सर्वे के झरोखे से अति वंचितों की स्थिति

सर्वे का दायरा था आठ जिलों (भदोही, जौनपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, कौशाम्बी, फ़तेहपुर, उन्नाव और बाराबंकी) के 14 ब्लाक, 15 राजस्व गांव और अति वंचित समुदायों के 676 परिवार। बेशक़, यह सीमित दायरे की तसवीर है लेकिन व्यापक रूप से अति वंचित समुदायों के साथ नत्थी वंचनाओं की बानगी पेश करता है; 
  

मनरेगा
मनरेगा इसलिए लागू हुआ कि ग्रामीण इलाक़ों में ज़रूरतमंद परिवारों को साल में सौ दिन काम मिले। इसमें अति वंचित समुदायों को पहली क़तार में होना चाहिए था। लेकिन उनकी कोई क़तार लगभग नहीं बन सकी। मनरेगा का फ़ायदा लेने के लिए जाब कार्ड का होना पहली शर्त है। लेकिन सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि 62 फ़ीसदी परिवार जाब कार्ड से वंचित हैं। उन्नाव में यह स्थित सबसे बुरी है जहां सौ फ़ीसदी परिवार जाब कार्ड से वंचित हैं। फ़तेहपुर, भदोही और कौशाम्बी में यह प्रतिशत 92 से 94 के बीच है। बाक़ी चार जिलों में यह प्रतिशत 72 से 55 के बीच है।

क़ानून के मुताबिक़ काम के लिए आवेदन किया जाना होता है और उसके एक पखवाड़े के भीतर काम मिल जाना चाहिए। क़ायदे से आवेदन की रसीद मिलनी चाहिए। लेकिन ज़मीनी स्तर पर ऐसा नहीं होता। रसीद मांगना प्रधान जी पर शक़ करना है और प्रधान जी भला किसी क़ानूनी लफ़ड़े में क्यों फंसना चाहेंगे? इसलिए यह औपचारिकता कहीं बिरले ही पूरी होती है। बहरहाल, सभी ज़िलों को मिला कर देखें तो 72 फ़ीसदी से अधिक परिवारों ने काम की मांग की लेकिन काम हासिल हुआ अधिकतम 58 फ़ीसदी परिवारों को। पांच ज़िलों (बाराबंकी, फ़तेहपुर, भदोही, कौशाम्बी और जौनपुर) में सभी जाब कार्डधारी परिवारों ने काम की मांग की लेकिन उनमें से केवल तीन ज़िलों (फ़तेहपुर, भदोही और जौनपुर) में सभी को काम मिला। बाराबंकी में किसी को काम नहीं मिला तो कौशाम्बी में लगभग 35 फ़ीसदी परिवारों को। वाराणसी में अगर तीन चौथाई से अधिक तो कौशांबी और इलाहाबाद में एक तिहाई परिवारों ने काम की मांग रखी थी और लगभग इसी अनुपात में काम हासिल करनेवाले परिवारों की संख्या रही। मतलब कि अति वंचित समुदायों का बड़ा हिस्सा काम के अधिकार से वंचित रहा या कहें कि वंचित कर दिया गया।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली
समग्र रूप में देखें तो लगभग तीन चौथाई परिवार राशन कार्ड से वंचित हैं। फ़तेहपुर और कौशाम्बी में तो यह वंचना सौ फ़ीसदी परिवारों के साथ नत्थी है। कहने को कहा जा सकता है कि उन्नाव में यह स्थिति एकदम उलट है- वहां सभी वंचित परिवारों के पास राशन कार्ड की सुविधा है। लेकिन कौन सा कार्ड? जवाब है- ग़रीबी रेखा से ऊपरवाला। यह अमीरी-ग़रीबी के वर्गीकरण में धांधली का, अन्याय का, अति वंचितों के साथ भद्दे मज़ाक़ का नज़ारा है।

