आप आंदोलन में हैं, तो व्यक्तिगत मुकदमों के लिए तैयार रहें : दयामनी बारला

जेल से छूटने के बाद दयामनी बारला से आज दिल्ली में मुलाकात हुई. कारपोरेट-सरकारी गठजोड आज जिस शातिर तरीके से उन सबकी आवाज़ चुप कराने में लगा है जो अपने आस-पास लोकतंत्र और लोगों के हक को लेकर बोलते हैं, इसकी ताज़ा मिसाल हैं दयामनी बारला. डॉ. सुनीलम की रिहाई के लिए 12 जनवरी को मुलताई में हुई जन-सुनवाई से होकर आईं दयामनी जी ने देश भर में इस तरह कार्यकर्त्ताओं को मुकदमों में डालकर थकाने के चलन पर हमें आगाह किया. हम यह बातचीत आपसे साझा कर रहे हैं:

आपकी गिरफ्तारी देश भर में चल रहे जनांदोलनों के प्रति सरकार के रवैये को दर्शाता है. इस तरह लोगों की व्यक्तिगत रूप से फर्जी केसों में फैसाने से जनांदोलन कैसे निपटेगें?

आज हम देख रहे कि सरकारों के एजेण्डे में जनता से सरोकार रखने वाले सवाल खत्म हो रहे है. आज सरकारे जल-जंगल-जमीन, मानवाधिकार के सवाल, समुदायक अधिकार के सवालों को जनता के सवाल नहीं मानती है. सरकार के एजेण्डे में साफ है कि कैसे कोरपोरेट घरानों को लाभ पहुचाये. यही कारण है कि आज सरकार पुरे देश में जहाँ भी प्राकृतिक संसाधन है उन्हें कोरपोरेट घरानों को सोपने में लगी हुई है. इस लूट का जो भी विरोध कर रहा है उन पर तमाम तरह से हमले किये जा रहे है जैसे- व्यक्तिगत फर्जी कैस थोपना.


मैं इसे व्यक्तिगत केस नहीं कह सकती क्योंकि सरकार उस व्यक्ति के मध्यम से जनांदोलनों को यह चेतावनी देना चाहती है कि यदि आप ने भी हक-अधिकारों की बात की तो आप के साथ भी वैसा ही सुलक किया जायेगा. इसे मैं फिर से स्पष्ट कर देना चाहती हू कि यह व्यक्तिगत केस नहीं बल्कि सरकार का एक हथकंडा है जो समुदाय के हाथों से संसाधनों को छीन कर कोरपोरेट के हाथों में दे रहा है.

यह चलन आज देश के हर आंदोलनों को कुचलने के ओजार के रूम में दिख रहा है. चाहे वह कुडनकुलम हो, जेतापुर हो, नगड़ी हो या फिर देश का कोई भी जनांदोलन हो सभी जगह पर यह चक्र चल रहा है.

केंद्र सरकार, राज्य सरकार या फिर कोरपोरेट घरानों के इर्दगिर्द घुमने वाली ताकते हो. इन ताकतों का गठजोड़ विश्व घरानों की ताकतों के साथ है. इससे निपटने के लिये जरुरी है कि देश में जितने भी हक-अधिकारों, मानवाधिकार, पर्यावरण संरक्षण में लगे संगठनों और व्यक्तियों को एक मंच पर आना होगा तभी देश में एक सशक्त आदोलन खड़ा होगा और हम इन हालातों से निपट पायेगें.

राज्य और कारपोरेट के गठजोड़ के साथ ही अदालतों का शासकवर्गीय रुख भी सामने आया है. इससे जमीन पर चल रहे आंदोलनों पर क्या असर पड़ेगा ?

देखिये, इसका जनांदोलनों पर सीधा असर पड़ेगा. पहले राज सत्ता और कोरपोरेट जहां दुश्मन के रूप में दिख रहे थे वही आज न्यायालय का जो शासकवर्गीय चरित्र सामने आ रहा है. यह लोकतंत्र के लिय बहुत ही हानिकारक है.

इससे जनता के अधिकारों पर इन ताकतों का वर्चस्व बढ़ेगा, हक-अधिकार की बात करने वालों पर दमन बढ़ेगा और न्यायालय की कार्यवाही पर लोगों का भैरासा कम होता जायेगा.

जल-जंगल-जमीन के लिय चल रहे आंदोलनों के लिय आज सबसे बड़ी चुनोतियों क्या है ?

