मारुति में मजदूरों पर दमन: अंधेर नगरी और चमगादड़ों का तिमिर-राग

अंधेरे का तिलिस्म जिन चमगादड़ों ने खड़ा किया है, वे इस मामले में मारुति प्रबंधन की शक्ल में हैं, सरकारी पक्ष के वकील हैं, राज्य की कर्मचारी विरोधी सरकार के रूप में हैं, बिकी हुई पुलिस और खुपिफया तंत्रा के तौर पर हैं। अंधे हैं और अंधेरे में शिकार के आदी हैं। इस घटना का ताना-बाना भी इन्हीं का बुना हुआ है ताकि अंधेरे में ये रहें, अंधेरे में लोग रहें और पिफर अंधेरे में इनका ख़ूनी खेल चलता रहे। मजदूर मरे, पिसे, कटे, तबाह हो। ख़ून बहे, नालियों, गलियों, खलिहानों से होता हुआ मुख्य सड़कों और चौराहों तक। सौदे पर सौदा होता रहे और मजदूरों के ख़ून से अघाए हुए ये चमगादड़ मस्त होकर तिमिर-राग गाएं...पाणिनि आनंद का आलेख;
मारुति सुजुकी मजदूरों का आंदोलन

एक बार फिर मारुति सुजुकी के संघर्षरत मजदूरों पर पूंजी की रक्षा में लगी हरियाणा पुलिस व प्रशासन ने दमन तेज कर दिया है। दमन की ताजा तरीन घटना को 19 मई को तब अंजाम दिया गया जब मारुति सुजुकी के संघर्षरत मजदूरों, उनके परिवार व गांव वाले, क्रांतिकारी, प्रगतिशील, लोकतांत्रिक संगठनों व ट्रेड यूनियन संगठनों के कार्यकर्ताओं व सदस्यों समेत लगभग 1500 लोग मारुति सुजुकी के मजदूरों व मजदूर संगठनों के नेताओं को रिहा करने की मांग के लिये शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे।
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एक मई, 2013 को जब देश और दुनिया के कई देशों में मई दिवस मनाया जा रहा था, मजदूरों के हक के गीत गाए जा रहे थे, लाल झंडों में और मानवाधिकार, श्रमिक अधिकार जैसे नारे वाले बैनरों के साथ लोग भाषण और परिचर्चाएं कर रहे थे, ठीक उसी वक्त हरियाणा के मानेसर में पिछले साल जुलाई की हिंसा के बाद गिरफ्रतार किए गए 147 युवा श्रमिक गुड़गांव के सत्रा न्यायालय की बैरकों में तप रहे थे। हरियाणा पुलिस की बसों में इन्हें गुड़गांव की भूंडसी जेल से ठूंसकर लाया गया था। लोहे की चादर वाली छत तंदूर की तरह तप रही थी। पीने के पानी का कोई इंतजाम नहीं। सूखे गले और तंग जालियों वाली खिड़कियों से चेहरे बाहर की दुनिया झांककर देखना चाहते थे। इस कवायद में हवा और रुक रही थी लेकिन परिजनों को एक झलक देख पाने की ललक के आगे पसीना बहना क्या मायने रखता है।

