छत्तीसगढ़ को लूटने का राज्योत्सव

अदम के शेर

अदम का मतलब है वंचित। अदम गोंडवी सचमुच पूरी उम्र अभाव और ग़रीबी में जिये- अदम थे, अदम ही रहे। वे कुल पांचवां दर्ज़ा पास थे लेकिन कहना होगा कि ज़िंदगी और समाज के सबसे बड़े विश्वविद्यालय से उन्होंने शायरी में पीएचडी हासिल की थी और इसीलिए बग़ावत की शायरी के आला फ़नकार बन गये। पिछले साल दिसंबर में उन्होंने गंभीर बीमारी से जूझते हुए अपनी आख़िरी सांस ली। पेश है उनकी ग़ज़लों के चुनिंदा शेर;
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है।

कोठियों से मुल्क़ के मेयार को मत आंकिए
असली हिंदुस्तान तो फ़ुटपाथ पर आबाद है।

उनका दावा मुफ़लिसी का मोर्चा सर हो गया
पर हक़ीक़त ये है मौसम और बदतर हो गया।

तुम्हारी फ़ाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा क़िताबी है।

वो जिसके हाथ में छाले हैं, पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक़ आपके बंगलों में आयी है।

आनेवाली नस्ल को सौग़ात देने के लिए
लो सजा शोकेस में इंसानियत की लाश को।

भारत मां की इक तसवीर मैंने यूं बनायी है
बंधी है एक बेबस गाय खूंटे में कसाई के।

एक सपना है जिसे साकार करना है तुम्हें
झोपड़ी से राजपथ का रास्ता हमवार हो।
सुधा भारद्वाज अपने पूरे अंदाज़ और मिजाज़ में ठेठ छत्तीसगढ़ी महिला हैं। वे पीयूसीएल की राज्य इकाई की अध्यक्ष हैं, बिलासपुर उच्च न्यायालय की मशहूर वकील हैं, ट्रेड यूनियन आंदोलनों का जाना-पहचाना नाम हैं और विभिन्न जन संघर्षों की हमराही हैं। कोई चार साल पहले लिखी गयी उनकी ‘बर्बरतम विस्थापन और बहादुराना प्रतिरोध’ नामक पुस्तिका छत्तीसगढ़ में राज्य दमन और संघर्ष की ज़िंदा तसवीर खींचती है। पेश है छत्तीसगढ़ के ताज़ा हालात को लेकर उनकी यह टिप्पणी; 

12 साल पहले जब अलग छत्तीसगढ़ राज्य बना तो यह जुमला चल निकला और जो ख़ूब मशहूर हुआ कि अमीर धरती के ग़रीब लोग। आज कहना होगा कि यहां के ग़रीब और गरीब हो गये। इधर पूरे देश में कोयला आबंटन को लेकर हल्ला-गुल्ला मचा। कोयला आबंटन और उसमें हुई धांधलियों का गढ़ तो छत्तीसगढ़ है। इस मायने में इसने बाक़ी दूसरे राज्यों को पछाड़ दिया। यह तो होना ही था। इसलिए कि कोयले के सबसे ज़्यादा भंडार यहीं हैं और कंपनियों पर सबसे ज़्यादा मेहरबान भी यहीं की सरकार रहती है।

इस तरफ़ ध्यान दिलाना चाहूंगी। चुनावी मौसम में सरकारें जनता को रिझाने और उनका विश्वास जीतने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देती हैं। अपने दामन को पाक-साफ़ दिखाने और ख़ुद को जनता का हमदर्द बताने के तमाम जतन करती हैं। यह बहुत स्वाभाविक भी है। लेकिन यहां इसका उल्टा दिख रहा है। सरकार उद्योगपतियों को रिझाने और उनका विश्वास जीतने का काम कर रही है। राज्योत्सव के दौरान आयोजित किया गया ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट यही कहानी कहता है। राज्योत्सव तो इसका बहाना भर था।


