बिकाऊ नहीं है हमारी धरती! एडीबी भारत छोड़ो! एशिया छोड़ो!

हम, जन आंदोलनों, जन संगठनों, संघर्ष समूहों, ट्रेड यूनियनों, सामुदायिक संगठनों के लोग और भारत व एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कई अन्य लोग दिल्ली, से सटे ग्रेटर नोएडा में 2 से 5 मई 2013 के बीच होने जा रही एशियाई विकास बैंक (एडीबी) के बोर्ड ऑफ गवर्नर की 46वीं सालाना आम बैठक(एजीएम) के विरोध का आह्वान करते हैं। इस एजीएम में एशिया-प्रशांत क्षेत्र के विकास से जुड़े प्रमुख मसलों पर वे फैसले लिए जाएंगे जो हम सभी को तत्काल और भविष्य में भी प्रभावित करेंगे। एडीबी के भीतर और ‘इस क्षेत्र में उभरती हुई ताकत’ के रूप में सराहा जाने वाला भारत तीसरी बार इस बैठक की मेजबानी कर रहा है ताकि वह एडीबी द्वारा सामने रखे गए ‘सशक्तीाकरण के रास्ते विकास’ के मॉडल को प्रदर्शित और अभिपुष्ट् कर सके।
बिकाऊ नहीं है हमारी धरती! एडीबी भारत छोड़ो! एशिया छोड़ो!
 2 से 5 मई 2013
दिल्ली, से सटे ग्रेटर नोएडा के वाईएमसिए में
अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें:
रमेश शर्मा : 9818111562
दरअसल पिछले कुछ वर्षों से भारत का सत्ताधारी तबका एडीबी के साथ मिलकर करोड़ों गरीबों, हाशिये पर रह रहे लोगों और समाज के अन्य बदहाल वर्गों की कीमत पर परस्पर हित साधने की साजिशों में लगातार संलिप्त है। 

एडीबी की कुख्यााति वास्तव में एक “मानवरोधी विनाशकारी बैंक” के रूप में है जिसकी विनाशकारी गतिविधियां सिर्फ भारत में सीमित नहीं, बल्कि समूचे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तथा वैश्विक स्तंर पर विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और वैश्विक पूंजीवाद की अन्य प्रतिनिधि संस्थाओं के साथ मिलकर की जाने वाली कार्रवाइयों से स्पष्ट हैं। इसी तरह हमारा प्रतिरोध भी सिर्फ एडीबी तक सीमित नहीं है बल्कि उन तमाम अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थासनों (आईएफआई) के खिलाफ है जिनका बुनियादी अभियान इस धरती की कुदरती, इंसानी और सामाजिक संपदा को लूट के माल में तब्दी्ल कर देने और इस तरह राष्ट्रों को कर्ज व राजनीतिक गुलामी में जबरन धकेल देने के लिए है।

“विकास” के लिए वित्त प्रदान करने वाले एक स्वयंभू संस्थान के तौर पर एडीबी इस क्षेत्र में गरीबी से लड़ने का दावा करता है, लेकिन गरीबी कम करने की उसकी रणनीति वह आड़ है जिसके बहाने वह निजीकरण, प्राकृतिक संसाधनों और बिजली, पानी, शिक्षा इत्यादि जैसी बुनियादी जरूरतों के वस्तुकरण व वित्तीयकरण से संचालित तीव्र आर्थिक विकास के अप्रासंगिक मॉडल को लागू करता है। “सुशासन” के आवरण में एडीबी मुनाफाखोरी, गैर-जवाबदेह और अपारदर्शी निजी क्षेत्र को समर्थन देता है। बैंक का दीर्घावधि रणनीतिक ढांचा (स्ट्रेटजी 2020) गरीबों व मध्यववर्ग से उसकी संपदा, साधन और क्षमताएं छीन कर संपन्न और उच्चकवर्ग को हस्तांातरित करने का एक नुस्खा है। “समावेशी वृद्धि”, “पर्यावरणीय सातत्या” और “क्षेत्रीय एकीकरण” जैसे बड़बोले नारों का इस्तेमाल करने वाली स्ट्रेटजी 2020 निजी क्षेत्र के विकास पर केंद्रित है और यह एडीबी और लेनदार के बीच विनिमय संबंधी प्रक्रियाओं में घोषित तौर पर निजी क्षेत्र की पैरोकारी करती है। बैंक ने 2011 में निजी क्षेत्र को वित्तपोषित करने पर करीब छह अरब डॉलर की रकम खर्च की थी। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि भारत में अरबपतियों की संख्या जो नब्बे के दशक के मध्य में कुल दो अरब डॉलर की संपत्ति के साथ सिर्फ दो थी, वह 2012 में 46 हो गई है जिनकी कुल संपत्ति 176 अरब डॉलर है!

