यह साम्प्रदायिक नहीं, हिंदूवादियों की इकतरफा हिंसा थी

फैजाबाद में हुई हिंसा को लेकर पिछली 18 और 19 नवम्बर को छह सदस्यीय स्वतंत्र जांच दल ने पूरे मामले की छानबीन की। जांच दल में शामिल थे- वरिष्ठ पत्रकार सईद नकवी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की रंजना कक्कड़, यूपी पीयूसीएल के पूर्व महासचिव ओडी सिंह, स्त्री अधिकार संगठन की पद्मा सिंह, पीडीएसयू के आलोक कुमार और शम्स विकास। जांच दल ने फैजाबाद तथा आसपास के प्रभावित गांवों भदरसा, शाहपुर, फूलपुर तकिया, इस्लामाबाद समेत फैजाबाद कोर्ट का दौरा किया और कोई सौ लोगों से हुई बातचीत के आधार पर कल, 20 नबंबर को, इलाहाबाद में अपने निम्न निष्कर्षों को जारी किया;


  1. फैजाबाद के पिछले महीनों की घटना को साम्प्रदायिक हिंसा कहना भ्रामक व खतरनाक होगा। गाजियाबाद, कुण्डा व उत्तर प्रदेश के अन्य स्थानों की तरह फैजाबाद में भी अपराधिक तत्वों का प्रयास था कि समुदायों के बीच विभाजन पैदा किया जाए। यह एक उकसावेजनक कहानी के साथ शुरू किया गया और इसका आम रूप यह रहा कि एक समुदाय के लड़के ने दूसरे समुदाय की लड़की के साथ छेड़खानी की है। यह खबर 24 अक्टूबर के समाचार पत्रों में छपी और शहर में माहौल तनावपूर्ण हो गया जबकि अगले दिन दशहरे की छुट्टी के कारण कोई स्पष्टीकरण नहीं छपा। इसके दो दिन बाद 27 अक्टूबर को ईद थी।
  2. सितम्बर को देवकाली मंदिर से काली, लक्ष्मी और सरस्वती की मूर्तियों की चोरी के साथ फैजाबाद भर में साम्प्रदायिक तनाव की आग फैल गयी। ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में योगी आदित्य नाथ ने मूर्तियों की बरामदगी की मांग उठायी और ऐसा न होने पर उग्र आन्दोलन की धमकी दी। आश्चर्यजनक ढंग से आजमगढ़ में पुलिसवालों ने एक मुस्लिम बस्ती में मूर्तियों को ढूंढ़ने का प्रयास किया। सुखद रहा कि मूर्तियां 22 अक्टूबर को कानपुर के करीब चार हिन्दू युवाओं के पास से बरामद हुईं। 
  3. यद्यपि 10 दिनों की दुर्गा पूजा के दौरान पंडालों के माइक से ‘यूपी अब गुजरात बनेगा, फैजाबाद शुरूआत करेगा’ जैसे भड़काऊ नारे लगातार लग रहे थे। प्रशासन ने इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया। 
  4. दुर्गा मूर्ति के विसर्जन जुलूस के दौरान फिर उकसाऊ नारे लगे। जुलूस पुराने शहर में 1778 में बनी स्थित सुन्दर सी मस्जिद के करीब से गुजरा जो हर मायने में हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक रही है। इसकी पहली मंजिल पर चढ़ कर हिन्दू महिलाएं व बच्चे मूर्ति विसर्जन जुलूस पर गुलाब की पत्तियां बरसाया करते थे। बेहद संदेहास्पद बात है कि इस साल महिलाओं व बच्चों की भागीदारी पर प्रतिबंध लगाया गया था। क्यों? क्या आयोजकों को पता था कि कुछ खतरनाक होने वाला है। 
  5. दंगे के दौरान मस्जिदों के नीचे व करीब की सभी मुस्लिम दुकानों को, शाहाब बूट हाऊस, स्टार बेकरी को लूटा गया और फिर आग के हवाले किया गया। इसमें घंटों लगे। पुलिस कहां थी?  पुलिस शान्ति से बिगड़ता माहौल देख रही थी। बल्कि उसने कुछ दूकानदारों को अपनी सम्पत्ति बचाने से रोका और कहा कि तुम अपनी जान बचाओ। 
  6. फैजाबाद का यह तांडव आसपास के गावों – भदरसा, शाहपुर, फूलपुर तकिया, इस्लामाबाद आदि में भी दोहराया गया। सपा विधायक मित्रसेन यादव का कहना है कि इसके लिए बसपा जिम्मेदार है क्योंकि इसका लाभ उसको मिलेगा। 
  7. फूलपुर तकिया के फकीर जो मोहर्रम की ताजिया बनाते हैं, मुसलमानों में सबसे गरीब हैं। उनकी झुग्गियों को भी लूटा व जलाया गया। 26 अक्टूबर की रात को उन्होंने ‘जय श्री राम’ के नारे सुने। जैसे-जैसे नारे तेज हुए, वे डर गये और अपनी जान बचाने के लिए खेतों में भाग गये। एक पुरूष, मनु शाह अपनी जलती झोपड़ी को देखने पहुंचा गया तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। 
