बेघरी की बेबसी बनाम सरकारी बेदिली

राजधानियों से बाक़ी शहरों के हाल का सुराग़ मिलता है। सब जानते हैं कि चमकते विकास के बरअक़्स नयी दिल्ली से लेकर रायपुर, भोपाल, जयपुर, पटना या कि लखनऊ तक पसरी हुई है बेघरी। ख़ास तौर पर सर्द रातों में उसका दर्द बयां करता मंज़र ख़ूब उजागर होता है। ज़ाहिर है कि उसमें बेघरों के प्रति सरकारी संगदिली भी नत्थी होती है और इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि सूबे में किसकी सरकार है। पेश है आदियोग की क़लम और कैमरे से इस दास्तान पर एक नज़र;

यह गठरी है या कोई लेटा है?
गोया कि यह सालाना रिवाज़ बन गया है कि ठंड कहर बरपा करती है, शोर मचता है और तब कहीं जा कर बेघरों के लिए अस्थाई रैन बसेरों और अलाव का बंदोबस्त किये जाने का सरकारी आदेश जारी होता है। और जिस तरह उस पर अमल होता है, वह महज़ रस्म अदायगी होता है, लूट का एक और मौक़ा हो जाता है। ठंड की विदाई के साथ ही बेघरी का मसला भी ठंडा पड़ जाता है। हालांकि बेघरी कोई मौसमी मसला नहीं हुआ करती कि गरमी में पिघल जाये। उसकी आह भाप बन कर अगली सर्दी तक के लिए कहीं उड़ नहीं जाया करती। उसकी मार तो हर मौसम में सताती है। बेघरी अगर सर्दी में ठिठुरती है तो गर्मी में लू के थपेड़ों से गुज़रती है और बारिश में लगातार भीगती है। बेघरी माने हर दिन दुश्वारियों से मुठभेड़- जितना बड़ा शहर, उतनी ही संगीन। 

तो फ़िलहाल, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ चलें और सरकारी बेदिली का दीदार करें। दिसंबर आते-आते सर्दी का मौसम उत्तर भारत के ग़रीबों और ख़ास कर बेघरों को डराने-धमकाने लगा था। लेकिन लखनऊ में अस्थाई रैन बसेरों और अलाव का इंतज़ाम किये जाने का सरकारी आदेश साल के आख़ीर में जारी हो सका। तब तक ठंड से होनेवाली मौतों का आंकड़ा सैकड़ा पार कर चुका था और रात का तापमान लुढ़क कर 2 डिग्री सेल्सियस के आसपास डोलने लगा था। यह बेघरों के लिए नये साल की ज़ालिमाना शुरूआत थी।

सीने में अगर धड़कता दिल है तो महसूस किया जा सकता है कि क़ुदरत की बेरहम ठंडी मार जिन मुफ़लिसों की आंख से नींद चुरा लेती है, उनके लिए ऐसी रात काटना किस क़दर क़यामत से गुज़रना होता है, कि पूरी रात करवटें बदलते रहने और बदन सिकोड़ कर हड्डी गलाती ठंड को चकमा देने की फिज़ूल क़वायद का नाम हो जाती है। गहराते कोहरे के दरमियान कैमरे में क़ैद किये गये इस मंज़र की तसवीरें जैसे पूछती हैं कि यह गठरी है या कोई लेटा है?  

 यह विधानसभा मार्ग है।
लेकिन हुक़्मरान तो ख़ैर चैन की नींद सोते हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा की 125 जयंती के मौक़े पर राजधानी लखनऊ में गुज़री 6 जनवरी से तीन दिवसीय आयोजन की शानदार शुरूआत होगी। इसे यादगार बनाने की तैयारी न जाने कब से पूरी गर्माहट और मुस्तैदी के साथ चली, बिना किसी कमी-कोताही के। इसे कहते हैं ऊंचे महलों में जम्हूरी निजाम का जश्न और फ़ुटपाथ पर मातम। लखनऊ का हालचाल गवाही है कि सूबे के दूसरे बड़े शहरों में फ़ुटपाथ की ज़िदगी जी रहे लोगों को सर्दी का निवाला बनने से बचाने के लिए पहले अगर ‘बहुजन हिताय’ का नगाड़ा पीटनेवाली तो अब पिछले नौ महीने से उत्तर प्रदेश को ‘उत्तम प्रदेश’ बनाने का नारा उछालनेवाली राज्य सरकार कितना और किस तरह मुस्तैद रही। इस मायने में हाथी और साइकिल सवार इकजैसे निकले।  

