उद्योगपतियों की चाकरी में सरकार


राज्योत्सव के तहत आयोजित हुए निवेशकों के दो दिन के मिलन समारोह का कल समापन हो गया। इसी के साथ तय हो गया कि छत्तीसगढ़ के हालात अभी और बिगडेंगे- उद्योगों के लिए किसानों से ज़मीन छीनने और उसके विरोध को कुचलने की सरकारी मुहिम और तेज़ी पकड़ेगी, बर्बरता के नये रिकार्ड क़ायम होंगे। राज्य सरकार का यह पहला ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट था और सरकार ने उससे जो उम्मीदें बांधी थीं, उसमें बहुत हद तक क़ामयाब था। या कहें कि छत्तीसगढ़ के लोगों की पहले से पतली हालत को और पतला किये जाने का शंखनाद था, भरे दरबार में ‘छत्तीसगढ़ महतारी’ का चीरहरण किये जाने का पूर्वाभ्यास था। पेश है आदियोग की यह रिपोर्ट एवं  साथ में रमेश अग्रवाल के साथ बातचीत;

और अमानवीयइंवेस्टर्स मीट का शुभारंभ करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसे कठिन समय में जबकि राष्ट्रीय स्तर पर उद्योग जगत निराशा के अंधेरे से घिरा हुआ है, छत्तीसगढ़ प्रकाश स्तंभ की भूमिका अदा करेगा। दुनिया के नक़्शे पर छत्तीसगढ़ की नयी पहचान बनेगी। इसके लिए उद्योगों को हर मुमकिन रियायतें और सहूलियतें दी जायेंगी। राज्य की औद्योगिक नीति के तहत अब तक इस्पात, सीमेंट और बिजली जैसे कोर सेक्टर के उद्योगों पर ज़ोर था जो अब रियल इस्टेट, पर्यटन, होटल, फ़ूड प्रोसेसिंग, लघु वनोपज, आटोमोबाइल जैसे डाउन स्ट्रीम उद्योगों पर होगा।

उद्घाटन समारोह में ही 20 हज़ार करोड़ रूपयों से भी अधिक लागतवाले चार एमओयू (सरकार और कंपनियों के बीच करार) पर दस्तख़त हुए और दो दिन के इस आयोजन में 1.24 लाख करोड़ के कुल 272 एमओयू हुए। सबसे ज़्यादा एमओयू रियल इस्टेट के लिए हुए लेकिन निवेश के लिहाज़ से आख़िरकार कोर सेक्टर के उद्योगों ने 11 फ़ीसदी भागीदारी करते हुए बाजी मार ली। इस तरह यह दावा हवा हो गया कि राज्य की नयी औद्योगिक नीति अब डाउन स्ट्रीम उद्योगों को तरज़ीह देगी हालांकि सरकार को दलील देनी पड़ी कि कोर सेक्टर में हुए एमओयू वैल्यू एडीशन के लिए हैं। वैसे भी कोर सेक्टर सबसे ज़्यादा मुनाफ़ा उगलता है और इसके एवज़ में बड़े पैमाने पर विस्थापन और प्रदूषण को पैदा करता है।


उद्योगों के लिए सरकार की दरियादिली कोई नयी बात नहीं है। छत्तीसगढ़ के नया राज्य बनते ही कंपनियों पर सरकारी मेहरबानियों की बारिश शुरू हो गयी थी। नाम भले ही माओवादियों से निपटने का आदिवासियों का स्वत:स्फूर्त आंदोलन दिया गया हो- बस्तर में कोई छह साल तक चला सलवा जुडुम का ख़ूनी खेल उन्हीं मेहरबानियों के तहत खेला गया था जिसमें सैकड़ों गांव वीरान और बर्बाद हुए, लाखों लोग विस्थापित हुए और सैकड़ों मारे गये। यह सब कुछ चंद उद्योगपतियों पर क़ुदरत की दौलत को क़ुर्बान करने के लिए हुआ था। तो ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट उद्योगों पर सरकारी मेहरबानियों की झमाझम बरसात का नया एलान था।

