मुलताई गोलीकाण्ड :डा. सुनीलम और अन्यों को हुई उम्रकैद, फैसलों की समालोचना

डा. सुनीलम और अन्यों को जो सजा वर्ष 1998 के मुलताई पुलिस फाइरिंग केस में दी गई है, जिसमें 24 किसानों की पुलिस की गोली से जान चली गई थी. पुलिस ने डा. सुनीलम और अन्य के खिलाफ 66 मामले दर्ज किए, जिनमें से डा. सुनीलम पर 18 मामलों में मुकदमे चल रहे है और तीन मामलों में उन्हें दोषी करार देते हुए अदालत ने केस क्रमांक 277, 278 और 280 में 18 अक्टूबर, 2012 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। पेश है इन फैसलों पर कविता श्रीवास्तव की समालोचना; 

पृष्ठभूमिः क्या हुआ था?
मध्य प्रदेश में शहडोल डिविजन के बैतूल जिले की मुलताई तहसील में 12 जनवरी, 1998 को पुलिस फाइरिंग में 24 किसानों की जान चली गई थी, 150 लोग घायल हो गए थे। यह तीसरा साल था जब किसानों की फसल बरबाद हो रही थी, ये किसान मुआवजे के तौर पर राज्य सरकार से 5000 रुपए की मांग कर रहे थे, जबकि मौजूदा दिग्विजय सिंह सरकार उन्हें मात्र 400 रुपए ही देने पर राजी थी। इस गोलीबारी में फायर ब्रिगेड वाहन का एक चालक मारा गया और पुलिस के अनुसार पचास से अधिक पुलिस वाले घायल हो गए थे। पुलिस ने डा. सुनीलम और अन्य के खिलाफ 66 मामले दर्ज किए, जिनमें से डा. सुनीलम पर 18 मामलों में मुकदमे चल रहे है और तीन मामलों में उन्हें दोषी करार देते हुए अदालत ने केस क्रमांक 277, 278 और 280 में 18 अक्टूबर, 2012 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। डा. सुनीलम कौन हैं, और यह एफआईआर क्या हैं? और उन्हें सजा क्यों दी गई है? यहां यह तथ्य संक्षेप में दिए गए हैं।

डा. सुनीलम कौन हैं?
डा. सुनीलम का जन्म 27 जुलाई, 1961 को भोपाल में सुनील मिश्रा के तौर पर हुआ था। ग्वालियर के केंद्रीय विद्यालय से उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और फिर गवर्नमेंट साईंस कॉलेज ग्वालियर से स्नातक की पढ़ाई की इसके बाद एम.आई.टी.एस. ग्वालियर से एप्लाईड फिजिक्स में एम.एस.सी. किया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बायो मेडिकल इलेक्टोनिक्स में पीएच.डी की। वे सी.आई.एस.आर. के साथ रिसर्च एसोसिएट भी रहे। ऑस्टेलिया, मेलबॉर्न के बर्न इंस्टीट्यूट से लौटने के बाद वे पूरी तरह राजनीतिक कार्यकर्ता बन गए।

एक सोशल एक्टिविस्ट, राजनितिज्ञ और लेखक डा. सुनीलम ने दो पुस्तकों के प्रकाशक और सह लेखक की भूमिका निभाई। प्रो. विनोद प्रसाद सिंह के साथ मिलकर हिन्दी में लिखी पुस्तक ‘‘समाजवादी आंदोलन के दस्तावेज’’ में उन्होंने सामाजिक आंदोलनों से जुड़े तमाम पेपरों और तथ्यों को जमा किया। अंग्रेजी में उन्होंने श्री सुरेंद्र मोहन, स्वर्गीय श्री हरि देव शर्मा और प्रो. वी.पी. सिंह के साथ मिलकर एक पुस्तक तैयार की जिसका शिर्षक है ‘‘इवोल्यूशन ऑफ सोशलिस्ट पॉलिसी इन इंडिया’’। सुनीलम ने अर्वेयम पर भी एक पुस्तक कम्पाइल की जो राम मनोहर लोहिया का उत्तर पूर्वी सिपाही था। सुनीलम ने लगातार राष्टीय और स्थानीय दैनिक समाचार पत्रों में लेख लिखे।

डा. सुनीलम दो बार विधायक रहे, पहली बार एक आजाद उम्मीदवार के तौर पर मुलताई से दिसंबर 1998 से दिसंबर 2003 के बीच और दूसरी बार समाजवादी पार्टी से दिसंबर 2003 से दिसंबर 2008 तक। वह दिसंबर 2008 में चुनाव हार गए थे। 

ममला क्या है?

