उत्तराखंड को बचाने की जद्दोजहद

उत्तराखंड को भारत का ''वाटर टैंक'' कहा जाता है और अब वहां 500 से अधिक बांधों के निर्माण की योजना बन रही है। वैसे कुछ पर काम शुरु भी हो गया है। भरपूर पानी वाले क्षेत्र में लोग अब पीने के पानी को भी तरस रहे हैं। ऐसी आत्मघाती योजनाओं को उद्घाटित करता सुरेष भाई का महत्वपूर्ण आलेख; 

उत्तराखण्ड राज्य समेत सभी हिमालयी राज्यों में सुरंग आधारित जलविद्युत परियोजनाओं के कारण नदियों का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ गया है। ढालदार पहाड़ी पर बसे हुए गांवों के नीचे धरती को खोदकर बांधों की सुरंग बनाई जा रही है। इन बांधों का निर्माण करने के लिए निजी कंपनियों के अलावा एनटीपीसी और एनएचपीसी जैसी कमाऊ कंपनियों को बुलाया जा रहा है।

राज्य सरकार इन्ही के सहारे ऊर्जा प्रदेश का सपना भी देख रही है और पारंपरिक जल संस्कृति और पारंपरिक संरक्षण जैसी बातों को बिलकुल भुला बैठी है। निजी क्षेत्र के पीछे वैष्विक ताकतों का दबाव है। दूसरी ओर इसे विकास का मुख्य आधार मानकर स्थानीय लोगों की आजीविका की मांग को कुचला जा रहा है। लोगों की दुविधा यह भी है, कि टिहरी जैसा विषालकाय बांध तो नहीं बन रहा है, जिसके कारण उन्हें विस्थापन की मार झेलनी पड़ सकती है। सरकार का मानना है कि इस तरह के बांधों से विस्थापन नहीं होगा, किंतु टनल के आउटलेट और इनलेट पर बसे सैकड़ों गांव की सुरक्षा कैसी होगी? सन् 1991 के भूकंप के समय उतरकाषी में मनेरी भाली जलविद्युत परियोजना के प्रथम चरण के टनल के ऊपर के गांव तथा उसकी कृषि भूमि भूकम्प से जमींदोज हुई है, और नमी लगभग खत्म हुई है। इसके अलावा जहां पर सुरंग बांध बन रहे हैं वहां के गांव के धारे व जलस्रोत सूख रहे हैं। इस बात पर भी पर्यावरण प्रभाव आंकलन की रिपोर्ट कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है।

राज्य सरकार सोचती है कि पंचायतें, गांव आदि की क्षमताएं कम करके कंपनियां विद्युत परियोजनाएं बनाकर राज्य का विकास कर देगी, जबकि गांव की पुष्तैनी व्यवस्था को अक्षम समझना बड़ी भूल है। सत्ता और विपक्ष से जुड़े स्थानीय जनप्रतिनिधियों को यही पाठ पढ़ाया जा रहा है, कि स्थानीय स्तर पर बनने वाली लोक लुभावनी परियोजनाओं के क्रियान्वयन में सक्रिय सहयोग देकर ही वे सत्ता सुख प्राप्त कर सकते हैं

अतः यह समझने योग्य बात है कि जिन लोगों ने टिहरी बांध निर्माण कम्पनी की पैरवी की है वे ही बाद में टिहरी बांध झील बनने के विरोधी कैसे हो गए? यह एक तरह से आम जनता के हितों के साथ खिलवाड़ ही तो है। पाला मनेरी, लोहारी नागपाला, घनसाली में फलेण्डा लघु जल विद्युत योजना, विष्णु प्रयाग, तपोवन, बुढ़ाकेदार चानी, श्रीनगर आदि कई जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण करवाने के लिए, लोगों को पैसे और रोजगार का झूठा आष्वासन देकर समझौता किया गया है।

इन परियोजनाओं के निर्माण के दौरान लोगों के बीच में एक ऐसी हलचल पैदा हो जाती है, जिसका एकतरफा लाभ केवल निर्माण एजेंसी को ही मिलता है। परियोजना के पर्यावरण प्रभाव की जानकारी दबाव के कारण ही बाद में समझ में आने लगती है। इसी तरह श्रीनगर हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट (330 मेगावाट) की पर्यावरणीय रिपोर्ट की खामियां 80 प्रतिषत निर्माण के बाद याद आई।

