दिल्ली की प्यास बनी हिमाचल की त्रास

दिल्ली के निवासियों को ज़िंदा रखने की कीमत हिमाचल के लोग अपनी आजीविका के विनाश और रेणुका बाँध परियोजना के दुष्प्रभावों के रूप में चुकाने पर मजबूर हैं. क्या दिल्ली की प्यास हज़ारों लोगों को बेघर और बेबस कर ही बुझेगी?

रेणुका बांध परियोजना गिरी नदी पर 148 मीटर ऊँचा 26 किमी लंबी झील लगभग 2100 हैक्टेयर जमीन लगभग 1142 परिवार तथा 70 पंचायतों से भी अधिक लोग प्रभावित होंगे, जिसमें ददाहू से खड़कोली के बीच की दूरी 12 किमी बढ़ जाएगी। जिसके कारण बस रूट प्रतिवर्ष लगभग 2 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष प्रभावित लोगों को देने पड़ेंगे, इसके अलावा उपभोक्ता वाली वस्तुएं तथा यातायात के साधन का खर्चा अलग से पड़ेगा। पर्यावरण का इतना बड़ा नुकसान होगा जिसमें लगभग 15 लाख से भी अधिक पेड़ कटेंगे, इसके अलावा वातावरण में बदलाव, भूमि का धसना, धुंध छा जाना, अकस्मात् बादल फटने जेसी घटनाएं, भूकंपीय दृष्टि से उत्तरी भारत पहले ही वैज्ञानिक दृष्टि से असंवेदनशील घोषित है व मीथेन जैसी गैसें खड़े पानी से निकलेंगी, नदी के बहाव बन्द कोने से रेत, बजरी नहीं मिलेगी।
2100 हैक्टेयर में रहने वाले जंगली जानवर पीछे बचे किसानों की जमीनों का क्या हाल करेंगे? उत्तरी भारत के आस्था का प्रतीक मां रेणुका झील क्या सुरक्षित रह पाएगी। मुख्य सचिव हिमाचल प्रदेश रेणुका जी आकर यहां की भौगोलिक परिस्थिति को देखते हुए उन्होंने पर्यावरण दृष्टि से इस बांध का विरोध किया है। यदि यह बांध बना तो क्षेत्र के लोगों को बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा। केवल 40 मेगावाट बिजली के लिए इतना बड़ा विस्थापन तर्क संगत नहीं है।

राज्य के मुख्य सचिव सुद्वत्तो राय ने प्रेस में कहा कि राजधानी दिल्ली में पीने के पानी की जरूरत को पूरा किया जाना है यदि दिल्ली को पानी चाहिए तो इस बांध का पूरापैकेज हिमाचल सरकार को देना होगा ताकि हिमाचल का प्रर्यावरण व भाखड़ा, पाँग बांध जैसे विस्थापितों की भांति रेणुका बांध के लोगों का यह हाल नहीं होने दूंगा। आजीविका बचाओ समिति सुद्वत्तो राय जी का समर्थन करती है और बांध का विरोध करती है। इसके बाद भी यदि बांध बनता है तो निम्नलिखित मांगें मानी जायें-