सरकार बहादुरों की मेहबानी से आलम यह है कि जन हित में जारी किये गये तमाम आदेश या तो काग़ज़ी दौड़भाग में उलझ कर ठहर जाते हैं या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। दिसंबर 2009 में देश की राजधानी में हुई बेघरों की मौत की ख़बरों के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया था कि लोगों को मौत से बचाने के लिए फ़ौरन ज़रूरी क़दम उठाये जायें। इस आदेश पर बस कहने भर को अमल हुआ। 2010 शुरू हुआ कि पीयूसीएल ने देश की सबसे बड़ी अदालत में गोहार लगायी। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने 27 जनवरी को दिल्ली सरकार समेत सभी राज्य सरकारों को दिशा निर्देश जारी किया कि दिसंबर 2010 तक स्थाई रैन बसेरे बना दिये जायें और जिसमें पीने के साफ़ पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य, सस्ते दरों पर राशन, सुरक्षा आदि की भी व्यवस्था हो। 

उत्तर प्रदेश सरकार ने मई 2010 को अदालत में अपना जवाब दाख़िल किया कि सूबे के पांच बड़े शहरों मेरठ, कानपुर, इलाहाबाद, आगरा और बनारस में आठ स्थाई रैन बसेरे चल रहे हैं। लेकिन यह दर्ज़ नहीं किया गया कि वे किस जगह पर हैं और किस हाल में हैं। मसलन, इलाहाबाद में संगम किनारे बाक़ायदा रैन बसेरा है लेकिन उस पर हमेशा साधुओं का डेरा रहता है। बताया गया कि तीन महानगरों में एक-एक स्थाई रैन बसेरा बनाये जाने का फ़ैसला हो चुका है। ज़मीन और धन की व्यवस्था होते ही उसे पूरा कर दिया जायेगा। यह अपनी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही से कन्नी काटने की ज़ुबान थी। वैसे, जिन्हें स्थाई रैन बसेरों के तौर पर पेश किया गया, वे तो असल में सामुदायिक केंद्र हैं और सभी जानते हैं कि उनका उपयोग सामुदायिक गतिविधियों के लिए नहीं, भाड़े पर उठाने के लिए किया जाता है। लखनऊ में नगर निगम के कम से कम 20 स्थाई रैन बसेरे हैं लेकिन उनका ज़िक्र अदालत को दिये गये सरकारी जवाब से नदारद रहा। 

ज़िक़्र हो भी तो कैसे? एक को छोड़ कर बाक़ी रैन बसेरे या तो शादी और माल बेचने की प्रदर्शनियों के लिए बुक हो जाते है या फ़िर उन पर अवैध कब्ज़े हैं। हद की बानगी देखें कि निशातगंज में लखनऊ-फ़ैज़ाबाद रोड पर बना एक रैन बसेरा अब रैन बसेरा कामप्लेक्स के नाम से जाना जाता है और फ़िलहाल दूकानों-गोदामों के काम आता है। दूसरा रैन बसेरा इंदिरानगर कालोनी के सेक्टर 16 में अमीरों के एक रिहायशी इलाक़े के बीच है और उसके बड़े हिस्से को सामुदायिक केंद्र का नाम दिया जा चुका है। इस बेहतरीन परिसर के बाहर लगा ‘आवश्यक सूचना’ का बोर्ड ही ख़ुलासा करता है कि यह जगह बेघरों की कोई पनाहगाह नहीं है। यह सूचना रैन बसेरे के ‘सम्मानित ग्राहकों’ के लिए है, उसके लाभार्थियों के लिए नहीं। वैसे, ब्याह के इस मौसम में यह रैन बसेरा अगली मार्च तक बुक है। चारबाग़ शहर का मुख्य रेलवे स्टेशन है और उसके नज़दीक बना रैन बसेरा केवल सर्दियों में खुलता है और जिसके दरवाज़े शाम ढलते ही बंद होने लगते हैं। 