सत्रा न्यायालय गुड़गांव में मारुति सुजुकी के मजदूरों की पहली सुनवाई हो रही थी। क्या तारीख चुनी थी एक न्यायाधिकरण ने मजदूरों के मामले की पहली सुनवाई के लिए। वामपंथी विचारधारा वाले वकील, रणदीप सिंह हुड्डा, जो अपनी उम्र के लगभग 80 बसंत देख चुके हैं और आज भी एक युवा कॉमरेड की तरह मौकों पर डटे रहते हैं, मजदूरों की ओर से इस मामले की सुनवाई के लिए रोहतक से गुड़गांव आए हुए थे। मजदूरों से संबंधित मामले देखना इन्होंने पिछले 10 वर्षों में कम कर दिया है पर हुड्डा उन लोगों में हैं जो जुलाई 2012 की घटना के बाद सबसे पहले इन मजदूरों और प्रभावित लोगों के बीच गए। बुढ़ापे और कैंसर से जूझ रहे एडवोकेट हुड्डा की जिरह देखने लायक थी। सुप्रीम कोर्ट के एक वकील, जो अपने मामलों और पफीस के लिए दिल्ली और देश में बद-मशहूर हैं, केटीएस तुलसी साहब अपने लश्कर के साथ सरकारी पक्ष के वकील के तौर पर उपस्थित थे। एसी से निकल कर पसीने और चिपचिपाहट वाली अदालत में खड़े होना न तो तुलसी को भा रहा था और न ही उनके साथ नत्थी होकर आए जूनियर, इंटर्न टाइप अंग्रेजी मार्का वकीलों को जिन्होंने कानून की पढ़ाई में लेबर लॉ इसलिए पढ़ा है ताकि उसकी हर मुमकिन तोड़ को अपने लिए तैयार करने का गुर सीख सकें और इसके लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मोटी तन्ख्वाहों पर न्याय को गोश्त के मापिफक बेच सकें। 

तुलसी इस मामले में कहने के लिए सरकारी वकील हैं पर थानों में बैठकर एक-एक मजदूर विरोधी बयान का इमला उन्होंने ही दिया था। मजदूरों को कैसे घेरा जाए और कैसे तोड़ा जाए, यह उन्होंने सिखाया। चार्जशीट ऐसी तैयार कराई है कि मजदूर अपने हक में तैयारी के लिए पूरे कागज तक न देख सकें। गवाहों के नाम चार्जशीट से बाहर है। तर्क है कि ऐसा किया तो उनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है। जब देश के क्रांतिकारी अंग्रेजों के खिलापफ मोर्चा खोलकर लड़ रहे थे सांडर्स केस हो, पेशावर कॉन्सपिरेसी केस हो, मेरठ कॉन्सपिरेसी केस हो, किसी भी मामले में अंग्रेज हुकूमत तक ने गवाहों की सुरक्षा को खतरा का बहाना नहीं बनाया था। और तो और, आजाद भारत में इंदिरा गांधी हत्याकांड, राजीव गांधी हत्याकांड, बेअंत सिंह हत्याकांड, 1984 के दंगे, गुजरात दंगे... ऐसे नमालूम कितने संवेदनशील मामलों में भी गवाहों की सूची सार्वजनिक थी पर केटीएस तुलसी और हरियाणा सरकार को लगता है कि मानेसर का मजदूर क्रांतिकारियों से भी ज्यादा उग्र और चरमपंथियों से भी ज्यादा खतरनाक है। हरियाणा सरकार और तुलसी की इस सूझ पर हंसी भी आती है और शर्म भी। 

कचहरी में जिरह शुरू हुई तो लगा जैसे केटीएस तुलसी पब्लिक प्रासीक्यूटर नहीं, मारुति के दलाल के रूप में वहां मौजूद हैं। क्राउन प्लाजा होटल की पांच सितारा आरामगाह में वो मारुति सुजुकी को बचाने के लिए प्रयासरत हैं। उनको न तो अन्याय दिख रहा है, न मजदूरों के अधिकारों का हनन। न ही अमानवीय प्रबंधन की धृष्टताएं और न ही संविधान और कानून की उड़ती धज्जियां। उन्हें दिख रहा है 1.43 करोड़ रुपया जो कि उन्हें हरियाणा सरकार ने मजदूरों के खिलापफ मुकदमा लड़ने के लिए दिया है। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत डाली गई एक अर्जी के मुताबिक मारुति मामले में सरकारी पक्ष के वकील के तौर पर हुड्डा सरकार तुलसी को अप्रैल महीने तक इतनी रकम अदा कर चुकी थी। आगे कितना और इसका कोई हिसाब नहीं और इसका तो आकलन भी संभव नहीं कि मारुति की ओर से उन्हें कितनी रेवड़ियां मिली हैं। 

