बढ़ते दमन और दरिद्रता के 12 साल

ग्लैडसन डुंगडुंग
झारखण्ड राज्य अपनी स्थापना के 12 साल पूरा कर चुका है। यह राज्य 79,714 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यहां 24 जिले, 152 टाउन एवं 32,616 गांव हैं और कुल जनसंख्या 3,29,66,238 है। प्राकृतिक संसाधनों से धनी इस राज्य की यात्रा 15 नवंबर 2000 को 2215 करोड़ रूपये के अतिरिक्त बजट से शुरू हुई थी लेकिन अपने 12 साल के सफर में यह 21,423 करोड़ रूपये के कर्ज में डूब चुका है। एक तरफ जहां गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क, बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था नहीं हो पायी है, वहीं दूसरी ओर उग्रवाद की समस्या 8 जिलों से प्रारंभ होकर पूरे राज्य में फैल चुकी है और भ्रष्टाचार तो पूरे राज्य को निगल जाने को लालयित है कि देश और दुनियां में झारखण्ड को घोटालाखण्ड के रूप में स्थापित कर देने की तैयारी में है। ऐसा लगता है कि राज्य में शासनतंत्र ही फेल हो चुका है। कुछ विद्वान इसका दोष राजनीतिक अस्थिरता को देते हैं। लेकिन क्या यह राज्य सिर्फ राजनैतिक रूप से अस्थिर है या यहां स्टेट ही अस्थिरता की स्थिति में है? यहां विगत 12 सालों में 8 मुख्यमंत्री, 8 राज्यपाल एवं 8 मुख्य न्यायाधीश बने। क्या यह सिर्फ संयोग है? इस परिस्थितियों को देखते हुए यह चर्चा जरूरी है कि पिछले 12 सालों में किसको क्या मिला?
झारखण्ड के 12 साल: क्या खोया, क्या पाया

आज 15 नवंबर 2012 को अलग झारखण्ड राज्य के गठन को 12 साल पूरे हो जायेंगे। इस मौक़े पर आज रांची के मोरबादी मैदान में सरकारी उत्सव मनाया जायेगा। इसमें अब तक हुए तथाकथित विकास का ढोल पिटेगा जो ज़ाहिर है कि झूठ और मक्कारी से मढ़ा हुआ होगा। इसकी थाप यह एलान करने की गरज़ से होगी कि होशियार-ख़बरदार, अभी और अंधेरा छायेगा, कि हक़ और इंसाफ़ की आवाज़ को लाठी-गोली-जेल मिलेगी, कि सरकार बहादुर विकास के देवताओं की आरती उतारने को उतावली है, कि इसके लिए उसे आदिवासियों और मूलवासियों के दुख और ग़ुस्से की परवाह नहीं। दूसरी ओर उसी मैदान के एक कोने में विस्थापन और राज्य दमन के ख़िलाफ़ विभिन्न संगठनों और समुदायों की साझा हुंकार भी गूंजेगी कि बस अब और नहीं सहा जायेगा, कि विकास नाम के पगलाये अंधड़ को थमना ही होगा, कि झारखण्ड की जनता आख़िरी दम तक लड़ने को तैयार है। अब तक राज्य सरकार ने देशी-विदेशी कंपनियों के साथ कुल 107 एमओयू किये। लेकिन यह तीखे जन विरोध का नतीज़ा है कि छोटे-मोटे उद्योगों को छोड़ दें तो कोई बड़ी कंपनी उसे अमली जामा पहनाने में कामयाब नहीं हो सकी। आख़िर उद्योग हवा में तो लगाये नहीं जा सकते। लोगों ने ताल ठोंक कर कहा कि वे विकास उर्फ़ उद्योगों के नाम पर अपनी एक इंच ज़मीन भी क़ुर्बान नहीं होने देंगे। याद रहे कि एक साल पहले इस्पात के बादशाह आर्सेलर मित्तल को जनता के इसी इस्पाती तेवरों ने झारखंड की धरती से अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर उल्टे पांव भाग जाने को मजबूर कर दिया था। बहरहाल, इसी आइने में पेश है झारखण्ड में जन संघर्षों के मोर्चे की अगली क़तार में शामिल तीन जुझारू साथियों की महत्वपूर्ण टिप्पणियां;