जजमेंट 277/2006 : उस समय के एक इंचार्ज एस.एन. कटारे की जान लेने की कोशिश और उनका हथियार छीनकर उसे घायल कर देने का है । कुल गवाह-16 जिनमें 13 पुलिसवाले, एक डाक्टर और दो स्वतंत्र। डा. सुनीलम और दो अन्य को 148 के तहत एक साल की सजा, 152 के तहत एक साल, 333/149 के तहत पांच साल और 1000 रुपए का जुर्माना और 307/149 के तहत सात साल और 1000 रुपए के जुर्माने की सजा दी गई है।

जजमेंट 278/2006 : जान लेने की कोशिश और पुलिस मैन सरनाम सिंह को घायल करना। कुल गवाह 14 जिनमें 8 पुलिसवाले, 3 डॉक्टर और 3 स्वतंत्र। डा. सुनीलम और दो अन्य को 148 के तहत एक साल, 332/149 के तहत एक साल और 500 रुपए का जुर्माना और 307/149 के तहत सात साल की सजा और 1000 रुपए के जुमाने की सजा।

जजमेंट 280/2006 : फायर ब्रिगेड के चालक धीर सिंह की हत्या। मामले के कुल गवाह-30 जिनमें 12 पुलिवाले, 3 डॉक्टर, 10 प्रशासन और 5 स्वतंत्र। सुनीलम और सात अन्य को 148 के तहत एक साल, 152 के तहत एक साल, 323/149 के तहत एक साल और 1000 रुपए जुर्माना और 302/149 के तहत आजीवन और 5000 रुपए जुर्माना और सैक्सन 3 के तहत सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहंचाने तहत 50000 रुपए का जुर्माना।

न्याय का यह कैसा मजाक है कि जहां पुलिस और प्रशासन जो पहले से तय करके पूरी ताकत के साथ किसानों के आंदोलन को कुचलने और उन्हें मारने के लिए आए थे, जबकि किसानों का यह आंदोलन पूरी शांति के साथ करीब एक सप्ताह से जारी था उन्हें इस अपराध के लिए दोषी नहीं माना गया और उन्हे छोड़ दिया गया जबकि डा. सुनीलम जो शांति और अहिंसा में विष्वास रखने वाले किसानों का नेतृत्व कर रहे थे उन्हें सजा दे दी गई। ध्यान से देखने से यह बात साफ हो जाती है कि जिन तीन मामलों में डा. सुनीलम और उनके साथियों को सजा सुनाई गई है वह पुलिस ओर प्रशासन की मिलीभगत का परिणाम है जिसे बहुत ही चालाकी के साथ तैयार किया गया है ताकि उनके किय गुनाह छिप जाएं और उनपर कोई उंगली न उठा सके। यह दुर्भाग्य ही है कि यह फैसला पुलिस बायसड होने की कहानी कहता है।

12 जनवारी, 1998 की इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को लेकर दो पक्ष हैं
1. आंदोलकारी किसानो का।
2. पुलिस और प्रशासन का।

किसानों का संक्षेप में बयान इस प्रकार हैः यह किसानों का शांतिपूर्वक और कानूनी तौर पर एक़ समूह था जो तहसील परिसर में अपने विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा के अधिकार के साथ विरोध प्रदर्षन कर रहा था और एक जनसभा का आयोजन किया गया था। जब वे एकत्र हुए तो वे एक कानूनी मांग कर रहे थे और उस समय उस स्थान के लिए किसी प्रकार की पांबंदी का आदेश नहीं था। प्रदर्षन द्वारा फसल बरबाद होने की वजह से मुआवजे की मांग की जा रही थी जो तूफान से बरबाद हो गई थी। इतना ही नहीं 9 जनवारी, 1998 को कलेक्टर साहब खुद उनकी मीटिंग में आए थे और यह संकेत दिए थे कि प्रशासन के साथ सहमति बन सकती है। लेकिन 12 जनवरी, 1998 को अचानक प्रशासन के व्यवहार में बदलाव आ गया और बड़ी संख्या में पुलिस बल की तैनाती कर दी गई किसानों के शांतिपूर्ण प्रदर्षन को कुचलने के लिए बलप्रयोग की तैयारी कर ली गई। अचानक संविधान की धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा हटा दी गई और किसानों के समूह को गैरकानूनी रूप से उनपर लाठी चार्ज किया गया, आंसू गैस छोड़ी गई और इसके तुरंत बाद ही पुलिस ने गोली चला दी जिसका नतीजा यह हुआ कि 24 किसानों की जान चली गई।  

तीनों फैसले मानने योग्य नहीं हैं क्योंकि कुछ लोगों की गवाही के आधार पर यह किए गए हैं। यह सारा प्रयास पुलिस और प्रशासन को उनके द्वारा किए गए 24 किसानों की हत्या के जुर्म को धो डालने और किसान नेताओं को झूटे मामलों में उलझाने का है।

