फांसी के फंदे में झूलते मानवाधिकार

-प्रशांत कुमार दुबे 
एनडीटीवी के प्राइम टाइम में पीयूसीएल (एक मानवाधिकार संगठन) की राष्ट्रीय महासचिव कविता श्रीवास्तव ने कसाब को फांसी दिए जाने वाले प्रकरण पर अपनी बात रखते हुए कहा कि "हमें बड़े ही शर्म के साथ कहना पड़ रहा है कि हमें एक निर्दयी राष्ट्रपति मिले हैं जो फांसी की सजा दे देते हैं" | उन्होंने यह भी कहा कि मुझे अचरज होता है जबकि एक लोकतांत्रिक देश में किसी को फांसी दिए जाने पर ज़श्न मनता है | कविता के इतना कहने पर ही पैनल के सभी सदस्य भावावेश में आ गए और उन्हीं में से एक राज्यसभा सदस्य सांसद तरुण विजय ने कविता को लगभग गरियाते हुए उन्हें दानवाधिकार कार्यकर्ता बताया |
“कोई मानव जीवन नष्ट नहीं होना चाहिए, बेशक वो कितना भी नीच क्यों नहीं हो, यह जश्न की वजह नहीं होनी चाहिए। इसकी बजाय, यह सही वक्त है जबकि राष्ट्र को सोचना चाहिए: अपराध के बारे में, सज़ा के बारे में और हमारे गणतंत्र के पोषित आधार, न्याय के बारे में। कई वजहों से, कसाब को फांसी देना इस खासियत का असंस्कृत सादृश्य है, जो प्रतिशोध के ज्यादा निकट है,” ।
हालाँकि तरुण विजय से इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं कर सकते हैं, क्यूंकि जिस पार्टी का वो झंडा थामे बैठे हैं उसका तो एजेंडा ही हिन्दुवाद है | बहरहाल कोफ़्त यह है कि लोकतांत्रिक तरीके (कथित) में विश्वास रखने वाला व्यक्ति भावनाओं के इस बहती गंगा में डुबकी लगाते समय यह क्यूँ भूल गया कि हमारे देश में अभिव्यक्ति का भी अधिकार है ? यदि किसी मानवाधिकार संगठन का कोई व्यक्ति यह मानता है कि कसाब को फांसी नहीं दी जानी चाहिए थी, तो उसकी बात का सम्मान होना ही चाहिए | पर तरुण विजय और लगभग तमाम पैनल ने यह नहीं किया बल्कि कविता को गरियाया ही | प्राइम टाइम अभी खत्म नहीं हुआ था कि भावनाओं के अतिरेक में डुबकी लगा रहा भारत देश तिलमिला उठा | सोशल साईट यानि फेसबुक पर कविता के खिलाफ बयानबाजी शुरू हो गई और बहुत कुछेक ने कविता के सुर में आलापा जिनमें से एक मैं भी था | बहरहाल नक्कारखाने में तूती की तरह ही सही पर इस प्रतिक्रिया ने इस बहस को जन्म दिया कि एक लोकतांत्रिक देश में फांसी दिया जाना कहाँ तक उचित है ??

