साइकिल पर कमल सजाने की तैयारी

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम विरोधी हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर आदियोग की रिपोर्ट;

फ़िरक़ापरस्त ताक़तें हमेशा इस ताक में रहती हैं कि उनके हाथ ऐसा कोई मौक़ा लग जाये कि नफ़रत की अंधी आग भड़का दी जाये। मथुरा ज़िले के कोशी कलां क़स्बा में यही हुआ। बात बहुत मामूली सी थी लेकिन उसे इस क़दर उलझाया गया कि देखते-देखते यह छोटा सा क़स्बा हैवानियत का मैदान बन गया। घंटों ज़ुल्म का सिलसिला चला, मस्ज़िदों पर हमला हुआ, दुकानों को लूटा-जलाया गया और चार लोगों को ज़िंदा फूंक दिया गया।
शर्म उनको मगर नहीं आती !

31 मार्च को विधानसभा के सामने स्थित धरना स्थल पर जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने कोसी कलां कांड पर रिहाई मंच की रिपोर्ट जारी की थी। उसी दिन उनके नेतृत्व में रिहाई मंच के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से हुई मुलाक़ात में उनकी सरकार के कार्यकाल में अब तक हुई मुस्लिम विरोधी घटनाओं की सीबीआई जांच कराने और दहशतगर्दी के नाम पर जेलों में बंद बेगुनाह मुसलमानों की तत्काल रिहाई की मांग की थी। राजेंद्र सच्चर ने मुख्यमंत्री को चेताते हुए यह भी कहा था कि उनके राज में मुसलमान अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है। आरोप लगाया था कि फ़िरक़ापरस्त ताक़तों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में उनकी सरकार बहुत ढीली और बेमन दिखती है। इसके उन्होंने कई उदाहरण भी पेश किये थे। ज़ाहिर है कि मुख्यमंत्री के पास तमाम सवालों का कोई ठोस जवाब नहीं था।     

लेकिन अगले दिन मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी हुई प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि राजेंद्र सच्चर ने सपा सरकार की तारीफ़ की। राजेंद्र सच्चर अपनी इंसाफ़ पसंदगी और साफ़गोई के लिए जाने जाते हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय ने सफ़ेद झूठ बोला और उनकी बेदाग़ छवि का बेजा इस्तेमाल किया। यह राज्य सरकार के दामन पर लगे मुस्लिम विरोधी धब्बों को ढंकने की फूहड़ कोशिश थी। अगर राजेंद्र सच्चर के कहे को पलटा जा सकता है तो आम आदमी की नाराज़गी को वाहवाही में बदलने में कितनी देर लगेगी। उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने का यह कितना आसान तरीक़ा है कि हर्र लगे न फिटकरी और रंग चोखा ही चोखा...
सबसे बड़ा नुक़सान यह हुआ कि बरसों पुराना भाईचारा और आपसी विश्वास दरक गया। यह अखिलेश सरकार के दौरान हुई पहली मुस्लिम विरोधी हिंसा थी और जिसे किसी कोने से दंगे का नाम नहीं दिया जा सकता। दंगा दो फ़िरक़ों के बीच होता है। यह तो मुसलमानों पर सोची-समझी साज़िश के तहत हुआ हमला था और यह मुस्लिम विरोधी हिंसा की शुरूआत थी।

कोशी कलां में यह ख़ूनी खेल पिछले बरस 1 जून को खेला गया था। तब सूबे की सरकार बहुत नयी-नवेली थी और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नौजवान चेहरा था। चुनावी वायदे लोगों की याददाश्त से अभी ग़ायब नहीं हुए थे। उम्मीद थी कि नया ख़ून कुछ कर दिखायेगा, बदलाव की अब नयी इबारत लिखी जायेगी- पत्थरों पर नहीं, ज़मीन पर। इस उम्मीद को पहला झटका तब लगा जब कुंडा नरेश राजा भइया उर्फ़ रघुराज प्रताप सिंह को कैबिनेट में शामिल कर लिया गया। जिसे जेल में होना चाहिए था, वह जेल मंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया गया। यह अलग बात है कि पहले उन्हें जेल मंत्री के ओहदे से हटना पड़ा और फिर कुंडा में हुए तिहरे हत्याकांड के गहरे छींटों ने उन्हें कैबिनेट से बाहर कर दिया। लेकिन यह सारा कुछ राजा भइया नाम के बवाल से छुट्टी मिलने जैसा नहीं था।