1. आर्थिक विकास और आम आदमीः देश का 40 प्रतिशत खनिज झारखण्ड में है। इस हिसाब से यह धनी राज्य है लेकिन बहुसंख्यक जनता या यों कहें कि यहां के आदिवासी एवं मूलवासी उत्पीड़ित हैं और उन्हें संसाधनहीन बनाने की प्रक्रिया बहुत तेजी से चल रही है। राज्य में 9 हजार करोड़ रूपये का पूंजीनिवेश हुआ है लेकिन दूसरी ओर लाखों लोगों को अपनी आजीविका के संसाधनों से बेदखल भी होना पड़ा है। उनके लिए आर्थिक विकास का क्या अर्थ है? आर्थिक आंकड़ों को देखने से थोड़ी बहुत खुशी जरूर होगी लेकिन इन आंकड़ों से आम झारखण्डी के जीवन स्तर का कोई सरोकार नहीं है। यहां घरेलू सकल उत्पादन 10.8 प्रतिशत है जो राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। इसी तरह प्रति व्यक्ति आय भी 10,345 से बढ़ कर 31,982 हो गयी है। यह प्रतिव्यक्ति आय संविधान में किये गये वायदे के मुताबिक आर्थिक न्याय को जरूर दर्शाती है लेकिन यह झूठ की पुड़िया भी है क्योंकि प्रतिव्यक्ति आय को मापने का तरीका ही गलत है। टाटा, जिंदल और भूषण की आय और एक आम आदमी की आय को जोड़ कर सिर्फ कागज में बराबर बांट देना, आम आदमी के साथ मजाक नहीं तो और क्या है?

2. गरीबी, भुखमरी एवं कुपोषणः झारखण्ड में गरीबी, भुखमरी एवं कुपोषण की स्थिति भयावह है। राज्य में अभी भी 40.3 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करते हैं। राज्य में 57 प्रतिशत कुपोषित बच्चे हैं। समाज कल्याण विभाग के अनुसार राज्य में 5.5 लाख बच्चे कुपोषित हैं। इसी तरह 78.2 प्रतिशत किशोरियां एवं 70 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी का शिकार हैं। आदिवासी समुदाय की स्थिति तो और भी बदतर है। इस समुदाय के पांच वर्ष से कम आयु के 80 प्रतिशत बच्चे खून की कमी से जूझ रहे हैं तथा 85 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी का शिकार हैं। पिछले एक दशक में झारखण्ड में 100 से ज्यादा लोगों की भूख से मौत हो चुकी है जिनमें 40 लोग आदिम जनजाति समुदाय से हैं। गरीबी के कारण राज्य में बाल मजदूरी खत्म करना मुश्किल है। झारखण्ड में 2001 में जहां 4 लाख 700 बाल मजदूर थे, वहीं 2005 में यह आंकड़ा 2 लाख 400 हो गया। सवाल यह है कि धनी राज्य के लोग लगातार गरीबी, भुखमरी और कुपोषण के शिकार क्यों हो रहे हैं? दूसरी ओर दूसरे राज्यों से आये हुए लोग लगातार समृद्ध हो रहे हैं तो क्यों?