  • जमीन के रेट क्रमशः सिंचित 30 लाख रु. प्रति बीघा असिंचित 25 लाख रु. प्रति बीघा, बंजर जदीद, बंजर कदीम 20 लाख, न काबिल जंगल झाड़ी 15 लाख रु. बीघा दिया जाए। हिमाचल प्रदेशे के अन्य बांधों में रेट दिया गया तो हमारे साथ भेदभाव क्यों।
  • जिनकी हल चलती जमीन डूब क्षेत्र में आ रही है। पीछे 5 बीघा जंगल झाड़ी बचती है व उसे भूमिहीन तथा घर भी बच जाते हैं, उन्हें घर रहित माना जाना चाहिए। आर. एण्ड आर. को वर्तमान स्थति के अनुसार बदला जाये।
  • जब तक हमारी जमीन में पानी नहीं आता हमारा उसमें कास्त करने का अधिकार बरकरार रहना चाहिए ताकि हमारी आजीविका चलती रहे।
  • प्रति परिवार को 2 हैक्टेयर जमीन दी जाए जिसमें एक हैक्टेयर हल चलती सिंचित जमीन व एक हैक्टेयर धसनी, जंगल झाड़ी वाली हो।
  • पंचायत परिवार रजिस्टर को आधार मान कर विस्थापितों का पुनर्वास किया जाए।
  • प्रति परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए।
  • रेणुका बांध विस्थापितों को 5 मेगावाट बिजली की हिस्सेदारी उनको उनकी जमीन के आधार पर सदा के लिए मिलती रहे।
  • विस्थापितों का पुनर्स्थापन जिस स्थिति में रह रहे हैं उससे बेहतर स्थिति में किया जाए। देश दुनिया में हर क्षेत्र में मूल्य बढ़ रहे हैं। परन्तु एच.पी.पी.सी.एलदृ लोगों की जमीनों के मूल्य व पुनर्स्थापन के पैकेज को क्यों नहीं बढ़ाता हैं
  • पेड़ों की गिनतीसही ढंग से की जाए फलदार पेड़ों के रेट 2000-2001 की दर से दिए जा रहे हैं। इसे नए 2012 की दर से जोड़ा जाए। पेड़ों की गिनती सेंटीमीटर से ऊपर के पौधों की जा रही है। छोटे पौधों की गिनती भी की जाए, बाकी पेड़ों के रेट कम क्यों किए जा रहे हैं। इसे बढ़ा कर दें।
  • के.एन.डी.सीदृ मर्ग की दूरी कम करने के लिए मोहतू से बस योग्य पूल का आश्वासन दिया था। अब उस पुल को बस योग्य बनाया जाए, नहीं तो बांध की उंचाइ्र कम की जाये जिससे 70 पंचायतें रोड़ प्रभावित होने से भी बचेंगी जिससे रोड़ भी बचेगा और लोगों की हजारों बीघा जमीन भी बचेगी।
  • माँ रेणुका जी झील मंदिरों, आश्रमों व स्थान पर किसी भी प्रकार का खतरा नहीं होना चाहिए, ताकि हमारी आस्थाओं व प्राचीन धार्मिक मेले हमेशा की तरह चलते रहें।
  • वन अधिनियम 2006 के तहत हमारे वनो पर अधिकार बरकरार रहने चाहिए। जैसे बांध से उठाऊ सिंचाइ्र व पेयजल योजना के तहत संगडाह, सैन-धार, धाटी-धार व प्रभावित पंचायतों को पूरा अधिकार मिलना चाहिए।
  • डैम के निले क्षेत्रों के लोगों को पूर्ण सुरक्षा के अधिकार दिए जाने चाहिए।
  • हमारे ऊपर बहुत बड़ा संकट आया है हम अपने घर वार को छोड़ कर कहां जाना है, उसका कोई पता नहीं। सामाजिक व पर्यावरण आंकलन भी नहीं हुआ है। एचपीपीसीएल हर कार्य तुक्के में चला रही है। इस प्रकार का अन्याय लोगों पर न हो।
  • जिन लोगों की जमीन मौके पर सिंचित है पटवार रजिस्टर रिकॉड्र में असिंचित है या सिंचित को बंजर, ऊबड़ आदि रिकॉर्ड मे लिखा है लोगों के रिकॉर्ड ठीक किए जायें।
  • लोगों पर धारा 17-4 लागाई गई जिसके कारण लोगों को नहीं सुना जा रहा है। लोगों के सेक्शन 9 की करवाई के समय जो लोगों की स्थिति है उस समय का लेखा-जोखा पंचायत व पटवार रिकॉर्ड के अनुसार मान्य होना चाहिए।
  • एचपीपीसीएल इस बांध में अंगेजों वाली नीति अपना रही है,लोगों में फूट डालो व राज करो यह नहीं होना चाहिए। यदि किसी भी प्रकार की घटना समिति के कार्यकर्ता/विस्थापितों के साथ होगी उसका उत्तरदायी एचपीपीसीएल व इनसे जुड़े भू-माफिया होंगे।
  • बांध का कार्य जबतक शुरू नहीं होना चाहिए जब तक लोगों की मांगों का समाधान नहीं होता।
भारत सरकार, हिमाचल प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन को लोगों की आजीविका के प्रति जवाबदेह बनाना होगा. यह बांध राष्ट्रहित के नाम पर बनाया जा रहा है। जल, जंगल, जमीन, घर उजड़ने वाले लोग भी इसी राष्ट्र के हैं। भारतीय सभ्यता के अनुसार राष्ट्रहित में उजड़ने वाले लोगों को तो मांगों का मौका ही नहीं दिया जाना चाहिए था। राष्ट्रहित में जो लोग उजड़ रहे हैं उनका वर्तमान तरीके से सामाजिक आंकलन कर पुनर्स्थापन करना ही राष्ट्रहित है।









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