एशिया-प्रशांत में करीब 350 परियोजनाओं के लिए (कर्ज, अनुदान, इक्विटी निवेश और तकनीकी सहयोग) कुल 22 अरब डॉलर के सालाना वित्तीय निवेश के साथ ही यहां की सरकारों ने एडीबी को इस क्षेत्र के विकास की रूपरेखा खींचने का एक जनादेश दे डाला है। पर्यावरणीय और जलवायु संबंधी संकट को संबोधित करने व गरीबी को दूर करने के नाम पर एडीबी लगातार बड़ी संख्या में लोगों को उनकी जमीनों, घरों, जल संसाधनों और जंगलों से विस्थाापित और अलग करता जा रहा है तथा निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी, नागरिकता व आजीविका के अधिकारों का इस तरह उल्लंघन कर रहा है।

एडीबी एजीएम के खिलाफ एकजुट हों

उधार हमारी सरकारें लेती हैं जबकि उसे चुकाने का बोझ राजकोष और देश की जनता के कंधों पर आ जाता है, जिसे बाद में आगे की पीढ़ियों और पर्यावरण के सिर पर डाल दिया जाता है। कर्ज भुगतान के चलते पहले से ही कमजोर विदेशी मुद्रा भंडार और बदतर होता जाता है तथा राष्ट्रीय राजस्व शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, जल, स्वच्छता, बिजली और रोजगार सृजन जैसे अनिवार्य सार्वजनिक कल्याण के कामों पर खर्च होने के बजाय अवैध कर्ज के पहाड़ से निपटने में खर्च हो जाता है।

पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व पूर्वोत्तर के राज्यों में एडीबी द्वारा अनुदानित परियोजनाओं के खिलाफ काम कर रहे संघर्षों, आंदोलनों और अभियानों के लिए यह उपयुक्तत अवसर है कि वे भारत सरकार और एडीबी के उस गठजोड़ का परदाफाश करें जो धन संपदा, संसाधन और क्षमताओं को आर्थिक-राजनीतिक संपन्नत प्रभुवर्ग के हाथों में केंद्रित कर रहा है। इन राज्यों में नाभिकीय ऊर्जा, जल और जमीन की लूट, विस्थापन, जनविरोधी कानूनों, किसानों की खुदकुशी व पर्यावरणीय विनाश को रोकने वाले उत्साही संघर्षों के समर्थक हम लोग यह अपील जारी कर के एडीबी के विषमतामूलक, अनुपयुक्त  और जनविरोधी विकास संबंधी नुस्खांे को चुनौती देते हैं।

दिल्ली में हो रहा एडीबी का एजीएम हमारे लिए एक बहुप्रतीक्षित अवसर है कि हम एकजुट होकर एडीबी और अपनी सरकारों द्वारा प्रचारित विकास के विनाशकारी मॉडल का परदाफाश करें। हम आप सभी को आमंत्रित करते हैं कि आप भी एडीबी जैसी उन तमाम संस्थाओं के खिलाफ विरोध के स्वर में अपनी आवाज मिलाएं, जो हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट कर रही हैं, समाज पर अघोषित हिंसा बरपा रही हैं तथा हमारी जनता को लगातार वंचित करते हुए हाशिये की ओर धकेल रही हैं।