इसे बड़े परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की ज़रूरत है। दुनिया के स्तर पर भीषण वित्तीय संकट है और उससे बाहर निकलने के रास्ते नहीं सूझ रहे। दुनिया में आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों का राज है और जिसका सरगना अमरीकी साम्राज्यवाद है। उसके टिके रहने के दो रास्ते हैं। पहला तो यह कि शताब्दियों के संघर्ष से मज़दूर वर्ग को जो अधिकार मिले हैं, उसे वापस ले लिया जाये। यह आसान रास्ता नहीं है, इस पर चलना जोखिम भरा काम है। ग्रीक, स्पेन, इटली आदि तमाम देशों में मज़दूरों को मिली सुविधाओं में कटौती किये जाने के ख़िलाफ़ इधर हाल में हुई ऐतिहासिक हड़तालें इसका सबूत हैं और जिन्होंने लुटेरे पूंजीपतियों की चूलें हिला देने का ऐतिहासिक काम किया। बचता है दूसरा रास्ता कि संसाधनों की लूट को और घना, और व्यापक कर दिये जाने का है।

इस लूट का एक निशाना हिंदुस्तान भी है। छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा आदि राज्य प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज़ से बेहद अमीर हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस अमीरी को लूटने और धरती को कंगाल कर देने के लिए अपने देश में डेरा डाल चुकी हैं और कई कंपनियां धावा बोलने के लिए लार टपका रही हैं। इसकी तीखा प्रतिरोध भी हो रहा है। कई जगहों पर लोग अपनी ज़मीन, जंगल, पहाड़, नदी को बचाने के लिए जान की बाजी भी लगा रहे हैं। यह नारा कई इलाक़ों में तेज़ी से फैल और गूंज रहा है कि जान देंगे पर अपना इलाक़ा नहीं। तो लड़ाई शुरू हो चुकी है, और बेशक़, यह लड़ाई विभिन्न रूपों में है और उसका नेतृत्व अलग-अलग विचारधारा के लोगों के हाथ में है।

रायगढ़ में रमेश अग्रवाल लंबे अरसे से विस्थापन और प्रदूषण के ख़िलाफ़ मैदान में हैं। उन्होंने जिंदल को चुनौती दी तो उनके साथ क्या हुआ? फर्ज़ी आरोप लगा कर उन्हें जेल भिजवाया गया। विरोध तब भी नहीं थमा तो उन पर दिनदहाडे गोलियां बरसवायी गयीं। शुक्र है कि वे बच गये। प्रतिरोध की आवाज़ों को कुचलने की घृणित कोशिशें बताती हैं कि जिंदल कितना ताक़तवर है, कि सरकार उसके पैर दबाती है। जिंदल का नाम दुनिया के उन गिनेचुने सीईओ में शामिल है जो अपनी कंपनियों से मोटी तनख़्वाह लेते हैं।  

रायगढ़ की तरह जशपुर में भी सरकार ने उद्योगों के लिए कंपनियों के साथ थोक के भाव करार किये। जांजगीर चांपा में 78 फ़ीसदी ज़मीन खेतिहर है और बेहद उपजाऊ है। यह धान के कटोरे का केंद्र है और उसी केंद्र में पावर प्लांट के लिए 34 एमओयू किये गये। बलौदा बाज़ार सीमेंट उद्योग का गढ़ हो गया। वहां लाफ़ार्ज़ और होल्सिम जैसी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां काबिज़ हैं और जो दुनिया भर में संसाधनों की लूट, प्रभावित समुदायों के साथ धोखाधड़ी और श्रम अधिकारों के हनन के लिए बदनाम हैं। बलौदा बाज़ार में उन्होंने चारागाह और गोठान को भी जबरन हड़प लिया। वे इतनी दबंग हैं कि उनके लिए केंद्रीय सीमेंट वेज बोर्ड का कोई मतलब नहीं।

तो चौतरफ़ा यही सीन सामने है कि कंपनियां अपनी मर्ज़ी की मालिक़ हैं और सरकार पर हावी हैं। उनके ख़िलाफ़ मुंह खोलनेवालों पर फ़र्ज़ी मुक़दमे हैं और हमले हैं, लड़ाकू ताक़तों की एकता को तोड़ने के तरह-तरह के हथकंडे हैं। इसमें सरकारी महकमा कंपनियों के साथ खड़ा है। जब-तब ख़बर आती है कि फ़लां अधिकारी के यहां करोड़ों की संपत्ति पकड़ी गयी। यह 2012 का नज़ारा है और इन विसंगतियों के बीच राज्योत्सव का आयोजन है। यह सूबे में प्राकृतिक संसाधनों की लूट को और बढ़ाने, लोगों को बदहालियों में और ज़हर घोलने का उत्सव है।