उत्तराखण्ड हिमालय गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियों और उनकी सैकड़ों सदानीरा जलधाराओं के कारण पूरे विष्व में जलभण्डार के रूप में प्रसिद्ध है। इन पवित्र पावनी नदियों के तटों एवं उन्हंे पोषित करने वाले ऊंचे पर्वतों पर ऋषि-मुनियों ने अध्ययन एवं तपस्या की तथा सामाजिक व्यवस्था के संचालन के नियम-विधान बनाए। लेकिन तथाकथित विकास और समृद्वि के झूठे दम्भ से ग्रस्त सरकारें गंगा तथा उसकी धाराओं के प्राकृतिक सनातन प्रवाह को बांधों से बाधित कर रही हैं। इनसे इन नदियों के अस्तित्व खतरे में है। इसके कारण राज्य की वर्षा पोषित एवं हिमपोषित तमाम नदियों पर संकट खड़ा हो गया है। जहां वर्षा पोषित कोसी, रामगंगा, व जलकुर आदि नदियों का पानी निरतंर सूख रहा है वहीं भागीरथी, यमुना, अलकनंदा, भिलंगना, सरयू, महाकाली, मन्दकानी आदि पवित्र हिमपोषित नदियों पर सुरंग बांधों का खतरा है। इन नदियों पर बनने वाले 558 बांधों से सरकार उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेष बनाना चाहती है, लेकिन विषिष्ठ भू-भाग की पहचान की दृष्टि से जैसे बाढ़, भूस्खलन, भूकंप के लिए संवेदनषील हिमालय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसको ध्यान में रखकर नदियों के उद्गम से लेकर आगे लगभग 150 किलोमीटर तक श्रंृखलाबद्ध रूप से दर्जनों सुरंग बांधों का निर्माण खतरनाक संकेत दे रहा है। लोगों ने प्रारंभ से ही सुरंग बांधों का विरोध किया है। सुरंगों के निर्माण में प्रयोग किये गये भारी विस्फोटों से लोगों के घरों में दरारें आयी हैं और पेयजल स्रोत सूखे हैं। सिंचाई नहरों तथा घराटों का पानी बंद हुआ है। चारागाह, जंगल और गांव तक पहुंचने वाले रास्ते उजाड़ दिए गए हैं। इसके साथ ही लघु एवं सीमान्त किसानों की खेती बाड़ी प्रभावित हुई है और वे भूमिहीन हो गये हैं।

नदी बचाओ अभियान ने सन 2008 को इसलिए नदी बचाओ वर्ष घोषित किया था, कि राज्य सरकार प्रभावितों के साथ मिलकर समाधान करेगी, लेकिन दुखः की बात यह है कि प्रदेष के निवासियों की अनसुनी की गई है। केंद्रीय पूर्व वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेष ने इसकी गंभीरता को समझा था, जिसके परिणामस्वरुप सुरंग बांधों से नदी व नदी के आर-पार रहने वाले लोगों का पर्यावरण एवं आजीविका बचाने के उद्देष्य से ही तीन परियोजनाएं रोकी गई थी। यदि नदी बचाओ अभियान के साथियों की बात सन् 2006 में ही सुनी जाती तो बंद पड़ी परियोजनाओं पर इतना खर्च भी नहीं होता। उत्तराखण्ड में बड़ी मात्रा में सिंचाई नहरें, घराट और कुछ शेष बची जलराषि अवष्य है, लेकिन पानी की उपलब्धता के आधार पर ही छोटी टरबाइनें लगाकर इनसे हजारों मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता है। इसको ग्राम पंचायतें एवं जिला पंचायतें बना सकती हैं।

इससे उत्तराखण्ड की बेरोजगारी समाप्त होगी। इसके लिए सरकार को जलनीति बनानी चाहिए। यहां कई संगठनों ने राज्य सरकार को लोक जलनीति सौंपी है। वैसे सन् 2007 की पुनर्वास नीति मे भी लिखा है कि ऐसी परियोजनायें बनें जिसमें विस्थापन न होता हो। जल नीति में जलधाराओं, जल संरचनाओं, नदियों, गाड़-गदेरों में जल राषि बढ़ाने, ग्लेषियरों को बचाने तथा प्रत्येक जीवन को जल निषुल्क मिलना चाहिए। उत्तराखण्ड के भारत का वाटर टैंक होने पर भी यहां लोगों को पीने का पानी नसीब नहीं होता है। पानी और जंगल का जिस तरह रिष्ता है, उसे बरकरार रखना भी जलनीति का मुख्य बिन्दु होना चाहिए। प्रत्येक सिंचाई नहर से एक घराट चलाकर अथवा टरबाईन चलाकर बिजली बनाने का प्रयोग हमारे प्रदेष में मौजूद है। वर्षा जल संग्रहण के पारम्परिक तरीकों से सरकार को सीखना होगा। प्रदेष में वर्षा जल का 2 प्रतिषत भी इस्तेमाल नहीं हो रहा है। जल संरचनाओं चाल, खाल पर मनरेगा में जिस तरह से सीमेंट पोता जा रहा है, उससे भी उतराखण्ड के जलस्रोत सूख जायेंगे। जलनीति में इसके लिए पारम्परिक चालों के बढ़ावा देने पर जोर देना चाहिए।
(साभार:सप्रेस)
(श्री सुरेष भाई लेखक हैं एवं उतराखण्ड नदी बचाओ अभियान से जुड़े हैं। वर्तमान में उत्तराखण्ड सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष हैं।)
Share on Google Plus

संघर्ष संवाद के बारे में

एक दूसरे के संघर्षों से सीखना और संवाद कायम करना आज के दौर में जनांदोलनों को एक सफल मुकाम तक पहुंचाने के लिए जरूरी है। आप अपने या अपने इलाके में चल रहे जनसंघर्षों की रिपोर्ट संघर्ष संवाद से sangharshsamvad@gmail.com पर साझा करें। के आंदोलन के बारे में जानकारियाँ मिलती रहें।