यह मानते हुए कि 26/11 के आतंकी हमलों में 166 निरोश लोगों को जान से मारने वाले एकमात्र ज़िंदा पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब को, जिसका प्रशिक्षण ही मरने और मारने के लिए हुआ था, बावजूद उसे उसके जीवन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता था  | यहाँ द हिन्दू की टिप्पणी का उल्लेख करना जरुरी है, जिसमें उसने कहा की “कोई मानव जीवन नष्ट नहीं होना चाहिए, बेशक वो कितना भी नीच क्यों नहीं हो, यह जश्न की वजह नहीं होनी चाहिए। इसकी बजाय, यह सही वक्त है जबकि राष्ट्र को सोचना चाहिए: अपराध के बारे में, सज़ा के बारे में और हमारे गणतंत्र के पोषित आधार,न्याय के बारे में। कई वजहों से, कसाब को फांसी देना इस खासियत का असंस्कृत सादृश्य है, जो प्रतिशोध के ज्यादा निकट है ।” एसी स्थिति में राष्ट्रपति महोदय को चाहिए था कि वह कसाब को दी गई फांसी की सज़ा को उम्र क़ैद में बदल देते और फिर फिर ताजिंदगी उसे जेल में रहने देते | उसे कोई विशेष तरह से रखने की भी जरूरत नहीं थी | बहरहाल ये नहीं हुआ और कसाब के मारे जाने के साथ ही उसका यह अधिकार भी दफ्न हो गया | पर वो यह सवाल छोड़ कर गया कि लोकतंत्र का डंका पीटने वाले इस देश में जब एक व्यक्ति को फांसी दी गइ तो पक्ष क्या विपक्ष ने भी एक सुर में बिगुल फूंका | रही सही कसर शिवसेना जैसे हिंदूवादी संगठन के प्रवक्ता संजय राउत ने यह कह कर पूरी कर दी कि कसाब को फांसी बाल ठाकरे को सच्ची श्रद्धांजलि है | यानी दक्षिण से लेकर वाम और धर्म निरपेक्ष से लेकर सांप्रदायिक सभी तरह की ताकतों ने इस जयगान को मिलकर गाया | कोई भी पार्टी इसका प्रखर और मुखर विरोध कर उदवेलित जनता से पंगा मोल नहीं लेना चाहती थी | बीजेपी का पेट इससे भी नहीं भरा तो उसें अफज़ल गुरु की फांसी मंजूर  न होने पर ही सवाल खड़े कर दिए |

“अन्ना जिसके कांधों पर सर रखकर युवा नए भारत का सपना देख रहे हैं वे भी यह कहते मिले पाए गए कि चौराहे पर दी जानी थी फांसी, जैसे यहाँ शरद पवार को चांटा मार देने जैसी ही घटना हो | आम आदमी पार्टी ने भी आश्चर्य जनक ढंग से फांसी के तरीकों पर सवाल दागा, फांसी पर नहीं ? यानी सबने अपने-अपने पक्ष में रोटियाँ सेंकी और बेचारे मानवाधिकार कोने में सुबके सब नजारा देखते रहे | ‘द हिंदू’ ” ।
और तो और अन्ना जिसके कांधों पर सर रखकर युवा नए भारत का सपना देख रहे हैं वे भी यह कहते मिले पाए गए कि चौराहे पर दी जानी थी फांसी, जैसे यहाँ शरद पवार को चांटा मार देने जैसी ही घटना हो | आम आदमी पार्टी ने भी आश्चर्य जनक ढंग से  फांसी के तरीकों पर सवाल दागा, फांसी पर नहीं ? यानी सबने अपने-अपने पक्ष में रोटियाँ सेंकी और बेचारे मानवाधिकार कोने में सुबके सब नजारा देखते रहे |
इस पूरे दौर में जबकि मानवाधिकारों की सार्वजनिक अर्थी निकल रही थी और निकल रही है मीडिया ने भी इस बहती गंगा में जमकर हाथ धोया | इलेक्ट्रानिक मीडिया जो कि पहले ही कुख्यात है, उसे एक बात का ही मलाल रहा कि वो फांसी शूट क्यूँ नहीं कर पाये !! सारे सूत्र फेल कैसे हो गए वगैरह- वगैरह | इस बार तो प्रिंट मीडिया ने भी कोई कोर कसार नहीं छोडी | तठस्थता का परचम लहराए मीडिया ने एकतरफा कसाब के विरोध में और सरकार की शान में कसीदे गढ़े | मानवाधिकारों की मौत का मर्सिया पढ़ पाने का न किसी को मलाल और ना किसी का वह दृष्टिकोण | बल्कि जो देश के गृह मंत्री श्री शिंदे, मखौल उड़ाते हुए कह रहे थे कि अब जरुरत है मानवाधिकारियों से बचने की, जो कि बगैर विश्लेषण तानाशाही की ओर ही इशारा करती है लगभग जस का तस एक प्रमुख हिंदी पत्र समूह के सम्पादक मानवाधिकारियों को विघ्न संतोषी कह रहे हैं | जब मीडिया से सबसे ज्यादा बचने की और सम्हलने की अपेक्षा होती है तभी वह लगभग औंधे मुंह गिरता है |

