मॉरीशस मार्ग और देश की लूट: विदेशी पूंजी की बंधक एक सरकार



इस् बार देश के संसाधनों की लूट् के लिए कोई वास्कोडिगामा भारत नहीं आया. हिंद महासागर में स्थित एक छोटा सा टापू मारीशस अब देसी कालेधन को सफ़ेद करने का केन्द्र बन चुका है. आज जब भारत में करीब 40 प्रतिशत 'विदेशी पूंजी निवेश' मारीशस की मार्फ़त आ रहा है, तब सरकार द्वारा निवेश के लिए सुगम माहौल बनाने की कवायद् कुछ् और नहीं बल्कि एक छलावा है। भारत और मॉरीशस के बीच ‘दोहरा करारोपण निषेध समझौते’ में छिपे इस राज की पड़ताल करता सुनील भाई का आलेख:

केन्द्रीय बजट की सालाना नौटंकी में इस बार करुण रस और शर्मिन्दगी से भरा एक दृश्य आया। 28 फरवरी को बजट पेश होते ही वित्त मंत्री की उम्मीद से विपरीत शेयर बाजार का सूचकांक गिरने लगा और पिछले तीन महीनों के सबसे नीचे स्तर पर पहुंच गया। कारण खोजने पर बजट भाषण का एक वाक्य खलनायक बन कर उभरा। तत्काल वित्तमंत्री से लेकर वित्त मंत्रालय के अधिकारियों तक ने पत्रकार वार्ताएं आयोजित कर सफाई जारी की, ‘गलतफहमी’ दूर करने की कोशिश की और माफी मांगी। अगले दिन शेयर बाजार का लुढ़कना रुक गया, ‘संकट’ दूर हो गया और सब कुछ ‘सामान्य’ रुप से चलने लगा। 

मामला क्या था और वह वाक्य क्या था ? वाक्य इतना ही था कि मॉरीशस और अन्य देशों के साथ भारत के ‘दोहरे करारोपण निषेध समझौतों’ का लाभ उठाने के लिए ‘कर-निवास प्रमाणपत्र’ जरुरी होगा, लेकिन पर्याप्त नहीं होगा। यानी भारत में पूंजी निवेश कर रही कंपनियां संबंधित देश की हैं, इसे प्रमाणित करने के लिए इस प्रमाणपत्र के अलावा और भी सबूत देने होंगे।

मामला उस बदनाम ‘मॉरीशस मॉर्ग’ का है जो विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में लगातार बड़ी मात्रा में कर-चोरी का शास्त्रीय उदाहरण बन चुका है। जब से भारत ने अपने दरवाजे विदेशी पूंजी के लिए खोले हैं, इस देश में सबसे ज्यादा विदेशी पूंजी संयुक्त राज्य अमरीका, यूरोप या जापान से नहीं बल्कि अफ्रीकी महाद्वीप के एक छोटे से टापू देश मॉरीशस से आ रही है। भारत में करीब 40 प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश का श्रेय इस छोटे से देश को प्राप्त है। इस चमत्कार का राज भारत और मॉरीशस के बीच ‘दोहरा करारोपण निषेध समझौते’ मंे छिपा है। इस समझौते में यह प्रावधान है कि कोई कंपनी एक देश में कर चुका रही है तो दूसरा देश उस से कर नहीं वसूलेगा। इस प्रावधान के कारण भारत के शेयर बाजार में शेयरों का कारोबार करने वाली मॉरीशस की कंपनियां करों में भारी बचत कर लेती हैं, क्योंकि मॉरीशस में कर नाममात्र का है। शेयरों की खरीद फरोख्त मंे जो मुनाफा होता है, उस पर भारत में 15 फीसदी अल्पकालीन पूंजी-लाभ कर या 10 फीसदी दीर्घकालीन पूंजी-लाभ कर देना पड़ता है।