बावजूद इसके उम्मीद पूरी तरह टूटी नहीं। दिल को बहलाने को हज़ार बहाने पैदा हो जाते हैं। यह तर्क भी पैदा हो गया कि साहब, सियासत का रास्ता इतना आसान नहीं हुआ करता। कि न चाहते हुए भी तमाम दबावों और समझौतों से गुज़रना पड़ता है। कि मुलायम सिंह यादव की छाया इतनी जल्दी भला कैसे काफ़ूर हो सकती है। समझदार जानते थे कि यह सरकार बस नये लेबलवाली बोतल में पुरानी शराब भर है, कि उससे ज़्यादा उम्मीद पालना ख़ुद को धोखा देने के सिवा कुछ भी नहीं। तो भी इतनी उम्मीद सभी को थी कि और चाहे कुछ हो या न हो, कम से कम फ़िरक़ापरस्त ताक़तों पर शिकंजा कसेगा और अमन पर कोई आंच नहीं आयेगी।

लेकिन कोशी कलां में हुई वारदात ने इसे ग़लत साबित कर दिया। मसला बहुत छोटा था। जुमे की नमाज़ का समय हो चला था। इसी बीच एक हिंदू युवक ने पेशाब करने के बाद अपना हाथ उस टंकी में डुबो दिया जिसमें नमाज़ियों के लिए शर्बत रखा गया था। एक नमाज़ी ने इस पर एतराज जताया और उस युवक को फटकार लगायी। लेकिन अपने किये पर शर्मिंदा होने के बजाय वह झगड़ा करने पर आमादा हो गया। ग़ुस्से में नमाज़ी ने उसे चांटा जड़ दिया और मामला बिगड़ गया। तहज़ीब और सलीक़े का मसला हिंदू-मुसलमान की तक़रार में बदलने लगा। इससे पहले कि हालात बेक़ाबू होते, जिले के पुलिस प्रमुख मौक़े पर पहुंच गये। आख़िरकार चांटा मारनेवाले नमाज़ी ने माफ़ी मांग ली और इस मामले को हिंदुओं पर हमला मान कर ग़ुस्साये लोग भी शांत हो गये। मामला रफ़ादफ़ा हो गया।

लेकिन अगला अध्याय अभी बाक़ी था। इधर लोगों ने सुकून की सांस ली और उधर अफ़वाहों का बाज़ार गर्म होने लगा। ख़बर उड़ी कि क़स्बे के मुस्लिम नौजवानों ने कुछ हिंदू लड़कियों का अपहरण कर लिया है, कि उनके साथ कोई भी अनहोनी घट सकती है, कि उनके साथ बलात्कार हुआ है, कि उनके स्तन काट दिये गये हैं, वगैरह-वगैरह। हुंकार भरी गयी कि हिंदू लड़कियों को बचाना और इस ज़ुर्रत के लिए मुसलमानों को सबक़ सिखाना हिंदुओं का धर्म है। इससे ठीक छह दिन पहले यह अफ़वाह भी गढ़ी जा चुकी थी कि स्थानीय मदरसे से तीन आंतकवादी पकड़े गये हैं, कि उनके पास से भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक बरामद किये गये हैं, कि उनका मक़सद क़स्बे में किसी बड़ी वारदात को अंजाम देना था। कुछेक अख़बारों ने इस निरी अफ़वाह को ख़बर बना कर भी पेश कर दिया था। इससे माहौल में गर्माहट घुल गयी थी। नयी अफ़वाह ने उसे और गाढ़ा कर दिया।

तो अफ़वाहों ने अपना काम किया। आसपास के गांवों से जत्थे के जत्थे क़स्बे की ओर कूच कर गये। देखते-देखते हज़ारों की तादाद में लोग जमा हो गये। उनके पास बंदूक़ें थीं, लाठियां और पेट्रोल से भरी बोतलें थीं। क़स्बे में घुसने से उन्हें रोका नहीं जा सका। मुस्लिम विरोधी हिंसा इस तरह परवान चढ़ी।

