चुटका परमाणु प्लांट विरोधी आंदोलन : और अब क्रिकेट मैच का दांव

सुना आपने? यह कोशिश आख़िरकार टांय-टांय फिस्स हो गयी कि मंडला जिले की हरी-भरी धरती के आदिवासी बहुल सुदूर इलाक़े में क्रिकेट का डंका पिटे, खिलाड़ियों पर रूपया लुटे, क्रिकेट का बाज़ार सजे। आयोजकों को पूरी उम्मीद थी कि स्थानीय जनता इस अनोखी पहल का भरपूर स्वागत करेगी और इस मेहरबानी के लिए सौ बार उनका शुक्रिया अदा करेगी लेकिन हुआ इसका उल्टा। आदिवासियों को यह अभूतपूर्व योजना तनिक रास न आयी। एक आवाज़ में उन्होंने इस योजना को बक़वास और घोखाधड़ी करार दिया और उसका तगड़ा विरोध किया। दोटूक कहा कि उन्हें क्रिकेट नहीं, ज़िंदा रहने का अधिकार चाहिए। 
 
ऐसा नहीं कि आदिवासी क्रिकेट को नापसंद करते हैं। उनके गांवों में बरसों पहले क्रिकेट की आमद हो चुकी है और आज तो वह कई परंपरागत खेलों को पछाड़ कर अपना रूतबा भी क़ायम कर चुका है। शहरों और क़स्बों की तरह वहां भी क्रिकेट की धूम है और जो मनोरंजन के अलावा लोगों को जोड़े रखने का ज़रिया भी है। इसलिए कि उसका अंदाज़ दोस्ताना है। लेकिन क्रिकेट की नयी योजना की मंशा में ऐसा कुछ नहीं है। यह आदिवासियों की एकता को तोड़ने की नयी तिकड़म है जिसे आदिवासियों ने फ़ौरन ताड़ लिया और इस पहल को बिना समय गंवाये ख़ारिज कर दिया। फ़िलहाल, प्रायोजकों ने अभी भी हार नहीं मानी है और उनकी कोशिश जारी है कि चुनिंदा गांवों में क्रिकेट के भव्य मैच आयोजित हों। इसमें कार और मोटरसाइकिल से लेकर एक लाख रूपये का इनाम दिये जाने का भी प्रावधान है।

यह इनायत कुल नौ गांवों के लिए है। इसमें छोटा सा आदिवासी गांव चुटका भी शामिल है जिसे तीन साल पहले तक नारायनगंज तहसील में ही बहुत कम लोग जानते थे। आज यह गांव मंडला में ही नहीं, पूरे मध्य प्रदेश में जाना जाता है। राज्य के बाहर भी यह नाम यहां-वहां लोगों की ज़ुबान पर चढ़ने लगा है। उसकी इस शोहरत के पीछे कोई चमत्कारिक उपलब्धि नहीं है। सामने खड़ी पहाड़ जैसी आफ़त ने उसे सुर्ख़ियों में लाने का काम किया है। यह आफ़त परमाणु बिजली संयंत्र की प्रस्तावित परियोजना लेकर आयी है।

परियोजना के निशाने पर अकेला चुटका नहीं है। उसके साथ दो पड़ोसी गांव भी परियोजना की बलिवेदी पर चढ़ेंगे। विकास नाम के इस पगलाये यज्ञ में दी जानेवाली आहुतियों का सिलसिला यहीं पर नहीं थमेगा। उसकी आंच से दर्जनों दूसरे गांव भी स्वाहा हो जाने की हद तक झुलसेंगे। ज़ाहिर है कि पिछले तीन सालों से लगातार तेज़ हो रही इस आफ़त की आहट ने इलाक़े के अमन-चैन को लूटने का बेहूदा काम किया है। सच है कि तमाम लोग डरे हुए हैं और उन्हें नहीं नहीं लगता कि उनकी सुनी जायेगी। कुछ टूट गये और कुछ लालच में भी फंस गये। लेकिन यह सच कहीं ज़्यादा वज़नी है कि बहुतेरे इसके ख़िलाफ़ अभी तक डटे हुए हैं और आख़िरी दम तक लोहा लेने को तैयार हैं।