करों में इस भारी बचत का लाभ उठाने के लिए भारत में पूंजी लगाने की इच्छुक दुनिया भर की कंपनियां मॉरीशस में एक दफ्तर खोल लेती हैं। मॉरीशस सरकार उनको ‘कर-निवास प्रमाणपत्र’ (यानी कर के उद्देश्य से निवासी होने का प्रमाणपत्र) दे देती हैं और उसी के आधार पर उनको भारत में करों से छूट मिल जाती है। यह एक तरह की     धोखाधड़ी है, क्योंकि मूल रुप से ये कंपनियां मॉरीशस की नहीं हैं और मॉरीशस में एक दफ्तर खोलने तथा यह प्रमाणपत्र हासिल करने के अलावा उनका मारीशस से कोई लेना-देना नहीं है। इसी की जांच करने तथा मॉरीशस की कंपनी होने के और ज्यादा सबूत मांगने की एक पंक्ति बजट में आ गई थी, जिससे इन कंपनियों में घबराहट फैल गई और शेयर बाजार नीचे जाने लगा। उनकी चिंता को दूर करने के लिए वित्त मंत्री ने बाद में कहा कि यह पंक्ति गलती से आ गई है। हम संसद में वित्त विधेयक को पास करवाते वक्त इस गलती को सुधार लेंगे। कर-निवास प्रमाणपत्र को ही पर्याप्त और पूरा सबूत माना जाएगा। यदि इसमंे कोई बदलाव करना होगा तो वह मॉरीशस सरकार से बातचीत के बाद दोनों की सहमति से ही होगा और अभी घबराने की कोई जरुरत नहीं है। गौरतलब है कि दोनों सरकारों ने ‘दोहरे करारोपण निषेध समझौते’ की समीक्षा करने और इस को सुधारने के लिए 2006 में एक समूह गठित किया था, जिसने अभी तक कुछ विशेष नहीं किया। इसकी ज्यादा बैठके भी नहीं हुई। शायद इसलिए कि भारत सरकार नहीं चाहती थी। वित्तमंत्री के आश्वासन से यही लगता है कि यह समूह निकट भविष्य में भी कुछ ठोस नहीं करने वाला है। भारत में करों की यह विशाल चोरी मजे से लगातार चलती रहेगी।