कागजों की मानें तो मजदूरों के इस मामले की शुरुआत हुई थी पिछले बरस 18 जुलाई को जब मैनेजमेंट और कर्मचारियों के बीच हिंसक भिड़ंत में एक एचआर अधिकारी की मौत हो गई और कई कर्मचारी, अधिकारी, मजदूर घायल हो गए। मारुति सुजुकी प्लांट, मानेसर की संपत्ति को नुकसान हुआ। आगजनी और तोडपफोड़ हुई। लेकिन सच की चादर आसमान की तरह पसरी है। लंबे अरसे से चले आ रहे शोषण के खिलापफ एकजुट हुए मजदूरों को पहले तो जातिसूचक शब्दों के जरिए भड़काया गया। पिफर उन्हीं के खिलापफ कार्रवाई हुई और इसके बाद जो नंगा नाच प्रबंधन के इशारे पर तीन घंटे चला, उसके लिए अपराधी भी मजदूर ही घोषित किए गए। पर प्रश्नों की अनंत वल्लरियां अपने लिए उत्तर के पल्लव खोज रही हैं। उत्तर किसी के पास नहीं है। या है भी तो कोई सुनना नहीं चाहता। और अगर कोई सुनना चाहे तो एक पूरा तंत्रा उस उत्तर के रास्ते में टिहरी बांध बनकर खड़ा हो गया है ताकि लोग उत्तर की आस में मर जाएं और प्रबंधन अपना धंधा पुरसुकून करता रहे। इस धंधे में जो अंधे हैं, वो खाप वाले भी हैं, आप वाले भी हैं, सरकार और पुलिस है। अपराधी वो है जिसका अपराध कुछ नहीं है। 18 जुलाई 2012 को सबसे ज्यादा घायल होने वाले मजदूर थे। आगजनी का इल्जाम जिन पर लगा, वे मजदूर तीली का एक टुकड़ा भी परिसर में नहीं ले जा सकते। सीसीटीवी रिकॉर्ड का अभी तक कुछ पता नहीं है। विश्व के सर्वश्रेष्ठ समूहों में एक बताने वाली मारुति सुजुकी की कार्यशाला में आग रोकने के यंत्रा क्यों नहीं चले, इसका जवाब किसी के पास नहीं। सुरक्षा का ढांचा और सैकड़ों पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद हिंसा क्यों हुई, पुलिसकर्मियों को अंदर क्यों नहीं जाने दिया गया। मजदूरों की वर्दी में घूम रहे सैकड़ों अपरिचित से चेहरे ;17 तारीख से ही बाउंसर्स परिसर में थे, ऐसा कई मजदूरों का कहना हैद्ध कहां से आए और क्यों आए। मजदूर अगर मार-काट पर उतारू थे तो केवल एक ही अधिकारी क्यों मरा, बाकी क्यों नहीं। अगर यह मजदूरों का हिंसक विद्रोह था तो मरने वालों की तादाद दर्जनों में हो सकती थी। मारे गए अधिकारी के शरीर पर कोई चोट का निशान तक नहीं है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के मुताबिक उनकी मृत्यु दम घुटने से हुई। पिफर सारा इल्जाम मजदूरों पर कैसे। एक व्यक्ति की मृत्यु के लिए 147 लोगों पर एक जैसी 12 गैर-जमानती और जघन्य अपराध वाली धाराएं कैसे लग सकती हैं। 66 अन्य मजदूर नेताओं और श्रमिकों पर संगीन आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज की गई है। 2760 लोगों की जीविका को इस एक घटना ने निगल लिया है। इनमें 540 स्थायी, 1800 कांट्रैक्ट और बाकी इंटर्न-अपरेंटिस वर्कर थे। इस लोगों को मारुति प्रबंधन ने किस आधार पर निष्कासित कर दिया है जबकि लोगों को नौकरी से हटाने के पहले ऐसे मामलों में लेबर कोर्ट से अनुमति लेना जरूरी होता है। आश्चर्य है कि निकालने के बाद निकालने की अनुमति की अर्जी मारुति प्रबंधन ने लेबर कोर्ट में दाखिल की है। ऐसे कितने ही सवाल हैं जिनका जवाब प्रबंधन, सरकार या पुलिस देने को तैयार नहीं हैं।

