चन्द्री देवी का अंतहीन संघर्ष

यह संघर्ष की दास्तान बिहार राज्य के बांका जिले के ग्राम मोचनावरण गांव की रहने वाली चन्द्री देवी की है. चन्द्री देवी को भूदान आंदोलन में वर्ष 1970-71 में खेती योग्य 4 एकड़ 80 डिसमिल जमीन दान में दि गई थी.चन्द्री देवी जमीन का पट्टा पा कर बहुत खुश थी, चन्द्री देवी ने तय किया कि अपने बच्चों शिक्षा दिलाएगी ताकि उन्हें गाव में मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी. यह सपना लिये चन्द्री देवी पिछले 18 सालों से अपनी जमीन पाने के लिये संघर्ष करती रही. गाव से लेकर राजधानी पटना तक चन्द्री देवी गुहार लगाती रही लेकिन उसकी किसी ने नहीं सुनी. पिछले माह चन्द्री देवी 65 साल की उम्र में नितीश कुमार के शुशासन में अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़ते हुए अपनी जंदगी की लड़ाई भी हार गई. आज चन्द्री देवी का बेटा रिक्शाचालक है उसकी जमीन पर भूमाफियाओं का कब्ज़ा है. पेश है आलोक कुमार की यह रिपोर्ट;

ज्ञात रहे कि सत्ता संभालते ही सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वाम सरकार की तरह सत्ता पर खुट्टा गाड़ने के लिए श्री डी0 बंधोपाध्याय की अध्यक्षता में भूमि सुधार आयोग गठित की। इसके अध्यक्ष ने अपनी अनुषंसा में भूदान यज्ञ कमेटी को चरणबद्ध तरीके से काम करने के लिए परामर्श दिया था। अगर भूदान यज्ञ कमेटी के अध्यक्ष कुमार शुभमूर्त्ति के द्वारा भूमि सुधार आयोग के अध्यक्ष की अनुषंसा को शिरोधार्य कर लेते तो विधवा चन्द्री देवी की मौत टाली जा सकती थी। भूदान की जमीन को लेकर गांवघर में हो ऐसी घटनाएं रोज हो रही है। थाना में मुकदमा दर्ज है। और तो और भूदान यज्ञ कमेटी के पास हजारों की संख्या में मामला लम्बित है।

खैर, किन्ही दबंगों के द्वारा जब आम लोगों की जमीन ली जाती है तो आम लोग विरोध स्वरूप नारा बुलंद करने लगते हैं कि हम ‘जान देंगे परन्तु जमीन नहीं देंगे’। ‘हां, इस तरह के नारों को सुनने जरूर ही दिल में दर्द होने लगता है। उनके हित में काम करने का मन करने लगता है। अगर आम लोगों की मांग पूर्ण हो जाती है तो उनके द्वारा जिन्दाबाद (झींगाभात) का नारा बुलंद किया जाता है। अगर उनकी मांग पूर्ण नहीं होती है तो उन लोगों के द्वारा मुर्दाबाद (मुर्गाभात) का भी नारा बुलंद किया जाने लगता है।

चन्द्री देवी नामक विधवा ने 18 सालों तक जिन्दाबाद और मुर्दाबाद का नारा बुलंद की है। यह तस्वीर विधवा की है। जो अपनी जमीन को कब्जाधारियों के चंगुल से मुक्त करवाने के लिए राजधानी में आयी थी। पहले वह बांका जिले के अधिकारियों तक फरियाद दर्ज करायी जब उनके द्वारा न्यायपूर्ण कार्यवाही नहीं की गयी तो राजधानी पटना आ धमकी। ‘हां, यहां के आलाधिकारियों और जन प्रतिनिधियों के समक्ष गुहार लगायी। इन नौकरशाहों तक गुहार लगाने के बाद भी विधवा को सुषासन बाबू की धरती पर न्याय नहीं मिल सका। वह लगातार 18 वर्षों तक जमीन की जंग लड़ी। राजधानी तक की दौड़ लगायी। अंत में जमीन की जंग में जान गंवा दी। इस तरह एक विधवा की जान भूमि की जंग में चली गयी । भूमि अधिकार आंदोलन चलाने वालों की नजर में चन्द्री देवी शहीद हो गयी। शहीद विधवा के पुत्र रिक्सा चालक है। अब प्रशासन का फर्ज बनता है कि शहीद के पुत्र को कब्जाधारियों के जबड़े से जमीन निकालकर रिक्साचालक को बतौर तौहफा के रूप में प्रदान कर दें।
दबंगों के हाथ से जार-जार होने वाली परेशान महिला का नाम चन्द्री देवी है। आयु 65 साल की है। वह बिहार राज्य के बांका जिले के ग्राम मोचनावरण गांव की रहने वाली है। उसके पति का नाम भुतरी दास हैं। जो तीन बच्चों को जन्म देने के बाद स्वर्ग लोक सिधार चुके हैं।
    
