संवेदनहीनता से उपजी संवादहीनता सरकार के लिए घातक - डॉ सुनीलम

माधुरी बहिन गत 17 मई से ही खरगौन जेल में हैं। उन्होंने जेल जाते समय कहा कि वे गुलाम भारत में स्वतंत्र नागरिक हैं, ऐसा कोई कार्य जिन्होंने नहीं किया, इसको लेकर वे जमानत दें। माधुरी जी का आचरण राष्ट्रीय आंदोलन की याद दिलाता है जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आजादी के लिये सत्याग्रह करते थे तथा गिरफ्तार किये जाने पर जमानत लेने से इन्कार कर देते थे। माधुरी बहिन पर दमनात्मक कार्यवाहियों को उद्घाटित करता डॉ सुनीलम का महत्वपूर्ण आलेख;

मनरेगा में भ्रष्टाचार, खारग नदी परियोजना में पुर्नवास के मुद्दों पर जागृत आदिवासी दलित संगठन के संघर्ष को कुचलने तथा संगठन द्वारा बड़वानी जिले की स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को लेकर इन्दौर उच्च न्यायालय के समक्ष जनहित याचिका लगाये जाने से झुझलाये प्रशासन ने माधुरी बहिन को खात्मा पेश करने बावजूद साजिशपूर्ण तरीके से दोषी कंपाउंडर के बयान करवाकर जेल को भिजवा दिया। 

12 नवम्बर 2008 को बनिया बाई प्रसव हेतु पी.एच.सी. मेली माता हेतु सुसर द्वारा लाया गया था, भर्ती करने के लिए कम्पाउण्डर ने पैसे की मांग की, अन्यथा बड़वानी अस्पताल ले जाने को कहकर अस्पताल से बाहर कर दिया, जहां बनीया बाई ने बच्चे को सड़क पर जन्म दिया, वहां से निकल रही माधुरी बहिन ने एम्बुलेंस रोककर महिला को बड़वानी जिला चिकित्सालय भिजवाया। कम्पाउण्डर ने पुलिस रिपेार्ट की, जिसमें 06 आदिवासी दलित जागृत संगठन के कार्यकताओं पर 353, 323, 147, 427 आई.पी.सी. 34 मध्यप्रदेश चिकित्सा अधिनियम 2008 के तहत अपराध क्रमांक 93/08 पंजीबद्ध कर, दो जागृत आदिवासी दलित संगठन के कार्यकर्ताओं को दिसम्बर 2010 में गिरफ्तार कर लिया गया।

11 दिसम्बर 2012 को इन्दौर के पुलिस महानिरीक्षक ने आरोपियों के विरूद्ध दोष एवं पर्याप्त साक्ष्य का अभाव होना पाया गया। अतः 18 दिसम्बर 2011 को खत्मा तैयार मंजूरी के लिए थाना सिलावड के उपनिरीक्षक एवं अनुसंधान कर्ता राजीव उइके ने न्यायिक दण्डाधिकारी वड़वानी के समक्ष अपना खात्मा पेश किया। 17 मई को माधुरी बहिन को खात्मा स्वीकार करने की बजाय न्यायालय ने जमानत के अभाव में माधुरी बहिन को 30 मई तक के लिये जेल भेज दिया। जेल भेजने का कारण 5 मार्च 2013 को सीजीएम बड़वानी द्वारा कम्पाण्डर का बयान दर्ज कराना था, जिसके आधार पर न्यायालय ने खात्मा स्वीकार करने की बजाय प्रकरण आगे बढ़ाने का निर्णय लिया था। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनन्दन झा के प्रकरण में 1969 में स्पष्ट कर दिया था कि खात्मा पेश होने पर न्यायालय के सामने तीन ही विकल्प हैं, या तो न्यायालय खात्मा स्वीकार करे अथवा संतुष्ट न होने पर 156/3 के तहत आगे बढ़े या अनुसंधानकर्ता को विस्तृत जांच कर पूरक चालान पेश करने का आदेश दे। लेकिन कहीं भी कानून में इस बात का जिक्र नहीं है कि अभियोगी का बयान दर्ज कर उसका संज्ञान लेकर खात्मा स्वीकार न किया जाय। न्यायालय के फैसले के विरोध में 21 मई को 10 हजार आदिवासियों ने बड़वानी में रैली निकालकर माधुरी बहिन को बिना शर्त रिहा करने की मांग की। प्रदेश भर के जन संगठनों ने रैली को सम्बोधित कर अपना विरोध प्रकट किया। आदिवासी जिलाधीश को कारण बताओं नोटिस देना चाहते थे, लेकिन जिलाधीश ने साफ तौर कार्यक्रम स्थल पर आकर आदिवासियों से मिलने से इंकार कर दिया, जब हजारों आदिवासी दिनभर इंतजार के बाद तीन किलोमीटर दूर जिलाधीश कार्यालय पर पहुॅंचे तब रैली को बेरीकेट लगाकर कार्यालय के बाहर ही रोक दिया गया। यह पूरा वाक़या मंगलवार के दिन हुआ, जो दिन पूरे प्रदेश के लिए जन सुनवाई के लिए मुख्यमंत्री द्वारा निर्धारित किया गया है। 10 हजार आदिवासियों की सुनने वाला कोई नहंीं था। पिछले महीने में मुझे तीन बार ऐसे ही अनुभव हुए हैं। जबलपुर स्थित संभागीय कमिश्नर कार्यालय में 2000 से अधिक किसान संघर्ष समिति के किसानों और आदिवासियों के पहुंचने के बावजूद उनसे संभागीय आयुक्त द्वारा मुलाकात नहीं की गयी। वे शासन द्वारा दी गयी शासकीय भूमि से खदेड़े जाने के विरोधम में सिर छुपाने की जगह मांगने कटनी से चलकर जबलपुर आये थे। 