3. कानून व्यवस्था की स्थितिः जिस तरह विकास एक प्रक्रिया है जिसमें सभी चीजें आगे बढ़ती रहती हैं, उसी तरह यहां की कानून-व्यवस्था भी इसी गति पर चलती प्रतीत होती है। यहां हत्या, बलात्कार एवं समाज के कमजोर वर्ग के लोगों के उत्पीड़न का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। गौर कीजिये कि वर्ष 2001 में 1507 लोगों की हत्या हुई, बलात्कार की 567 घटनाएं हुईं, महिला एवं बच्चों पर अत्याचार के 2270 मामले तो आदिवासी एवं दलित अत्याचार के 440 मामले दर्ज किये गये। अब इस पर गौर कीजिये कि वर्ष 2010 में हत्या के 1689 मामले, बलात्कार के 773 मामले, महिला एवं बच्चों के खिलाफ हिंसा के 3141 एवं आदिवासी एवं दलित अत्याचार के 577 मामले दर्ज किये गये। यह भी गौर तलब है कि 2002 में सिविल एवं सशस्त्र पुलिस की संख्या 8930 थी जो 2010 में बढ़ कर 46,613 हो गयी। इस भारी इजाफे के बावजूद कानून-व्यवस्था की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। हालत यह है कि राज्य की राजधानी के इर्द-गिर्द स्थित थानों में भी आम आदमी मुकदमा दर्ज नहीं करवा सकता। पुलिस पीड़ित एवं मुजरिम दोनों की हैसियत देख कर ही मुकदमा दर्ज करती है और उसी के मुताबिक कार्रवाई होती है।

4. नक्सलवाद की आड़ में अत्याचारः अलग झारखण्ड का अब तक का समय हिंसा-प्रतिहिंसा से भरा रहा। झारखण्ड पुलिस ने नक्सलवादियों को समर्थन देने के आरोप में ‘आतंकवाद निवारण अधिनियम’ (पोटा) के तहत 654 मामले दर्ज कर 3200 लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया तथा 10 बच्चों के साथ 202 लोगों को गिरफ्तार किया। इसी तरह अलग राज्य बनने के बाद से मई 2011 तक पुलिस ने 550 लोगों को मुठभेड़ में मार गिराया एवं 4372 लोगों को नक्सली होने के आरोप में गिरफ्तार किया। इसी तरह राज्य में पुलिस फायरिंग की 346 घटनाएं हुईं जिसमें 56 लोगों की जान गयी एवं 34 लोग घायल हुए। राज्य में 576 लोगों की मौत हिरासत में हुई जिसमें से 35 लोगों की मौत पुलिस हिरासत में एवं 541 लोगों की मौत न्यायिक हिरासत (जेलों) में हुई। सारंडा जंगल में माओवादियों के खिलाफ चलाये गये ‘आपरेशन मानसून’ एवं ‘आपरेशन अनाकोंडा’ में सुरक्षा बलों ने तीन आदिवासियों की हत्या की, महिलाओं का यौन शोषण किया एवं पांच सौ आदिवासियों को माओवादियों के नाम पर प्रताड़ित किया। इसी तरह नक्सली संगठनों एवं पुलिस के बीच हिंसा-प्रतिहिंसा की 4430 घटनाएं हुईं। इन घटनाओं में कुल 1878 लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी जिसमें 399 पुलिस व अर्धसैनिक बलों के जवान भी थे। फिलहाल तो नक्सलवाद की आड़ में राज्य में 70 हजार अर्धसैनिक बलों को लगाया गया है जिन्होंने ग्रामीणों को जीना हराम कर दिया है।

