सुनिये क़रीब आती बदलाव की आहट...

श्रमिक के चुनिंदा शेर

उम्र की तीन चौथाई सदी पार कर चुके शायर कमल किशोर ‘श्रमिक’ कानपुर में ही पैदा हुए, यहीं पले-बढ़े और यहीं से कानपुर के बाहर दूर-दूर तक जाने गये। वामपंथी आंदोलनों में सक्रिय रहे श्रमिक जी किदवई नगर स्थित श्रमिक बस्ती में रहते हैं- गोया बिन कहे कहते हैं कि मैं जिनके बीच रहता हूं और जिनकी तरह जीता हूं, मैं उन्हीं की बात रखता हूं। पेश है उनकी ग़ज़लों के चुनिंदा शेर;

इस दर्द के एहसास को हम बांट रहे हैं
हम मिल के उम्र क़ैद यहां काट रहे हैं।

तहज़ीब से मरने का हुनर सीख लीजिये है
आदमी की भूख से ख़तरा निजाम को।

एतराज़ से मरना भी है तौहीने अदालत
ज़ल्लाद की ख़्वाहिश है ज़रा मुस्कराइये।

मायूस परिंदों में ये चर्चा है आजकल
अपने चमन के वास्ते इक संविधान है।

ख़ुशबू चमन की दोस्तों निर्यात हो रही
ये बात समझते हैं परिंदे भी डाल के।

चंद बादल कहीं वीराने में बरसे हैं दोस्त
लोग पानी की इक बूंद को तरसे हैं दोस्त।

ज़रा बता दो अंधेरे के अदाकारों को
रोशनी के लिए पैग़ाम लिख रहे हम।

उठो चलो क़दम क़दम से मिला के देखें
अपने हाथों से पहाड़ों को हिला कर देखें।

जांबाज़ परिंदों की उड़ानों को देखिये
पंजों में इनके क़ैद शिकारी का जाल है।
अभी कल ही यह पहली बार हुआ कि लगभग सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने रायपुर के शहीद स्मारक परिसर में साझा आयोजन किया। सबने माना कि आज ट्रेड यूनियन आंदोलन बचाव की मुद्रा में है और उसे आक्रामक मुद्रा अख़्तियार करनी होगी, कि साझा संघर्ष इसकी पहली मांग है। तय हुआ कि अगले 18 नवंबर को जिला स्तर पर और उसके अगले दिन राज्य स्तर पर जेल भरो आंदोलन होगा। राष्ट्रीय स्तर पर 20-21 फ़रवरी 2013 को पूरे देश में 48 घंटे की हड़ताल की जायेगी। यह बदलाव की आहट हो सकती है।

सीआर बख्शी सीपीआई के बड़े नेताओं में से हैं और विभिन्न जन आंदोलनों के साझा संघर्षों के पैरोकार हैं। छत्तीसगढ़ में अपनी जुझारू सक्रियताओं की आधी सदी वे पार चुके हैं। उनके बारे में विद्रोही लेखक के तौर पर मशहूर हुए दिवंगत हंसराज रहबर के इस शेर के हवाले से कहा जा सकता है कि- क्या हौसले हैं दिल में रहबर न पूछ, है सामने पहाड़ ढहाने को जी करे। आज 80 साल की उम्र में भी वे बदलाव का जवान सपना संजोते हैं और उसे सच में बदलने का हौसला रखते हैं। रायपुर सम्मेलन की तैयारी और उसमें हुए फ़ैसले की पूरी प्रक्रिया के वे अहम साझीदार रहे हैं। पेश है छत्तीसगढ़ के ताज़ा हालात पर उनकी राय जिसे आदियोग ने क़लमबंद किया है;

छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बने 12 साल गुज़र गये। जिस उम्मीद के साथ छत्तीसगढ़ की मांग हुई थी, वह पूरी नहीं हो सकी। लेकिन हां, कहना होगा कि इन 12 सालों में कहा जाये तो हमने पाया भी है और खोया भी है। अलग राज्य बनने से पहले मध्य प्रदेश में रह रहे छत्तीसगढ़ के लोग लगातार महसूस कर रहे थे कि भोपाल उनकी नहीं सुनता, प्रशासन उनका भला नहीं करता। उनके इलाक़े के जल, जंगल, ज़मीन का दोहन होता है लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिलता। छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना तो उन्हें लगा कि अब हालात बदलेंगे, उनकी ज़िंदगी सुधरेगी और सरकारी उदासीनता से, शोषण की स्थिति से उन्हें मुक्ति मिलेगी, बेहतरी की राह खुलेगी। यहां उनकी सुनी जायेगी, उनके दुख-दर्द दूर किये जायेंगे। आख़िर यह तो छत्तीसगढ़ियों का अपना राज्य है।