इसी का नतीज़ा है कि परियोजना का काम काग़ज़ों से आगे नहीं खिसक सका। पिछले कोई एक साल से मामला ठंडा पड़ा था। क्रिकेट मैच के आयोजन की योजना लोगों को बरगलाने और उनकी एकता को भंग करने के नये पैंतरे के बतौर बुनी गयी। इसके योजनाकारों को लग रहा था कि आदिवासी उनके इस नये जाल में ज़रूर फंसेंगे, ख़ास कर आदिवासी नौजवान उनके पाले में आसानी से आ गिरेंगे। लेकिन यह सरासर ग़लतफ़हमी थी। आदिवासियों ने बता दिया कि वे अनपढ़ या भोले हो सकते हैं लेकिन मूर्ख नहीं।

परियोजना के विरोध का सिलसिला कोई साढ़े तीन साल से जारी है। पिछले साल ज़मीन के अधिग्रहण की अधिसूचना ने इसमें और गरमाहट घोल दी थी। याद रहे कि धारा-4 की यह नोटिस पिछली 29 जून को जारी हुई थी लेकिन इतनी धीमी रफ़्तार से चली कि गांव तक पहुंचने में उसे 23 जुलाई की रात हो गयी। यह देरी सरकारी मक्कारी का नमूना है। ख़ैर, इसके अगले ही दिन आंदोलनकारियों का प्रतिनिधि मंडल जिला कलेक्टर से मिला। पूछा कि जब ग्राम सभाएं परियोजना को नामंज़ूर करते हुए उसके ख़िलाफ़ अपनी आपत्तियां दर्ज़ कर चुकी हैं तो यह नोटिस क्यों, कि यह तो पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों का सरासर उल्लंघन है। यों, इस नीतिगत मसले पर कलेक्टर से जवाब की कोई उम्मीद भी नहीं थी। यही बात राज्यपाल के सामने भी रखी गयी और हाथ लगा बस वही पुराना जुमला और वो भी बहुत ठंडे सुर में कि उनकी मांगों पर संजीदगी के साथ विचार किया जायेगा। तसवीर साफ़ हो गयी कि लड़ना लाज़मी है। इसी रोशनी में 19 अगस्त को 54 गांव के प्रतिनिधि चुटका में जुटे और उन्होंने सरकारी ज़िद और ज़बरदस्ती के आगे घुटने न टेकने का संकल्प दोहराया कि जान देंगे लेकिन ज़मीन नहीं।      

परियोजना के मुताबिक़ परमाणु संयंत्र बरगी बांध के किनारे जमेगा। याद रहे कि बरगी बांध नर्मदा घाटी में बने 30 बड़े बांधों में से एक है और केवल बरगी बांध से मध्य प्रदेश के तीन जिलों के 162 गांवों के लोग विस्थापित हुए थे- मंडला के 95, सिवनी के 48 और जबलपुर के 19 गांव। यह भी याद रहे कि विस्थापितों में 70 फ़ीसदी से अधिक आदिवासी हैं, कि विस्थापित हुए लोग अभी तक विस्थापन की त्रासदी से उबर नहीं सके हैं। मुआवज़े और पुनर्वास को लेकर किसी पारदर्शी और न्यायसंगत नीति की ग़ैर मौजूदगी में बरगी बांध ने उनके साथ ज़ालिमाना मज़ाक़ किया। विकास का जाप करते हुए उनकी सिधाई के साथ छल किया और उन्हें वंचनाओं के जंगल में फेंक दिया।   

परियोजना का ख़ाक़ा 1984 से ही बनना शुरू हो गया था जब परमाणु ऊर्जा आयोग के विशेष दल ने चुटका के आसपास के इलाक़े का दौरा किया। तब बरगी बांध से हुए विस्थापन का मुद्दा ताज़ा और गरम था। शायद इसीलिए गांववाले नहीं सूंघ सके कि एक और आफ़त उन पर घात लगाने की तैयारी में है। कोई 25 साल बाद इसके ख़िलाफ़ हलचल तब शुरू हुई जब अक्तूबर 2009 में केंद्र सरकार ने इसके प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दी। परियोजना के मुताबिक़ पहले दौर में संयत्र की दो इकाइयां लगेंगी और प्रति इकाई सात सौ मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। जल्द ही दो और इकाइयां लगा कर परियोजना का विस्तार किया जायेगा। इस तरह चुटका परमाणु बिजली संयंत्र की उत्पादन क्षमता 28 सौ मेगावाट हो जायेगी। परियोजना के लिए चुटका, टाटीघाट और कुंडा गांव की 650 हेक्टेयर ज़मीन का अधिग्रहण होगा। परियोजना से सात किलोमीटर दूर बसे सिमरिया गांव के पास टाउनशिप का निर्माण होगा और इसके लिए 75 हेक्टयर अतिरिक्त ज़मीन का अधिग्रहण होगा।

