छत्तीसगढ़ महतारी की नीलामी का राज्योत्सव

महामहिम राष्ट्रपति ने कल शाम छत्तीसगढ़ की नयी राजधानी नया रायपुर में बने राज्य के नये मंत्रालय भवन और विभागाध्यक्ष भवन का लोकार्पण किया और इसी के साथ राज्योत्सव का समापन हो गया। यहां सब कुछ नया था, शानदार और शंहशाही था। हां, इस जादुई मेले के बाहर सब कुछ ज़रूर वही पुराना था- भुखमरी और ग़रीबी का नज़ारा, कल्याणकारी सरकर की ज़्यादतियों और बेदिली के शर्मनाक़ क़िस्से, उसके झूठे वायदे और तरक़्क़ी के फ़र्ज़ी आंकड़े, बेबस और उदास चेहरे, छावनियों में तब्दील हो गये इलाक़े, यहां-वहां ख़ौफ़ और दहशत से तरबतर मरघटी ख़ामोशी, जम्हूरियत और इंसानियत के उड़ते परखचे और हां, इंसाफ़ मांगती और लगातार तेज़ होती आवाज़ें भी। राज्योत्सव के बहाने पेश है आदियोग का यह आलेख;
हम ज़िंदा थे, हम ज़िंदा हैं, ज़िंदा रहेंगे।

सलवा जुडुम का गठन 2005 में पूर्व कांग्रेसी विधायक महेंद्र कर्मा की अगुवाई में हुआ था। यह वही समय था जब बस्तर में भारी पैमाने पर उद्योग लगाये जाने की कवायद शुरू हुई। दुनिया से यही कहा गया कि सलवा जुडुम माओवादियों के ख़िलाफ़ आदिवासियों का स्वत:स्फूर्त आंदोलन है और बस्तर में अमन की बहाली का दस्ता है लेकिन इसने केवल बदअमनी को पैदा किया और हैवानियता के रिकार्ड बनाने का काम किया। उसी की मेहरबानी से बस्तर के सैकड़ों गांव उजड़ गये- बड़ी संख्या में घर जले, लोग मरे, महिलाओं के साथ बलात्कार हुए, फ़सलें बर्बाद हुईं और बेगुनाह आदिवासी जेलों में पहुंचे। इसे लेकर पूरी दुनिया में देश की थूथू हुई। तब भी सलवा जुडुम का ख़ूनी खेल और उसे राज्य सरकार का संरक्षण मिलना जारी रहा।

देश की सबसे बड़ी अदालत के कड़ा रूख़ अख़्तियार करने के बाद ही राज्य सरकार ने उसको दी जा रही आर्थिक और हथियारों की सहायता रोकी। भले ही पंजा और कमल के बीच कुश्ती का माहौल दिखता हो लेकिन सलवा जुडुम के मामले ने भी साफ़ कर दिया कि माओवाद के सफ़ाये को लेकर देश के इन दोनों प्रमुख विपक्षी दलों के बीच कमाल की एकता है। इसलिए कि दोनों ही दल सबसे पहले उद्योगों के तरफ़दार हैं। उनके लिए देश और देश की जनता उसके बाद है।

सलवा जुडुम की पैदाइश से लेकर उसके परवान चढ़ने तक के दौर में छत्तीसगढ़ के पुलिस प्रमुख थे विश्वरंजन। वे इस पर इतराते रहे हैं कि साहित्य उनके खू़न में रहा है। वे उर्दू के जानेमाने शायर उन फ़िराक़ गोरखपुरी के पौत्र हैं जिन्हें नेहरु बहुत मानते थे और फ़िराक़ साहब सरेआम उनसे भी चुटकी लेने में नहीं हिचकिचाते थे। जो फ़िराक़ साहब को महज़ हुस्नो-इश्क़ के शायर के बतौर जानते हैं, शायद उन्होंने फ़िराक़ साहब के काव्य संग्रह ‘धरती की करवट’ को नहीं पढ़ा जिसमें रोटियां, क़ैदी, जागते रहो, माज़ीपरस्त, नयी चेतना जैसी नज़्में शामिल हैं और जो लयताल की खू़बसूरती के साथ ज़ालिम निजाम से बग़ावत करने का पैग़ाम देती हैं। फ़िराक़ साहब को अपनी धारदार नज़्मों के कारण आज़ादी से पहले जेल की हवा खानी पड़ी थी। आज ज़िंदा होते और लिख रहे होते तो जेल में ही होते। विश्वरंजन अपने पितामह से बहुत हट के हैं।

बहरहाल, इन्हीं में दास्ताने आदम नाम की उनकी मशहूर लंबी नज़्म के इस पहले बंद को यहां पेश करना मुनासिब होगा।