कर-चोरी के इस मॉरीशस मार्ग पर पहले भी कई बार सवाल उठे हैं और विवाद हुआ है। भारत और मॉरीशस में यह समझौता 1983 में हुआ था, लेकिन इसका दुरुपयोग नब्बे के दशक में शुरु हुआ जब भारत ने अपने शेयर बाजारों में विदेशी पूंजी को इजाजत और न्यौता देना शुरु किया। 2000 में कुछ देशभक्त आयकर अधिकारियों ने मॉरीशस में फर्जी निवास करने वाली इन कंपनियों की जांच शुरु की थी, तब भी यही नाटक हुआ था। कंपनियों ने भारत से अपनी पंूजी वापस ले जाने की धमकियां दी, शेयर बाजार गिरने लगा और तब वित्त मंत्रालय ने अपने ही अधिकारियों पर रोक लगाते हुए एक परिपत्र निकाला। इस बदनाम परिपत्र क्रमांक 789 में निर्देश दिया गया था कि मॉरीशस सरकार का ‘कर-निवास प्रमाणपत्र’ अपने आप में पर्याप्त है और आगे कोई जांच करने की जरुरत नहीं है। तेरह साल बाद इसी देश-विरोधी नाटक को दोहराया गया।
बजट मेंऔर अगले दिन जो कुछ हुआ, इसे चालू भाषा में ‘थूक कर चाटना’ कहा जाता है। लेकिन यह पहली बार नहीं हुआ है। एक ताजा उदाहरण ‘गार’ का है। एक साल पहले बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कंपनियों द्वारा कर-वंचन रोकने के लिए कुछ नियम बनाने की घोषणा की थी, जिन्हें ‘जनरल एन्टी-अवॉयडेन्स रुल्स’ या ‘गार’ कहा गया। इसमंे यह भी प्रावधान था कि जो कंपनी विविध छूटों का लाभ उठाकर कोई भी कर देने से बच रही है, उसे एक न्यूनतम कर तो सरकार को देना पड़ेगा। वोडाफोन नामक यूरोपीय फोन कंपनी ने भारत में फोन कारोबार के शेयरों का बड़ा सौदा देश के बाहर करके करीब 11000 करोड़ रुपये से ज्यादा का टैक्स बचाया था। ऐसे सौदों को भी कर-दायरे मंे लाने के लिए कानून को पिछली तारीख के प्रभाव से बदलने की घोषणा भी प्रणव मुखर्जी ने की थी। इन घोषणाओं से विचलित होकर विदेशी कंपनियों ने फिर विरोध करना और धमकियां देना शुरु कर दिया।
कंपनियों से कर वसूल कर सरकार का राजस्व बढ़ाना किसी भी वित्त मंत्री का स्वाभाविक प्रयास और कर्तव्य होता है, लेकिन प्रणव मुखर्जी को इसकी गहरी कीमत चुकानी पड़ी। राष्ट्रपति चुनाव का मौका आने पर राष्ट्रपति बनाकर उन्हें राह से हटा दिया गया। कंपनियों के हितैषी चिंदबरम ने वित्तमंत्री बनते ही पार्थसारथी शोम नामक अर्थशास्त्री की अध्यक्षता में एक समिति बनाकर उसे ‘गार’ की समीक्षा करने का काम सौंप दिया। आनन-फानन में दो-तीन महीने में शोम समिति ने अपनी रपट दे दी और जनवरी में सरकार ने उसकी सिफारिशों को मंजूर करते हुए ‘गार’ को लागू करने का काम तीन साल बाद 1 अप्रैल 2016 तक स्थगित कर दिया। वोडाफोन को भी आश्वस्त किया गया कि उस पर टैक्स नहीं वसूला जाएगा। 22 जनवरी को वित्तमंत्री चिदंबरम हांगकांग में भारत में पूंजी-निवेशकर्ता कंपनियों के सम्मेलन में गए और घोषणा की कि उन्होंने ‘गार’ के  भूत को दफन कर दिया है और अब कंपनियों को डरने की कोई जरुरत नहीं है। फिर वे सिंगापुर, लंदन और फं्रेकफुर्त भी गए तथा इसी तरह विदेशी पूंजीपतियों को आश्वस्त करने, खुश करने तथा मनाने की कोशिश की।
वैश्वीकरण-उदारीकरण के इस दौर में भारत सरकार एक विचित्र विसंगति भरी स्थिति में पहुंच गई है। वह बजट घाटे को कम रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है ताकि रेटिंग एजेन्सियों द्वारा उसकी रेटिंग ठीक रहे और उसके मुताबिक विदेशी पूंजी निवेशक भारत की ओर रुख करते रहें। इस घाटे को कम करने के लिए सरकार विकास और जनकल्याण पर जरुरी खर्च में कटौती कर रही है, सरकारी संपत्ति को बेच रही है और जनसाधारण पर डीजल, बिजली, पानी आदि की बढ़ती हुई दरों का बोझ डाल रही है। लेकिन वह दूसरी तरफ विशाल कंपनियों पर टैक्स कम कर रही है, उन्हें करों से बचने और कर-चोरी करने की इजाजत दे रही है तथा उन्हें अनुदान भी दे रही है। यानी जिनके कंधे सबसे कमजोर हैं और जिनको मदद की जरुरत है, उनकी मदद से हाथ खींचते हुए उन पर बोझा बढ़ा रही है और जो विशाल मुनाफा कमाने वाली कंपनियां हैं, उन पर करों का बोझ हल्का करते हुए कर-चोरी की भी छूट दे रही है।
