मज़दूरों की सुरक्षा की आपराधिक अनदेखी

प्रगतिशील सीमेंट श्रमिक संघ के अध्यक्ष भगवती साहू उद्योग प्रभावित किसान संघ में भी सक्रिय हैं। अभी वह साढ़े तेरह महीने की जेल काट कर ज़मानत पर रिहा हुए हैं। बलौदा बाज़ार स्थित अंबुजा सीमेंट के प्रबंधन के इशारे पर उन्हें और उनके आठ साथियों पर फ़र्ज़ी मामले थोपे गये थे। यह सभी सीमेंट श्रमिकों के जुझारू नेता हैं। बाक़ी आठों साथी फ़िलहाल भूमिगत हैं। पिछले दिनों सामुदायिक पत्रकार भान साहू ने उनसे बातचीत की। देखें यह वीडियो...
अक्टूबर माह के आख़िरी पखवारे में राज्योत्सव की तैयारी परवान पर थी और इसी दौरान तीन दुखद औद्योगिक हादसे हुए। क्य़ा पता कि इस दौरान छोटे-बड़े और भी हादसे हुए हों जिसकी ख़बर लावारिस लाश की तरह दफ़्न हो गयी हो, भाप की तरह उड़ गयी हो? वैसे भी एकाध अपवादों को छोड़ दें तो छत्तीसगढ़ का मीडिया सरकारी और कारपोरेटी धुन पर क़दलताल ताल करता ज़्यादा नज़र आता है। बहादुर होता भी है तो उसकी बहादुरी सोडा वाटरी जोश की तरह- फव्वारा फूटा कि ठंडा हो गया। बहरहाल, पेश है छत्तीसगढ़ में मज़दूरों की सुरक्षा की आपराधिक अनदेखी के ताज़ा मामलों पर आदियोग का लेखाजोखा;

पिछली 22 अक्टूबर को रायपुर जिले के उरूला औद्योगिक क्षेत्र के एक लोहा कारख़ाने में बड़ा हादसा हुआ। प्रगति इंगट एंड पावर प्लांट के इस कारख़ाने में 12 मज़दूर घायल हुए जिसमें दो मज़दूरों ने तीसरे दिन दम तोड़ दिया। इनमें छह मज़दूरों की हालत अभी भी नाज़ुक है। हुआ यह कि कारख़ाने की भट्टी में कबाड़ डाला जा रहा था कि अचानक पिघलते लोहे में उबाल आ गया और जो उछल कर मज़दूरों पर जा गिरा। यह हादसा देर रात में हुआ। ऐसे किसी हादसे के समय ज़रूरी बंदोबस्त सिरे से नदारद था। बुरी तरह घायल हो चुके मज़दूरों को अस्पताल पहुंचाने में देरी भी हुई। उनके इलाज में भी कोताही हुई।
इतना बड़ा हादसा हुआ और तीन दिन तक प्रशासन सोता रहा। पुलिस ने प्राथमिकी तक दर्ज़ नहीं की। सरकारी अमला तब हरक़त में आया जब दो घायल मज़दूर मौत से जूझते हुए ज़िंदगी हार गये। शोर मचा तब कहीं जा कर मुक़दमा दर्ज़ हुआ और वह भी कारख़ाने के दो ज़िम्मेदार अफ़सरों के ख़िलाफ़। कारख़ाने का मालिक़ अभी तक क़ानून की ज़द से बाहर है। बताया गया कि हादसे की पूरी जांच के बाद मालिक़ को मुल्ज़िम बनाया जा सकता है। हुआ बस इतना कि जांच पूरी होने तक के लिए कारख़ाना बंद कर दिया गया और वह भी शोर-शराबा मचने के बाद।

लेकिन किसी पड़ताल से पहले ही यह आशंका रख दी गयी कि हो सकता है कि भट्टी में गलाने के लिए डाले गये कबाड़ में विस्फोटक रहा हो। यह मज़दूरों की हिफ़ाज़त के सवाल को तोड़फोड़ की साज़िश के शिगूफ़े से ढांक-पोत देने और इस तरह कारख़ाने के गुनाहगार मालिक़ को बरी किये जाने का रास्ता खोलने की कवायद थी। अलबत्ते उरला के मज़दूर संगठन ने हादसे के फ़ौरन बाद अपने स्तर से ज़रूर जांच-पड़ताल की। उसे कबाड़ में सिलेंडर दिखे। मामला साफ़ है। आंख मूंद कर पूरा सिलेंडर गलने के लिए झोंक दिया जाता रहा है। शिकायत मिली कि गलायेजाने कबाड़ में अक़्सर पुराने सिलेंडर होते हैं- एलपीजी गैस के, आक्सीजन के और तमाम रसायनों के भी। उन्हें गलाने से पहले तोड़ने की ज़हमत नहीं की जाती। इसमें समय लगता है और दमड़ी भी। उद्योगपति कम समय और कम ख़र्च में ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा लूटना चाहते हैं। इसके लिए मज़दूरों की ज़िंदगी को भी दांव पर लगाया जा सकता है।