इसी तरह का अनुभव बैतूल कलक्ट्रेट में सेमझीरा के देहगुड बांध क्षेत्र के डूब प्रभावित किसानों के साथ हुआ जब कलेक्टर ने पीड़ित किसानों से मिलने से इन्कार कर दिया तथा जिस डिप्टी कलेक्टर के कमरे में किसान घुस गये  तथा उससे पूछा कि एक कटहल के पेड़ का सौ रुपये मुआवजा मिलना तथा कुएं का 20,000 रुपये मुआवजा मिलना कितना औचित्यपूर्ण है जब कपिल धारा योजना के तहत शासन द्वारा 1,73,000 रुपये का भुगतान स्वयं शासन द्वारा किया जा रहा था। अधिकारी ने कहा कि जो अवार्ड में लिख दिया गया वही अंतिम है। कुछ करना चाहते हैं तो न्यायालय जाइये। यही स्थिति मुलताई तथा बैतूल दौरे के समय मुख्यमंत्री की दिखायी पड़ी। दोनों कार्यक्रमों के दौरान सैकड़ों किसान कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे लेकिन मुख्यमंत्री ज्ञापन देने तक से इन्कार कर दिया। 

चुटका परियोजना को लेकर 24 मई को आयोजित जनसुनवाई केवल इसलिए रद्द कर दी गयी क्योंकि विस्थापित होने वाले किसान अपना पक्ष अधिकारियों के समक्ष रखना चाहते थे। इस तरह स्पष्ट तौर पर यह देखने में आ रहा है कि सरकार तथा प्रशासन के मुखिया किसी भी मुद्दे पर आमजन के साथ संवाद करने को तैयार ही नहीं है। एक तरफ जन सुनवाई नाम पर शासन द्वारा करोड़ों रूपये खर्च किया जाता है, दूसरी ओर प्रशासन की रूचि जनता के साथ किसी स्तर पर संवाद करने में नहीं है। जन सुनवाई सरकारी नौटंकी बनकर रह गयी है।

माधुरी बहिन गत 17 मई से ही खरगौन जेल में हैं। उन्होंने जेल जाते समय कहा कि वे गुलाम भारत में स्वतंत्र नागरिक हैं, ऐसा कोई कार्य जिन्होंने नहीं किया, इसको लेकर वे जमानत दें। माधुरी जी का आचरण राष्ट्रीय आंदोलन की याद दिलाता है जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आजादी के लिये सत्याग्रह करते थे तथा गिरफ्तार किये जाने पर जमानत लेने से इन्कार कर देते थे।

इस प्रकरण में कम्पाउण्डर को जेल भेजा जाना चाहिए था, क्योंकि उसकी वजह से बनीया बाई सड़क पर बच्चा जन्मने के लिए मजबूर हुयी थी। कम से कम इस घटना के तत्काल बाद मेनीमाता पीएचसी में  महिला डाक्टर तैनात किया जाना चाहिए था तथा शासन और सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिये माधुरी बहन का नागरिक अभिनन्दन कर उन्हें उत्कृष्ट नागरिक घोषित कियाजाना चािहए था लेकिन उसकी जगह माधुरी बहिन को जेल क्यों भेज दिया गया? यह सवाल बड़वानी म.प्र. एवं देश के जागरूक नागरिकों के मन में है। जो कानून के साथ-साथ न्याय सिद्धान्त में भरोसा रखते हैं। सब कुछ हुआ अदालत में, लेकिन फर्जी एफ.आई.आर. तथा प्रशासन द्वारा राजनैतिक आकाओं के इशारे पर न्यायालय में दिलाये गये बयान के आधार पर हुआ।