18 तारीख की रात से ही इस घटना के बाद सत्ता और सिपाहियों का नंगा नाच शुरू हुआ। मजदूरों को उनके घरों, डेरों और सार्वजनिक स्थानों से पकड़ कर अंदर डाला गया। जो बीमार थे, छुट्टी पर थे, काम पर नहीं थे, वे भी इस अंधे दमन का शिकार बने। घटना के दौरान बड़ी संख्या में मजदूरों को चोटें आई थीं पर कुछ देर सरकारी अस्पताल में रहने के बाद वे भी इस डर से भागने को मजबूर थे कि कहीं वे भी पुलिस के शिकार न बनें। दूसरी ओर मेदांता और कई अन्य पांच सितारा अस्पतालों में मारुति के अधिकारियों को जबरन भर्ती कराया गया। उन्हें भी, जिन्हें खरोंच तक नहीं आई थी। मजदूरों को जबरन पकड़ कर जेलों में ठूंसा गया। बिना देखे किसी को भी उठाया गया। कुछ ऐसे भी थे जो दूसरी कंपनियों में काम करते थे पर शक की चोट उनके सिर भी लगी। अभियुक्तों की सूची देखकर हंसी आती है। एपफआईआर की पांच अर्जियों में लगभग 100 नाम दिए गए थे। ये नाम अंग्रेजी के अल्पफाबेटिकल ;वर्णद्ध क्रम में हैं। ए से जे तक एक सूची में, जे से पी तक दूसरी और इसी तरह पांचवीं सूची में मामला जेड तक पहुंचता है। यानी लोग वर्ण क्रम के हिसाब से हमले करने के लिए आ रहे थे। मसलन, किसी ने कहा- ए अटैक, और अनिल, अमन, असद, आलोक जैसे नाम हमले के लिए कूद पड़े। पिफर कहा- बी अटैक... ऐसे ही वर्णक्रम में हमले होते रहे। कम से कम दरख्वास्तों को देखकर तो यही यकीन होता है। जेल में कैद 147 लोगों के परिजनों को नौ महीने के दौरान प्रसव, दुर्घटना, मृत्यु, बीमारी, बुढ़ापा, कर्ज, सहारे जैसी कितनी ही जरूरतों के आगे लाचार होना पड़ा है। मजदूर सीखचों के पीछे से जमानत या अल्पावधिक जमानतों के लिए अनुरोध कर-कर के थक गए पर न्यायालय, पुलिस और सरकार को जैसे कुछ दिखाई देना या सुनाई देना बंद हो चुका है। ये देश अमित शाह, प्रवीण तोगड़िया, राजा भैया, कलमाड़ी, ए राजा जैसों को जमानत दे सकता है पर लाचार मां-बाप को अस्पताल में देखने या प्रसव से कराहती परदेस में पड़ी पत्नी को देखने के लिए या किसी को मुखाग्नि देने के लिए मजदूरों को जमानत नहीं दी जा सकती। ये लोकतंत्रा के अंदर भर चुके पीप की सड़ांध है। जिस दिन पफूटेगी, कुर्सियां और कोठियां मलबा हो जाएंगी।