अभियोग चलाने वाले पक्ष का केस और निम्न बिन्दुंओं पर फैसले-

  1. किसानों का समूह गैरकानूनी था और यह डा. सुनीलम की अगुवाई में हिंसक हो गया।
  2. किसानों की हिंसा के परिणामस्वरूप फायरब्रिगेड के चालक धीर सिंह की मौत हो गई, सरनाम सिंह और थाना प्रभारी एस.एन. कटारे पर जानलेवा हमला करके घायल कर दिया गया।
  3. डा. सुनीलम इस हिंसा के लिए केवल एक लीडर होने के नाते ही जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि उन्होंने अपनी पूरी जानकारी में हिंसात्मक गतिविधियों में भी भाग लिया और पूरे होश में हत्या व हत्या करने का प्रयास किया।
  4. पुलिस द्वारा लाठी चार्ज किया जाना एकदम ठीक है क्योंकि किसानों का समूह गैरकानूनी और हिंसक हो गया था और कानून व्यवस्था लागू करने के लिए यह जरूरी था।

यह तीनों फैसले पुलिस और प्रशासन द्वारा पेश किए गए गवाहों और सबूतों पर आधारित हैं, जबकि पुलिस के रोजनामचे से घटना वाले दिन 12 जनवरी, 1998 को लेकर अनेक विरोधाभाष सामने आते हैं । इस पुलिस डायरी को जज द्वारा जजमेंट नंबर 280/2006 में तो कोट किया गया लेकिन जजमेंट नं 277/2006 और 278/2006 में नहीं। पुलिस डायरी को ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि पुलिस बल का जमा होना सुबह सवेरे से ही शुरू हो गया था किसानों द्वारा आंदोलन के लिए जमा होने के कुछ ही देर बाद हिंसा भड़क उठी लेकिन किसानों द्वारा किया गया विरोध बहुत कमजोर था। रोजनामचा धारा 144 लगाए जाने , लाठी चार्ज किए जाने, और प्रदर्षनकारियों पर आंसू गैस छोड़े जाने और भीड़ की तरफ से कोई हिंसा न शुरू किए जाने के संबंध में भी कई तथ्यों को उजागर करता हैं। संक्षेप में कहें तो पुलिस के रोजनामचे से खुद यह बात पता चल रही है कि धारा 144 लगाने की योजना पहले ही बनाई जा चुकी थी और इसके जरिए से किसानों के आंदोलन को गैरकानूनी करार दिया जाना था। इस कड़ी का सीधा संबंध मामले से है लेकिन फैसला सुनाते समय इसे नजरअंदाज किया गया और पुलिस प्रशासन व सरकार द्वारा तैयार किए गए केस के आधार पर फैसला किया गया ताकि 24 किसानों की हत्या का दोष ढका जा सके और इसे न्यायोचित ठहराया जा सके। न्यायधीश द्वारा इस मामले में तथ्यों को पूरी तरह नजरअंदाज किया और झूठे तथ्यों को ही ठीक मानते हुए फैसला सुनाया।  

पुलिस के 12 जनवरी, 1998 के रोजनामचे के अनुसार जिसे फैसला नं. 280/2006 में कोट किया गया है पुलिस का क्रियाकलाप सुबह 7.25 बजे शुरू हों गया था जब विभिन्न पुलिस स्टेशनों के एसएचओ द्वारा आपस में बातचीत शुरू हुई कि किस समय तक किसान जमा नहीं होते हैं। सुबह 9.03 पर सभी थानों से पुलिस बल पूरे निर्देशों के साथ मुलताई तहसील के लिए निकला और किसानों के जमा होने के पहले ही तहसील परिसर में तैनात हो गया। यहां सवाल यह उठता है कि यह प्रॉपर निर्देश क्या हैं? इसकी पहचान होना जरूरी है।

रोजनामचा के पहले संदर्भ के अनुसार किसानों के समूह द्वारा किसी तथाकथित हिंसा किए जाने की संभवना की सूचना 11.32 बजे 12 जनवरी, 1998 को जैसा कि अशोक गंघोरिया ने कहा कि उन्हें एक मुखबिर द्वार सूचना प्राप्त हुई कि किसान संघर्ष समिति का इरादा तहसील का घेराव करके उसे बंद करने का है, समिति के सदस्य अवैध हथियार और पत्थर अपने बैग और जेबों में छिपाकर लाए हैं, ये लोग टैक्टर टरॉली द्वारा तहसील परिसर में तोड़फोड़ करने का इरादा रखते हैं। मुखबिर की यह सूचना किसानों के इस नारे पर आधारित थी ‘‘ मरेंगे सा मारेंगे, हमारा हक हमारा है’’, इस प्रकार देखा जा सकता है कि किसा प्रकार एक नारे के आधार पर मुखबिर ने प्रदर्षनकारियों के पास अवैद्य हथियार होने और पत्थर छिपाकर लाने की बात गढ़ ली जबकि प्रदर्षनों और आंदोलनों के दौरान अक्सर ऐसे नारे सुनाई देते हैं इससे प्रदर्षन के हिंसक होने का कैसे पता चलता हैं।

