दिल्ली में सरेराह बलात्कार: निर्णायक संघर्ष ज़रूरी

दिल्ली में इस रविवार की रात हुए नृशंस बलात्कार की घटना ने लोगों को हिला कर रख दिया है. देश की राजधानी में हुए इस अपराध से कई ज़रूरी सवाल सामने आए हैं. क्या बलात्कार की हर घटना इसी तरह प्रशासन और सुरक्षा का सवाल भर बना कर टाली जाती रहेगी? क्या हम हर ऐसी घटना पर कुछेक दिन अपना आक्रोश जताकर बलात्कार जैसी बर्बरता के पीछे काम करने वाले सामाजिक तथ्यों से मुंह मोडते रहेंगे? हमारे शहरों में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध क्या इस बात का सबूत नहीं कि थोड़ी तादात में शिक्षा और रोजगार के अवसर हासिल करने वाली महिलाओं से ही पुरुष-सत्तात्मक समाज इतना डर गया है कि कई तरीकों से औरतों को धमकाना शुरू कर दिया है. छोटे शहरों में ड्रेस-कोड और औरतों के मोबाइल पर रोक, प्रेम-विवाहों के खिलाफ हिंसात्मक रवैये से लेकर कारपोरेट ऑफिसों और शैक्षणिक कैम्पसों तक में अलग-अलग तरीकों से औरतों को प्रताडित किया जाना दरअसल एक पितृसत्तात्मक समाज की प्रतिक्रया है. इसके लिए जहां एक तरफ घर और काम की जगहों में औरतों को सुरक्षा दिए जाने और अपराधों के खिलाफ्र न्याय और सज़ा सुनिश्चित किए जाने की ज़रूरत है, वहीं स्त्री-अधिकारों की लड़ाई को अगले चरण में पहुंचाने की ज़रूरत है. स्त्री-अधिकार और औरत की बराबरी एक लोकतांत्रिक समाज में ही संभव है. सामंतवादी ढाँचे और बाज़ार की तानाशाही के पहियों पर टिकी आज की व्यवस्था स्त्री को न्याय और बराबरी दिलाने में असफल ही साबित होगी. 

ऐसी घटनाओं के बीच हमें यह सच भी याद रखना चाहिए कि आदिवासी, मजदूर और दलित जैसे समाज के वंचित तबकों के खिलाफ भी स्त्री-उत्पीडन सामंतवाद का हथियार रहा है. देश के पिछड़े जिलों में तो ऐसे अपराध आम हैं और औरतें पुलिस के पास जाने से भी उतनी ही डरती हैं जितना सामंतों से. सोनी सोरी पर हुए नृशंस यौन अत्याचार किसी क़ानून व्यवस्था की कमी से नहीं, बल्कि पुलिस थानों और केन्द्रीय जेलों के अंदर हुए हैं. अपने वर्गीय और व्यक्तिगत दुश्मनियों की भरपाई स्त्री की देह पर हमले के अर्थ में देखना हमारे सड़े हुए समाज की रवायत बन गयी है. स्त्री की 'अस्मत' पर हमला मूलतः उसकी सारी संभावनाओं पर हमला होने के साथ साथ उसके सामाजिक लोकेशन पर भी एक आघात होता है. हर बलात्कार इस अर्थ में एक गहरा सामाजिक अपराध है, जैसे किसी दलित को दी गई गाली सिर्फ दो लोगों के बीच का मसला नहीं होती. जबतक एक तबके के बतौर औरत कमजोर रहेगी, समाज के ऐसे अपराध का आसान शिकार भी वही बनी रहेगी.

दिल्ली में हुई बर्बर घटना के विरोध में आज मुनीरका के नजदीक स्थित वसंत विहार थाने पर सैकड़ों लोगों ने प्रदर्शन किया. इसमें साधारण नागरिक, नारी समूह और बड़ी संख्या में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र शामिल थे. लोगों ने अपराधियों को जल्द से जल्द सज़ा दिलाने और दिल्ली को महिलाओं के लिए सुरक्षितबनाने की मांग की. 




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