दमन की कथा यहीं रुकी नहीं... किश्त दर किश्त उसी मजदूर की पीठ पर रखकर पत्थर तोड़ा जाता रहा। इस दौरान खामोश रहे मीडियावाले। आंखें मूंदकर बैठे रहे भ्रष्टाचार के विरोध का बिगुल पफूंकने वाले। कभी जमीनी मुद्दों पर लड़ने वाले प्रगतिशील राजनीतिक धड़े तक अपने कुर्ते और झोले संभालते हुए दिल्ली में अपराध और चोरियों की लुकाझिपी में कैमरे के सामने आते रहे। चेहरे पर संघर्ष का भाव लिए लेकिन मन में अगले दिन के अखबार और उस वक्त के लाइव का चेहरा होने का उल्लास लिए हुए। यह किसी को समझ नहीं आया कि दिल्ली की सड़कों पर जिस कंपनी की गाड़ी सबसे ज्यादा दौड़ती हैं, उसी दिल्ली की नाक के नीचे जापानी प्रबंधन इस देश के नागरिकों के साथ गुलामों जैसा बर्ताव करती रही और पुलिस, सत्ता उसकी रखैल बनी इशारों पर नाचती रही। असलियत यह है कि मारुति सुजुकी अगर जापान में इस स्तर का उत्पादन करे तो श्रम की स्थितियों और उसके मूल्य को चुकाने के बाद उनके पास पफूटी कौड़ी नहीं बचेगी। भारत सस्ते श्रम की दरगाह है। किसी को भी अरमानों के पंख दिखाओ, रुपयों के चंद नोट दिखाओ और जब तक जितना भोगना चाहो, भोगो। अघाओ, भोगो, अघाओ, पिफर भोगो। अमानवीयता के चरम तक। राज्य के मुख्यमंत्राी का एक ही रोना है। मजदूरों, तुमने ये क्या किया। जापानी इस राज्य के दामाद हैं। नाराज किया तो गुजरात चले जाएंगे। पर गुजरात में तो मारुति ने 2009 में ही जमीन खरीद ली थी। पिफर गुजरात जाने का ठीकरा मजदूरों के सिर क्यों। पिफर, जैसे-जैसे भारत में श्रमिक असंतोष बढ़ा है और छोटी कारों का बाजार अपनी संतृप्तता की ओर अग्रसर है, जापानी कंपनी अप्रफीकी देशों का रुख कर रही है। वहां पर पैर पसारने के पीछे का मकसद वहां पर पसरा बाजार और सस्ता श्रम है। यानी जोंक की तरह खून पीने के लिए जहां अवसर हो, ये कंपनियां अपना झंडा गाड़ रही हैं।

अगस्त में अधिकतर नेताओं और यूनियन के प्रतिनिधियों के जेल जाने के बाद एक प्रोविजनल कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी का मकसद है कि मजदूरों की लड़ाई को आगे लेकर जाया जाए। उन्हें रिहा किया जाए। पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और मजदूरों को काम पर वापस लिया जाए। मारुति यूनियन के लिए यह हजम होने वाली बात नहीं है। वे लगातार इससे पीछे हट रहे हैं। लगातार जारी उपेक्षा और अन्याय के चलते 24 मार्च को मजदूरों ने हरियाणा के कैथल में अपना प्रदर्शन शुरू किया। राज्य के वाणिज्य, श्रम एवं उद्योग मंत्री रणदीप सिंह सुरजेवाला के घर के पास यह प्रदर्शन शुरू हुआ। इसकी एक वजह और भी थी। गुड़गांव में प्रदर्शन को अनिश्चितकाल के लिए चला पाना मजदूरों की माली हालत को देखते हुए सही रणनीति नहीं थी। 540 स्थायी कर्मचारियों में से 400 हरियाणा के हैं। इनमें से 150 जींद जिले से और120 कैथल से हैं। ये दोनों जिले आसपास हैं। बाकी के कर्मचारी रोहतक, झज्जर आदि जगहों से हैं। कैथल सबके लिए सुविधाजनक भी था। अपार जनसमर्थन के साथ मजदूरों का प्रदर्शन शुरू हुआ। लेकिन ज्यादा समय तक उन्हें वहां नहीं टिकने दिया गया। जिस व्यक्ति की जमीन पर कर्मचारी धरने पर बैठे थे, उससे पुलिस में शिकायत कराई गई कि कुछ लोग उसका प्लाट कब्जा करना चाहते हैं। मजदूरों ने उस जगह को छोड़ कर अप्रैल की शुरुआत में डीसी कॉम्प्लेक्स को अपना ठिकाना बनाया। इस दौरान मुख्यमंत्राी से मजदूरों की बात हुई। मजदूर बताते हैं कि ऐसा मालूम दे रहा था जैसे वे गुलाम हैं और अपने मुख्यमंत्राी से नहीं, मारुति सुजुकी के अधिकारी से बात कर रहे हैं। इसी दौरान मारुति प्रबंधन से भी बात हुई। प्रबंधन बार-बार दोहराता रहा कि मजदूरों की ओर से प्रबंधन के खिलापफ दर्ज मामले पहले वापस लिए जाएं। मामला वही है जिससे उस दिन की हिंसा की शुरुआत हुई थी। जियालाल को जातिसूचक शब्द से संबोधित करते हुए अपमानित किया गया था। जियालाल ने एससीएसटी ऐक्ट के तहत मामला दर्ज कराया पर उस शिकायत पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। जियालाल के मामले में तो मारुति के अधिकारी जेल जा सकते हैं और उनकी जमानतें खारिज हो सकती हैं। इसीलिए प्रबंधन पहले वे शिकायतें वापस लिए जाने की मांग पर अड़ा है। ताज्जुब है कि नौ महीने बाद भी जियालाल की शिकायत पर कोई अमल नहीं हुआ है। जियालाल एक दलित है। जींद जिले के ढाकल गांव का रहनेवाला। उसके पिता रामपाल रूंधे गले से कहते हैं, ‘‘अब न्याय की कोई आस नहीं लगती। कितने दिन और अंदर रखेंगे। उसे कितनी यातनाएं दी हैं। शरीर तोड़ दिया है। ऐसी नौकरी का क्या मतलब और ऐसी किसी भी जगह काम करने का क्या मतलब जहां इंसान को इंसान न समझा जा सके।’’ मां रोती हुई बताती है कि पुलिसवाले इस पूरी घटना के लिए उनके बेटे को जिम्मेदार ठहराते हैं। क्या अपने अपमान के खिलापफ मुंह खोलना तक जुर्म है। क्या उनके बेटे ने वाकई कुछ गलत कर दिया है। बेटे अमन की आंखों में अब पिता के चेहरे की स्मृतियां लुप्त हो चुकी हैं। जियालाल की कहानी उसके कई साथियों की कहानी जैसी है। दमन, दर्द और दोहन की दास्तां बयान करती हुई।