विज्ञान फ़ाउंडेशन द्वारा की गयी गिनती के मुताबिक़ लखनऊ में कोई 18 हज़ार बेघरों का बसेरा है और उनके छह सौ बड़े ठिकाने हैं। उनकी रात ओस बरसाते आसमान के नीचे या बंद दूकानों के बाहर खुले गलियारों में गुज़रती है। बेघरी की यह तसवीर शहर की केवल अहम सड़कों की है। इसमें गली-मोहल्लों में पसरी बेघरी शामिल नहीं हैं। झुग्गी-झोपड़ियों की नरक जैसी झांकियां भी इससे बाहर हैं। 

ख़ैर, जनवरी शुरू हुई तब जिला प्रशासन ने अलाव समेत कोई तीन दर्ज़न अस्थाई रैन बसेरों का इंतज़ाम किया। लेकिन हक़ीक़त यह है कि रैन बसेरों के इर्द-गिर्द बसेरा डालनेवाले मेहनतकशों को इसकी ख़बर ही नहीं और अगर ख़बर है भी तो वे उसका इस्तेमाल करने से कतराते हैं। उन्हें यक़ीन नहीं होता कि यह सुविधा वाक़ई उनके लिए है। दूसरी बात यह कि चार दिन की चांदनी के चक्कर में वे मुश्किल से बनायी गयी अपनी जगह छोड़ना नहीं चाहते। उस पर किसी दूसरे बेघर के काबिज़ हो जाने का ख़तरा बना रहता है। उन्हें अपने से ज़्यादा अपने रिक्शे या ठेलिया की हिफ़ाज़त की चिंता होती है। और चार दिन की चांदनी भी कैसी? पतली चादर से बनायी गयी चारदीवारी की यह सुविधा भी तो बस लिफ़ाफ़ा होती है जो बदन चीरती ठंड से मामूली बचाव भी नहीं कर पाती। रही बात अलाव की तो लकड़ियां भी कम और वह भी गीली। कुल मिला कर हालत यह कि कहने को खड़े किये गये रैन बसेरे अमूमन वीरान हैं और वहां आवारा कुत्तों और छुट्टा जानवरों का डेरा है। कुछेक रैन बसेरे तो महज़ काग़ज़ों पर हैं।    

बेशक़, अस्थाई रैन बसेरे बेघरों की समस्या का हल नहीं हो सकते। 95 फ़ीसदी बेघर मेहनतकश हैं, फ़क़ीर या निराश्रित नहीं। वे अपनी मेहनत का सौदा करते हैं, गरिमा का नहीं। सोचना चाहिए कि उन्हें सर पर छत की ज़रूरत केवल सर्दियों में ही नहीं, गर्मी और बरसात में भी होती है। बेघरी से उन्हें सही मायने में तभी निजात मिल सकती है अगर ज़रूरी सहूलियतों के साथ स्थाई रैन बसेरे उनके सामने हों और पूरे साल के लिए हों। ऐसा न होना गरिमा के साथ उनके जीने के अधिकार के साथ बेहूदा मज़ाक़ है, कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के साथ खुली धोखाधड़ी है। संविधान ने देश के सभी नागरिकों को जीने का अधिकार दिया है। शहरी बेघर भी इस देश के नागरिक हैं और उन्हें भी जीने का अधिकार है। इसकी सुरक्षा और सम्मान की गारंटी राज्य का दायित्व है। इसके लिए सरकारों की घेराबंदी होनी चाहिए कि कम से कम हर बड़े शहर में सालों साल चलनेवाले स्थाई रैन बसेरों की व्यवस्था हो और जहां बिजली, पानी और शौचालय से लेकर स्वास्थ्य और सस्ते राशन तक की सहूलियत हो। लेकिन फ़िलहाल यह संकट की घड़ी है जहां यह सवाल बाद के हैं। पहला सवाल, जैसे भी हो, लोगों को बचाये जाने का है और इस मोर्चे से सरकारी अमला लगभग ग़ायब है।      