कम या ज़्यादा लेकिन यह नज़ारा हर जगह का है। यह कमाल की कारस्तानी है कि लगभग 56 फ़ीसदी अति वंचित परिवार एपीएल श्रेणी में ‘पहुंचा’ दिये गये हैं। बाक़ी 44 फ़ीसदी में बीपीएल और अंत्योदय श्रेणी के परिवार हैं। भदोही में कुल 20 फ़ीसदी परिवार एपीएल श्रेणी में हैं। बाक़ी जिलों में यह प्रतिशत 42 से 57 के बीच है। राशन के अनियमित वितरण को लेकर शिक़ायतों का प्रतिशत लगभग 56 है। वैसे, चार ज़िलों में यह अधिकतम हैं तो बाक़ी चार ज़िलों में न्यूनतम।

पेंशन
विधवा पेंशन की पात्रता रखनेवाली दो तिहाई महिलाएं इस लाभ से वंचित हैं। दो ज़िलों (बाराबंकी और वाराणसी) में तो ऐसी सभी महिलाएं इस योजना से बाहर हैं। हालांकि दो ज़िले (भदोही और जौनपुर) में सभी पात्र महिलाओं को इसका लाभ मिल रहा है। वृद्धावस्था और विकलांग पेंशन के मामले में भी दोनों ज़िले अव्वल हैं। यों, वृद्धावस्था पेंशन का हाल औसतन विधवा पेंशन जैसा है- उसके तीन चौथाई से भी ज़्यादा पात्र बुढ़ापे की इस आर्थिक लाठी से वंचित हैं- 20 फ़ीसदी से भी कम पात्र इसका लाभ ले पा रहे हैं। विकलांग पेंशन का हाल ज़रूर थोड़ा बेहतर है। इससे वंचित पात्रों का औसत एक तिहाई से बस कुछ अधिक है।

पेंशन के अधिकार से वंचना सरकार और प्रशासन की असंवेदनशीलता की बड़ी गवाही है।  

आवास
लगभग तीन चौथाई परिवार आवास से वंचित हैं। इस मायने में इलाहाबद की बेहतर हालत है जहां कोई एक तिहाई परिवार ही इंदिरा या महामाया आवास से वंचित हैं। यह जानना दिलचस्प है कि जिन दो जिलों ने पेंशन के मामले में बाजी मारी, आवास के मामले में उनकी शून्य उपलब्धि है। इसमें उन्नाव भी शामिल है।

आंगनवाड़ी
पोषाहार के लाभ से इसकी पात्रता रखनेवाले बच्चों का तीन चौथाई से अधिक हिस्सा बाहर है। फ़तेहपुर और वाराणसी में यह आंकड़ा सौ फीसदी है। लेकिन हां, भदोही और जौनपुर में ज़रूर यह आंकड़ा शून्य है- सभी पात्र बच्चे इसका लाभ उठा रहे हैं।

जननी सुरक्षा
यह दुखद स्थिति है कि औसतन लगभग 59 फ़ीसदी परिवारों को जननी सुरक्षा के बारे में जानकारी नहीं। बाराबंकी इसमें सबसे आगे है जहां यह प्रतिशत सौ है। इसके बाद भदोही और कौशाम्बी का स्थान है जहां गैर जानकारी का प्रतिशत क्रमशः 96 और 86 है। केवल उन्नाव मंि सभी परिवारों को इसकी जानकारी है।

भूमि हक़दारी
भूमिहीन परिवार औसतन 68 फ़ीसदी हैं। उन्नाव में यह संख्या सौ फ़ीसदी है। इसके बाद बाराबंकी (96 फ़ीसदी), वाराणसी (87 फ़ीसदी), जौनपुर (84 फ़ीसदी), इलाहाबाद (75 फ़ीसदी) आते हैं। सबसे कम भूमिहीन परिवार कौशाम्बी हैं- कुल 38 फ़ीसदी।