परियोजना को केंद्र सरकार की हरी झंडी मिलने के फ़ौरन बाद नवंबर 2009 में चुटका में आसपास के 50 गांवों की बड़ी सभा का आयोजन हुआ था। तब तक यह ख़बर आग की तरह दूर-दूर तक फैल चुकी थी कि परमाणु बिजली संयंत्र का इलाक़े पर बुरा असर पड़ेगा, कि सैकड़ों परिवार अपनी आजीविका से हाथ धो बैठेंगे, कि बरगी बांध से विस्थापित हो चुके कुछ गांव दोबारा विस्थापन की मार झेलेंगे। इससे सभी सकपकाये हुए थे और ग़ुस्से में थे। उस सभा में मंडला के सांसद बसोरी सिंह मसराम भी पहुंचे थे। अब इसे संसदीय राजनीति की विडंबना कहें कि जन प्रतिनिधि महोदय के सुर जनमत से ठीक उलट थे। उन्होंने विकास की दुहाई दी, बेहतर मुवावज़े और पुनर्वास का झुनझुना हिलाया। लेकिन जैसा कि तय था, सांसद महोदय की दाल नहीं गली। उनका सामना लोगों के तीखे विरोध से हुआ और उन्हें बैरंग लौटना पड़ा। दूसरी ओर सभा ने एकमत से प्रस्तावित परियोजना पर अपनी नामंज़ूरी दर्ज़ की। संघर्ष के संचालन के लिए चुटका परमाणु संघर्ष समिति का भी गठन किया गया। महिलाओं ने भी कमर कसी और कई मर्तबा सर्वे के लिए आनेवाले दलों को खदेड़ने का मोर्चा संभाल लिया।

आंदोलनकारी भूले नहीं हैं कि बरगी बांध को भी जन हितकारी परियोजना के बतौर प्रचारित किया गया था। कहा गया था कि उससे प्रभावित लोगों को वैकल्पिक ज़मीन मिलेगी, नौकरी और मुफ़्त बिजली मिलेगी, बेहतर ज़िंदगी जीने की तमाम सरकारी सहूलियतें मिलेंगी, उनकी क़िस्मत बदल जायेगी। बरगी बांध तो बन गया लेकिन मिला कुछ भी नहीं। बरगी बांध से बिजली बन रही है लेकिन उनके घरों में आज भी कुप्पी जलती है। क्या यही विकास है? चुटका परियोजना का आकलन है कि संयंत्र से 11 किलोमीटर के अर्ध व्यास में बसे दर्जनों गांव संभावित विकरण के दायरे में होंगे। परियोजना से भले ही तीन गांव के लोग उजड़ेगे लेकिन और गांव भी उसके बुरे नतीज़ों को भुगतेंगे। कोई अनहोनी घटी तो पूरा महा कौशल वीरान हो जायेगा।

फ़िलहाल, परियोजना को अभी तक अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं मिला है। इस बीच इलाक़े का सर्वेक्षण किये जाने की जब-तब कोशिशें जारी रहीं। कहना होगा कि ग़ांववालों और ख़ास कर महिलाओं की सजगता के चलते ऐसी हर कोशिश को केवल नाकामयाबी हाथ लगी।   

परियोजना का रास्ता साफ़ करने के लिए सामाजिक कार्य की आड़ में गांवों में घुसपैठ करने और लोगों को भरमाने का पैंतरा भी आज़माया गया। जबलपुर की सिहोरा तहसील की किसी संस्था को स्वास्थ्य शिविर लगाने का ठेका दिया गया। लेकिन गांववाले भांप गये कि इसका असल मक़सद तो कुछ और है। शंका इसलिए भी पैदा हुई कि सरकारी योजना के तहत पहले से ही बरगी बांध से सटे इलाक़ों में चिकित्सा सुविधा पहुंचाने के लिए हर हफ़्ते वाहन और स्टीमर का दौरा लगता है, तब अचानक इस स्वास्थ्य शिविर का आयोजन क्यों? आख़िरकार, जागरूक और सतर्क वाशिंदों के कड़े रूख़ के सामने संस्था की एक न चली और उसे अपने स्वास्थ्य शिविर का बोरिया-बिस्तर समेट कर वापस लौटना पड़ा।    