यह इस दौर की उलटबांसी है कि शहरी बेघर शहरों के लिए जितना ज़रूरी हैं, उतना ही बड़ा बोझ भी हैं। जिस रफ़्तार से शहर फैल रहे हैं, उसी अनुपात में लाज़िमी तौर पर शहरी बेघरों की फ़ौज़ में भी इजाफ़ा होता जा रहा है। जिस शहर को गढ़ने-संवारने में उनका पसीना लगता है, उसी शहर में उनके साथ बेगानों जैसा सलूक़ होता है। शहर के दिलकश नज़ारों के बीच वे बदनुमा दाग़ मान लिये जाते हैं। 

इसमें बहस की गुंजाइश नहीं कि शहरी बेघर अपनी मर्ज़ी से शहरों का रूख़ नहीं करते। भूख, अभाव और ग़रीबी की मार उन्हें गांवों से उठा कर शहर ले आती है और उन्हें ग़रीबों की सबसे निचली कतार में खड़ा कर देती है। अलाव की आंच से अपने बदन को गर्म करते कई बेघरों से मैंने बात की। सबकी कहानी लगभग इक जैसी है। ज़्यादातर भूमिहीन हैं। ज़मीन है तो उसकी उपज से पूरे परिवार का पेट भरना मुश्किल होता है। खेती घाटे के सौदे में बदलती जा रही है। ऊपर से मशीनों पर बढ़ती निर्भरता खेतिहर मज़दूरी को हाशिये पर पहुंचाने का काम कर रही है। सभी जानते हैं कि मनरेगा काम के अधिकार का केवल सरकारी झुनझुना है और वह भी अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के हवाले है। कइयों के पास जाब कार्ड नहीं, जाब कार्ड है तो काम नहीं और काम है तो उसका सही समय पर भुगतान नहीं। परिवार के पास खाने का जुगाड़ नहीं तो भी बीपीएल या अंत्योदय कार्ड नहीं। परिवार को जैसे-तैसे ज़िंदा रखना है, इसलिए 60-70 साल के बूढ़े भी काम की तलाश में भटकते हैं और मज़दूरों की मंडी में सस्ते में बिकते हैं। मज़दूरी का दाम मज़दूर की उम्र और सेहत से भी तय होता है। यहां भी काम कम है और उम्मीदवार ज़्यादा। पके बाल या चेहरे की झुर्रियां काम मिलने की गुंजाइश घटा देती हैं। बूढ़ा हो या जवान, लगभग हर दिहाड़ी मज़दूर माह में औसतन 10-12 दिन बिना काम के रहता है। और तब जो मज़दूर बेघर होते हैं, आफ़त में रहते हैं। कोई ठिकाना होता नहीं इसलिए दिन भर इधर-उधर भटकते हैं। उनके सुकून का चांद तब निकलता है जब शहर की धमाचौकड़ी थमती है, रात का सन्नाटा गहराता है और उनके लेटने की जगह बनती है। लेकिन ओस टपकाती रात उनका सोना हराम करती है।     

