इंसाफ़-पसन्द नागरिकों के नाम दिल्ली मेट्रो रेल मज़दूरों की अपील

 अन्‍धकार का युग बीतेगा ! जो लडेगा वो जीतेगा !!
साथियो, 
आप सभी जानते और मानते हैं कि दिल्ली मेट्रो रेल दिल्ली की शान है और ठीक ही मानते हैं। दिल्ली मेट्रो रेल ने दिल्ली में सफर करने के तौर-तरीके को बदल डाला है। यह एक तेज़, सुरक्षित और सुविधाजनक परिवहन माध्यम है। दिल्ली मेट्रो रेल के निर्माण से लेकर उसके रख-रखाव और प्रचालन  तक के कामों में आज हज़ारों मज़दूर लगे हुए हैं। इनमें से अधिकांश (70 प्रतिशत ) से भी ज़्यादा ठेके पर काम करते हैं। केवल टॉम आपेरटर, टोकन वेंडर, हाउसकीपिंग से लेकर सिक्योरिटी में करीब 5000 से अधिक कर्मचारी लगे हुए हैं।

लेकिन क्या आपको पता है कि इस पूरी ठेका मज़दूर आबादी से किन हालात में काम करवाया जाता है? क्या आप जानते हैं कि जो युवक या युवती यात्रियों की लम्बी-लम्बी लाइनों को यात्रा करने के लिए टोकन देने में दिन भर लगे रहते हैं, उनके सिर पर हमेशा छंटनी की तलवार लटकी रहती, वहीं तमाम श्रम कानून के तहत मिलने वाली सुविध ई.एस.आई., पी.एफ और डबल रेट ओवरटाइम तक नहीं दिया जाता है?

क्या आप जानते हैं कि जिन सपफाई कर्मचारियों की हाड़तोड़ मेहनत के कारण मेट्रो रेल के स्टेशन दमदमाते रहते हैं, उन्हें साप्ताहिक छुट्टी, न्यूनतम मज़दूरी, डबल रेट ओवरटाइम, ई.एस.आई.-पी.एफ आदि तक नहीं दिया जाता? क्या आप जानते हैं कि इन मज़दूरों को काम पर रखने से पहले बेदी एंड बेदी, ट्रिग, केशव, ए टू जेड, प्रहरी, जेएमडी आदि जैसी कुख्यात ठेका कम्पनियाँ सिक्योरिटी राशि के नाम पर 25 हज़ार रुपये तक लेती हैं, ताकि ये मज़दूर अपने शोषण और कम्पनियों की तानाशाही के खि़लाप़फ कुछ न बोल सकें? क्या आपको मालूम है कि इतनी रकम ऐंठने के बाद भी ज़्यादातर मामलों में इन मज़दूरों को साल भर के भीतर ही नाजायज़ तरीके से काम से निकाल दिया जाता है ताकि उन्हें स्थायी मज़दूर की मान्यता न देनी पड़े? 

क्या आपको पता है कि कानूनन दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन सफाई, टिकट-वेंडिंग व सिक्योरिटी के कामों में ठेका मज़दूर नहीं रख सकता, क्योंकि ये सभी स्थायी प्रकृति के काम हैं? मेट्रो मज़दूर श्रम कानूनों के उल्लंघन, गुलामों जैसी स्थितियों में काम करवाये जाने, सिक्योरिटी राशि के नाम पर घूसखोरी, मनचाहे तरीके से हायर-फायर किये जाने के खि़लाफ पिछले कुछ वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं। 

हम जानते हैं कि आप भी एक इंसाफसन्द नागरिक के तौर पर इस बात को मानेंगे कि मज़दूरों को यदि न्यूनतम मज़दूरी और साप्ताहिक छुट्टी भी नहीं मिलेगी और उनके साथ गुलामों-सा बर्ताव किया जाएगा तो इसका सीधा असर सेवाओं पर पड़ेगा। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में आप यह भी मानते होंगे कि डी.एम.आर.सी. को इस देश के संविधान और कानूनों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाने का कोई अधिकार नहीं है। 

हम इन कानूनी और संविधान-प्रदत्त अधिकारों से ज़्यादा कुछ नहीं माँग रहे हैं। हमारा संघर्ष सिर्फ यह है कि सरकार और उसके उपक्रम जो वायदा करते हैं, वह उन्हें पूरा करना चाहिए।

आज भी डी.एम.आर.सी. के पास ठेका कम्पनियों के तहत काम कर रहे सभी कर्मचारियों का कोई प्रत्यक्ष रिकार्ड तक नहीं है। एक सूचना अधिकार याचिका के जवाब में डी.एम.आर.सी. ने इसे माना है। इसी से साफ हो जाता है कि वह श्रम कानूनों के लागू किये जाने को सुनिश्चित नहीं करती है। इसके लिए जिन ठेका कम्पनियों को श्रम कानूनों को लागू करना है, उन्हीं से लिखित में यह कहलवा दिया जाता है कि वे सभी श्रम कानूनों को लागू करती हैं! 

आप खुद देख सकते हैं कि यह कैसा भद्दा मज़ाक है! वेतन दिये जाते समय डी.एम.आर.सी. का कोई अधिकारी मौजूद नहीं होता है, जो कि सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन है। कुल मिलाकर, दिल्ली मेट्रो रेल की ऊपरी चमक-दमक के नीचे भ्रष्टाचार, कानूनों के उल्लंघन, ठेकाकरण, निजी ठेका कम्पनियों की तानाशाही, मज़दूरों के दुख-तकलीफ की एक काली दुनिया है। हम इसी स्थिति को बदलना चाहते हैं।

साथियो! हम आप सबसे अपील करते हैं कि हमारे संघर्ष का समर्थन कीजिये। हम ज्यादा नहीं सिर्फ कानून-प्रदत्त अधिकार माँग रहे हैं। हमारी माँग है कि दिल्ली मेट्रो को सच्चे मायने में एक विश्व-स्तरीय संस्था केवल तब बनाया जा सकता है जब भ्रष्टाचार, स्वेच्छाचार, और तमाम किस्म के गोरखधन्धों का मेट्रो रेल से सप़फाया हो जाय, जो कि ठेका कम्पनियों और डी.एम.आर.सी. की मिलीभगत से चल रही है। हम दि‍ल्‍ली के नागरि‍को से अपील करते हैं कि हमारे इस न्‍यायपूर्ण संघर्ष में हमारा साथ दें।

-दि‍ल्‍ली मेट्रो रेल कामगार यूनि‍यन
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