5. शिक्षा की स्थितिः झारखण्ड में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को पांच स्तरों पर देखा जाना चाहिए- प्राथमिक शिक्षा (वर्ग 1-5), माध्यमिक शिक्षा (वर्ग 6-8), सेकेन्ड्री शिक्षा (वर्ग 9-12), उच्च एवं तकनीकी शिक्षा। राज्य सरकार के ही कुछ आंकड़े यहां की शिक्षा व्यवस्था की हकीकत बताने के लिए काफी हैं। वर्तमान में झारखण्ड के विद्यालयों में कक्षा 1 से 8 तक 40,31,582 बच्चे नामांकित हैं जिनमें से 32,25,145 बच्चे ही नियमित विद्यालय जाते हैं एवं 8,06,437 बच्चे विद्यालयों से बाहर हैं। इसके अलावा एक लाख बच्चों का तो विद्यालयों में कभी नामंकन ही नहीं हुआ। छात्र-शिक्षक अनुपात में कमी नहीं आ रही है। एक शिक्षक पर 50 से 100 बच्चे निर्भर हैं एवं ड्राप आउट की संख्या कम होने का नाम ही नहीं ले रही। सरकारी प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय अब केवल खिचड़ी खिलानेवाले विद्यालय बन कर रह गये हैं। गुणवतापूर्ण शिक्षा का पूर्ण अभाव है। सरकारी माध्यमिक विद्यालयों में पढ़नेवाले बच्चे अपने पाठक्रम को सही से नहीं समझ पाते हैं। पूरे देश की तरह यहां भी गरीब और अमीर बच्चों के लिए अलग-अलग शिक्षा व्यवस्था खड़ी की गयी है। अलग राज्य बनने के बाद यह काम बहुत तेजी से हुआ है। यह असमानता को बढ़ाने की व्यवस्था है।

6. स्वास्थ्य की स्थितिः अलग राज्य बनने के बाद झारखण्ड सरकार ने लोगों को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के लिए लगभग 2800 करोड़ रूपये खर्च किये। इसके बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है। राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं की घोर कमी है। राज्य में जितने स्वास्थ्य उप केन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र की जरूरत है, उससे बहुत कम उपलब्ध हैं। जरूरत से सवा दो गुना कम चिकित्सक हैं, कोई छह गुना कम विशेषज्ञ चिकित्सक हैं और पैरा मेडिकल स्टाफ तो कई गुना कम हैं। जाहिर है कि उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों के लोग स्थानीय वैद्य एवं झोलाछाप डाक्टर पर ही निर्भर हैं। डाक्टर, एएनएम एवं अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के लिए क्षेत्र में न जाने के लिए उग्रवाद अच्छा बहाना हो गया है।

7. विस्थापन एवं गैर-कानूनी भूमि हस्तांतरण: ‘इंडियन पीपुल्स ट्रिब्यूनल आन इंनवायरमेंट एण्ड ह्यूमन राइट्स’ के अनुसार झारखंड में विकास के नाम पर अब तक लगभग 65.40 लाख लोग विस्थापन के शिकार हो चुके हैं। बावजूद इसके कि आदिवासियों की भूमि को सुरक्षा देने के कानून हैं, उनकी जमीनों का गैर-कानूनी तरीके से बड़े पैमाने पर हस्तांतरण जारी है। राज्य के विशेष न्यायालय में इसके हजारों मामले दर्ज किये गये हैं। अब तक लगभग 23 लाख एकड़ जमीन आदिवासियों के हाथ से निकल चुकी है। विकास के नाम पर झारखण्ड सरकार ने औद्योगिक घरानों के साथ 107 एमओयू किये हैं। अगर उसका क्रियान्वयन हुआ तो 2 लाख एकड़ जमीन रैयतों के हाथों से निकल कर पूंजीपतियों के पास चली जायेगी एवं उससे 10 लाख लोग विस्थापित होंगे। औद्योगिक विकास के इस माडल के कारण संसाधनों का केन्द्रीयकरण हो रहा है एवं छोटे किसान पूरी तरह से भूमिहीनता की स्थिति में आते जा रहे हैं।

