मुलताई गोलीकाण्ड के महत्वपूर्ण प्रकरणों में फैसला: डॉ .सुनीलम्

सर्व विदित है कि मध्यप्रदेष के बैतूल जिले की मुलताई तहसील के सामने 12 जनवरी 1998 को मुलताई मे लगातार फसले खराब होने के कारण मुआवजा मॉंग रहे किसानों पर कांग्रेस की सरकार के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के षड़यंत्र के चलते मेरी हत्या तथा किसान आन्दोलन को कुचलने के उद्देष्य से पुलिस गोलीचालन प्रायोजित किया गया था, जिसमे 24 किसान शहीद हुए, 150 किसानो को गोली लगी। विभिन्न किसान संगठनो, जन संगठनो तथा राजनैतिक दलो द्वारा तत्कालीन एस.पी., कलेक्टर पर हत्या का मुकदमा चलाने की मॉंग पूरी करने की बजाय सरकार ने मेरे सहित 250 किसानो पर 66 फर्जी मुकदमे दर्ज किए गए। हत्या, हत्या के प्रयास, लूट, आगजनी, सरकारी काम मे बाधा सहित तमाम अपराधों को लेकर दर्ज फर्जी मुकदमे 12 जनवरी 1998 से अब तक चल रहे है। जिनमे से मुलताई सत्र न्यायाधीष के समक्ष तीन मुकदमंे है। जिनमें आगामी 18 अक्टूबर को फैसला सुनाया जाएगा। फैसला तो कानून ,गवाही तथा बहस के आधार पर होगा लेकिन मुलताई गोलीचालन से उभरे मुद्दो पर विचार करना जरूरी है।

गोलीचालन के बाद सरकार ने आमतौर पर जो किया जाता है वह करते हुए तत्कालीन पुलिस अधीक्षक तथ जिलाधीष का निलम्बन किया था तथा न्यायिक जॉच आयोग भी बिठाया था।

औपचारिकताए पूरी हो जाने के बाद सरकार ने न केवल दोनो अधिकारियो को बहाल किया बल्कि दोनो को लगातार पदोन्नति देकर गोलीचालन करने के लिए पुरस्कृत कर प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को यह संदेष दिया कि जो सीधे गोली चलानें से  जुड़ा अफसर होगा, जिसने स्वयं गोली चलाई होगी उसको सरकार सजा दिलाने की बजाय सतत् रूप से संरक्षण देने का कार्य करेगी। यहॉं मुख्य मुद्दा यह है कि आंदोलनकारियों से संवाद करने की बजाय किसानो की दिनदहाड़े हत्या की गई। सभी जानते और मानते है कि आई. ए. एस. एवं आई. पी. एस. अधिकारी इस कार्य के लिए नियुक्त नहीं किये जाते। होना तो यह था कि सरकार दोनों अधिकारियों को बर्खास्त कर यह स्पष्ट संदेष देती किं उसके राज में अधिकारी कानून हाथ में नही ले सकते तथा पुलिस गोली चालन करने या कराने वाले अधिकारियों को नही बक्षा जाएगा।

देश में अब तक हुये हजारों गोली चालनों में 55 हजार से अधिक निहत्थे और निर्दोष नागरिक मारे जा चुके है। ज्यादातर गोली चालनों के बाद न्यायिक आयोग का गठन कर जाँच कराई जाती है। मुलताई गोलीचालन के बाद भी यही हुआ। जिलासत्र न्यायाधीष पी. सी. अग्रवाल की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग गठित किया गया जिसका किसानों ने यह कहकर बहिष्कार किया कि वे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीष से जाँच कराना चाहते है। तथा उन्हें सरकार द्वारा नियुक्त किये गये न्यायाधीष से न्याय पाने की उम्मीद नहीं है क्योंकि उन्होंने पूर्व मंे पुलिस गोलीचालन के बाद अधिकारियों को बचाने और आंदोलनकारियों को फंसाने की रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। आयोग ने जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी उस पर ना तो विधानसभा मंे चर्चा की गइर्, न ही रिपोर्ट के आधार पर गोलीचालन करने वाले तथा षड़यंत्र करने वाले पुलिसकर्मियों पर कोई मुकदमे दर्ज किये गये। हाँ इतना जरूर हुआ कि आयोग की सिफारिषों के आधार पर सरकार ने यह सुझाव स्वीकार कर लिया कि किसी भी गोली चालन के बाद विभागीय जाँच पूरी न होने तक किसी भी अधिकारी को निलम्बित नहीं किया जायेगा। किसानों के अनुमान अनुसार रिपोर्ट जमा कर दिये जाने के बाद न्यायाधीष महोदय को पदोन्नत कर उन्हें उच्च न्यायालय का न्यायाधीष बना दिया गया। आयोग की रिपोर्ट पढ़ने से साफ हो जाता है कि यह रिपोर्ट व्यक्तिगत मेरे खिलाफ लिखी गई तथा गोलीचालन करने वालों के अपराधों को पर्दा डालने के लिए लिखी गई। सूचना के अधिकार के तहत मैने सामान्य प्रषासन विभाग से जॉंच आयोग के दस्तावेजो की प्रतियॉ 2 वर्ष पहले मॉंगी, जो आज तक उपलब्ध नही कराई गई है। अनौपचारिक तौर पर उच्च अधिकारियो ने कहा कि फाईल खो चुकी है, यह है सरकार का रवैया।