सवाल यह है कि देशहित और जनहित के खिलाफ यह खुला खेल सरकार क्यों खेल रही है ? क्या उसकी कोई मजबूरी है ? कहा जा सकता है कि एक मायने में सरकार मजबूर है। देश की अर्थव्यवस्था की हालत खराब है। राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर कम होती जा रही है और विदेशी मुद्रा का भुगतान संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। देश का विदेश व्यापार हमेशा से घाटे में था, लेकिन अब इस घाटे ने विकराल रुप धारण कर लिया है। बाहर से जो अन्य चालू प्राप्तियां (जैसे विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भेजा जाने वाला पैसा) मिलती थी, उनका प्रवाह भी सूखने लगा है। ऐसी हालत में भुगतान संतुलन के चालू खाते का घाटा 7500 करोड़ डॉलर का विकराल रुप धारण कर चुका है। भारत का जो विदेशी मुद्रा भंडार लगातार पहले बढ़ रहा था, अब वह भी छीजने लगा है। यदि हालात नहीं  सुधरे तो हम 1991 के संकट के नजदीक पहुंच सकते हैं, जब भारत को अपना सोना लंदन में गिरवी रखना पड़ा था और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से काफी अनुचित शर्तों से युक्त कर्ज लेना पड़ा था।
इस संकट से उबरने का एक ही उपाय इस सरकार को दिखाई देता है। वह यह कि हर हालत में, हर कीमत पर विदेशी पूंजी को बुलाए तथा पूंजीगत खाते के अधिशेष से चालू खाते के घाटे को पूरा करे। यह अलग बात है कि ऐसा करने से देश की देनदारियां और बढेंगी तथा आने वाले सालों में भुगतान संतुलन का संकट और गंभीर होगा। दरअसल पिछले दो दशकों मंे सरकार लगातार विदेशी लेन-देन में चालू खाते के घाटे को विदेशी कर्जों और विदेशी पूंजी से पूरा करने का प्रयास करती रही है और इसको उपलब्धि बताकर खुद की पीठ ठोकती रही है।
आज यह संकट इतना बढ़ चुका है और विदेशी पूंजी के प्रवाह पर सरकार इतनी ज्यादा निर्भर हो गई है कि विदेशी पूंजीपतियों द्वारा थोड़ी भी नाराजी दिखाने या धमकी देने से सरकार घबरा जाती है, उनकी नाजायज मांगों को भी मानने को मजबूर हो जाती है। एक तरह से भारत सरकार विदेशी पूंजी के मालिकों, दलालों और सटोरियों की बंधक बन चुकी है। गौरतलब है कि भारत में आ रही विदेशी पूंजी मंे लगभग आधा हिस्सा विदेशी प्रत्यक्ष निवेश है तो आधा केवल शेयर बाजार में लगने वाला पोर्टफोलियो निवेश है और खासतौर पर यही सट्टात्मक वित्तीय पूंजी भारत सरकार को चाहे जैसा नचा रही है। विडंबना यह है कि इसकी तमाम मांगो को पूरी करने के बावजूद कभी भी मुसीबत के समय में इसे वापस भागते देर नहीं लगेगी। दस साल में आए विदेशी पोर्टफोलियो निवेश को वापस जाने में दस दिन भी नहीं लगेंगे। मैक्सिको, दक्षिण-पूर्वी एशिया के अनुभव इस बात के उदाहरण है कि यह वित्तीय पूंजी पहले तो तेजी का गुब्बारा फुलाती है और उसके फूटते वक्त सबसे पहले साथ छोड़कर भागती है। यह चंचल, उड़न-छू पूंजी कभी भी बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को अस्थिर कर सकती है।
लेकिन भारत को इस मुसीबत में ला खड़ा करने का पाप भी उन्हीं लोगों का है जो पिछले 20 सालों से भारत को वैश्वीकरण-उदारीकरण की आत्मघाती राह पर ले जा रहे हैं। विदेश व्यापार का बढ़ता विकराल घाटा बता रहा है कि ‘निर्यात आधारित विकास’ का मॉडल बुरी तरह असफल हुआ है। राष्ट्रीय आय की ऊँची वृद्धि दर एक बुलबुला साबित हुई है। दरअसल इस गरीब देश के करोड़ों लोगों के हित तथा विशाल मुनाफाखोर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों में बुनियादी विरोध है। एक की कीमत पर ही दूसरे को साधा जा सकता है, इसे लातीनी अमरीका के नव-समाजवादी शासकों ने अच्छी तरह समझा है। दुनिया की वित्तीय पूंजी एक लुटेरी पूंजी है जो दुनिया को तबाह करके और लूट कर अपने मुनाफे कमाने में लगी है और इस प्रक्रिया में नए-नए संकट पैदा कर रही है।
अफसोस की बात है कि भारत सरकार के कर्णधारों ने इस बारे में सुधिजनों की बार-बार चेतावनियों और दुनिया के कई अनुभवों के बावजूद इस पर ध्यान नहीं दिया। अभी भी वे उसी आत्मघाती राह पर चल रहे हैं। जयचंद की गद्दारी, सिराजुद्दौला की हार जैसे भारतीय इतिहास के शर्मनाक अध्यायों में एक नया अध्याय जुड़ता जा रहा है जिसमें एक बार फिर हमारे अपनों द्वारा विदेशियों के साथ मिलने और उनका हुकुम बजाने से देश गुलाम और तबाह होने की कगार पर है।
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(लेखक समाजवादी जन परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं ‘सामयिक वार्ता’ के संपादक है।)
- सुनील, ग्राम - केसला, तहसील इटारसी, जिला होशगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111 मोबाईल 09425040452  ईमेल -sjpsunil/gmail.com
       
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