कोयला सत्याग्रह: ज़मीन हमारी तो कोयला भी हमारा

गांधी जयंती के मौक़े पर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के कोई 14 गांवों के किसानों ने कोयला क़ानून तोड़ने का साहसी काम किया। कोयले पर अपनी दावेदारी दर्शाने के लिए उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से अपनी ज़मीन से कोयला खोदा। नारा दिया कि ज़मीन हमारी तो कोयला भी हमारा। किसानों का यह क़दम इस नारे को सच में बदले जाने के संघर्ष की शुरूआत था। पेश है इस प्रेरणादायी कोयला सत्याग्रह की रिपोर्ट एवं  साथ में  गारे  निवासियों  का  राष्ट्रपति के नाम  ज्ञापन;

रायगढ़ के तमनार ब्लाक के कोई आठ सौ किसानों ने गांधी जयंती के मौक़े पर राष्ट्रपिता को अनूठे ढंग से याद किया, गुज़री 2 अक्टूबर को जैसे 12 मार्च 1930 का ऐतिहासिक दिन ज़िंदा कर दिया। गांधी जी ने उस दिन साबरमती आश्रम से अपने अनुयायियों के साथ जुलूस की शक़्ल में निकल कर मुठ्ठी भर नमक बनाया था। यह नमक क़ानून तोड़ो आंदोलन के नाम से इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हुआ। यह जन कार्रवाई नमक के उत्पादन और बिक्री से संबंधित क़ानून को अस्वीकार करने और नमक़ पर आम लोगों का हक़ जताने के लिए थी।

82 बरस बाद उसी तर्ज़ पर गांधी जयंती के मौक़े पर रायगढ़ के किसानों ने कोयला क़ानून तोड़ा। सबसे पहले गारे गांव में आसपास के एक दर्ज़न से अधिक गांवों के लोग जमा हुए। गांधीजी की तसवीर पर पुष्पांजलि भेंट की गयी। इसके बाद लोग जुलूस बना कर, गैती और टोकरियों और बैनर-पोस्टर के साथ नारे लगाते हुए गांव-गांव घूमे और आख़िरकार गारे गांव के खेतों में पहुंचे जहां उन्होंने ज़मीन खोद कर कोयला निकाला। इस तरह उन्होंने दावा किया कि ज़मीन हमारी है तो इसके नीचे दबा कोयला भी हमारा है और हम उसे किसी कंपनी के हवाले नहीं होने देंगे। खोदे गये कोयले को लाद कर गारे गांव लाया गया। खनिज विभाग के अधिकारियों को न्यौता भी भेजा गया कि वे गांव आयें और खोदे गये कोयले की रायल्टी की पर्ची काटें।

यह जन कार्रवाई सरकार की कोयला आबंटन की उस नीति को ख़ारिज़ करने के लिए थी जिसका कुल मक़सद केवल बड़ी कंपनियों और भ्रष्टाचार को मौक़ा देना है, और जिसका देश और देश के लोगों के भले से कोई लेनादेना नहीं है।

याद रहे कि कोई डेढ़ माह पहले गारे गांव में हुई किसानों की बैठक में फ़ैसला हुआ था कि वे ख़ुद अपनी कंपनी बना कर बिजली संयंत्र लगायेंगे और कोयले का खनन भी करेंगे। इसी के साथ कंपनी बनाये जाने की प्रक्रिया भी शुरू हो गयी। इसी कड़ी में कोयले पर जनता की दावेदारी का इज़हार करने के लिए गांधी जयंती का दिन चुना गया। नमक क़ानून तोड़ो आंदोलन की तरह यह कार्यक्रम भी सांकेतिक था। किसानों ने बिना लाइसेंस के अपनी ज़मीन से कोयला निकाला और ताल ठोंक कर यह एलान भी किया कि अब उनका अगला कार्यक्रम कोयला खदानों में घुस कर कोयला निकालने का होगा। मतलब कि वे निर्णायक लड़ने को तैयार हैं भले ही उन्हें इसकी कितनी ही बड़ी क़ीमत क्यों न अदा करनी पड़े।