  8. इस्लामाबाद में हिन्दू-मुसलमान दोनों एक-दूसरे को दोष जरूर देते हों पर उनके बीच घृणा व दुश्मनी का भाव नहीं है। 
  9. एक अन्य गांव की नज़रीन ने बताया कि कैसे गांव के कुछ हिन्दुओं ने ‘जय श्री राम’ के नारे लगाये और उन पर हमला करने बढ़े। इस बीच पुलिस की तीन जीपें देखकर उसे लगा कि वे अब बच जायेंगी। पर यह राहत कुछ पल की थी। पुलिस जल्द ही वापस लौट गयी और हमलावर सक्रिय हो गये। यह किस्सा हर जगह दोहराया जाता है। 
  10. भदरसा में एक हत्या हुई। अपराधियों का पता नहीं है पर 13 के खिलाफ नामजद रिपोर्ट हुई। पुलिस ने अब 26 मुसलमानों और 32 हिन्दुओं को जेल में डाल दिया है हालांकि वे नामजद नहीं हैं। इसका हल निकलना चाहिए। पुलिस को बेवजह किसी को जेल में डालने का अधिकार नहीं है। 
  11. कुछ लोगों को 20 से 30 हजार तक का मुआवजा दिया गया परन्तु उनके सरकारी चेक बाउन्स कर गये। 
  12. ऐसा प्रतीत होता है कि मंडल जातियों के रूप में सत्ता में आने का जो शुरूआती जोश था, वो ठंडा पड़ता जा रहा है। यह नई ताकतें प्रशासन के संचालन में जनता के साथ न्याय करने में, कानून-व्यवस्था बनाये रखने में, जनता को सुरक्षा प्रदान करने और उसकी आर्थिक समस्याएं हल करने में नाकाम रही हैं। मुसलमानों का, जो साम्प्रदायिक हमले के आसान निशान बन जाते हैं, इन पार्टियों से मोहभंग हो रहा है और वे विकल्प ढूंढ़ रहे हैं। पर वे कहां जाएंगे? वे अब भी उम्मीद कर रहे हैं कि कोई सत्ता में आकर उनकी मदद करेगा जबकि वास्तविक विकल्प केवल एक व्यापक जन आंदोलन है जो इस दमनकारी व विभाजनकारी तंत्र को रोक दे। 
  13. हिन्दुत्व ताकतें इस माहौल में अपनी मजबूती का नया अवसर देख रही हैं जबकि मंडल ताकतें अपने राज को बनाये रखने के लिए साम्प्रदायिक चाल को हथियार समझ रही हैं। यह घटनाएं स्पष्ट बताती हैं कि कैसे मुसलमानों को पासियों, यादवों, मल्लाहों, वाल्मीकियों के विरुद्ध लड़ाने का प्रयास किया गया। स्पष्ट है कि जातिवादी ताकतें धर्मनिरपेक्ष समाज के निर्माण का आधार नहीं हो सकतीं। आज शासन तंत्र साम्प्रदायिक छेड़खानी के प्रति आंख मींच रहा है, कभी-कभार उसे बढ़ावा दे रहा है पर अंत में हमेशा पीड़ित समुदाय (यहां मुसलमान) के नौजवानों को गिरफ्तार कर लेता है। इसके साथ-साथ हिन्दुओं के गरीब तबकों से बड़े पैमाने पर निराधार ढंग से गिरफ्तार करता है। पुलिस की दमनकारी भूमिका बढ़ रही है और साम्प्रदायिक माहौल इसे और बढ़ावा दे रहा है। 
  14. फैजाबाद के वकीलों ने 25 दिन तक कोर्ट में हड़ताल इस वजह से की थी क्योंकि सरकार इस प्रयास में थी कि पिछली सरकार द्वारा निराधार ढंग से गिरफ्तार किये गये मुसलमानों के मामलों की समीक्षा की जाये। साम्प्रदायिक तत्व चाहते हैं कि निर्दोष मुसलमान भी बड़े पैमाने पर जेल में रहें। जाहिर है इस मसले में सपा मुसलमानों को दिये गये अपने वादे के प्रति पूरी तरह अगम्भीर है। 


जांच दल मांग करता है कि;

  1. सरकार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश द्वारा घटना की न्यायिक जांच करानी चाहिए जो घटना की परिस्थितियों तथा हिंसा और पुलिस-प्रशासन की भूमिका की जांच करे। 
  2. सभी पीड़ित पक्षों को अपनी शिकायतें एक निष्पक्ष प्रेक्षक की उपस्थिति में दर्ज कराने की व्यवस्था बनायी जानी चाहिए। 
  3. सभी लोगों के नुकसान की सूची बनाकर उन्हें मुआवजा दिया जाना चाहिए।
  4. सीसीटीवी में दिखनेवाले सभी हमलावरों को चिन्हित करके गिरफ्तार करना चाहिए। जितने भी लोग गिरफ्तार हों, उनके मामलों का पुनर्मूल्यांकन करके निर्दोषों को छोड़ा जाना चाहिए।


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