इस मौक़े पर धुरंधर उद्योगपतियों ने उद्योगों के प्रति रमन सरकार की दरियादिली की जम कर तारीफ़ की। क्यों न करते? घर लुटा कर मेहमाननवाज़ी होगी और घरवालों को खदेड़ कर मेहमानों को जगह मिलेगी तो आख़िर मेहमान का भी फ़र्ज़ बनाता है कि जी खोल कर घर के मुखिया की बलैय्या ले, घर के असली वारिसों के साथ धोखाधड़ी करने की उसकी ज़िद्दी चाहतों पर तालियां पीटे। इसी कड़ी में वेदांता के अनिल अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ को निवेश के अथाह अवसरों की धरती का नाम देते हुए ख़ुशी ज़ाहिर की कि यह राज्य तेज़ प्रगति की राह पर है। यह वही वेदांता है जिसके विरोध में उड़ीसा धधक रहा है।

जेएसपीएल के नवीन ज़िंदल ने इंवेस्टर्स मीट को ‘विश्वसनीय छत्तीसगढ़’ का अविश्वसनीय मौक़ा कहा। इस बात की तारीफ़ की कि यहां के लोग अमनपसंद हैं। अब इन वाक्यों को जोड़ कर देखिये और उसके असली निहितार्थ को समझिये। ‘विश्वसनीय छत्तीसगढ़’ का मतलब है- छत्तीसगढ़ की विश्वसनीय सरकार और मुनाफ़े की अकूत संभावनाएं। लोगों को अमनपसंद बताना उन लोगों को अमन का दुश्मन बताना है जो मुनाफ़े की लूट के धंधे में रोड़ा हैं। रायगढ़ में नवीन ज़िंदल के लिए सबसे बड़ा रोड़ा तो रमेश अग्रवाल हैं जिन्होंने अपने अनवरत संघर्ष से रायगढ़ की धरती पर उन्हें कभी चैन की सांस नहीं लेने दिया और उन्हें लगातार सांसत में रखा। नवीन ज़िंदल छत्तीसगढ़ में अभी तक 25 हज़ार करोड़ का निवेश कर चुके हैं जो अब दोगुना हो जायेगा। रायगढ़ में ही उनकी योजना 24 सौ मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट लगाये जाने की है। मतलब कि रमेश अग्रवाल और उनके बीच जंग अभी और गाढ़ी होगी।

जन आंदोलनों के बीच रमेश अग्रवाल जाना-पहचाना नाम हैं। रायगढ़ में वे पिछले सात सालों से विस्थापन और प्रदूषण के ख़िलाफ़ मुहिम पर हैं। पिछली 23 अक्टूबर को उन्होंने नयी दिल्ली में अपने बहादुराना विरोध का झंडा गाड़ते हुए उद्योगपति नवीन जिंदल को सरेआम नंगा करने का बड़ा काम किया था। उस दिन जिंदल की प्रेस वार्ता का कार्यक्रम था। यह पहला मौक़ा था जब कोई भारी पुलिस बल के साथ किसी प्रेस वार्ता में पहुंचा। पुलिस बल के अलावा सादे कपड़ों में उनके बाउंसर भी साथ थे जिनकी गुंडई के ख़ूब क़िस्से हैं। उस आयोजन में व्हील चेयर पर बैठ कर अचानक रमेश अग्रवाल पहुंच गये और जिंदल पर इस क़दर सवाल दाग़े कि उन्हें अपनी प्रेस वार्ता को छोड़ कर पिछले दरवाज़े से भागना पड़ा। बहरहाल, दो साल पहले रमेश अग्रवाल को जिंदल से भिड़ने की सज़ा भी मिली जब उन्हें किसान नेता हरिहर पटेल के साथ जेल जाना पड़ा। दो साल पहले जिंदल ने उन पर झूठे आरोप मढ़े तो इस साल जुलाई में उन पर गोलियां भी बरसवायीं।

अनिल अग्रवाल की तरह नवीन जिंदल भी दुनिया के महाबली उर्फ़ महा धूर्त और अपने कारनामों के चलते महा कलंकित उद्योगपतियों में गिने जाते हैं। अभी हाल में उन्होंने कनाडा की उस कंपनी का अधिग्रहण किया है जिसके नाम बोत्सवाना और मोजंबीक में बेहतर क्वालिटी के कोयले की विशालतम खानें हैं। इसके अलावा आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ़्रीका में भी कोयला खदानों का बहुत बड़ा जखीरा है। यह सारा कुछ अब नवीन ज़िंदल की कंपनी की मल्क़ियत है।