लेकिन जल्द ही यह भ्रम टूट गया। यह तो होना ही था। यह नासमझी थी कि अलग राज्य बन जाने से सब कुछ ठीक हो जायेगा। लोग भूल गये कि पूंजीवादी व्यवस्था में भला यह कैसे मुमकिन हो सकता है? धीरे-धीरे लोग इस सच से दोचार होते गये- अलग राज्य बनने का यह सकारात्मक पक्ष है। पिछले 12 सालों की दूसरी बड़ी उपलब्धि यह भी है कि नये राज्य ने छत्तीसगढ़ियों को नयी पहचान मिली। उन्होंने अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं पर गर्व करना सीखा। मध्य प्रदेश का निवासी होते हुए उन्हें अपनी ख़ासियतों का बोध नहीं था। अलग छत्तीसगढ़ राज्य के गठन ने इसका बोध जगाया, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास दिलाया।

नकारात्मक पक्ष यह है कि छत्तीसगढ़ियों के साथ पहले से चली आ रही लूट-खसोट अलग छत्तीसगढ़ राज्य में और बढ़ गयी और जो लगातार बढ़ती ही गयी। छत्तीसगढ़ के आदिवासी, पिछड़े और दूसरी जातियों के ग़रीब और मेहनतकश लोगों की ज़िंदगी सुधरने के बजाय और बिगड़ती गयी। सही है कि छत्तीसगढ़ में कमाल का विकास हुआ लेकिन उसका फ़ायदा केवल लुटेरों की झोली में गिरा। बाहर से आये कारपोरेट घरानों ने यहां डेरा डाला और बेधड़क लूट की, लूट की सारी सीमाएं तोड़ दीं। पहले कांग्रेस की सरकार बनी, फिर भाजपा की। दोनों ने लुटेरों को अभयदान दिया। अजीत जोगी की सरकार ने इसकी शुरूआत की तो ड़ा. रमन सिंह की सरकार ने इसमें चार चांद लगाने का काम किया। ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट इसका ताज़ा सबूत है।

आज हालत यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कारपोरेट घरानों के अलावा मंत्री और अफ़सर सभी लूट की होड़ में हैं। उनकी चल-अचल संपत्तियों में चौंकानेवाली बढ़त हुई है। यह कोयला आबंटन से लेकर भूमि अधिग्रहण, नदियों के निजीकरण और जंगलों पर अतिक्रमण का नतीज़ा है जिसने संपत्ति के केंद्रीयकरण को मज़बूती दी। राज्य में एक के बाद एक और एक से बढ़ कर एक भ्रष्टाचार के मामले सामने आये लेकिन कार्रवाई कहने भर को हुई। तो इस माहौल में कुल मिला कर अमीर और ग़रीब के बीच की खाई ख़तरनाक़ रफ़्तार से गहरी और चौड़ी हुई- देश के दूसरे राज्यों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा।

अमीर लगातार और अमीर होते जायेंगे, ग़रीब और ग़रीब होते जायेंगे तो ज़ाहिर है कि ग़रीबों के बीच ग़ुस्सा पनपेगा और उफ़ान बन कर फूटेगा। माओवाद की समस्या का यही सच है। आज का नौजवान शिक्षित हो रहा है, जाग रहा है। यह मुमकिन नहीं कि वह हाथ पर हाथ धर कर चुपचाप अपनी बर्बादी का तमाशा देखता रहे और घुट-घुट कर जिये।

यहां तो कोई ख़ुश नहीं। किसान, मज़दूर, छोटे दुकानदार, सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, छात्र, नौजवान, महिलाएं सबके सब दुखी-परेशान हैं। यह सकारात्मक पक्ष है कि वे अपने अधिकार जान रहे हैं, ख़ामोशी तोड़ रहे हैं, संघर्ष में उतर रहे हैं। इससे नयी उम्मीद जागी है। आम तौर पर जनता अभी तक या तो कांग्रेस के पक्ष में थी या भाजपा के पक्ष में। अब दोनों दलों से उसका मोह और विश्वास टूट रहा है। लोग समझने लगे हैं कि भले ही दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वंदी नज़र आते हों और उनका नारा-निशान और रंग अलग हो लेकिन असल में उनके बीच कोई बुनियादी फ़र्क़ नहीं है। दोनों सिक्के के दो पहलू हैं।

