा किया जाता है। इस तथ्य के हिसाब से स्वास्थ्य, शिक्षा, न्यायपालिका, पुलिस, शासन व प्रशासन, सांसद व विधायक, लोक सभा व राज्य सभा, विधान सभा व विधान परिषद, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लगायत प्रमुख सचिव तक वेतन भोगी कर्मचारी, बौद्धिक क्षमता से अपने शोध कार्यों के द्वारा देशी-विदेशी पूजीपतियों के औद्योगिक व व्यापारिक क्षेत्रों को तकनीकी साधन मुहैया कराने वाले वैज्ञानिक व बुद्धिजीवी आदि के द्वारा देश के जीडीपी या राष्ट्रीय आय में परोक्ष रूप से कोई योगदान नहीं किया जाता क्योंकि इनके द्वारा मुद्रा की कमाई की ही नहीं जाती।

ऐसी स्थिति में यह प्रश्न लाजिमी है कि इनके ऊपर होने वाले खर्चे चाहे वह वेतन भत्ते के रूप में हो या ऊपर वर्णित संस्थाओं को चलाने के खर्चे के रूप में, आखिरकार कहॉ से आता है? निर्विवाद सच यह है कि इन पर खर्च होने वाला धन कृषि क्षेत्र यानि किसानों की कमाई से मिलता है। इस हकीकत का सत्यापन सेंट्रल स्टैटिस्टिकल आर्गनाइजेशन, डेटाबुक फार डी0सी0एच0 के आंकड़ों से होता है। किसानों की कमाई का औसतन 24.26 प्रतिशत भाग (कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा) वेतन भोगी कर्मचारियों के वेतन भत्ते के रूप में तथा लोक सभा, राज्य सभा, विधान सभा व विधान परिषद को चलाने में खर्च किया जाता है। इसके ठीक उलट किसानों की कमाई का बहुत छोटा भाग (1.39 प्रतिशत) कृषि के विकास पर खर्च किया जाता है अर्थात देश के चतुर्थ श्रेणी से लेकर उच्च पदों पर आसीन अधिकारी, वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी, सांसद, विधायक, मंत्री व सन्तरी जो किसानों की कमाई पर ऐश करते हैं कभी नहीं सोचते कि जिस दिन कृषि क्षेत्र की कमाई एकाएक बन्द हो जाएगी उस दिन इन्हें ऐश करने के लिए धन कहॉ से आएगा? यह भी सम्भव है कि इस हकीकत की इन्हें जानकारी ही न हो।

शायद इसीलिए किसानों की स्थिति दिनोंदिन खराब होती जा रही है फिर भी इनके कान पर जॅू नहीं रेंगता। कृषि क्षेत्र से पैदा किया गया धन वेतन भत्ते व संस्थाओं के संचालन में ही खर्च किया जाता है क्योंकि सरकारी नौकरियों के कुछ पदों को ठेकेदारी प्रथा के हवाले करना, रिक्त पदों पर कम वेतन देकर संविदा पर कर्मचारियों को रखना तथा देश के हर विभागों में लाखों-लाख रिक्त पदों पर नियमित कर्मचारियों की नियुक्ति न करना इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि जैसे-जैसे कृषि क्षेत्र का योगदान देश के सकल घरेलू उत्पाद में कम होता गया तैसे-तैसे सरकारी खजाने में धन की कमी होती गई जिसका असर नियुक्तियों पर पड़ा। यानि किसानों द्वारा कमाया गया धन कर्मचारियों के वेतन भत्ते पर ही खर्च किया जाता है तभी तो सरकार ऐसा कर रही है। देश के राजनेता चाहे वो सत्ता में हो या विपक्ष में हो इस भ्रम में हैं कि देशी-विदेशी कारपोरेट घरानें तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विकास करने से ही इन्हें वेतन भत्ते और सारे सुख संसाधन मिलते रहेंगे। भले यह कड़वी सच्चाई हो लेकिन जिस दिन कृषि क्षेत्र पर पूजीपतियों/बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्जा हो जाएगा उसी दिन से ये सारे लोग किसानों की तरह पूजीपतियों के बंधुआ मजदूर के रूप में काम करने लगेगें। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, अतः किसानों की भलाई तथा कृषि को विकसित करने के लिए वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवियों, माननीय सांसदो, विधायकों, मंत्रियों आदि को एकजुट होकर इस दिशा में सोचते हुए कार्य करना चाहिए तथा एक्सप्रेस वे या अन्य परियोजनाओं के लिए कृषि भूमि के अधिग्रहण पर अविलम्ब रोक लगा देना चाहिए वरना हाथ मलने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं दिखा।




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