लंबे अरसे से कंपनियों के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे मेहनतकश किसान मज़दूर सभा के नेता हरिहर पटेल ने (जो अपने जुझारूपन के लिए कोई डेढ़ साल की जेल भी काट चुके हैं) इस मौक़े पर कहा कि किसान सरकार को कोयला निकालने के लिए दोगुना रायल्टी देने को तैयार हैं। उन्हें अपनी ज़मीन से कोयला निकालने की इजाज़त मिलनी चाहिए। यह उनका अधिकार है। इसके लिए वे सरकार को रायल्टी भी चुकायेंगे लेकिन अगर सरकार किसानों को लाइसेंस नहीं देती तो भी वे अपने इस अधिकार का उपयोग करेंगे। अपनी ही ज़मीन से कोयला खोदेंगे और अगर सरकार इसके लिए उन पर पेनाल्टी ठोंकती है तो उसे कभी अदा नहीं करेंगे। कुछ इस तरह नारा गूंजा- रायल्टी देंगे, पेनाल्टी नहीं।

कहना होगा कि किसानों की इस कार्रवाई से प्रशासन के अलावा वोट के मैदान के नेता भी सकते में हैं। क्षेत्र के भाजपा विधायक किसानों के इस क़दम को सही नहीं मानते। उनके मुताबिक़ किसानों को क़ानून का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। इस सवाल पर कि तब तो गांधीजी को भी नमक क़ानून नहीं तोड़ना चाहिए, उनका जवाब है कि तब की परिस्थितियां कुछ और थीं। जिले के कांग्रेसी नेताओं का भी यही सुर है।

रायगढ़ में उद्योगों के चलते हो रहे भारी विस्थापन और बढ़ते प्रदूषण के ख़िलाफ़ सक्रिय जन चेतना से जुड़े राजेश त्रिपाठी की टिप्पणी है कि इसमें अचरज कैसा? रायगढ़ में उद्योग लगाये जाने के सवाल पर जितनी जन सुनवाइयां हुईं, उसे केवल जन सुनवाई का नाटक कहा जा सकता है। इन नाटकों में हम दोनों दलों को एक जैसी जन विरोधी भूमिका अदा करते हुए ख़ूब देख चुके हैं। भले ही दोनों के झंडे अलग हों और वे कुश्ती लड़ते रहते हों लेकिन विकास के नाम पर हो रहे सत्यानाश में दोनों बराबर के भागीदार हैं।

किसानों के इस क़दम को रायगढ़ समेत पूरे छत्तीसगढ़ में और देश के दूसरों हिस्सों से भी व्यापक समर्थन मिला है। सभी का मानना है कि प्राकृतिक संसाधनों पर उन्हीं का अधिकार बनता है जो सदियों से इसके वारिस रहे हैं और उसकी हिफ़ाज़त करते रहे हैं। सरकार नियामक हो सकती है, नियंता नहीं। उसे अधिकार नहीं कि इस ख़ज़ाने को उसके असली हक़दारों से छीन कर चंद बाहरी हाथों को सौंप दिया जाये। यह कहीं से लोकतांत्रिकता नहीं।

किसानों द्वारा कंपनी बना कर साझा उद्योग लगाने का फ़ैसला कोई नया नहीं है। झारखंड में ऐसी पहली कंपनी 2007 में बनी थी। बाद में गुजरात में भी यह प्रयोग हुआ। कुछ जगहों पर सामूहिक परियोजना शुरू भी हो चुकी है। तो तमलनार में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? 

यहां जिंदल, जायसवाल, मोनेट, प्रकाश स्पंज जैसे उद्योग समूहों को कोयला खदानें आबंटित की गयी हैं। इसके चलते कई गांव हमेशा के लिए जिले के नक़्शे से मिट गये हैं। उद्योग-धंधों की भरमार ने रायगढ़ को देश के सर्वाधिक प्रदूषित जिलों की सूची में पहुंचा देने का काम किया है। रायगढ़ आदिवासी बहुल इलाक़ा है। क़ानून के मुताबिक़ ऐसे इलाक़ों में ज़मीन अधिग्रहण के लिए ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य है। लेकिन अधिकतर मामलों में यही देखा गया कि ग्राम सभा की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए लोगों की ज़मीनें छीनी गयीं और उसे कंपनियों को सौंप दिया गया। लोगों को क्या मिला? उनकी आजीविका का साधन छिना और उनके सामने ज़िंदा रहने का संकट खड़ा हो गया। लेकिन हां, ढेर सारे लोगों की बर्बादी का फ़ायदा कुछ कंपनियों को भरपूर मिला। 

यह अंधेरगर्दी है, सरासर ज़्यादती है। तमलनार के किसानों ने इसे पहली बार तगड़ी चुनौती दी है। देखना होगा कि यह चुनौती सरकार और कंपनियों के लिए कितनी मारक बनती है और उसकी आंच कितनी दूर तक फैलती है।




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