फुकुशिमा से आंख चुराता भारत

फुकुशिमा की दूसरी बरसी पर दुनियाभर में परमाणु उर्जा के सुरक्षित स्वरूप को लेकर बहस चली। इस बीच कुडनकुलम संयंत्र को ठंडा करने वाले संयंत्र के पुनः बिगड़ जाने से परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा पर पुनः प्रश्न चिन्ह लग गया है। मगर भारत वास्तविकता से मुंह फेरकर रट्टू तोते की तरह इसके प्रारंभ होने की बार-बार घोषणा करता जा रहा है। पिछले 18 महीनों में 16 बार यह घोषित कर चुके हैं कि रिएक्टर 15 दिनों में कार्य करना प्रारंभ कर देगा और परमाणु उर्जा नियामक बोर्ड की अनुमति भी प्राप्त हो जाएगी। परमाणु उर्जा पर नित्यानंद जयरामन का महत्वपूर्ण आलेख;

दो वर्ष पूर्व आए प्रलयकारी भूकंप एवं सुनामी ने फुकुशिमा संयंत्र के बड़े हिस्से को क्षतिग्रस्त कर दिया था। अगर यह केवल विध्वंस ही होता तो मलवा साफ करने और पानी उतरने के पश्चात पुनर्निर्माण का वहां पुनः जीवन प्रारंभ किया जा सकता था, लेकिन इस हादसे के बाद परमाणु संयंत्र  में हुए मेल्टडाउन (गल जाने से) की वजह से यह इलाका अगले कई दशकों तक पुनः रहवास लायक नहीं हो पाएगा। जापानी संसद द्वारा नियुक्त स्वतंत्र आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, जहां प्राकृतिक कारणों से परमाणु दुर्घटना हो सकती है वहीं संयंत्रों में होने वाले मेल्टडाउन ''पूर्णतया मानव निर्मित’’ है। आयोग का निष्कर्ष था कि ''यह दुर्घटना सरकार, नियामक एवं टेप्को के आपसी टकराव एवं उपरोक्त पक्षों द्वारा ठीक से कार्य न किए जाने का परिणाम है। जापान की ही तरह भारत में भी प्रशासनिक चूक एवं स्वतंत्र नियामक की लापरवाही की ओर इंगित करते हुए महालेखा नियंत्रक एवं परीक्षण (केग) ने कहा है उपरोक्त कारण भारत में परमाणु सुरक्षा तंत्र को पंगु बना रहे हैं।

कुडनकुलम का ही मामला लीजिए। हमारे सांसदों के दिमाग में केवल यही मुद्दा चल रहा है कि इस संयंत्र के प्रारंभ होने की तारीख क्या होगी। जैसे ये 1000 मेगावाट बिजली अन्य सभी 1000 मेगावाट से अलग है और यह पूरे देश को अंधेरे से बाहर ले आएगी। कानून निर्माता समय-समय पर इसके बारे में सवाल उठाते रहते हैं और प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री नारायण सामी बिना किसी दुविधा के रटा रटाया उत्तर दे देते हैं। हमेशा यही बताया जाता है कि रिएक्टर 15 दिनों में कार्य करना प्रारंभ कर देगा और परमाणु उर्जा नियामक बोर्ड की अनुमति भी प्राप्त हो जाएगी। गौरतलब है कि यदि परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड यदि वास्तव में स्वतंत्र है तो नारायण सामी किस आधार पर पिछले 18 महीनों में 16 बार यह घोषित कर चुके हैं कि नियामक बोर्ड इस ''तारीख'' के पहले अपनी अनुमति दे देगा।

लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय एक महत्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी कर रहा है। कुडनकुलम संयंत्रों  के पास अभी तक समुद्र तटीय नियामक जोन की वैध स्वीकृति नहीं है। गत नवंबर में न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन ऑफ इंडिया (एमपीबीआईएल) ने बड़ी अनिच्छा से सर्वोच्च न्यायालय में स्वीकार किया था कि डिसेलिनेशन संयंत्र (पानी से नमक निकालने) के बारे में बाद में सोचा गया है और इसे बिना पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति के निर्मित किया है। इसी के साथ पूर्व में निर्मित की गई नहर एवं समुद्र तटीय दीवार के निर्माण के लिए भी कोई अनुमति नहीं ली गई थी।

सन् 1991 की अधिसूचना को सन् 2011 की अधिसूचना से रद्द करना और एनपीसीआईएल का सन् 1991 के रद्द  किए गए नियमों के अंतर्गत आवेदन करने को बुद्धिमतापूर्ण नहीं कहा जा सकता। यह आवेदन अनेक कारणों से कानून के समक्ष ठहर नहीं सकता। संयंत्र क्रमांक 1 एवं 2 के लिए दिए गए आवेदन में इंजीनियर इंडिया लिमिटेड द्वारा संयंत्र क्रमांक 3 से 6 तक की पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है, वहीं संयंत्र क्रमांक 1 एवं 2 के लिए तो कोई अध्ययन ही नहीं किया गया है। पर्यावरण प्रभाव आंकलन केवल अधिमान्यता प्राप्त संस्थानों द्वारा ही किया जा सकता है और इंजीनियर इंडिया लिमिटेड को किसी परमाणु संयंत्र के परमाणु प्रभाव आंकलन हेतु अधिमान्यता प्रदान नहीं की गई।