याद रहे कि कुछ साल पहले उरला में कबाड़ में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान के ख़राब हो चुके दर्जनों राकेट मिले थे। इससे सनसनी फैल गयी थी। यह कबाड़ लोहा कारख़ानों का कच्चा माल था। समय रहते इसका पता चल गया और किसी बड़े हादसे की संभावना टल गयी। यह कुछ जागरूक नागरिकों की सतर्कता से मुमकिन हुआ। तब भी सरकार ने इसमें दहशतगर्दों की साज़िश सूंघी थी। जबकि मामला यह है कि भट्टियों को बंद नहीं किया जा सकता, उसे लगातार चलाये रखना होता है। इसके लिए भारी तादाद में कबाड़ की ज़रूरत पड़ती है और बेहतर क्वालिटी का कबाड़ कम मिलता है और मंहगा भी पड़ता है। इसलिए ज़्यादातर घटिया कबाड़ इस्तेमाल होता है और उसे जांचने की भी ज़हमत नहीं उठायी जाती। मुनाफ़ा कमाने की हड़बड़ी में इस तरह मज़दूरों की जान दांव पर लगती है।

रायपुर समेत रायगढ़, बिलासपुर, भिलाई और राजनांदगांव में सैकड़ों लोहा कारख़ाने चल रहे हैं और सभी में कमोबेश यही हाल है, मज़दूरों की हिफ़ाज़त का इंतज़ाम लगभग नदारद है और जहां है भी तो बहुत लचर-पचर है, कहने भर को है।

उरला की तरह सिल्तरा औद्योगिक क्षेत्र में भी कुछ ऐसा ही हादसा हुआ। यहां रश्मि इंडस्टीज़ में चार मज़दूर लौह अयस्क गलाने की 45 फ़ुट ऊंची भट्टी पर काम कर थे कि बुरी तरह झुलस गये। वे भी हिफ़ाज़ती एहतियात के बग़ैर काम पर लगा दिये गये थे। इनमें एक की हालत अभी तक नाज़ुक है। बताते चलें कि चारों ठेका मज़दूर थे। उरला के हादसे में शिकार हुए मज़दूर भी कारख़ाने के नहीं थे, किसी ठेकेदार के ज़रिये काम पर लगाये गये थे। ठेका मज़दूरी होती ही इसलिए है कि मजबूरी के मारों का ज़्यादा से ज़्यादा ख़ून-पसीना चूसा जा सके और, जब जी आये, उन्हें बिना किसी नोटिस के गेट आउट किया जा सके। बोनस, स्वास्थ्य और हिफ़ाज़त जैसे झंझटों से छुटकारा। कोई अनहोनी घटे तो वह ख़ुदा की मर्ज़ी।

उधर, रायगढ़ के तमनार में लगे जिंदल के पावर प्लांट में 19 अक्टूबर को बड़ा हादसा हुआ। मज़दूरों का दल 150 फ़ुट की ऊंचाई पर निर्माणाधीन टावर पर थे कि अचानक टावर ही ढह गया। एक मज़दूर ने फ़ौरन दम तोड़ दिया। दूसरे मज़दूरों का क्या हश्र हुआ, पता ही नहीं चला। मीडिया को घटना स्थल तक पहुंचने से रोक दिया गया। जिसने अपनी जान गंवायी, वह हाइथ्रो पावर कंपनी के लिए काम रहा था और ठेका मज़दूर की हैसियत में था। यह कंपनी कोरबा वेस्ट पावर लि. के लिए भी टावर बना रही है। हादसे में अपनी जान से हाथ धो बैठा वह मज़दूर बिना किसी सुरक्षा बेल्ट के था। मरने के बाद उसके शव को ज़रूर सेफ़्टी बेल्ट पहना दी गयी ताकि ढिंढोरा पीटा जा सके कि कंपनी मज़दूरों की हिफ़ाज़त के मामले में पाबंद और चौकस रहती है।

याद रहे कि राज्योत्सव से ठीक पहले के उसी पखवारे के दौरान रायगढ़ के श्रम न्यायालय ने उद्योगों में मज़दूरों की हिफ़ाज़त के सिलसिले में पांच कंपनियों को ग़ैर ज़िम्मेदार माना था और इसके लिए उन पर ज़ुर्माना भी ठोंका। इनमें जिंदल भी शामिल है। लेकिन ग़ौर कीजिये कि यह ज़ुर्माना भी कितना था? पांचों कंपनियों पर कुल मिला कर 23 लाख रूपये। जिंदल साम्राज्य के लिए तो इस रक़म की कोई क़ीमत ही नहीं। पता नहीं कि यह ज़ुर्माना वसूला भी जा सका या नहीं या कि उसे माफ़ कर दिया गया? यह कौन बतायेगा?
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