कहना होगा कि इन बेरहम रातों में मुझे इनसानियत की मिसालें भी दिखीं और अहसान जताती फ़र्ज़ अदायगी का नाटक भी। यह वाक़या भी सुनने को मिला- ठिठुरन से भरी रात में कोई छुटभय्या नेता पैरों को पेट से सटा कर फुटपाथ पर सो रहे लोगों की मदद के लिए निकला। सांता क्लाज़ की तरह वह दबे पांव उन्हें कंबल उढ़ाता गया और पीछे से उसके वफ़ादार चमचे उन कंबलों को वापस समेटते गये। लेकिन हां, पहले सीन की फ़ोटू ज़रूर खिंच गयी। इस तरह उसने पार्षदी के आगामी चुनाव के मद्देनज़र अपना चेहरा चमकाने की शुरूआत ज़रूर कर दी। इसी चक्कर में किसी दूसरे उभरते नेता ने अपने इलाक़े में फ़ुटपाथ पर रहनेवालों के बीच एक शाम पूड़ी-सब्ज़ी बंटवा दी गोया कि बेघर कोई भिखमंगे हों, किसी मंदिर के बाहर दानियों के इंतज़ार में बैठे हों। पता यह भी चला कि तीन-चार संस्थाएं हर साल अस्थाई रैन बसेरों का ढांचा खड़ा करती हैं और उस पर अपना बैनर टांग कर बाक़ी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेती हैं और फिर झांकने के लिए भी नहीं लौटतीं। आराम से पुण्य लूटनेवालों की इस कतार में व्यापारिक संगठन और टेंट हाउस भी शामिल रहते हैं। 

लेकिन ख़ैर, इस तस्दीक से सुकून मिला कि बेघरों के बीच जाति-धर्म का कोई झमेला लगभग नहीं है। नाम से भले ही वे हिंदू-मुसलमान या बाभन-चमार हों लेकिन यहां सब केवल परदेसी मज़दूर हैं- सबसे पहले और सबसे आख़ीर में बस मुसीबत के मारे हैं जिन्हें पेट की आग शहर का रास्ता सुझाती है और उन्हें मजबूरन बेघर बनाती है। उनके बीच दिखे सहयोग, विश्वास और साझेदारी की यही बुनियाद है। और हां, यह आम लोगों की भलमनसाहत का ‘क़ुसूर’ है कि ठंड से होनेवाली बेघरों की मौत अक़्सर दर्ज़ नहीं हो पाती। इसलिए कि लाश के अंतिम संस्कार के लिए चंदा जुटने में देर नहीं लगती और उसे कांधा देनेवाले भी मिल जाते हैं। प्रशासन लाश फूंकने-गाड़ने की तकलीफ़ उठाने से बच जाता है। 

इस कड़ी में राकेश नाम के रिक्शा चालक का ज़िक्र किया जा सकता है। उनकी अपनी झुग्गी है यानी कहने भर को वे बेघरों की जमात से बाहर हैं लेकिन अपने आसपास के दूसरे मेहनतकशों की बेघरी के दर्द के अहसास से जुड़ कर उन्होंने चंदा बटोर कर सड़क किनारे 10-12 लोगों के सोने लायक़ छोटा सा रैन बसेरा खड़ा करने की क़ाबिले तारीफ़ पहल की। क्या पता कि हमदर्दी और साझी पहल की यह गरमाहट शहर की दूसरी जगहों पर भी उपजी हो जहां तक अपनी नज़र नहीं पहुंच सकी। ज़ाहिर है इसलिए भी कि वहां रैन बसेरे का कोई बैनर नहीं था इसलिए कि वहां अपनी पीठ ठोंकने-ठुंकवाने की कोई चाहत नहीं थी, उसकी कोई ज़रूरत ही नहीं थी। कितना अच्छा होता अगर शहर के ऐसे राकेशों की पहचान होती और उन्हें अस्थाई रैन बसेरे बनाने और चलाने का ज़िम्मा सौंप दिया जाता। लेकिन यह तो तभी होता जब सरकारी महकमे में बेघरों पर आनेवाले जानलेवा संकट को लेकर कोई बेचैनी होती। बेचैनी होती तो उससे निपटने की मुकम्मल तैयारी होती लेकिन सरकारी अमले को अपना उल्लू सीधा करने की जुगत भिड़ाने वरना हीटर के आगे हाथ-पैर तापने से ही फ़ुर्सत कहां रहती? राजनेताओं को क्या कहें जिन्हें दुखियारी जनता की याद तभी सताती है जब चुनाव सर पर होते हैं?                   






बेघरी माने ठिठुरन उर्फ़ की बेबसी।

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