यहां यह बात गौर करने वाली है कि पुलिस के रोजनामचे से यह बात तो साफ है कि 11.35 बजे तक उस दिन किसानों के आंदोलन में कोई हिसंक गतिविधि नहीं हुई। रोचनामचे के अनुसार धारा 144 को 11.35 बजे लागू किया गया ,बिना किसी हिंसा के किसान 11.40 बजे तक अपनी मांगो को लेकर नारेबाजी कर रहे थे। रोजनामचे के अनुसार धारा 144 को लागू किए जाने की घोषणा 11.45 बजे की गई। इसका साफ मतलब है कि धारा 144 को बिना किसी हिंसक गतिविधि के शुरू हुए ही लागू कर दिया गया जिसका मकसद किसानों के एकत्र समूह को गैरकानूनी करार देना था। रोजनामचा के अनुसार आंसू गैस और लाठीचार्ज किए जाने का आदेश 12.55 बजे दिया गया यहां यह कहा गया कि लेकिन इसका भीड़ पर कोई असर नहीं हुआ जैसे यह उन्हें हिंसक होने के लिए किया गया हो। रोजनामचे के अनुसार किसानों की ओर से पहला पत्थर 12.56 मिनट पर फेका गया जबकि पहले ही लाठी चार्ज और आंसू गैस छोड़े जा चुके थे। यह पत्थर पुलिस की जबरन बल प्रयोग की कार्यवाही की प्रतिक्रिया के तौर पर फेका गया हो सकता है। रोजनमाचे के अनुसार भीड़ द्वारा की गई हिंसक गतिविधियों का ब्यौरा 1.05 बजे के बाद दर्ज किया गया, जिसमें डाक्टर सुनीलम पर लगाए गए तथाकथित हिंसा के कार्य भी शामिल है जिनके लिए उन्हें सजा सुनाई गई है।

तीनों फैसलों पर गौर करने से पता चलता है कि डा. सुनीलम को सुपर मैन या स्पाइडर मैन की तरह माना गया है, जो 9 मिनट के एक छोटे से अंतराल में 12.56 से 1.05 के बीच पुलिस की आंसू गैस की कार्यवाही को परास्त करते हुए परिसर में पुलिस द्वारा लाठी चार्ज के बीच परिसर में प्रवेश करते हैं और एक पुलिस अधिकारी से उसकी रायफल छीनकर उसे जान से मारने की कोशिश करते हैं और उसे घायल करने के बाद दूसरे पूलिस अधिकारी पर हमला करते हैं और उसे मारने की कोशिश करते हैं। इसके बाद वह जम्प करते हैं और फायर ब्रिगेड की गाड़ी पर पहुंच जाते हैं और इसके चालक के सर पर पत्थर मार मार कर उसे मार डालते हैं। यह सब कितना असंभव है क्या इस तरह की घटना का कोई गवाह संभव है?

एसडीएम ने कहा कि 1.15 बजे गोली चलाने के आदेश दिए गए जो इस केस से जुड़े पुलिस अधिकारी द्वारा दी गई सूचना की जांच के बाद ही दिए गए, जिसमें हिंसक गतिविधियों का जिक्र था। एसडीएम द्वारा साफ तौर पर डॉटेड आडर पर हस्ताक्षर किए गए। यह दुर्भाग्य ही है कि इस फैसले द्वारा पुलिस के दोषपूर्ण केस को स्वीकार कर लिया गया। 

इस आधार पर यह फैसला अवश्य पढ़ा जाना चाहिए और इसका विश्लेषण होना चाहिए।

हमारी राय है कि यह फैसला पूरी तरह पक्षपातपूर्ण है और संविधान द्वारा दिए गए अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता के अधिकारों को कानून के द्वारा अवैध करार देने की कोशिश है। यह पुलिस के अपराध को न्यायोचित ठहराए जाने के निए भी एक यंत्र बना है। इस दोषपूर्ण फैसले में अनेक पुलिस वालों और प्रशासनिक अधिकारियों की गवाही से संबंधित विरोधाभाषों को नजरअंदाज कर दिया गया है, जो महत्वपूर्ण हैं और जिन्हे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यहा तक कि फायर ब्रिगेड के चालक धीर सिंह की मौत के कारणों को लेकर भी डाक्टरों में एक राय नहीं है।

कविता श्रीवास्तव, पी.यू.सी.एल.(राजस्थान)
परामर्श वरिष्ठ काउंसिल रवि किरन जैन, इलाहबाद हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट

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