19 मई इस आंदोलन के लिए एक और काली तारीख साबित हुई। आसपास के लोगों की मदद से अनाज और सब्जी के सहारे, भगत सिंह की एक तस्वीर और कुछ पोस्टरों, बैनरों के साथ लगातार तेज धूप में भी कर्मचारियों का प्रदर्शन जारी था। इस दौरान सत्ता और प्रबंधन ने सुर बदलना शुरू किया। बातचीत की शुरुआत तो हुई थी पर स्पष्ट दिखने लगा कि इसमें पफायदा उन्हीं को चाहिए। मजदूरों की एकता को तोड़ने की भी कोशिश की गई। इन सब बातों को देखते हुए 19 मई को कैथल में एक बड़े प्रदर्शन की घोषणा मजदूरों ने की। पूरा शहर उनके साथ आने को तैयार था। आसपास के ज़िलों से परिवार के लोग, समुदाय के लोग, किसान और मजदूर, प्रगतिशील संगठनों के लोग कार्यक्रम की तैयारी करने लगे। पर 19 मई से पहले, यानी 18 मई की शाम पांच बजे से कैथल में 19 की मध्यरात्रि तक धारा 144 लागू कर दी गई। धरना स्थल पर 2000 पुलिसवाले तैनात कर दिए गए। अंधेरा होते होते चमगादड़ों का हमला शुरू हो गया। पुलिस ने कर्मचारियों को पीटना और पकड़ कर सरकारी गाड़ियों में ठूंसना शुरू कर दिया। 96 कर्मचारी गिरफ्रतार कर लिए गए। उनपर कई धाराएं लगा कर जेल भेज दिया गया। चार मानवाधिकारकर्मी और श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधि व श्रम अधिकारों के कार्यकर्ताओं को भी गिरफ्रतार कर लिया गया। धरनास्थल पर जुटे सामान को या तो नष्ट कर दिया गया या जब्त कर लिया गया। 