याद रहे कि अलग छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद और ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट के पहले तक दो लाख करोड़ रूपयों की लागतवाले 142 एमओयू किये गये लेकिन निवेश हुआ केवल साढ़ 24 हज़ार रूपयों का। इनमें 23 एमओयू रद्द हुए। बाक़ी 121 एमओयू का हाल यह है केवल 36 उद्योग उत्पादन शुरू कर सके हैं और 15 अभी तक निर्माण के दौर में हैं। 29 उद्योगों के लिए अभी तक ज़मीन ही तय नहीं हो सकी है जबकि 41 उद्योगों के लिए अब तक केवल ज़मीन का चयन हो सका है। यानी कोई 65 फ़ीसदी एमओयू अभी तक हवाई बने हुए हैं। तनिक सोचिये कि इसकी मुख्य वजह क्या हो सकती है? ज़ाहिर है केवल यही कि लोग उद्योगों के लिए अपनी ज़मीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं और सरकारी ज़ोर-जबरदस्ती का डट कर मुक़ाबला कर रहे हैं। काश कि ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट के दौरान हुए एमओयू भी इसी गति को प्राप्त हों ताकि पहले से अशांत राज्य में और अशांति न फैले, विस्थापन की भीषण त्रासदी का दायरा और ज़्यादा न फैले।

ग़ौर तलब है कि ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट में बस्तर और सरगुजा के लिए कोई एमओयू नहीं हुआ। यह दोनों ही प्राकृतिक संसाधनों के मामले में अमीर हैं और उतने ही असंवेदनशील भी हैं। ज़मीन के अधिग्रहण का सबसे तीखा विरोध यहीं हुआ है। तो अब तक के अनुभवों को देखते हुए आज कोई भी निवेशक इन इलाक़ों से मुनाफ़ा लूटने के मोह में अपने निवेश को दांव पर लगाने को तैयार नहीं हो सकता। इसे यों भी कह सकते हैं कि यहां की जनता का बहादुराना प्रतिरोध आख़िरकार रंग लाया।
रमेश अग्रवाल के साथ आदियोग की बातचीत

राज्योत्सव पर आपकी टिप्पणी...

किस बात का राज्योत्सव? जब छत्तीसगढ बना तो लोगों को लगा कि अब संकट के दिन बीतेंगे, लोगों का विकास होगा। लेकिन विकास के बजाय हुआ केवल विनाश- लोग उजड़े, उनकी ज़मीनें छिनीं, हवा-पानी में ज़हर घुला। तो यह लोगों का राज्योत्सव नहीं है। यह तो उद्योगपतियों का, बिचौलियों का, भ्रष्ट अफ़सरों और नेताओं का राज्योत्सव है।

उद्योगों ने रायगढ़ को क्या दिया?

ग़रीबी, भुखमरी, विस्थापन, बीमारी, प्रदूषण, फर्ज़ी मुक़दमे, स्थानीय लोगों का बेतहाशा शोषण, दमन और जानलेवा दुर्घटना के अलावा रायगढ़ के लोगों को कुछ नहीं मिला। उद्योगों के कारण लोगों ने अपनी आजीविका का साधन और अपना सुख-चैन खोया।

छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है। बावजूद इसके यहां कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल का औद्योगिक साम्राज्य है। इस पर क्या कहना चाहेंगे?

सरकार किसी की भी हो, उद्योगों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पडता। केंद्र की कांग्रेसी सरकार और यहां की भाजपाई सरकार दोनों ही उद्योगपरस्त सरकारें है। दोनों ही उद्योगों के लिए समर्पित हैं और उद्योगपतियों के आगे नतमस्तक हैं। उद्योग किसके हाथों में है और कहां किसकी सरकार है, इससे लूट और लूट के तरीक़ों पर कोई अंतर नहीं पड़ता।

दिल्ली में धमाका करने के बाद अब आपका अगला क़दम क्या होगा?

फ़िलहाल, मुझे इलाज की ज़रूरत है। आपरेशनों से गुज़रना है लेकिन चलने-फिरने लायक़ होते ही संघर्ष के मोर्चे पर वापस लौटूंगा। उद्योग प्रभावित लोगों को साथ लेकर छत्तीसगढ के बाहर निकलूंगा। पूरे देश को बताऊंगा कि छत्तीसगढ़ में हाल कितने बुरे हैं, कि विकास का चेहरा कितना घिनौना, प्रकृत्ति विरोधी  है? 
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