6. कृषि एवं वनाधारित अर्थव्यवस्थाः झारखण्ड की अर्थव्यवस्था कृषि एवं वन आधारित है- 70 प्रतिशत लोगों की आजीविका इसी पर आश्रित है। राज्य में सालाना 15 सौ से 17 सौ मिमी वर्षा होती है जो कृषि के लिए पर्याप्त है। राज्य के कुल क्षेत्रफल का 38 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि है जिसमें 18.04 लाख हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र है। राज्य गठन के समय सिंचित क्षेत्र के 9.2 प्रतिशत हिस्से में सिंचाई व्यवस्था थी जो अब घटकर 7.3 प्रतिशत रह गयी है। यह तब है जबकि झारखण्ड में बड़े-बड़े बांध हैं लेकिन उसका पानी तो सिंचाई के लिए नहीं- औद्योगिक घरानों के लिए है। सरकार में बैठे लोग यह मामूली बात समझने को तैयार नहीं कि यह राज्य सिर्फ औद्योगिकरण के बल पर नहीं खड़ा हो सकता। उन्हें कौन समझाये और कैसे कि अंधाधुंध औद्योगिकरण तो लोगों की आजीविका को तबाह कर देगा।

7. बेरोजगारी, पलायन एवं मानव तस्करीः झारखण्ड धनी राज्य के रूप में जाना जाता है लेकिन स्थानीय लोग प्रतिदिन गरीब होते जा रहे हैं। राज्य में 27.1 प्रतिशत बेराजगारी होने की वजह से बेरोजगार युवक हिंसा का सहारा ले रहे हैं। इससे ग्रामीण इलाको के युवा बेरोजगार भी अछूते नहीं हैं। दूसरी ओर राज्य में चल रहे औद्योगिककरण से बाहरी लोगों को रोजगार मिल रहा है क्योंकि स्थानीय लोगों को शिक्षा एवं तकनीकी ज्ञान हासिल करने हेतु अवसर ही उपलब्ध नहीं कराया गया। पलायन एवं मानव तस्करी झारखण्ड में विकराल रूप ले रही है। रोजी-रोटी की खोज में यहां से प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख 25 हजार लोग पलायन करते हैं, इनमें 76 प्रतिशत आदिवासी होते हैं और लगभग 33 हजार लड़कियां। गैर-सरकारी आंकड़ों की मानें तो पिछले 12 वर्षों में झारखण्ड से लगभग 30 लाख लोगों को रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ा। इनमें लगभग 5 लाख लड़कियां और महिलाएं हैं जिनका महानगरों में बुरा हाल होता है। अधिकतर घरेलू कामगार हो जाती हैं और जो आम तौर पर मानसिक, आर्थिक और शारीरिक शोषण से गुजरने को मजबूर होती हैं। बाकी महिलाओं को पता भी नहीं चलता कि कब उनके सामने वेश्यावृत्ति के अलावा दूसरा कोई चारा ही नहीं बचा।

8. आधारभूत संरचनाः झारखण्ड में पिछले 12 सालों में राज्य की आधारभूत संरचना के निर्माण हेतु अरबों रूपये खर्च किये गये लेकिन स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। अब तक राज्य की राजधानी की सड़कों को ही ठीक नहीं किया जा सका है। लगभग प्रत्येक दो साल में हर सड़क की मरम्मत होती है जिसमें करोड़ों रूपये खर्च होते हैं। इसलिए सरकार को चाहिए कि योजनाबद्ध तरीके से वह एक सड़क को पांच साल तक चलने लायक बनाये तथा सड़क की क्षमता के अनुरूप ही वाहनों को चलने की अनुमति दे। अगले पांच वर्ष का लक्ष्य प्रत्येक गांव को पक्की सड़क से जोड़ने का होना चाहिए। इसी तरह से बिजली, पेयजल एवं भवन निर्माण के क्षेत्र में भी समय-सीमा के अन्तर्गत गुणवतापूर्ण कार्य किया जाना चाहिए। क्योंकि आधारभूत संरचना के अभाव में विकास का पहिया आगे नहीं बढ़ सकता है।  