अब वह समय आ गया है जब देष में तमाम जघन्य घटनाओं के बाद स्थापित किये गये आयोगों की दुर्गति देखते हुये जाँच के कोई नए तरीके ईजाद किये जायंे। सी.बी.आई. की विष्वसनीयता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। आयोगो के गठन को लेकर कम से कम इतना तो हो कि दोषी अधिकारी जाँच आयोग को गुमराह करने से डरें, आयोग स्वतंत्र रूप से जाँच कर सके तथा आयोग की रपट के आधार पर जाँचकर्ता को पुरस्कृत न किया जाये। देष में तमाम ऐसे मामले भी सामने आये है जिसमें जाँच के बीच में न्यायाधीष को हटा दिया गया क्योंकि वे निष्पक्षता व ईमानदारी से काम कर रहे थे। तथा सरकार के हाथ की कठपुतली बनने को तैयार नहीं थे।

पुलिस फायरिंग के बाद 12 जनवरी 1998 की शाम को मुझे गिरफ्तार किया गया था। पुलिस द्वारा अमानवीय तरीके से प्रताड़ित किया गया जितनी बार होष आया, बेहोष होने तक लगातार लाठियों, बूटों, बेल्टों, लात, घूसों से मारा-पीटा गया। बिना, खाना-पानी दिये हथकड़ी बेड़ी में जकड़ कर रखा गया। फर्जी मुठभेड़ की कोषिष की गई। मैंने सब कुछ लिखित में न केवल न्यायालय को बताया बल्कि जेल से मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को चिट्ठियाँ भी भेजी। परंतु आज तक किसी भी एजेंसी ने जाँच करने की जहमत नहीं उठाई। तीसरे दिन मुलताई मजिस्टेªट के सामने पेष कर जेल पहँुचाकर मुझ पर तथा मेरे 250 साथी किसानों पर 66 मुकदमें दर्ज कर दिये गये। एक घटना के 66 मुकदमें दर्ज होने पर किसी ने आपत्ति नहीं की। हमारी आपत्ति का भी संज्ञान नहीं लिया गया। दूसरी तरफ आंध्रप्रदेष उच्च न्यायालय की फुल बैच द्वारा दिये गये फैसले के मुताबिक गोली चालन से किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद मुकदमा दर्ज किया जाना तथा न्यायालय में पेष किये जाने का स्पष्ट निर्देष होने के बावजूद 24 किसानों की मौत के बावजूद पुलिस कर्मियों तथा षड़यंत्रकर्ताओं के खिलाफ एक भी मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। जबकि पुलिस ने स्कूल गाउण्ड में क्रिकेट खेल रहे छात्र ऋषि साहू की दिनदहाड़े गोली मार कर हत्या की थी। तथा दुकान से निकालकर एक नौजवान राऊत की सरेआम हत्या की थी।

ऐसा नहीं है कि फर्जी मुकदमें केवल मुलताई के आंदोलनकारियों पर लगाये गये हों। देष में जहाँ भी आंदोलन होते है वहाँ आंदोलन की माँगों का कुछ हो या न हो, आंदोलनकारियों पर फर्जी मुकदमें लगाना तथा उनका जेल पहुँचना तय होता है। फर्जी मुकदमा दर्ज करने वालों पर तथा फर्जी गवाही देने वाले पर जब तक कड़ी कारवाई के कानूनी प्रावधान नहीं किये जाते तब तक यह चलन चलता ही रहने वाला है।

फर्जी मुकदमों का सीधा सम्बंध पुलिस के दुरूपयोग से जुड़ा हुआ है। जो भी राजनैतिक दल सत्ता मंे आता है वह पुलिस को अपने हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है। ऐसा लगता है कि पुलिस की जवाबदेही भारत के संविधान तथा भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता की जगह सत्ताधारी नेताओं का हुक्म पालन करने तक सीमित हो जाती है। न तों पुलिस मुकदमा दर्ज करने के लिए स्वतंत्र है और न ही किसी भी प्रकरण की जाँच स्वतंत्र रूप से की जाती है। मुलताई गोली चालन से जुड़े 66 प्रकरणों मंे यदि जाँच अधिकारी निष्पक्ष जाँच करते तों साफ हो जाता कि सभी प्रथम सूचना रिर्पोटंे फर्जी-निराधार है। लेकिन पुलिस का उपयोग फर्जी गवाह तैयार करने के लिए किया गया। पूरी जाँच मुझे और मेरे साथियों को सजा दिलाने के मन्तव्य से की गई। इतना सब होने के बावजूद पुलिस सभी प्रकरण न्यायालय के समक्ष पेष करने में असमर्थ रही। कितने प्रकरणों में खात्मा दर्ज किया गया इसकी जानकारी अब तक मुझे अथवा मेरे किसी भी साथी को पुलिस द्वारा नहीं दी गई है। सरकार ने 66 प्रकरण तो दर्ज कर लिये लेकिन जब चौ तरफा थूँ- थूँूँ होना शुरू हुई तब सरकार ने प्रकरण वापसी का नाटक किया। आज तक कितने प्रकरण वापस हुये। इसकी जानकारी भी मुझकों नहीं दी गई है। दिलचस्प यह है कि एक तरफ सरकार लोकहित में मुकदमें वापस लेने का नाटक कर रही थी। दूसरी तरफ सरकारी वकील अपने ही आवेदन का अपरोक्ष रूप से विरोध कर रहे थे।