बांका जिले के ग्राम मोचनावरण गांव के रहने वाले भुतरी दास की विधवा चन्द्री देवी ने मरने के पहले बताया कि बांका जिले के प्रखंड और पंचायत कटोरिया के गांव लकीपुर के निवासी जमुना प्रसाद ने भूदान आंदोलन के प्रर्णेता विनोबा भावे को जमीन दान में दिये थे। इसके बाद वर्ष 1970-71 में सरकार ने भुतरी दास को खेती योग्य 4 एकड़ 80 डिसमिल जमीन दी थी। उन्हीं के साथ बरिआती पंडित को 2 एकड़ 80 डिसमिल जमीन मिली थी।  भुतरी दास के परिवार वालों ने मिलकर खेती करना षुरू कर दिये। कभी कोदो, धान, कुर्थी आदि फसल लगाकर मजे से जिन्दगी चला रहे थे। भूदान यज्ञ कमेटी के द्वारा प्राप्त दस्तावेजों को सरकार के अंचल कार्यालय में जाकर आवश्कतानुसार रसीद और दाखिल खारिज भी करा लिये थे। इस बीच भुतरी दास का निधन हो गया।

महादलित विधवा को भूदान यज्ञ कमेटी के द्वारा भूदानी जमीन मिली थी। इसके अलावे अन्य महादलित परिवारों को भी भूदान यज्ञ कमेटी के द्वारा 4 एकड़ 80 डिसमिल जमीन मिली। भूदान यज्ञ कमेटी ने सभी को जमीन का पर्चा हाथ में दिया परन्तु जमीन का कब्जा करवाने में अक्षम साबित हो गया। इसी के कारण दबंगों ने अपने हाथ में जमीन कर लिये। उस पर आज भी दबंगों का कब्जा बरकरार है। इसके खिलाफ इस बुजुर्ग विधवा ने अपने हाथ में पॉलिथिन लेकर दफ्तरों के चक्कर लगाती रही परन्तु विधवा को न्याय नहीं मिला। इस पॉलिथिन में विधवा ने धरती पर के गण देवताओं के द्वारा की जा रही काली करतूत और उसके दबंगई का खुला चिट्ठा रखती थी।

इन दबंगों के कहर का परिणाम यह निकला कि वह मानसिक रोग के शिकार हो गयी। परन्तु विधवा के सिर पर जमीन को मुक्त करने का जुनून सवार हो गया गया था। महिला होकर भी कभी द्यबड़ायी नहीं और न ही हार मानने वाली थी। वह दबंगों के एक-एक सीतम और वार को झेलने को तैयार रहती थी।

मगर दूसरी ओर भगवान भी सहायक नहीं हुए। डूबते हुए को तिनका का सहारा कहावत फेल हो रहा। महिला सशक्तीकरण के युग में भी किसी धरती के भगवान भी सहायक नहीं बन सके। लगातार गम के बांउसर से आहत होने के बाद दिल से कमजोर हो गयी है। इसका परिणाम यह हुआ कि वह हृदय रोग से पीड़ित हो गयी।
महादलित परिवार के लोगों को भूदान यज्ञ कमेटी के द्वारा 4 एकड़ 80 डिसमिल जमीन मिली थी। जो दबंगों ने कब्जा कर रखा है। इसके खिलाफ 18 वर्षों से फरियाद करते-करते थकहार गयी है।  किसी से खबर मिलने के बाद पटना राजधानी में स्थित एकता परिशद कार्यालय में आकर आपबीती बयान की है।

वर्ष  1994 में बरिआती पंडित के पुत्र भोनो पंडित और पुत्रवधू सुमा देवी की नियत खराब होने लगी। इस संदर्भ में विधवा चन्द्री देवी का कहना है कि इन लोगों की 2 एकड़ 80 डिसमिल जमीन का प्लांट बाजू में ही है। इसके कारण बरिआती पंडित के पुत्र भोनो पंडित और पुत्रवधू सुमा देवी ने 4 एकड़ 80 डिसमिल जमीन पर दावा करने लगे। दावा को पुख्ता करने हेतु अंचल कार्यालय के कर्मचारी एवं अन्य पदाधिकारियों को काम के बदले दाम देकर गलत दस्तावेज तैयार करा दिया गया। भोना पंडित ने 2 एकड़ 60 डिसमिल और उनकी धर्मपत्नी ने 2 एकड़ 20 डिसमिल का दस्तावेज तैयार करा लिया है। इस धोखाधड़ी से विधवा चन्द्री देवी टूट गयी हैं। न्याय के लिए जन शिकायत कोशांग, बांका में फरियाद दर्ज करायी है। इसकी जांच की गयी। कोशांग के अधिकारी ने लिखा है कि उक्त जमीन पर शांतिपूर्ण ढंग से कब्जा है किसी अन्य व्यक्ति का कब्जा नहीं है। मगर यह वास्तविकता से कोसो दूर की बात है। इसके कारण ही चन्द्री देवी की जान चली गयी।

                    


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