'द हिन्दू' अखबार को छोड़ दें तो कमोबेश सभी ने यही लिखा कि खुश हुए पीड़ितों के परिजन, जश्न मना, सच्ची श्रधांजलि, सही न्याय आदि लेकिन किसी ने भी दूसरे पक्ष को तवज्जो नहीं दी | क्यूंकि मुंबई हमले में ही मारी गई मोनिका चौधरी के भाई आशीष चौधरी की राय थोड़ी अलग ही थी वे कहते हैं कि ''मैं अपने बच्चों को कसाब की मौत पर खुश होने की सीख नहीं दूंगा| मुझे लगता है कसाब जब बच्चा रहा होगा तब शायद उसे धर्म के नाम पर लोगों को मारना सिखाया होगा| हमें अपने बच्चों के मन में अच्छे संस्कार डालने चाहिए और उन्हें धर्मान्धता से बचाना चाहिए |" यह बयान किसी मीडिया हाउस ने नहीं प्रकाशित किया, बल्कि आशीष की टिप्पणी को सोशल साईट पर प्रचार पाने का तरीका कहकर प्रचारित किया गया| इसी तरह किसी भी अखबार समूह ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के पक्ष को प्रकाशित न कर स्वयंभू यह माहौल बनाया कि  चहुँ और ख़ुशी है, आनंद है, जबकि एसा नहीं था |

"मैं अपने बच्चों को कसाब की मौत पर खुश होने की सीख नहीं दूंगा| मुझे लगता है कसाब जब बच्चा रहा होगा तब शायद उसे धर्म के नाम पर लोगों को मारना सिखाया होगा| हमें अपने बच्चों के मन में अच्छे संस्कार डालने चाहिए और उन्हें धर्मान्धता से बचाना चाहिए |"।
बहरहाल कसाब की फांसी ने इस बहस को फिर सुलगाया है कि भारत को मृत्यु दंड बरकरार रखना चाहिए अथवा नहीं ? एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार विगत दो दशकों में केवल 4 जनों को ही फांसी की सज़ा सुनाई गई है लेकिन इस कतार में 435 अपराधी हैं | अभी हाल ही में तो 2004 के बाद यह पहला मौका रहा जब भारत में मृत्यु दंड दिया गया | मानवाधिकार समूहों ने कम संख्या में ही सही लेकिन मजबूत प्रतिक्रिया देकर भारत से मृत्यु दंड खत्म किए जाने की मांग को फिर दोहराया।| स्वयं सरकार के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद इस मसले पर परस्पर विरोधी बात करते नजर आये, उन्होंने कहा कि “स्वभावत:, हम मृत्यु दंड के खिलाफ हैं,” लेकिन, उन्होंने कसाब की फांसी को उचित ठहराते हुए कहा कि यह एक ‘निराशाजनक कर्तव्य’ है, जिसे सरकार को अपने नागरिकों के लिए निभाना ही होता है। एक ओर तो माननीय उच्चतम न्यायालय ने 1982 में ही कहा है कि मृत्यु दंड की सज़ा केवल विरले (रेअरेस्ट ऑफ रेयर) मामलों में ही दी जानी चाहिए। हालाँकि हाल ही में भारत ने 38 अन्य देशों के साथ संयुक्त राष्ट्र में मृत्यु दंड का समर्थन किया था, जहां अब भी इस सज़ा का प्रावधान है।  यह भी भारत के दोगलेपन की और इशार करता है | एक विरोधाभास यह भी है जबकि देश ने मानवाधिकारों के संरक्षण वाली अंतर्राष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर किये हैं लेकिन दूसरे और वह सरेआम मानवाधिकारों का हनन कर रहा है | स्वयं मानवाधिकार आयोग भी इस मसले पर चुप्पी साधे है |

मृत्यु दंड आज के इस विकाशसील समाज के नाम पर कलंक है | दरअसल इसे एसा भी देखा जाना चाहिए कि सरकार ने अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए यह सब किया, क्यूंकि सरकार की पहले ही सुरक्षा चाक चौबंद होती तो कसाब जैसे आतंकी घुसपैठ कर भी नहीं सकते थे | कसाब का भारत में घुसना और नरसंहार करना हमारी सुरक्षा एजेंसियों की गहरी चूक है | यह हमारी नपुंसकता का ही प्रतीक है कि हम पहले ढील बरतें और फिर यदि कोई आ जाये तो उसे मारकर थाली पीटें | इस अक्षमता पर सवाल न उठें इसलिए सरकार ने यह कदम उठाया | अब कसाब को फांसी दिए जाने से पगलाई जनता कम से कम चार पांच साल तक तो सब बिसार जायेगी | घोटालों में घिरे सुशील शिंदे और खुर्शीद ने इस बहाने अपने अपने पाप धोने की भी कोशिश की और आश्चर्य न हो कि गुजरात में कसाब की फांसी तख्ता पलट कर दे | बहरहाल फांसी देकर सरकार ने केवल और केवल अपनी कारगुजारियों पर ही पर्दा डाला है यह बहादुरी तो कतई नहीं कही जा सकती हैं |