10. अभिव्यक्ति की आजादी का हननः झारखण्ड में विस्थापन के विरोध में लोकतांत्रिक तरीके से लड़ रहे पांच हजार आंदोलनकारियों पर फर्जी मुकदमा किया गया एवं पुलिस अत्याचार के खिलाफ आवाज उठा रहे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया गया। आंदोलनकारी कुमार चन्द्र मार्डी, मुन्नी हांसदा, चरण कुमार, दयामणी बारला, जीतन मरांडी जैसे सैकड़ों आंदोनकारियों को जेल भेजा गया। नगड़ी के मामले में राज्य सरकार ने लगातार यही कहा है कि नगड़ी के रैयत सरकार को जमीन देने के लिए तैयार हैं लेकिन बाहरी लोग ग्रामीणों को भड़का रहे हैं। सरकार के महाधिवक्ता ने 6 अगस्त 2012 को माननीय उच्च न्यायाल से कहा कि नगड़ी मामले में जब भी सरकार ग्रामीणों के साथ वार्ता के लिए जाती है- दयामनी बारला, ग्लैडसन डुंगडुंग एवं रतन तिर्की जैसे बाहरी लोग पहुंच जाते हैं एवं ग्रामीणों को भड़काते हैं। इसी तरह माननीय उच्च न्यायालय ने भी अपने आदेशों में विस्तार से कहा है कि बाहरी लोगों ने 1957-58 में भी रैयतों को भड़काया और अब भी वही काम कर रहे हैं। इस तरह झारखण्ड सरकार एवं माननीय उच्च न्यायालय ने अभिव्यक्ति की आजादी में भी आपत्तिजनक और अनावश्यक हस्तक्षेप करने की कोशिश की है जो असंवैधानिक है। यह अभिव्यक्ति की आजादी का घोर उल्लंघन है और अगर अभिव्यक्ति की आजादी खत्म हो गयी तो कोई भी अधिकार हासिल कर पाना संभव नहीं होगा।

कुल मिला कर कहा जाये तो झारखण्ड के पिछले 12 सालों में शासक वर्ग ने खूब पाया। उनकी गाड़ियों की संख्या बढ़ी, उनके बंगले और उंचे हुए, बैंक बैलेंस में भारी इजाफा हुआ, उनका निवेश भी दस गुना बढ़ गया। लेकिन राज्य का आम आदमी मुख्य रूप से आदिवासी एवं मूलवासी जिनके लिए राज्य का गठन किया गया, उसे कुछ नहीं मिला। राज्य बनने के बाद उनकी जमीन, जंगल, पानी, पहाड़ और खनिज लूट लिया गया और उस लूटे हुए व्यक्ति को गरीब कहा गया जबकि वह शोषित-उत्पीड़ित है, गरीब नहीं। राज्य प्रायोजित लूट, फरेब अत्याचार एवं दमन की वजह से वह आम आदमी जिसके पास प्राकृतिक संसाधन था और जिसके कारण वह आत्मनिर्भर था, गरीब बना दिया गया। झारखण्ड राजनीतिक रूप से अलग राज्य तो बना लेकिन सांस्कृतिक गुलामी से इसे मुक्ति नहीं मिली। सामूहिकता, लोकतांत्रिकता और मानवीयता के उत्कृष्ट मूल्यों से सजी यहां की सदियों पुरानी संस्कृति पर व्यक्तिवाद, सामंतवाद एवं ब्राह्मणवाद हावी हो गया और यहीं से राज्य गलत दिशा में चला गया। सत्ता पर बैठे आदिवासी एवं मूलवासी नेता इसी मानसिक गुलामी के शिकार हैं। जो नेता जल, जंगल, जमीन, पहाड़ और खनिज बचाने की लड़ाई लड़ते थे, वही नेता सत्ता में पहुंच कर इन संसाधनों को पूंजीपतियों के हवाले करने में गर्व महसूस करने लगे हैं। यह इस राज्य के लिए सबसे बड़ा दुर्भाग्य है, झारखण्ड के आम लोगों की प्रगति और खुशहाली की राह का सबसे बड़ा पत्थर है।

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