असल में भा.ज.पा. सरकार माधुरी द्वारा मनरेगा में चार करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोपों से तिलमिलाई हुई है। जागृत आदिवासी दलित संगठन ने जब 24 पंचायतों की मजदूरों को भुगतान न किये जाने का हिसाब मांगा, तब हिसाब देने के बजाय प्रशासन ने विधायक के नेतृत्व में रेली निकाली गई। संगठन लोक सेवा गांरटी में भ्रष्टाचार जिले में डाक्टरों की कमी जैसे मुद्दों को सतत उठाता रहा है। संगठन ने खारग नदी परियोजना के तहत सात गॉंव के बिना पुर्नवास नीति लागू किये, 218 हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण को भी चुनैौती दी है। इसी तरह संगठन की ओर से एडवोकेट शन्नो खान द्वारा 27 जून 2011 को बड़वानी जिले में डाक्टरों की कमी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत आवश्यकताओं की कमी को लेकर जनहित याचिका लगायी गयी जिसके आधार पर लगातार उच्च न्यायालय स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के निर्देश दे रहा है। लेकिन संगठन द्वारा उठाई गई जन समस्याओं को हल करने की बजाय, संगठन को नक्सली साबित करने में प्रशासन लगा हुआ है। हालांकि पुलिस के उच्चाधिकारियों ने बड़वानी क्षेत्र में किसी भी नक्सली गतिविधि होने से इंकार किया है, लेकिन प्रशासन माधुरी बहिन और संगठन को नक्सली घोषित करने पर अमादा है। यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि जिस तरह छिन्दवाड़ा को भू-अधिग्रहण के खिलाफ किसान आन्दोलन तथा किसान संघर्ष समिति को कुचलने के लिये नक्सली जिला घोषित किया गया उसी तरह जागृत आदिवासी दलित संगठन द्वारा मनरेगा में भ्रष्टाचार तथा आदिवासी अस्मिता के आन्दोलन को कुचलने के लिये बड़वानी को शीघ्र ही नक्सली क्षेत्र घोषित किया जा सकता है।

21. मई को मैने बड़वानी में नर्मदा बचाओ आन्दोलन की नेत्री चित्ररूपा पालित जो खरगोन एवं खंडवा में सक्रिय हैं तथा केसला होशंगाबाद की समाजवादी जन परिषद की गुनिया बाई को देखा तब मुझे याद आया कि मेरे सहित सभी जन संगठनों के नेताओं पर नक्सली होने का आरोप गत 25 वर्षो से लगातार सरकारों द्वारा लगाया जाता रहा है हालांकि सभी संगठनों द्वारा तथ्य पेश करने की चुनौती देने पर सरकार मुंह छुपाती दिखलाई पड़ी है, लेकिन कुत्ते की पूछ टेड़ी की टेड़ी बनी हुई है।

बनीया बाई के प्रकरण ने जननी सुरक्षा योजना तथा लाडली लक्ष्मी योजना की कलई खोल दी है। आये दिन समय से वाहन उपलब्ध न होने तथा डॉक्टर उपलब्ध न होने के चलते अस्पताल के बार प्रसव की घटनायें अखबारों की सुर्खियां बनी रहती हैं। कल भी खण्डवा में अस्पताल में भर्ती न किये जाने के कारण एक मुस्लिम महिला फहमीदा का प्रसव पेड़ के नीचेे होने तथा नवजात की मौत होने की खबर छपी है, जिससे साफ है कि सरकार की प्राथमिकता वास्तव में ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मुहैया कराने की जगह केवल विज्ञापन छपवाने में है। हाल ही में महालेखाकार की रिपोर्ट भी अखबारों में छपी है जिसमें स्पष्ट आंकड़ों के साथ 39 जिलों में मनरेगा में अनिमितताओं के तथ्य उजागर किये गये हैं लेकिन सरकार हर तरह से भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने पर आमादा है।

माधुरी बहन ने जेल जाकर सरकारों तथा समाज का ध्यान उक्त महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर आकृष्ट करने का प्रयास किया है। बड़वानी जिले के सभी थानों पर संगठन का धरना जारी है। 30 मई को माधुरी बहन की पेशी है। उस दिन बड़ा फैसला होना है, अदालत के अंदर और बाहर भी। प्रशासन और पुलिस के संवेदनहीन रुख से आदिवासी आक्रोशित हैं तथा आर-पार का संघर्ष करने का मन बनाये हुये हैं। संगठन चाहता है कि पुलिस प्रशासन कार्यकर्ताओं पर फर्जी मुकदमें दर्ज करने की बजाय आदिवासियों की समस्याओं को हल करने के लिये आगे आये। देखना यह है कि सरकार किस तरह इस परिस्थिति से निपटती है। चुनाव नजदीक हैं। पुलिस दमन का विकल्प सरकार के लिये महंगा पड़ सकता है। सरकार को कलेक्टर, एसपी को आदिवासियों के साथ संवाद के लिये निर्देशित करना ही एकमात्र जनतांत्रिक विकल्प है। भाजपा सरकार अब तक साढ़े नौ बरसों में ढ़ाई लाख से अधिक मुकदमें वापस ले चुकी है तथा इससे कई गुना मुकदमों में मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा खात्मा दर्ज किये गये हैं। क्या सरकार जागृत आदिवासी दलित संगठन के कार्यकर्ताओं पर लगाये गये फर्जी मुकदमें वापस लेने का फैसला कर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कडी कार्रवाई करने तथा स्वास्थ्य सेवाओं में कमियों को दूर करने की इच्छा शक्ति दिखलायेगी ?

(डॉ सुनीलम,पूर्व विधायक, कार्यकारी अध्यक्ष किसान संघर्ष समिति sunilam_swp@yahoo.com ; मोबाः 9425109770)

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