पट्टे की ज़मीन पर क़ब्ज़े से वंचित परिवार औसतन 89 फ़ीसदी हैं- अधिकतम कुल 11 फ़ीसदी परिवारों का पट्टे की ज़मीन पर क़ब्ज़ा है। इलाहाबाद में यह स्थित सबसे बुरी है जहां सभी पट्टेदार ज़मीन पर क़ब्ज़ा हासिल नहीं कर सके हैं। इसके बाद कौशाम्बी (92 फ़ीसदी) और बाराबंकी (86 फ़ीसदी) आते हैं। लेकिन हां, पांच जिलों (फ़तेहपुर, भदोही, जौनपुर, उन्नाव और वाराणसी) में पट्टेदारों का ज़रूर सौ फ़ीसदी क़ब्ज़ा है।

शिक्षा
निरक्षर व्यक्तियों का औसत 71 फ़ीसदी से ऊपर है। सबसे बेहतर हालत में फ़तेहपुर है जहां निरक्षरता केवल 43 फ़ीसदी है। प्राथमिक शिक्षा औसतन 15 फ़ीसदी से कम है। ज़ाहिर है कि अगली शिक्षा घटते क्रम में है। 12वीं तक पहुंचते-पहुंचते यह प्रतिशत एक से भी कम है और जो आगे की शिक्षा के मामले में न्यूनतम 16 गुना और कम है। इसलिए कि शिक्षण संस्थानों की उपलब्धता और उनकी गुणवत्ता बहुत कम है।

आजीविका
लगभग 96 फ़ीसदी परिवारों का आजीविका का स्रोत मज़दूरी है। एक प्रतिशत से भी कम परिवार खेती पर निर्भर हैं। इससे पता चलता है कि भूमिहीनता की स्थिति कितनी विकट है। ढाई फ़ीसदी परिवार नौकरी पर निर्भर हैं तो डेढ़ फ़ीसदी परिवार व्यवसाय पर।

पेयजल
लगभग 8.5 फ़ीसदी परिवारों के पास निजी हैंडपंप हैं जबकि लगभग 85 फ़ीसदी परिवार पीने के पानी के लिए सार्वजनिक हैंडपंपों पर निर्भर हैं। कुंओं पर निर्भरता का प्रतिशत पांच से भी कम है। दूसरे साधन मुश्क़िल से दो फ़ीसदी हैं।


पैरवी के बिंदु
  • मुसहर, मुस्लिम, नट, कंजड, फकीर, कंकाली, हेला आदि अतिवंचित जातियों को अनुसूचित जन जातियों में शामिल किया जाये।
  • अतिवंचित समुदायों के पट्टेदारों को जमीन पर कब्जा एवं भूमिहीन परिवारों को जमीन का पट्टा दिया जाये। प्राथमिकता के आधार पर उनके बीच तालाब, कृषि भूमि एवं अन्य ग्रामीण प्राकृतिक संसाधनों का व्यावसायिक आवंटन किया जाये।
  • अतिवंचित समुदायों एवं महिलाओं पर बढते अत्याचारों पर रोक लगायी जाये।
  • अतिवंचित समुदायों के लोगों पर लगे फर्जी मुकदमें वापस लिये जायें एवं उन मामलों की उच्च स्तरीय जांच करायी जाये तथा दोषियों के खिलाफ संवैधानिक अवमानना का वाद दाखिल किया जाय।
  • मनरेगा का पारदर्शी एवं जवाबदेह क्रियान्वयन सुनिश्चित कराया जाये। सौ दिन काम के बजाय तीन सौ दिन काम की गारंटी, न्यूनतम मजदूरी 175 रुपये तथा काम का अधिकार परिवार के बजाय हर बालिग को हो।
  • असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए ठोस कानून बनाया जाये तथा न्यूनतम मजदूरी कानून को सख्ती से लागू किया जाये।
  • अतिवंचित समुदायों के सभी परिवारों को आवास की सुविधा मुहैया करायी जाय।
  • उन तक गुणवत्तापरक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करायी जाये।
  • उनकी प्रत्येक बस्ती में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र खोले जायें।
  • उनके लिए आंगनबाडी तथा उनसे मिलने वाली सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करायी जाये।
  • उनकी बसाहटों में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करायी जाये।
  • सभी पात्रों को विधवा, वृद्धावस्था एवं विकलांग पेंशन प्रदान की जाये। मंहगाई के सापेक्ष पेंशन की राशि बढ़ायी जाये।

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