मृत्युदंड पर सरकार मानवाधिकार समूहों की न सुनकर अपने पूर्वजों की ही सुने तो भी उसे सोचने के लिए विवश होना ही पड़ेगा | महात्मा गांधी ने कहा था "मैं मृत्युदंड को अहिंसा के खिलाफ मानता हूँ, अहिंसा से परिचालित व्यवस्था हत्यारे को सुधार गृह में बंद कर सुधरने का मौक़ा देगी |
"मैं मृत्युदंड को अहिंसा के खिलाफ मानता हूँ, अहिंसा से परिचालित व्यवस्था हत्यारे को सुधार गृह में बंद कर सुधरने का मौक़ा देगी | अपराध एक बीमारी है, जिसका इलाज होना चाहिए |"।
अपराध एक बीमारी है, जिसका इलाज होना चाहिए |  डाक्टर अम्बेडकर ने कहा था कि "मैं मृत्युदंड ख़त्म करने के पक्ष में हूँ, अहिंसा के सिद्धांत इस देश की प्राचीन परम्परा हैं | कांग्रेस सरकार अपने ही पूर्वजों को इस तरह बिसारेगी यह आप सोच भी नहीं सकते | यह एक कठिन दौर है | डर यह भी है कि भावना के अत्यंत उत्साहित प्रदर्शन में यदि कोई गांधी और आंबेडकर की इस टिप्पणी को उछाल भी दें तो क्या हो! शायद उनके पोस्टरों पर जूतम पैजार हो जाए| एक मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते मुझे लगता है कि जब-जब कहीं कोई भी व्यक्ति फांसी पर चढ़ाया जाता है तो वह अकेला नहीं होता बल्कि उसके साथ उसके मानवाधिकार भी सूली पर टांग दिए जाते हैं जो कसाब के साथ टांग दिए गए है | यहाँ पर यह बताना भी जरूरी है कि पूरी दुनिया के 110 देशों ने मृत्युदंड के खिलाफ प्रस्ताव पास कर यह बता दिया है कि यह एक पाशविक प्रवृत्ति है लेकिन भारत ने इस पर अपनी राय इसके समर्थन में दी है | क्यूंकि आका ओबामा अमेरिका भी इसके पक्ष में है और भारत तो अलाउद्दीन के चिराग से उपजा जिन्न है, जिसक एकसूत्रीय एजेंडा ही आका के निर्देशों पर चलना है, फिर चाहे मानवाधिकार हनन हो तो हो !!!

बहरहाल मानवाधिकार संरक्षण के महापर्व में फिर कसीदे गढ़े जायेंगे, फिर दुहाइयां दी जायेंगी लेकिन यह सरकार किस मुंह से मानवाधिकार संरक्षण की दुहाई दे रही है जबकि कसाब को फांसी दी गयी यानी हमारे देश मैं हम मृत्युदंड को ही बेहतर विकल्प मानते हैं, नक्सलियों के नाम पर देश में हजारों लोग मारे जा रहे हैं, इरोम शर्मीला अफ्स्पा जैसे कानूनों के खिलाफ पिछले बारह सालों से भूख हड़ताल पर है, सोनी सोरी और उस जैसे हजारों निर्दोष लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है, हजारों बच्चे रोजाना मर रहे हैं, रोजाना नई-नई कंपनियों के लिए आदिवासियों/दलितों को विस्थापित कर सरकारें उनके लिए पलक पांवड़े बिछाए खडी हैं, महिलाएं बलात्कार का शिकार हो रही है, कुपोषण और भूख का नंगा नाच अपने विकराल रूप में है | सरकार कहती है कि एक आम आदमी चाहता था कि कसाब को फांसी दी जाए, इसलिए दी गई | ऐ सरकार, सुनो एक आम आदमी मैं भी हूँ, पर मैं कभी नहीं चाहता था और हूँ, कि ना केवल कसाब बल्कि किसी को भी फांसी हो, तो ज़रा ये बताओ कि आपके पास मेरे लिए क्या है !!!!

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