दोनों दलों से उकता कर छत्तीसगढ़ की आबादी का बड़ा हिस्सा अब विकल्प की खोज में है। ऐसा भी नहीं कि वे सब लाल झंडेवाले हैं, क्रांतिकारी हैं। उसमें ग़ैर राजनैतिक लोग भी हैं, एनजीओवाले भी हैं। शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, मितानिनें, मिडडे मील के रसोइये जैसे लोग भी हैं। यह नयी परिघटना है। छत्तीसगढ़ियों ने समझा है कि लोकतांत्रिक मूल्य क्या होते हैं और बेहतरी के लिए क्यों ज़रूरी होते हैं? इसीलिए दमन के बावजूद तीसरे विकल्प की संभावना बढ़ी है।

अविभाजित मध्य प्रदेश के छत्तीसगढ़ी इलाक़ों में अभाव और सरकारी बेदली के बावजूद अमन-चैन था और शानदार समाज था जिसमें आपसी झगड़े नहीं थे, फूट नहीं थी। आज उसी छत्तीसगढ़ में अपराध ने पांव पसारे हैं, आपसी विश्वास और सहयोग की भावना की मज़बूत डोर भी कमज़ोर हुई है। इसलिए कि कारपोरेट और सरकार की जुगलबंदी ने सामाजिक बुनावट को तोड़ा है, सहनशीलता और सामूहिकता के मूल्यों को ध्वस्त किया है। अंधविश्वास और धार्मिकता को खुला बढ़ावा दिया गया है। बीपीएल कार्डधारी बुजुर्गों को सरकारी ख़र्चे पर तीर्थाटन कराने की अभी कुछ महीने पहले की घोषणा इसका ताज़ा उदाहरण है। आदिवासियों के हिंदूकरण का अभियान तो ख़ैर भाजपा सरकार के आते ही परवान चढ़ा। जाति विशेष के सम्मेलनों की तो जैसे झड़ी लग गयी। यह लोगों को जाति-धर्म के आधार पर बांट कर अपना उल्लू सीधा करने का बेहूदा और अश्लील खेल है।

अभी निवेशकों का मेला ख़त्म हुआ है। इसमें विभिन्न उद्योगों के लिए सरकार ने कंपनियों के साथ एमओयू पर दस्तख़त किये। यह सब कुछ जनता की राय जाने बग़ैर किया गया। तय नहीं हुआ कि उद्योग कहां लगेंगे और एमओयू हो गये। सरकारी ज़मीन तो बहुत थोड़ी है। ज़ाहिर है कि उद्योगों के लिए लोगों की ज़मीनें छीनी जायेंगी, जंगलों पर धावा बोला जायेगा। यह सर्वनाश को बुलावा देना है, छत्तीसगढ़ियों को दर-दर भटकने के लिए मजबूर कर देने का इंतज़ाम करना है। जिंदल और मोनेट ने रायगढ़ को बुरी तरह प्रदूषित कर दिया, उसकी आबो-हवा में ज़हर घोल दिया। इतना कि लोगों का जीना, सांस लेना दुश्वार हो गया। सवाल है कि धान के कटोरे का क्या होगा? जांजगीर चांपा की 90 फ़ीसदी ज़मीन खेती की रही है। यह धान के कटोरे का केंद्र है और वहीं पावर प्लांट के 35 एमओयू किये गये। यह तो खाद्य सुरक्षा पर हमला है। अंधाधुंध उद्योग इसका हथियार है।

रमन ने घोषणा की कि उद्योगों से छह लाख रोजगार पैदा होगा। यह सफ़ेद झूठ है। अभी तक जितने उद्योग लगे, उसमें बाहरी लोगों को ही बड़ी संख्या में रखा गया- चाहे वह जिंदल का प्लांट हो या बाल्को का। बाल्को की चिमनी ने कोई डेढ़ दर्ज़न मज़दूरों को निगल लिया। इनमें ज़्यादातर बाहर से लाये गये मज़दूर थे। सर्वे होना चाहिए कि छत्तीसगढ़ के तमाम उद्योगों में काम कर रहे कर्मचारियों में कितने फ़ीसद छत्तीसगढ़ी हैं। सबको यह भी पता चलना चाहिए कि उद्योगों में मज़दूरों की हिफ़ाज़त का कितना और कैसा बंदोबस्त है। और यह भी पता चलना चाहिए कि कुल कामगारों में कितने ठेका मज़दूर हैं। वैसे, ठेका मज़दूरी हर कहीं दिखती है- सरकारी विभागों में 50 फ़ीसदी काम उसी के हवाले है। अर्ध सरकारी विभागों में तो और बुरी हालत है।

इस सबके बीच अंतर्द्वंद बढ़े हैं और याद रखना चाहिए कि बदलाव का रास्ता अंतर्द्वंद से गुज़र कर बनता है। हो सकता है कि हाल-फ़िलहाल हालात और बिगड़ें लेकिन बदलाव हर हाल में आना है, बहुत बड़ा बदलाव आना है।

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