क़ुर्नो के मिटाने से मिटे हैं, न मिटेंगे
आफ़ाते-ज़माना से झुके हैं, न झुकेंगे
उभरे तो दबाने से दबे हैं, न दबेंगे
हम मौत के भी मारे मरे हैं, न मरेंगे
हम ज़िंदा थे, हम ज़िंदा हैं, ज़िंदा रहेंगे।

(क़ुर्न का मतलब है युग)

राज्योत्सव के मौक़े पर राष्ट्रपति को छत्तीसगढ़ आना ही था। उनका तयशुदा कार्यक्रम कैसे टलता और क्यों टलता? इसे यों भी कहा जा सकता है कि नया रायपुर से प्रभावित हुए किसानों द्वारा उनसे की गयी छत्तीसगढ़ न आने की गोहार बेअसर रही। याद रहे कि नयी राजधानी के लिए 27 गांवों की ज़मीन ली गयी थी। यह खेती की ज़मीन थी, पुश्तों से उनकी आजीविका का साधन थी। ज़मीन गयी तो उनकी ज़िंदगी अधमरी हो गयी, ख़ुशहाली और आत्मनिर्भरता की लहलहाती फ़सलों को हमेशा के लिए पाला-ओला मार गया। इसके बदले उन्हें वाजिब मुआवज़ा और पुनर्वास पैकेज नहीं मिल सका। सरकार ने अपने क़ब्ज़े में ज़मीन के आते ही उनसे किये गये अपने वायदे से मुंह मोड़ लिया। किसानों की ज़मीनें कौड़ियों के भाव उनके हाथ से निकल गयी और वही ज़मीन देखते-देखते कई गुना मंहगी हो गयी। 

राज्योत्सव सरकार को झुकाने का उम्दा मौक़ा था। उनका आंदोलन एक नवंबर को राज्योत्सव के शुभारंभ के साथ ही शुरू हो जाना था। सरकार के लिए यह बड़ी चिंता का सबब था कि अगर कहीं ऐसा हुआ तो ‘विश्वसनीय छत्तीसगढ़’ के दिये गये नारे का क्या होगा? इससे तो निवेशकों के सामने सरकार की किरकिरी हो जायेगी, यह नारा ही अविश्वसनीय हो जायेगा। इश्तहारों में किये गये उस दावे की तो हवा निकल जायेगी कि नया रायपुर छत्तीसगढ़ के विकास का ध्वजावाहक बनेगा, कि छत्तीसगढ़ के सुनहरे इतिहास में नया अध्याय जोड़ेगा। किसानों के आंदोलन को रोकना ज़रूरी था। जो सरकार किसानों की सुनने को तैयार नहीं थी, उसने किसानों को ठंडा करने का नया नाटक किया और किसानों के साथ झटपट समझौता किया। लगा कि सरकार झुक गयी लेकिन यह नज़रों का वहम था। जल्द ही इस नाटक की पोल खोल गयी। पता चला कि समझौते में इतनी अगर-मगर है कि किसानों को अपना हक़ हासिल करने में पसीने छूट जायेंगे। इसने किसानों को भड़का दिया। उसे क़ाबू में करने के लिए सरकार ने दोबारा बातचीत का नाटक किया और इस दौरान किसानों के बीच फूट डालने की कोशिशें भी तेज़ कर दीं और जिसमें वह कामयाब भी हो गयी। राज्योत्सव शुरू होने से ठीक एक दिन पहले सरकार ने अपनी मजबूरियां गिनाते हुए ठोस फ़ैसला लेने के लिए किसानों से तीन दिन की मोहलत मांगी। आपसी एकता बनाये रखने के लिए किसानों के बड़े हिस्से को मन मसोस कर तीन दिन इंतज़ार करने को राज़ी होना पड़ा।

राज्योत्सव के पहले तीन दिन तक अमन-चैन का रहना सरकार के लिए बहुत ज़रूरी था। पहली शाम तो राज्योत्सव नाम के इस मेले के उद्घाटन के लिए थी और अगले दो दिन निवेशकों का मेला था। राज्योत्सव तो इसीलिए था। लेकिन जैसा कि पक्का अंदेशा था, तीन दिन में कोई ठोस फ़ैसला नहीं लिया जा सका, लिया जाना ही नहीं था। तीन दिन की मांगी गयी मोहलत तो महज़ किसानों को बहलाये रखने के लिए थी। मोहलत की मियाद सरकारी जवाब के इंतज़ार में गुज़र गयी लेकिन ठोस नतीज़ा गुमशुदा ही बना रहा। आख़िरकार चौथे दिन से किसानों के आंदोलन ने चुप्पी तोड़ी। सरकारी चाल में पहले भटक गया किसानों का छोटा सा हिस्सा भी अब साथ खड़ा था। एकता वापस लौटी लेकिन हां, सरकार की दुखती रग पर हाथ धरने का सही समय ज़रूर निकल चुका था।

ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट को कामयाब बनाने के लिए सरकार ने पानी की तरह रूपये बहाये। निवेशकों को लुभाने के लिए देश-विदेश के दौरे हुए और जिसकी कमान ख़ुद मुख्यमंत्री ने संभाली। आख़िर यह छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आयोजित पहला ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट था। कितना ग्लोबल था, इसकी कलई तो आयोजन के दौरान ही खुल गयी। विदेशी निवेशकों ने इसमें कहने भर को भागीदारी की और जिन्होंने की, उन्होंने निवेश करने में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखायी। कलई तो राज्य की नयी औद्योगिक नीति की भी खुली। कहा गया था कि कोर सेक्टर के उद्योगों (बिजली, इस्पात और सीमेंट आदि) में झंडे गाड़ने के बाद अब नान कोर सेक्टर (रियल स्टेट, परिवहन, पर्यटन, होटल, वनोपज, आटोमोबाइल, फ़ूड प्रोसेसिंग आदि) में छत्तीसगढ़ का सिक्का जमाने की बारी है। लेकिन निवेश के प्रतिशत के लिहाज़ से सबसे आगे कोर सेक्टर ही रहा। धान के उत्पादन में छत्तीसगढ़ का हमेशा से ऊंचा स्थान रहा है लेकिन खेती में निवेश के लिए बस दो हज़ार करोड़ रूपयों के निवेश का ही करार हो सका।

बेशक़, ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट को मिली यह नाकामयाबी छत्तीसगढ़ के आम वाशिदों के लिए बहुत शुभ है वरना अगर सचमुच इतने करार हो गये जिसका ढिंढ़ोरा पीटा गया था तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि छत्तीसगढ़ के लोगों को कितनी बड़ी मुश्किलों से सामना करना पड़ता? यों भी पहले हुए करार ने कोई कम समस्याओं की बाढ़ पैदा नहीं की है। छत्तीसगढ़ का चप्पा-चप्पा संघर्ष का मैदान बन जाता और हम हर आदिवासी और हर ग़रीब कट्टर माओवादी मान लिया जाता। सरकार ने अपनी पीठ ठोंकी कि निवेशकों के इस सम्मेलन में 1.24 लाख करोड़ रूपयों की लागतवाले कुल 272 करार हुए। लेकिन राज्योत्सव के दौरान ही भेद खुल गया कि यह आंकड़ा भी फ़र्ज़ी है- हक़ीक़त में तो 68 हज़ार करोड़ रूपयों से भी कम लागतवाले केवल 137 करार हुए थे। यह सबूत है कि राज्य सरकार आंकड़ेबाजी के खेल की कितनी बड़ी उस्ताद है।

तय है कि इसी तरह के खेल से राज्य का नाम न्यूनतम बेरोजगारी दर की सूची में पहुंचाया गया है और ऐसी हेराफेरी से ही सबको हैरान करते हुए राज्य को पिछले साल किसान आत्महत्याओं के कलंक से एक झटके में आज़ाद कराया गया है। यह भी तय है कि लगातार खेती के होते सत्यानाश और खेतिहर ज़मीन के घटते रक़बे के बावजूद राज्य को धान के उत्पादन में अव्वल बनाया गया है।

दो राय नहीं कि नयी राजधानी सपनों का शहर होगी जहां दुनिया जहान की सुख-सुविधाएं होंगी और ख़ुशहाली होगी। लेकिन किसके लिए? केवल उनके लिए जिनके पास उसे हासिल करने की क़ुव्वत है और जो भ्रष्टाचार, संसाधनों की लूट-खसोट और दूसरों का हिस्सा हड़प कर बनी है। मतलब कि देश की दूसरी राजधानियों की तरह नया रायपुर भी सबसे पहले इन्हीं छोटे-बड़े लुटेरों की ऐशगाह होगी। इसीलिए स्वामी विवेकानंद के नाम से माना में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा तैयार है। रायगढ़ और बिलासपुर में भी जल्द से जल्द हवाई अड्डा बनाये जाने की योजना है ताकि बड़े लुटेरों को किसी तरह की कोई तकलीफ़ न हो। चांद छूने की चाहत है तो हवाई सफ़र पर निकलना होगा और तब ज़मीं के मसाइल पर फ़िक़्र करने की फ़ुर्सत भला कहां होगी?     