राज्योत्सव के लिए 12 एकड़ में लगी फ़सल की बलि भी चढ़ी। नया रायपुर के बनने से प्रभावित हुए किसानों के लिए तो यह उनके सर्वनाश का उत्सव है। इधर राज्योत्सव चल रहा था और उधर नया रायपुर से प्रभावित किसान अपने साथ हुई नाइंसाफ़ी को लेकर ग़ुस्से में हैं और सदमे में भी। दमन के अंदेशे से गांवों में वीरानी और उदासी छायी हुई है। कुल मामला यह कि नयी राजधानी के लिए उनकी आजीविका का साधन लूटा गया और इसकी वाजिब क़ीमत से उन्हें वंचित कर दिया गया। राज्योत्सव के भव्य और गर्वीले शोर ने न्याय की उनकी आवाज़ों को दबा दिया। तो राज्योत्सव उनकी बरबादियों के पहाड़ पर आयोजित उत्सव है।

सवाल है कि जिस विकास की बात की जा रही है, वह छत्तीसगढ़ को कहां ले जायेगा? यहां के लोगों को किस हाल में छोड़ेगा? धान के कटोरे को कहां ले जा कर पटकेगा? विकास की अंधी आंधी से जुड़ा यह सवाल छत्तीसगढ़ के स्तर पर ही नहीं, कमोबेश पूरे देश के स्तर पर है।

छत्तीसगढ़ के हज़ारों आदिवासी जेल में हैं। आप बस्तर या सरगुजा जाइये और गांव के आम लोगों से पूछिये तो पता चलेगा कि इनमें से ज़्यादातर मामले फ़र्ज़ी हैं। सुरक्षा बल गांव और जंगल में गश्त पर निकलते हैं तो किसी को भी मार गिराते हैं या पकड़ कर उसे माओवादी बता देते हैं। सरकार की पूरी सोच सुरक्षा केंद्रित हो गयी है। नागरिक अधिकारों के लिए जगहें बची ही नहीं या बहुत सिकुड़ गयी हैं।

इससे लोगों में अन्याय का अहसास होने लगा है। यह शांति और ख़ुशहाली के लिए अच्छा नहीं है। चार महीने पहले बस्तर के बसगुडा गांव में 17 आदिवासियों का संहार हुआ और उन्हें माओवादी घोषित कर दिया गया। इनमें छह नाबालिग बच्चे भी थे। स्वतंत्र जांच एजेंसियों और मीड़िया ने भी अपनी पड़ताल में मुठभेड़ की पुलिसिया कहानी को फ़र्ज़ी बताया। तब कहीं जा कर सरकार ने मामले की जांच किये जाने का फ़ैसला किया। तीन महीने गुज़र चुके हैं लेकिन जांच के क़दम नहीं बढ़ सके। गांववालों के बयान ही दर्ज़ नहीं हुए। कैसे होते? जांच के लिए गांव की विज़िट ही नहीं हुई। क़ानून के शासन की यह स्थिति है। इससे लोगों में गहरी हताशा-निराशा है।

तो छत्तीसगढ़ में जैसे बिना घोषणा के आपात काल लागू कर दिया गया है। भारी दमन के बावजूद जगह-जगह इसके ख़िलाफ़ आवाज़ें भी उठ रही हैं। अभी औद्योगिक हादसों के संदर्भ में कई ट्रेड यूनियनें साझा दस्तक के लिए साथ आयीं। विस्थापन के ख़िलाफ़ साझा कार्रवाइयों के लिए विस्थापन विरोधी मंच बना। इसी तरह छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन की शुरूआत हुई जो जन सुनवाई के सरकारी नाटकों और पेसा क़ानून के घोर उल्लंघन से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हो रहे दमन के ख़िलाफ़ लगातार आवाज़ उठा रहा है। रमेश अग्रवाल पर हुए क़ातिलाना हमले, बीजापुर की फ़र्ज़ी मुठभेड़ और कारपोरेट द्वारा न्याय मांगनेवालों पर लगाये गये झूठे मुक़दमों के ख़िलाफ़ पिछली 16 जुलाई को विभिन्न संगठनों की ओर से विधानसभा तक साझे मार्च का आयोजन हुआ। कुल मिला कर कहें तो अभी लड़ाई जारी है और इस लड़ाई के माहौल में राज्योत्सव है। यह सरकारी दमन और बर्बरता का राज्योत्सव है।

(सुधा भारद्वाज के साथ हुई बातचीत के आधार पर आदियोग की पेशकश) 
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