मंत्री जी, देश की वनभूमि पर कारपोरेट का जंगलराज कायम हो गया है !

देश आज उस मुहाने पर खड़ा है जहां या तो जंगल बचाने वाले आदिवासी बचेंगे, या जंगलराज लाने वाले कारपोरेट. देश का क़ानून और संविधान कारपोरेट हितों का अभयारण्य बन गया है. वनभूमि-हस्तांतरण को रोकने के लिए 2006 में क़ानून तो बना, लेकिन जब इसे लागू करने के लिए ज़रूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति कंपनियों के आगे घुटने टेक देती हो तो हिमाचल हो या ओडीसा, छत्तीसगढ़ हो या झारखंड, जंगल की ज़मीन कब तक बच पाएगी? दिल्ली की प्यास बुझाने के लिए रेणुका बाँध हिमाचल की ज़िंदगियाँ तबाह करने पर आमादा है तो पोस्को में वनभूमि के कब्जे के लिए सरकार ने दस पलटनें लगा रखी हैं. जंगल और इंसान के हकों के लिए दशकों से जूझ रहे समूहों ने यह गुहार केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री से की है.

संघर्ष संवाद आपसे यह चिट्ठी इस उम्मीद से शाया कर रहा कि क़ानून और राजनीति के बियावान में आम लोगों की बात मजबूत हो:


सेवा में,
सुश्री जयंती नटराजन,
केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मन्त्री,
भारत सरकार।
विषयः- देश भर में वन अधिकार कानून - 2006 की अवहेलना कर के गैर कानूनी तरीके से वन हस्तांतरण पर रोक व कार्यवाही करने की बाबत .
मंत्री जी,
देश भर में वनाधिकार कानून - 2006 की अवहेलना कर के गैर कानूनी तरीके से राज्य सरकारें विभिन्न तथाकथित विकास परियोजनाओं  के लिए वन हस्तांतरण करती जा रही हैं। समय-समय पर इस तरह की अवहेलनाएं देश भर में होती रही हैं, जिस पर आदिवासी मंत्रालय ने गंम्भीर आपत्ति भी उठाई है और इस पर दिशा निर्देश व स्पष्टीकरण पत्र जारी किया।  हाल ही में ओडीसा के नियमगिरी के मामले में माननीय उच्चतम न्यायलय ने प्रस्थापना दी है कि वनाधिकार देने की शक्ति केवल ग्राम सभा के पास है जबकि दूसरी कमेटियों की भूमिका केवल शिकायत निवारण की है, इस पर भारत सरकार अपना मत दे।
हाल ही में आदिवासी मंत्री ने आपको पत्र लिख कर अपनी चिन्ता जाहिर की है। राज्य सरकारें तथा दूसरी संस्थांए भी इस कानून की अवहेलना कर के अपने कार्य कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर हिमाचल विद्युत निगम ने रेणुका बांध परियोजना के लिए ग्राम सभाओं से अन्नापत्ति प्रमाण पत्र व अपने वनाधिकार निगम को हस्तांतरित करने का प्रस्ताव पारित करने का छपा फार्म 25 ग्राम सभाओं में बांटा व 2 अक्तूबर 2012 की ग्राम सभा बैठक में पारित करने का दवाव डाला और प्रलोभन भी दिया जबकि वन अधिकार कानून के तहत वन आधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया अभी हिमाचल में अन्य वन निवासियों के लिए शुरु भी नहीं हुई है। हिमाचल सरकार ने 27-03-2012 को प़त्र जारी करके मंडल, जिला व राज्य कमेटियों को गठित करने का आदेश दिया है। निगम ने अपने आप फार्म डा्रफट करके खाली फार्म ग्राम सभाओं को भेजा। जिलाधीष सिरमौर ने झूठा सर्टीफिकेट दिनांक 12-03-2012 को जारी किया जिसमें दावा किया गया कि रेणुका बांध क्षेत्र में वन अधिकार इस कानून के तहत निस्तारित कर दिए गए हैं।
मामला यह नहीं है कि प्रस्ताव विरोध या हक में पारित हों। असल मसला तो प्रक्रिया का है कि इस तरह वन अधिकार क्या निगम को हस्तांतरित हो सकते हैं। जबकि कानून कि हिसाब से यह प्रस्ताव की प्रक्रिया ही अवैध है। इसी तरह जिलाधीष द्वारा जारी किया गया झूठा प्रमाण पत्र संवैधानिक अवहेलना के दायरे में आता है। सच्चाई यह है कि रेणुका बांध के लिए फॉरेस्ट क्लीयरेंस वन और पर्यावरण मंत्रालय से अभी तक नहीं मिल पाई है।  हिमाचल विद्युत निगम व प्रदेश सरकार इस तरह के झूठे कागजात व प्रमाण पत्र इक्ट्ठे करके वन मंजूरी हासिल करना चाहते हैं।
इस तरह के मामले पूरे देश में घटित हो रहे हैं। बहुत से वन आश्रित समुदायों को उनके संवैधानिक वन अधिकारों से वंचित किया जाता रहा है। इस समस्या पर गंभीरता से विचार होना चाहिए और इसके लिए कोई व्यवस्थित प्रावधान होने चाहिए। परियोजनाओं के मालिक व राज्य सरकारें वन भूमि का इस तरह के गलत तरीके से हस्तांतरित कर रही हैं। इस तरह  वन निवासियों के लिए वन अधिकार का कोई अर्थ ही न रह जाएगा। इसे रोकने के लिए आपके मंत्रालय ने दिशा र्निदेश जारी किए हैं।
झूठे प्रमाणपत्र और ग्राम सभाओं से अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल करने की प्रक्रिया अवैध है जो वन अधिकार कानून 2006 की धारा 7 के तहत दंडनीय अपराध है। इसलिए हम आपसे मांग कर रहे हैं कि उन तमाम अधिकारियों को वन अधिकार कानून के तहत वन अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया में अवरोध डालने पर उक्त कानून की धारा 7 के तहत सजा दी जाए।
गुमान सिंह
संयोजक हिमालय नीति अभियान
गांव खुंदन डाक बंजार जिला कुल्लू, हिमाचल प्रदेष 175123 मोबाइल 09418277120
आर श्रीधर
अध्यक्ष माइंस मिनरल्स  एंड पीपल
चितरंजन सिंह
महासचिव इंसाफ, नई दिल्ली
अशोक चौधरी
महासचिव राष्टीय वन श्रमजीवी मंच

पूरन चंद
सचिव आजीविका बचाओ संघर्ष समिति रेणुका







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