यह वारदात किसी भारी चूक का नतीज़ा नहीं थी। चूक होती तो उसे दुरूस्त किया जाता, एहतियात बरती जाती कि आइंदा ऐसी घटना न होने पाये। याद कीजिये कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में सिख विरोधी हिंसा की लहर उठी थी। तब राजीव गांधी ने यह बयान देकर उस बर्बर लहर को जायज़ ठहराने का काम किया था कि ‘कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिल उठती है।‘ इस बयान ने बलवाइयों के हौसले बुलंद करने का काम किया था। यह भी याद कीजिये कि उसी दौरान हावड़ा ब्रिज पर भी दो सिखों को ज़िंदा जलाया गया था। पश्चिम बंगाल में सिख विरोधी हिंसा की वह पहली वारदात थी। इस पर तत्कालीन मुख्यंत्री ज्योति बसु ने बिना किसी देरी के सख़्त हिदायत दी थी कि सिखों की पूरी हिफ़ाज़त की जाये, कि वे ऐसी अगली ख़बर सुनने को तैयार नहीं वरना पुलिस-प्रशासन के ज़िम्मेदारों की ख़ैर नहीं। इसका असर हुआ और हावड़ा ब्रिज जैसी कोई दूसरी वारदात नहीं हुई।

बेशक़, अगर सरकार ठान ले तो ऐसी वारदातें रोकी जा सकती हैं। इसके लिए मज़बूत इरादे की ज़रूरत होती है, और इरादे तभी बनते और मज़बूत होते हैं जब सचमुच ऐसी कोई चाहत हो। यह चाहत नदारद थी इसलिए कोशी कलां की वारदात पहली और आख़िरी वारदात नहीं रही। अखिलेश सरकार ने अभी छह माह ही पूरे किये कि मुस्लिम विरोधी सात घटनाएं घट गयीं। एक साल पूरा होते-होते इन घटनाओं की संख्या दो दर्ज़न का आंकड़ा पार कर गयी। प्रतापगढ़, फ़ैज़ाबाद, मेरठ, ग़ाज़ियाबाद, इलाहाबाद, फ़र्रुख़ाबाद, संभल, मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर, बहराइच आदि ज़िलों में फ़िरक़ापरस्ती ने बेख़ौफ़ होकर अपने झंडे गाड़े। प्रतापगढ़ में तो एक माह के भीतर एक ही इलाक़े में दो बार हिंसा भड़की। दूसरी बार तब जब आग लगाने के मामले में कुख्यात विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया ने वहां इतना भड़काऊ भाषण दिया कि उनके जाते ही नफ़रत का अंधड़ जाग उठा। सवाल उठता है कि उन्हें वहां घुसने की इजाज़त ही क्यों मिली और उनके किये-धरे पर फ़ौरन कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

बहरहाल, कोशी कलां की घटनाओं को लेकर जिलाधिकारी ने मुस्लिम विरोधी अफ़वाहों को ज़िम्मेदार ठहराया। प्रशासन को रत्ती भर आभास नहीं हुआ कि एक बड़ा बवंडर क़स्बे का सुख-चैन छीनने की तैयारी कर रहा है। देखते-देखते हज़ारों की भीड़ क़स्बे के बाहर जमा हो गयी। उसे रोकने के लिए प्रशासन के पास पर्याप्त बल नहीं था। भीड़ को समझाने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं था लेकिन यह कोशिश नाकामयाब हो गयी। भीड़ को क़स्बे में घुसने से रोका नहीं जा सका। सवाल दर सवाल हैं कि आख़िर पर्याप्त बल क्यों नहीं जुट सका? घंटों ख़ौफ़ और दहशत का आलम बना रहा लेकिन रात 11.30 बजे के बाद ही कर्फ्यू क्यों लगा? जब अफ़वाहें पक रही थीं, उस समय एलआईयू क्या कर रही थी? समय रहते प्रशासन को इसकी ख़बर क्यों नहीं लग सकी? रैपिड एक्शन फ़ोर्स मुस्लिम बस्तियों में क्यों तैनात की गयी? बाक़ी इलाकों को क्यों खुला छोड़ दिया गया? एफ़आईआर में यह दर्ज़ नहीं हो सका कि बलबा किसके इशारे पर और किसकी अगुवाई में हुआ? हमले की पहल किधर से हुई?