पहले केंद्र या राज्य सरकारों के विरोध में आंदोलन होते थे और हमें आंशिक सफलता भी मिल जया करती थी. जैसे- कोयलकारो, नेतरहाट फायरिंग रेज इतियादी. इन आंदोलनों में क्षेत्रीय जनता सीधा विरोध में खड़ा हो जाती थी परंतु आज आंदोलन में लगे लोगों को कोरपोरेट घराने सम, दाम, दंड, भेद के स्तर पर निपट रहे है. आज कोरपोरेट घरानों ने ग्रामीण क्षेत्रों में एक-एक व्यक्ति को पकड़ कर उन्हें व्यक्तियों में बाँट कर ग्रामीण क्षेत्रों में घुस रहे है. अब कम्पनी सीधे जमीन नहीं खरीद रही है बल्कि उनके दलाल टुकड़ों में जमीन खरीद रहे है. आज हम देख रहे है कि सामूहिक विरोध कि ताकत कमजोर हो रही है, कोरपोरेट घराने आज सरकारों के साथ समझोते कर रहे है कि सरकार जन कल्याणकारी की भूमिका अब कम्पनियों को दे दे, जहाँ कम्पनियों को जमीने चाहिये वहा पर एनजीओ उनकी मदद कर रहे है और नक्सलवाद के खात्मे के नाम पर गावों में आर्म फ़ोर्स भेजी जा रही जो नक्सलवाद के नाम पर आम लोगों का उत्पीड़िन कर रही है इससे ग्रामीण क्षेत्रों से लोग पलायन कर रहे है.

अभी देश में कोरपोरेट घरानों के विरोध में तो आंदोलन खड़े हो रहे है परंतु राज्य दमन के विरोध में सशक्त आंदोलन नहीं उठ रहा है.

आप झारखण्ड के वर्तमान आदिवासी आंदोलन को कैसे देखती है ?

लगातार आंदोलनों में सक्रिय रहते हुये जो अनुभव मुझे मिले है उनके आधार पर मैं कह सकती हू कि झारखण्ड भले ही आदिवासी बहुल क्षेत्र हो परंतु आज यहाँ पर प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिय जो आंदोलन जारी है उनमें सभी लोगों को शामिल होना होगा तभी हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचा पायेगें.
आदिवासी आंदोलन अकेले आज उस मुकाम तक पहुचने कि स्थिति में नहीं है. आज हम विभिन्नता में एकता की बात कर रहे है. हमने देखा है की राज्य में अब तक आठ आदिवासी मुख्यमंत्री बने परंतु उन्होंने कोरपोरेट की दलाली के अलावा कोई कदम नहीं उठाया.

आज सबसे ज्यादा इस बात की जरूरत है कि जो भी आदिवासी संगठन या आदिवासी मंच है उन्हें आपनी सोच के दायरे को बढ़ाना होगा तभी हम झारखण्ड के सपनों को साकार कर सकते है.

देश के हर जिले में आंदोलन चल रहे है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में कोई विकल्प नहीं दिखता. आप क्या सोचती है ?

देखिय, आज देश का राजनीतिक ढांचा जन मुद्दों पर आधारित नहीं रहा है. आज व्यक्तिगत फायदे के लिये राजनीति की जा रही है. पुरी चुनाव की प्रक्रिया भष्टाचार के खेल में चल रही है. ऐसी स्थिति में जनांदोलनों को एक विकल्प तलाशने की जरूरत है जो भारत की जनता के हक-अधिकारों का संरक्षण करें ताकि उनका जल-जंगल-जमीन पर हक कायम रह सके तभी भारत का असली विकास होगा.

आज देश में हजारों कम्पनियां निवेश के नाम पर आ गई है. इन कम्पनियों ने भारत के सविधान को ही कब्जे में ले लिया है. अब यह आवश्यक हो गया है कि एक ताकत बनाकर इनको टकर दी जाये.

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एक दूसरे के संघर्षों से सीखना और संवाद कायम करना आज के दौर में जनांदोलनों को एक सफल मुकाम तक पहुंचाने के लिए जरूरी है। आप अपने या अपने इलाके में चल रहे जनसंघर्षों की रिपोर्ट संघर्ष संवाद से sangharshsamvad@gmail.com पर साझा करें। के आंदोलन के बारे में जानकारियाँ मिलती रहें।