लेकिन कैथल और आसपास के जिले तब तक सुलग चुके थे। परिवारों के अलावा आसपास के जिलों के किसान, मजदूर धरने में जाने की तैयारी कर चुके थे। सुबह तक हजारों की तादाद में लोग कैथल शहर की सीमा पर थे जहाँ हजारों पुलिसकर्मी बैरिकेडिंग करके उन्हें रोक रहे थे। महिलाओं, बुज़ुर्गों और किसानों, मजदूरों की इस शांतिपूर्ण भीड़ ने गुहार लगाई कि उन्हें प्रदर्शन करने का अधिकार है और उन्हें इससे न रोका जाय लेकिन प्रशासन ने उन्हें धारा 144 का हवाला दिया। ताज्जुब की बात है कि उसी दिन कैथल शहर में ही ब्राह्मण समाज की और मंत्राी सुरजेवाला की दो सभाएं हुईं लेकिन धारा 144 उनके लिए नहीं थी। प्रदर्शन में आए लोगों ने कहा कि कम से कम अधिकारी और मंत्राी उनसे आकर मिलें, उनकी बात को सुना जाय लेकिन प्रशासन इसके लिए भी तैयार नहीं हुआ। यह स्थिति तब थी जब कैथल की मंडियों से लेकर गन्ने के रस की दुकानों तक के ठेलेवाले, मजदूर अपना काम बंद करके प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे थे। शाम ढलते-ढलते बर्बरता का नंगा नाच पिफर शुरू हुआ। साढ़े छह बजे वॉटर कैनन से लोगों को तितर-बितर करना शुरू हुआ। साथ में आंसूगैस के गोले दागे गए और पिफर लाठीचार्ज। महिलाओं के पेट पर पुलिसवालों ने लातें मारीं, सिर पर लाठियां बरसाईं। 25 औरतों समेत बड़ी तादाद में लोग घायल हुए जिसमें से कई की हालत गंभीर है। 

अभी लोग इस हमले से संभले भी न थे और शहर के बाहरी हिस्सों में अपने बिछड़े परिजनों, साथियों को खोज रहे थे कि पुलिस ने पिफर से हमला बोला और लोगों को चुन-चुन कर लाठियों से पीटना शुरू किया। पुलिस का यह नंगा नाच रात के अंधेरे में कापफी देर तक चला। 11 अहम नेताओं और कर्मचारियों को संगीन धाराओं और आर्म्स ऐक्ट के तहत गिरफ्रतार किया गया। ज़मानत के लिए 40 हजार के मुचलके की सीमा रख दी गई। जेल में बंद धरने पर बैठे कर्मचारियों को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। खबर लिखे जाने तक यानी 25 मई तक 67 लोगों की बेल हो चुकी थी। बाकी साथियों की रिहाई के लिए संघर्ष जारी है।
अंधेरे का तिलिस्म जिन चमगादड़ों ने खड़ा किया है, वे इस मामले में मारुति प्रबंधन की शक्ल में हैं, सरकारी पक्ष के वकील हैं, राज्य की कर्मचारी विरोधी सरकार के रूप में हैं, बिकी हुई पुलिस और खुपिफया तंत्रा के तौर पर हैं। अंधे हैं और अंधेरे में शिकार के आदी हैं। इस घटना का ताना-बाना भी इन्हीं का बुना हुआ है ताकि अंधेरे में ये रहें, अंधेरे में लोग रहें और पिफर अंधेरे में इनका ख़ूनी खेल चलता रहे। मजदूर मरे, पिसे, कटे, तबाह हो। ख़ून बहे, नालियों, गलियों, खलिहानों से होता हुआ मुख्य सड़कों और चौराहों तक। सौदे पर सौदा होता रहे और मजदूरों के ख़ून से अघाए हुए ये चमगादड़ मस्त होकर तिमिर-राग गाएं। इस निराश करने वाली सच्चाई में हौसले के लिए कोई रास्ता नहीं दिखता पर जेल के अंदर बंद श्रमिक एकजुट हैं और यही बाकी लोगों को पिफर खड़े होने का संबल देता है। पिछले दिनों प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान एक नारा सुना था जो बार-बार गूंज रहा है कानों में- जेल के पफाटक टूटेंगे, हमारे साथी छूटेंगे।( साभार : समकालीन तीसरी दुनिया )

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