मुलायम सिंह यादव की छवि फ़िरक़ापरस्ती के कट्टर विरोधी और मुसलमानों के पैरोकार की रही है। यह भरम इधर तेज़ी से टूटने लगा है। अभी हाल में संसद में उन्होंने फ़रमाया था कि अगर भाजपा अपना फ़िरक़ापरस्त नज़रिया छोड़ देती तो आज सपा उन्हीं के साथ खड़ी होती, कांग्रेस के साथ क्यों जाती? गोया नज़रिया कोई कपड़ा हो जिसे कभी भी पहना या उतारा जा सकता हो। पूर्व समाजवादी और अब कांग्रेसी नेता बेनीप्रसाद वर्मा की मुलायम विरोधी अभद्र टिप्पणियों को लेकर भाजपा के बड़े नेता भी मुलायम के पक्ष में खड़े हुए। इसके बाद अपनी पार्टी के एक कार्यक्रम में मुलायम सिंह यादव ने बिन मांगे यह सार्टीफ़िकेट भी जारी कर दिया कि लालकृष्ण आडवाणी कभी झूठ नहीं बोलते। पूरा देश जानता है कि यह वही आडवाणी हैं जिन्होंने बाबरी मस्ज़िद की शहादत में अहम किरदार निभाया था और इसके लिए पूरे देश में फ़िरक़ापरस्ती का उबाल पैदा किया था। क़ायदे से इस गुनाह के लिए उन पर देशद्रोह का मुक़दमा चलना चाहिए था और इसके लिए मुलायम को मैदान में आना चाहिए था। तो अचानक भाजपा के प्रति यह मुलायमियत क्यों? शायद उन्हें लगता हो कि लोकसभा चुनाव के नतीज़े सपा और भाजपा को एक पाले में आने की मजबूरी का सबब भी बन सकते हैं तो यारी के हाथ अभी से क्यों न बढ़ा दिये जायें। सियासत के उजड्ड जंगल में यह पूर्वांचल के पुराने पहलवान का ताज़ातरीन दांव है।

बहरहाल, इससे समझा जा सकता है कि कोसी कलां की वारदात को एक साल पूरे होने को हैं लेकिन अभी तक उसके पीड़ितों के ज़ख़्मों पर सरकारी मलहम क्यों नहीं लगाया जा सका? सब्र का बांध टूट गया तो उन्हें अपनी आपबीती सुनाने और इंसाफ़ मांगने के लिए राजधानी लखनऊ आना पड़ा। यह जम्हूरी निजाम के लिए शर्म की बात होनी चाहिए। यों, सियासत में आजकल अपनी ग़लती, लापरवाही या बेदिली पर चुल्लू भर पानी में डूब मरने का रिवाज़ बचा ही नहीं। फ़िलहाल तो समाजवाद और हिंदुत्व की जुगलबंदी का रियाज़ चल रहा है।

भुक्तभोगियों की ज़ुबानी...