तो महामहिम राष्ट्रपति ने राज्योत्सव के समापन समरोह में दिये गये अपने भाषण में छत्तीसगढ़ के गौरवशाली इतिहास का बखान किया, उसके बेहतर भविष्य को तय माना। कहा कि अलग राज्य बनने के बाद इसने लगातार तरक़्क़ी की है, कि यहां विकास की बेहिसाब गुंजाइश मौजूद है। उन्होंने नया रायपुर में बुनियादी सहूलियतों के उम्दा इंतज़ाम और उसकी बसाहट की जम कर तारीफ़ करते हुए भरोसा जताया कि उसे इस सदी की सबसे ख़ूबसूरत राजधानी का ओहदा मिलेगा। छत्तीसगढ़ के अतीत का यही गुणगान और उसके शानदार भविष्य की यही तसवीर मुख्यमंत्री और उनके आला सिपहसालारों ने भी पेश की। लेकिन छत्तीसगढ़ के आज के बुरे हालात पर ज़ाहिर है कि सबने चुप्पी साधी।  

ग़ौर तलब है कि राष्ट्रपति नयी राजधानी पहुंचने से पहले पुरानी राजधानी में थे। वहां बस्तर से आये तमाम आदिवासी उनसे मिलने की आस लेकर पहुंचे थे। मक़सद था राष्ट्रपति के सामने अपना यह दर्द बयां करना कि बस्तर को लूटने के लिए राज्य सरकार और उद्योगपतियों के गठजोड़ से आदिवासियों को वहां से खदेड़ देने की बर्बर मुहिम चल रही है। वे बताना चाहते थे कि राज्य सरकार उनके साथ दुश्मनों जैसा बर्ताव कर रही है कि उसे डांटिये-फटकारिये देश के आला हुज़ूर, कि आदिवासियों को उसके ज़ोर-ज़ुल्म से बचाइये महामहिम जी। राष्ट्रपति होने के नाते आप तीनों सेनाओं के मुखिया भी हैं और उसी सेना के प्रशिक्षण के लिए वहां 750 वर्ग किलोमीटर के इलाक़े के अधिग्रहण का प्रस्ताव है। बस्तर के हम आदिवासी भी इस देश के नागरिक हैं लेकिन विकास के नाम पर अपने इलाक़े से बाहर किये जाते रहे हैं। अब सेना के प्रशिक्षण के नाम पर उनकी एक और बेदख़ली की तैयारी है। तो आदिवासियों को इस कहर से बचाने के लिए दख़ल दीजिये महामहिम।  वरना हम कहां जायेंगे? बेमौत मारे जायेंगे- पुलिस और सुरक्षा बलों की गोलियों से या जेल की चारदीवारी में और अगर पीछे हटे तो भूख से।

लेकिन महामहिम तक वे नहीं पहुंच सके। उनके सामने अपनी फ़रियाद नहीं रख सके। महामहिम के पास इतना समय नहीं था और इसकी ज़रूरत भी नहीं थी कि पांच मिनट बस्तर के आदिवासियों का दुखड़ा सुनने में ख़र्च कर दिया जाये। आख़िर वे महामहिम हैं और महामहिम को किसी ऐरे-ग़ैरे-नत्थू-ख़ैरे से क्या मतलब? राष्ट्रपति तो वे अब बने हैं। इसलिए भी बने हैं कि हमेशा से वफ़ादार कांग्रेसी रहे हैं और कांग्रेस माओवादियों को देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानती है, उनका सफ़ाया चाहती है। राष्ट्रपति हो जाने से भला पुराना याराना कहीं टूट सकता है? मूरख कहीं के, इतना भी नहीं समझते बस्तर के जंगली।

तो माननीय मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव का गाजे-बाजे के साथ उद्घाटन किया और महामहिम राष्ट्रपति ने इतने लकदक विकास के लिए सूबे की सरकार की पीठ ठोंकते हुए उसका समापन। यह छत्तीसगढ़ महतारी को सरे आम नीलाम किये जाने का राज्योत्सव था जहां केंद्र और राज्य की सरकारें उस पर बोलियां लगाने आये धन्नासेठों की ख़िदमत और हौसला अफ़ज़ाई में हाज़िर थीं। इस फूहड़ और शर्मनाक़ शोर-शराबे में छत्तीसगढ़ महतारी की सिसकियां कौन सुनता और भला क्यों? लेकिन सूबे की जनता ने उसकी पुकार ख़ूब सुनी और पिछले 12 सालों से सुनती रही है, उसे बचाने के लिए लड़ती रही है- कहीं सड़कों पर तो कहीं जंगल में, कहीं हाथों में नारों की तख़्तियां लेकर तो कहीं कांधे पर बंदूक धर कर। 





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