तमिलनाडु तटीय क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण, जिसने इस आवेदन पर विचार किया था उसने चुपचाप स्वयं को एक कानूनी शिकंजे में जकड़ लिया है। अजीब सी आत्मघाती प्रवृत्ति दिखाते हुए पर्यावरण निदेशक ने निम्न टिप्पणी के साथ प्राधिकरण को आवेदन भेजते हुए लिखा कि ''आवेदनकर्ता ने पूर्व में ही निर्माण पूर्ण कर लिया है और सन् 2011 के सीआरजेड अधिसूचना में किसी अनुसमर्थन का कोई प्रावधान उपलब्ध नहीं है, जबकि इस इकाई की स्थापना अनुमति की प्रत्याशा में पूर्व में ही सन् 1989 में कर ली गई है, जबकि यह स्पष्ट हो गया है कि प्राधिकरण तो अभी भी 'विचार' ही कर रहा है।''

सीआरजेड की अनुमति न होना महज तकनीकी खानापूर्ति नहीं है। अधिसूचना के निहितार्थ हैं संवेदनशील समुद्रतटीय संरचनाओं को नुकसान पहुंचाने से बचाना। इस हेतु कुछ गतिविधियों को प्रतिबंधित करना और कुछ के गंभीर वैज्ञानिक परीक्षण से आंकना कि इनके निर्माण से यहां पर क्या प्रभाव पड़ेंगे। भारत का पूर्वी तट तलछट की हलचल एवं उनके समुद्री किनारों की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति रखता है। सन् 2005 के अध्ययन से पता चला था कि परियोजना स्थल पर 4 लाख 20 हजार क्यूबिक मीटर तलछट मौजूद है। इसी से तटीय संतुलन बना रहता है। पूर्व से ही निर्मित नहर (बांध) समुद्र तटीय दीवारों जैसे पक्के ढांचे गंभीर भराव का कारण बन सकते हैं।

इडिंथाकराई का सिकुड़ता तटीय क्षेत्र इसका प्रमाण है। यहां के पूर्वी तट पर जहां नावों की कतार समाप्त होती है वहां पर बहुत थोड़ी सी जमीन अब बची है जहां पर कि मछुआरे मछली छांटते हैं और अपने जालों की मरम्मत करते हैं। गांव के पूर्वी छोर पर थोमेयापुरम की ओर मुड़ने के पहले ही जमीन समुद्र में डूबी दिखाई दे जाती है। कुछ वर्ष पूर्व तक स्थानीय परिवार थोमैयापुरम के अरिविकाराई तट पर पिकनिक मनाने जाते थे। यहां पर धारा समुद्र में मिल जाती थी। अब यह पहुंच मार्ग समाप्त हो गया है। भूखे समुद्र ने तट को लील लिया है।

इडिंथाकराई के मछुआरे यू.पी. रायप्पन का कहना है ''यह तो होना ही था! पुल (बांध) और समुद्री दीवार ने हमारे तट (बीच) को लील लिया है। समुद्र शीघ्र ही हमारे घरों को भी निगल जाएगा। तूफान के दौरान तो और भी अधिक नुकसान पहुंचेगा क्योंकि दीवारें लहरों को गांव की ओर मोड़ देगी।''

यह भी सामान्य तथ्य है कि जब भी बड़ी परियोजनाओं की बात आती है नियामक कमजोर प्रवृत्ति दर्शाते हैं। वैसे अपवाद भी मौजूद हैं। सन् 2001 में तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अध्यक्ष शीला रानी चुंकाथ ने एमपीसीआईएस को बिना विधिवत लाईसेंस के निर्माण प्रारंभ करने के खिलाफ चेतावनी दी थी। चेतावनी के बावजूद वहां कार्य प्रारंभ कर दिया गया और दो वर्ष पश्चात सन् 2004 में अनुमति प्राप्त की गई।  वैसे तब तक सुश्री चुंकाथ जा चुकी थीं!

रेडियोधर्मिता के मामले में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की परिचालन संबंधी अनुमति लेना आवश्यक है। कानूनी भाषा में बात करें तो सभी अनुमतियां मिल जाने के पश्चात ही यह अनुमति दी जा सकती है। परंतु समुद्र तटीय क्षेत्र अनुमति न मिल पाने के बावजूद तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इकाई क्रमांक 1 एवं 2 का निर्माण नहीं रोक पाया।

पुनः एक बार कानूनी नजरिए से बात करें तो तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को परिचालन हेतु दी गई सहमति वापस ले लेना चाहिए और प्रधानमंत्री कार्यालय को यह कहना चाहिए कि सभी अनुमतियों जिनमें समुद्रतटीय क्षेत्र अनुमति भी शामिल हैं हासिल कर लेने के बाद ही संयंत्र प्रारंभ किया जा सकेगा। लेकिन कोई भी व्यक्ति कुडनकुलम की वैधानिकता पर कुछ भी नहीं कहना चाहता। लगता है वे सभी चाहते हैं परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड अपनी अंतिम स्वीकृति दे दे और संयंत्र प्रारंभ हो जाए। सवाल यह है कि वे सारे लोग जो कि ''वैधानिक तौर पर बयानबाजी'' कर रहे हैं क्या वे एक रेडियोधर्मी रिएक्टर से होने वाले दुष्परिणामों से निपट पाएंगे? (सप्रेस/थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क फीचर्स)

(श्री नित्यानंद जयरामन चेन्नई स्थित लेखक हैं। कुडनकुलम संघर्ष के लिए कार्यरत ‘चेन्नई
    सोलिडेरिटी समूह' के कार्यकर्ता हैं)
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