नियमगिरी में कारपोरेट और राज्य सत्ता को कड़ी टक्कर देते आदिवासी

नियमगिरि के आदिवासी वेदांता के विरोध में कालाहांडी जिलाधिकारी के कार्यालय पर 10 जनवरी 2013 को प्रदर्शन करेंगे

नियमगिरी का जुझारू जन-आंदोलन अब निर्णायक स्थिति में पहुँच गया है. आगामी 11 जनवरी को ग्रीन बेंच में खनन की स्वीकृति को लेकर सुनवाई होनी है जिसके विरोध में आंदोलन कमर कस चुका है. ज्ञात हो कि 13 अक्टूबर 2012 से वेदान्त की  लाँजीगढ़-स्थित रिफाइनरी बंद पड़ी है, यह आंदोलन के दबाव में ही हो पाया है.

ओडिसा के कालाहाण्डी जिले का लाँजीगढ़ ब्लाक भारतीय संविधान के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त अनुसूचित क्षेत्रों में आता है। इसी स्थान पर वेदांता कंपनी ने अपना अलमुनाई प्लांट लगा रखा है और इसी क्षेत्र में स्थित नियामगिरि पहाड़ के बेशकीमती बाक्साइट पर उसकी ललचाई निगाहें लगी हुई हैं। स्थानीय ग्रामवासी, आदिवासी अपनी जमीन, जंगल, नदी, झरने  पहाड़ बचाने की लड़ाई लगातार लड़ते आ रहे हैं. पेश है नियमगिरी आंदोलन के अगुआ लिंगराज आजाद की यह रिपोर्ट:

नियमगिरि का महत्व
नियमगिरी पहाड़ियों में आज डोंगरिया कोंध जनजाति के सिर्फ़ 7,950 लोग बचे हैं.


डोंगरिया उड़ीसा के दूरस्थ हिस्से में स्थित नियमगिरि के जंगलों में सदियों से रह रहे हैं. वे फल एकत्र कर, ज्वार-बाजरा की खेती कर और जंगल के पौधों को शहरों-कस्बों में बेच कर अपना जीवन यापन करते हैं.


गोलगोला से आधुनिक दुनिया अभी कोसों दूर है. वहाँ अभी न तो बिजली है, न स्कूल हैं, न टीवी है और न ही टेलीफ़ोन.

डोंगरिया कोंध के लिए काम करने वाले एक युवा कार्यकर्ता सिवसंकर भुई कहते है कि "हम जंगल में मिलने वाली हर चीज़ जैसे फलों को बाज़ार ले जाते हैं. यह डोंगरिया कोंध लोगों के जीवन के स्त्रोत की तरह है."
वह इस जाति के उन कुछ लोगों में से एक हैं जिन्होंने औपचारिक शिक्षा ग्रहण की है और वह अब अपनी जनजाति के जीने के तरीक़े को सुरक्षित रखने के लिए लड़ रहे हैं.

उन्होंने कहा, "हम इन फलों को पाने के लिए कोई पैसा नहीं देते हैं. हमें यह मुफ़्त में मिलते हैं. यह हमारे लिए स्वर्ग के समान है."

डोंगरिया जीववादी होते हैं. उनके अनुसार हर पहाड़ किसी ख़ास देवता का निवास होता है.
गुजरी 6 दिसम्बर को लाँजीगढ़ ब्लाक कार्यालय पर वेदांता कंपनी, उड़ीसा सरकार एवं केंद्र सरकार के विरोध में लगभग 20 हजार आदिवासियों ने प्रदर्शन कर एसडीएम को राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया है.

ज्ञात रहे कि वेदांता कंपनी की बाक्साइट माइनिंग पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 2010 में रोक लगा दी गई थी.

परंतु उड़ीसा राज्य सरकार ने वेदांता कंपनी की बाक्साइट माइनिंग पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा लगायी गयी रोक को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी । राज्य सरकार का कहना था कि पर्यावरण मंत्रालय का आदेश माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अवमानना है। सर्वोच्च न्यायालय का कहना था कि यदि राज्य सरकार केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना मानती है तो अवमानना की याचिका दायर कर सकती है। इस याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय की ग्रीन बैच में 23 नवम्बर से 26 नवम्बर 2012 को सुनवाई की तारीख घोषित होने पर नियामगिरि सुरक्षा समिति, सचेतन नागरिक मंच, लैण्ड लूजर्स एसोसिएशन जैसे स्थानीय संगठनों के साथ ही साथ समाजवादी जन-परिषद के कार्यकर्ता-नेतों  इस सुनवाई के विरोध में नियामगिरि क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन का सिलसिला शुरू कर दिया.
  • 22 नवम्बर 2012 को कालाहांडी जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन एवं राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया है.
  • 23 नवम्बर 2012 को लांजीगढ़ एसडीएम कार्यालय पर प्रदर्शन एवं राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया है.
  • 24 नवम्बर 2012 को कल्याणसिंहपुर (रायगडा) एसडीएम कार्यालय पर प्रदर्शन एवं राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया है.
  • 25 नवम्बर 2012 को बिसनकटक (रायगडा) एसडीएम कार्यालय पर प्रदर्शन एवं राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया है.
  • 27 नवम्बर 2012 को मुनिगुडा (रायगडा) एसडीएम कार्यालय पर प्रदर्शन एवं राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया है.

इस बीच याचिका पर ग्रीन बैच में सुनवाई की तारीख को आगे बढा दिया. सुनवाई की तारीख 3 दिसम्बर से 5 दिसम्बर घोषित की गयी. बाबा साहब आंबेडकर निर्वाण दिवस को लांजीगढ़ में वेदांता कंपनी के विरोध में प्रदर्शन कर फिर से  राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया. जिसमे मांग की गई कि-
  • वेदांता कंपनी के साथ समझोता रद्द किया जाय.
  • वेदांता कंपनी की बाक्साइट माइनिंग रद्द की जाय.
  • आंदोलनकारियों पर फर्जी केस वापस लिये जाय.
  • अब तक वेदांता कंपनी से विस्थापितों का उचित पुनर्वास किया जाय.
  • शिक्षा, चिकत्सा की समुचित व्यवस्ता की जाय.

याचिका पर ग्रीन बेंच में सुनवाई 11 जनवरी 2013 को सुनवाई होगी. इसके विरोध में कालाहांडी जिलाधिकारी कार्यालय पर 10 जनवरी 2013 प्रदर्शन एवं राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया जायेगा.

आदिवासी क्षेत्रों को मिले विशेष संवैधानिक संरक्षणों को धता बताने की घटनायें यहां पर आम चलन में हैं। संवैधानिक प्रावधानों तथा पेसा कानून की धज्जियां उड़ाते हुए, बिना ग्राम सभा की सहमति, प्रस्ताव यहां तक कि बिना बताये ही इस इलाके में वेदांत कंपनी सरकारी अमले की मदद से आदिवासियों की जमीनें तथा प्राकृतिक संसाधनों को लूटने में लगी है। इस लूट का विरोध करने वाले राज्य तथा कारपोरेट हिंसा का शिकार बनाये जाते हैं, जेल में निरूद्ध किये जाते हैं तथा पुलिस थाने में कई-कई दिनों तक अनायास लाक अप में बंद रखे जाते हैं।





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