अन्याय की बुनियाद पर न्याय मांगते झारखण्ड के आदिवासी

विस्थापन विरोधी एकता मंच और अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के बैनर तले पूर्वी सिंहभूम के पोटका से रांची तक, 2 नवम्बर को शुरू हुई पदयात्रा 10 नवम्बर 2012 को रांची में राजभवन के घेराव के लिय आयोजित प्रदर्शन में बदल गई. झारखण्ड के कोने-कोने से आये हजारों आदिवासियों ने ‘जल-जगल-जमीन की लूट, नहीं किसी को छूट’, हमें लोहा नहीं अनाज चाहिय, कारखाना नहीं, खेती और गांव का विकास चाहिए’, आंदोलनकारियों को फर्जी मुकदमों में फैसाना बंद करो’, दयामनी बारला को रिहा करों, आदि नारों से सरकार को चुनोती दे रहे थे. 

ज्ञात रहे कि 2 नवम्बर को पोटका से भूषण स्टील का एमओयू रद्द करने, कोल्हान को केंद्र शासित राज्य की मान्यता देने, कुजू डैम को रद्द करने, पांचवी अनुसूची को दृढ़ता पूर्वक लागू करने, जनद्रोही क़ानूनों और राज्य दमन के ख़िलाफ़  यह पदयात्रा शुरू हुई थी.

आज 10 नवम्बर 2012 को पदयात्रा के समापन्न के मोके पर रांची में राजभवन के सामने एक विशाल जन प्रदर्शन का आयोजन किया गया. पेश है यहाँ पर कुमार चंद मार्डी कि यह रिपोर्ट; 

झारखण्डी जनता जल जंगल जमीन और खनिजो को लूटने वाले और झारखंडियो को उजाड़ने वाले कंपनियों के खिलाफ लड़ने के लिए कमर कस चुकी है। जनता ने जर्बदस्त आंदोलन खड़े कर दिये है और वह पूंजीपतियों को और उनके सेवा में लगें सरकार को उखाड़ फेंककर ही दम लेगी। सरकार ने झारखण्ड को देश-विदेश के लुटरे पूंजीपतियों के लिए एक खुला चारागाह बना दिया है। केन्द्र तथा झारखण्ड की सरकार की नीतियां बिल्कुल जनविरोधी एंव राष्ट्र विरोधी नीतियां है। इनके विकास का मतलब है पूंजीपतियों को मुनाफा कमाने की पूरी छूट। इतने इस्पात कारखाने जो बन रहे है यह देश की जरूरत के लिए नही, यह झारखण्डी मजदूरों को खटाकर विदेश में इस्पात बेच कर मुनाफा कमाने के लिय लगाये जा रहे है।

स्ंविधान मे निहित अनुच्छेद 244 (1) के अंतर्गत 5वी अनुसूची के तहत इस क्षेत्र में प्रशासन एंव नियत्रण, कल्याण एवं उत्रति तथा शांति एवं सुशासन का प्रवाघान है। ग्राम सभा की अनुमति के बिना कोई जमीन लेने पर मनाही है। फिर भी सरकारी अघिकारी कंपनियों को जमीनें दिलवा रहे हैं। अनुसूचित क्षेत्र के हितरक्षक राज्पाल है। इस विषम परिस्थित में राज्यपाल की भूमिका महत्पूर्ण है। लेकिन दुःख की बात है कि राज्यपाल के जमशेदपुर दौरा के क्रम में अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के सदसयों ने राज्यपाल के समक्ष अपनी बात रखनी चाही लेकिन नजर अंदाज करते हुए अवसर नहीं दिया गया। मजबूरन उनके मार्ग को रोका गया और 5वीं अनुसूची को सख्ती से लागू करने का संदेश दिया गया। प्रशासन ने अपनी कमजोरी को छुपाने के लिए अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के सदस्यों पर मुकदमा दर्ज कर दिया है ।

दूसरी ओर भूषण स्टील की झारखण्ड राज्य प्रदूषण पर्षद से अनापति के लिए आयोजित 24 सितम्बर 2012 की जन सुनवाई में खुलकर प्रशासन ने मदद की। कंपनी का विरोध करने वाले लोगों को मौका नहीं दिया गया और उनके ऊपर झूठे मुकदमा लाद दिया गये।

यह लड़ाई विस्थापन से बचने के लिए ही नहीं है। यह झारखण्ड को बचाने की लड़ाई है। यह घुसपैठियों दलाल नेताओं और उनके छुटमैये दलालों की मदद से पूरे झारखण्ड की अर्थव्यव्स्था पर कब्जा किये हुए है। झारखण्ड के एक करोड़ झारखण्डी लाचार शरणर्थी बन गये है। जमीन से बेदखल झारखण्डी शहरो में झोपड़पट्टियो के कुलीगिरी करने के लिए मजबूर है। जहां उनकी कोई इज्जत नही है। आज चुप रहियेगा तो न बचेगा झारखण्डी समान, न बचेगी झारखण्डी पहचान और संस्कृति। झारखण्ड के संसाधनो पर झारखंडियों का नियंत्रण कायम करना होगा और जनविरोधी विकास नीति को समाप्त करके जन विकास की नीति चलानी होगी, कृषि और ग्रामांचल का विकास करना है ताकि झारखण्डी जनता खुशहाल हों, सालभर खेत लहलहाये, सबको शिक्षा स्वास्थ्य की पूरी सुविधायें मिलें, कोई बंरोजगार न रहें, पलायन को पूरी तरह रोकना है। जनता को उजाड़ने वाली इन परियोजनओं के लिए एक इंच भी जमीन नही देंना है। सरकार और पूंजीपतियों के हमले को रोकना है। झारखण्ड और देश को आत्म निर्भर बनाना है। वन भूमि और गैर मजरूआ जमीन को सरकार और पूंजीपतियों से बचाना है।

इस प्रदर्शन के मोके पर सरकार से मांग की गई की-
  • पूर्वी सिंहभूम के पोटका में भूषण स्टील और आसनबनी में जिंदल कम्पनी सहित सभी एम, ओ, यू, रद्द करो।
  • समता फैसला एवं रामो रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश सरकार के मुकदमा पर कोर्ट के फैसले को सख्ती से लागू किया जाए।
  • 5वी अनुसूची सी,एन,टी एक्ट, एस, पी, टी, एक्ट का सख्ती से पालन की जाए।
  • भूमि अधिग्रहण कानून रद्द करो।
  • बजट का 80 प्रतिशत समग्र ग्रामीण विकास पर खर्च करे।
  • जमीन बचाने वाले आंदोलनकारियों पर झूठा मुकदमा वापस लिय जाए।
  • नगड़ी में रैयतो की जमीन वापस की जाए और पुलिस दमन बन्द हो।
  • सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बरला को बिना शर्त अविलम्ब रिहा की जाए।
  • वन भूमि और गैर मजरूआ जमीन पूंजीपतियों को हस्तातरण पर रोक लगें एवं सरकार ग्रामसभा का सहमति से उपयोग करें।
इस प्रदर्शन में अखिल भारतिय आदिवासी महासभा विस्थापन विरोधी एकता मंच, गांव गणराज्य परिषद, भूमि रक्षा वाहिनी किसान मोर्चा (रोलाडी), खूंटकट्टी रैयत भूमि सुरक्षा संघर्ष समिति,पोटका, भूमि रक्षा संघर्ष समिति, आसनबनी पोटका पंचायत, भूमि सुरक्षा समिति, कालिकापुर आदि सगठनों सहित  सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया.
             
     
           

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