अंतरराष्ट्री य वित्तीय संस्थासनों (आईएफआई) के खिलाफ जन मोर्चा
भारत
आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच(झारखंड), ऑल इंडिया फोरम आफ फोरेस्ट मूवमेंट (एआइएफएफएम), ऑल इंडिया यूनियन आफ फोरेस्ट वर्किंग पीपुल (एआइयूएफडब्ल्यूपी/एनएफएफपीएफडब्ल्यू), अनबलयम-पांडिचेरी, आंध्राप्रदेष मुस्लिम आर्गेनाइजेसन, एसोसियेसन फार प्रोटेक्षन ऑफ डेमोक्रेटिक राइटस, बारक हयूमन राइटस प्रोटेक्षन कमेटी-बीएचआरपीसी (मणिपुर), बिहार स्ट्रीट वेन्डरस हॉर्कस फेडरेषन, बंगियो पारोमपरिक कारू ओ बस्त्रा षिल्पी संघ (वेस्ट बंगाल), विहेवरियल र्साइंस सेंटर (अहमदाबाद), भारत जन विज्ञान जथ्था, भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू), केंपेन फॉर इलेक्टोरल रिफॉरम इन इंडिया (सीईआरआइ), कासा-एक्ट, सेन्टर फॉर आर्गेनाईजेषन रिसर्च एंड एजूकेषन (सीओआरई)-मणिपुर, सेंटर फॉर रिसर्च एंड एडवोकेसी (मणिपुर), छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (मजदूर कार्यकर्ता कमेटी)-भिलाई-छत्तीसगढ़, सिटिजन फोरम ऑन मेंगलौर डेवलेपमेंट, कॉटेकस्ट इंडिया-बंगलौर, फोरम फॉर इंडिजीनियस परस्पेक्टिव एंड एक्षन (मणिपुर), ग्लोबल हयूमन राईटस काम्यूनिकेषनस, जीएम फ्री बिहार मूवमेंट, हलदिया डोक काम्पलेक्स कॉंट्रेक्टर्स श्रमिक यूनियन, हिमालय नीति अभियान, इंडिया एफडीआई वॉच, इंडियन सोषल एक्षन फोरम (इंसाफ), इंडियन ऑयल पेतरोनस कॉंट्रेक्टर्स श्रमिक यूनियन, जनपहल काबनी- दि अॅदर डाईरेक्सन, खुदाई खिदमदगार, किसान मंच, किसान संघर्स समिति, केएसएमटीएफ -केरल फिसवर्कर्स फोरम, लोकषक्ति अभियान, मंथन अध्यन केंद्र, माइन्स, मिनरल एंड पीपुल (एमएमपी), नदी घाटी मोर्चा, नेषनल फिसवर्कर्स फोरम, नेषनल हॉकर्स फेडरेषन, न्यू सोषलिस्ट अल्टरनेटिव (सीडब्ल्यूआइ-इंडिया), पष्चिम बंगा खेत मजदूर समिति, पलाचिमाडा सॉलिडेरिटी कमेटी, पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति (पीपीएसएस), रेडिकल सोषलिस्ट, रीवर बेसिन फ्रेंडस, साउथ एषिया नेटवर्क ऑन डेम्स, रीवर्स एंड पीपुल (सेड्रेंप), सुंदरबन बनाधिकार संग्राम कमेटी, तमिल सॉलिडेरिटि और अन्य
एशिया/अंतर्राष्ट्रीय
अल्टरनेटिव एषिया, एषिया यूरोप पीपुल्स फोरम, एषिया-पेसिफिक मूवमेंट ऑन डेट एंड डेवलेपमेंट (जुबलि साउथ), बर्मा संेटर दिल्ली, सीएडीटीएम इंटरनेषनल नेटवर्क, यूरोप सॉलिडेयर सेन्स फ्रेंटियर (इएसएसएफ, फ्रांस), फोक्स ऑन दि ग्लोबल साउथ, जीएआईए, माइग्रेंट फोरम इन एषिया (एमएफए), सोषलिस्ट अल्टरनेटिव (आस्ट्रेलिया), साउथ एषियन एलायंस फॉर पावर्टी इरेडिकेषन (एसएएपीई)
एशियन देश
बंगलादेश: बंगलादेश कृषक फेडरेशन, सीपीबी (एम-एल), इक्विटी हयूमेनिटि वॉच, इनिषिएटिव फॉर राइट व्यू-आइआरवी, नबोधारा, ऑनलाइन नोलेज सोसाइटी, पार्टिसिपेटरी रिसर्च एक्षन नेटवर्क-पीआरएएन, वॉयस
इंडोनेषियाः सॉलिडेरिटास पेरेमपॉन
नेपालः ऑल नेपाल पिसेंटस फेडरेषन (एएनपीएफए) ऑल नेपाल वूमेंस एसोसिएषन (एएनडब्ल्यूए), फोरम फॉर दि प्रोटेक्षन ऑफ पब्लिक इंटरेस्ट
पाकिस्तानः अवामी वर्कर्स पार्टी, मॉज  डेवलेपमेंट फांउडेशन, पाकिस्तान फिसरफॉक फोरम, उमीदनाओ सिटिजन काम्यूनिटी बोर्ड
फिलिपींसः एएमए-एनिबन एनजी एमजीए मंग्गागवा एसए एग्रिकुलतरा (यूनियन ऑफ एग्रिकल्चर वर्कर्स)
श्रीलंकाः सेंटर फॉर एनवायरमेंटल जस्टिस/फ्रेंडस ऑफ दि अर्थ, फेडरेषन ऑफ मीडिया इम्लाईज ट्रेड युनियनस, फ्री ट्रेड यूनियन सेंटर, यूनाइटड सोशलिस्ट पार्टी
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