वैसे, चुटका से कोई दस किलोमीटर दूर बसे गोरखपुर बरेला में तीन साल पहले झाबुवा तापीय बिजली संयंत्र की परियोजना को मंज़ूरी मिली थी। इसमें कहीं कोई दिक़्क़त पेश नहीं आयी। सीधे-सादे आदिवासी परियोजना द्वारा दिखाये गये सुनहरे कल के झांसे में आ गये और उन्होंने आगा-पीछा सोचे बग़ैर परियोजना के पक्ष में हामी भर दी और कौड़ियों के भाव अपनी उपजाऊ ज़मीनें उसके हवाले कर दीं। संयंत्र अभी निर्माणाधीन है लेकिन समस्याओं की बारिश शुरू हो चुकी है। चट्टानों को विस्फोट से उड़ाया जाता है तो आदिवासियों के घर दहल उठते हैं। ज़्यादातर मकानों में दरारें पड़ गयी हैं। धुकधुकी लगी रहती है कभी कोई तगड़ा विस्फोट न हो जाये कि उनका आशियाना भरभरा कर ढह जाये। विस्फोट से उड़नेवाली धूल बचे-खुचे खेतों में पसर जाती है। यह ज़मीन को बांझ बना देने का सिलसिला है। गोरखपुर बरेला के लोगों को अब समझ में आया कि उनसे भारी भूल हुई। देर से और बहुत कुछ लुट जाने के बाद ही सही लेकिन वे जाग रहे हैं। चुटका परमाणु संघर्ष समिति के क़रीब आ रहे हैं। अभी तो ख़ैर शुरूआत है।
    
बरगी बांध में चुटका की 75 फ़ीसदी तो टाटीघाट की 90 फ़ीसदी ज़मीन समा गयी। जो बची, उसमें ज़्यादातर बर्रा है- बर्रा मतलब पथरीली, केवल कोंदो-कुटकी उगाने लायक़। कुंडा गांव इस मायने में ख़ुशक़िस्मत है। बरगी बांध में यहां की बहुत कम ज़मीन गयी। यहां के आदिवासी दोफ़सली बड़ी जोतों के मालिक़ हैं और इतने सक्षम रहे हैं कि इस गांव से कभी पलायन नहीं हुआ। चुटका परमाणु बिजली संयंत्र की परियाजना इस आत्मनिर्भरता पर ग्रहण लगाने का काम करेगी। इस समझ और कमाल की एकता के चलते यह पूरा गांव परियोजना के ख़िलाफ़ है।

दुर्भाग्य से चुटका और टाटीघाट में ऐसा नहीं है। परियोजना को लेकर लोग बंटे हुए हैं। ताज़ा ख़बर यह है कि मंडला के कई भाजपाई और कांग्रेसी नेता चुटका और टाटीघाट में औने-पौने दाम में ज़मीन ख़रीद रहे हैं। इस आधार पर ख़ुद को इलाक़े का वाशिंदा बताते हुए परियोजना के पक्ष में खुल कर प्रचार कर रहे हैं। यह परियोजना के विरोध में खड़े लोगों से मुक़ाबला करने का नया दांव है। इसी कड़ी में ग़ौरतलब है कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार से मदद की गुहार करते हुए यह ख़तरा बयान कर चुके हैं कि उनके सूबे में माओवादी तेज़ी से अपने पांव पसार रहे हैं। क्या पता कि कल को चुटका का संघर्ष परवान चढ़े तो सरकार माओवाद का ठप्पा लगा कर उसका दमन करे। तो सरकारी हथकंडों से निपटना, व्यापक एकता की राह खोलना और संघर्ष को जीत की मंज़िल तक ले जाना चुटका परमाणु संघर्ष समिति के लिए बड़ी चुनौती है।

-आदियोग
 
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