पांच बच्चों की मां फ़रज़ाना उस दिन का मंज़र याद कर सिहर उठती हैं। यह बताते हुए उनकी आंख भर जाती है, गला रूंध जाता है कि उनके दामाद भूरा और उसके जुडवां भाई कलुआ को भीड़ ने पकड़ा, बेरहमी से पीटा, बुरी तरह घायल किया, नंगा किया और आग में झोंक दिया। वहशियत का यह ख़ूनी खेल उनकी नज़रों के सामने हुआ। भीड़ के पगलाये ग़ुस्से से वे ख़ुद भी नहीं बच सकीं। सरेआम उनके कपड़े फाड़े गये। इस पूरे सिलसिले की शुरूआत तब हुई जब कलुआ को गोली लगी। उसे ठेलिया पर लाद कर किसी तरह बचते-बचाते निजी अस्पताल ले जाया गया लेकिन अस्पताल ने उसका इलाज करने से इंकार दिया। अब दूसरे अस्पताल में जाना तय हुआ लेकिन वहां पहुंचने से पहले heeभीड़ ने उन्हें घेर लिया। गोली मार कर भूरा को भी घायल कर दिया गया और वहीं दोनों को ज़िंदा जला दिया गया। तब से उनका परिवार डरा-सहमा हुआ है जबकि गुनाहगार बेख़ौफ़ घूम रहे हैं। सादिक़ ने कहा कि उस दिन क़स्बे में इंसानियत तार-तार हुई... माहौल में घुंआ था, तेज़ाब और पेट्रोल से भरी बोतलें थीं, लाठियां थीं, गोलियों की आवाज़ें थीं, चीख़पुकार थी... और उसके पीछे जयश्रीराम का नारा था। जान भाई के मुताबिक़ इस वारदात का मक़सद नगर पंचायत के होनेवाले चुनाव में बढ़त हासिल करना था। बस इत्ती सी मेहनत से यह मक़सद पूरा हो गया। मुस्लिम विरोधी हिंसा को हवा देनेवाले कोशी कलां समेत वृंदावन और मथुरा नगर पंचायत पर क़ाबिज़ हो गये। 

शाहिद कहते हैं कि हमलावरों ने बच्चों और बूढ़ों को भी निशाना बनाया। लोग गिड़गिड़ा रहे थे और अपनी जान की भीख मांग रहे थे लेकिन हमलावर तनिक नहीं पसीजे। वारदात के लिए लोगों को उकसानेवाली ताक़तों की ओर ऊंगली उठाते हुए उन्होंने कहा कि 25 मई को वृंदावन स्थित हनुमान अखाड़े में आरएसएसएस का तीन दिन का कैंप लगा था। साज़िश वहीं रची गयी। इसकी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए कि उस कैंप में आख़िर किन मुद्दों पर चर्चा हुई थी? जो घायल हुए और जिनकी दूकानें स्वाहा हुईं, उन्हें 30-30 हज़ार रूपये बतौर मुआवज़ा दिया गया। इतने में क़ायदे से इलाज भी नहीं हो सका। दूकानें दोबारा खड़ी करना तो ख़ैर दूर की कौड़ी बना रहा। इस्लाम ने बताया कि नयी सब्ज़ी मंडी में कोई दो दर्ज़न दूकानों को बरबाद-तबाह किया गया। सुनते हैं कि अब ख़ाली पड़ी जगह के लिए बोली लगेगी और ज़ाहिर है कि जिनका सब कुछ चला गया, वे बोली लगाने की हैसियत में नहीं होंगे। अपनी दूकान खड़ा करने के लिए लोगों ने बैंक से उधार लिया था। अब बैंकवाले तक़ादे के लिए उन्हें परेशान करते हैं। पता नहीं कि ज़िंदगी आगे कैसे चलेगी? अपनी दुखभरी दास्तान बयां करते-करते उनकी आंख से आंसू छलक पड़े।         

मौलाना मोहम्मद ताहिर सिंगारवी दुख और ग़ुस्से के साथ कहते हैं कि एसडीएम और पीएसी की आंख के सामने बेगुनाह मुसलमानों और उनके ठिकानों पर कहर बरपा हुआ। ज़िले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने साफ़ कह दिया कि अब वे कुछ नहीं कर सकते। आईजी पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि हालात क़ाबू में हैं। रात पौने 10 बजे मुलायम सिंह यादव से बात हो सकी। उनका कहना था कि चिंता की बात नहीं, मुसलमान आईजी के रहते अब आगे कोई फ़साद नहीं हो सकता। लेकिन तब तक दो मस्ज़िदें, तमाम घर और दूक़ानें तोड़फोड़ और आगजनी का शिकार हो चुकी थीं। हाकिम की नीयत में खोट हो तो मुसलमान आईजी भी भला क्या कर सकता है और क्यों करना चाहेगा? हुक़ूमत का मुख्य सचिव भी तो मुसलमान है लेकिन उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?




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