जब भाजपा सरकार गठित होने पर, उमा भारती दस साल के कांग्रेस शासन के बाद मुख्यमंत्री बनीं तब उन्होने सदन ने मुझसे कहा कि कांग्रेस के शासन काल में पुलिस ने तुम्हे सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया है। मेरी सरकार किसानों के साथ न्याय करेगी। उस दिन उन्होंने फर्जी मुकदमें वापस लेने की घोषणा की। भाजपा सरकार ने गत नौ वर्षो में एक लाख 75 हजार मुकदमें वापस भी लिये लेकिन मुलताई के किसानों का एक भी मुकदमा सरकार ने वापस नही लिया।

राजनैतिक दलों का दोहरा चरित्र पुलिस गोली चालन को लेकर ख्ुालकर सामनें आया। गोली चालन के बाद, विधानसभा में कई घंटे बहस हुई। भाजपा के 10 विधायकों न,े जो अब मंत्री बन चुके है, ने अधिकारियों पर हत्या के मुकदमें चलाने तथा नष्ट फसलों का समय पर समुचित मुआवजा देने तथा फसल बीमा का समय पर समुचित मुआवजा देने का प्रबंध करने की माँग की। यह भी कहा कि शहीद किसानों का स्तम्भ बनाया जाना चाहिए। फर्जी मुकदमें वापस लेने की मांग भी कांग्रेस सरकार से की गई। लेकिन भाजपा सरकार के नौ साल बीत जाने के बावजूद इनमें से एक मंत्री ने किसानों की सुध नहीं ली है। जो माँगे भाजपा विपक्ष में रहकर कांग्रेस सरकार से कर रही थी। उनमें से एक भी माँग पर भाजपा सरकार द्वारा गंभीरता से कार्यवाही नहीं की गई है।

चुनाव के लिये राजनैतिक दल किसानों की लाशों का इस्तेमाल करते रहे है। भाजपा ने शहीद किसानों के पोस्टर छापे, सरेआम वोट माँगे, फिर शहीद परिवारों को भूल गये, यहाँ तक कि शहीद स्तम्भ बनाने तक की अनुमति भाजपा सरकार ने मेरे द्वारा 20 लाख रूपए की विधायक निधि आबंटित करने के बावजूद अब तक नहीं दी है। कांग्रेस के राहुल गांधी ने विदर्भ की कलावती के माध्यम से किसानों की आत्महत्या का सवाल उठाकर संसद में खूब वाहवाही लूटी थी। लेकिन विदर्भ के किसानों के आत्महत्या के लिए मजबूर होने की परिस्थिति आज तक नहीं बदली है। कुछ दिन पहले सोनिया गॉंधी ने गुजरात जाकर कहा कि, किसान हक मॉंगे तो उसे गुजरात मे गोली मिलती है। जहॉं कांग्रेस सरकारो नें गोलीचालन किया है उन पर सोनिया कुछ बोलने को तैयार नही है।

पार्टियों ने किसानों के प्राकृतिक आपदा के चलते फसले खराब होने के बाद समुचित मुआवजा देने की समस्या तथा फसल बीमा के भुगतान की समस्या को आज तक हल नहीं किया है। सरकार ने अब बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की अनुमति दे दी है। जब किसानों का फसल बीमा का भुगतान देश की कम्पनियो ने नहीं किया। तब विदेशी कम्पनियों से मुआवजा पाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? देश में जब राजनैतिक दलों ने किसान, किसानी तथा गाँव के खात्में को ही देश के विकास का पैमाना बना दिया हो, तब किसानों को न्याय मिलने की उम्मीद लगातार कम होती जाना तय है। अर्थात् किसानों के सामनंे राज्य कल्याणकारी राज्य का मुखौटा उतारकर सरकारों का दिन प्रतिदिन और अधिक दमनकारी हो जाना तय है। जो खुली अर्थव्यवस्था, बाजारवाद तथा नवउदारवाद का प्रतिफल है।

देर से दिया गया न्याय, न्याय को नकारना माना जाता है। मुलताई के किसानों को न्याय के नाम पर 14 वर्ष अदालत के चक्कर काटने पडे हैं। एक-एक किसान की वारण्ट निकल जाने पर कई-कई बार गिरफ्तारियाँ हुई हैं। न्यायालय सरकारी गवाहों को एक दशक से अधिक तक तलब नहीं कर सके। सेशन ट्राईल, समरी ट्राईल की तरह चली। जो भी न्यायाधीश प्रकरण को समझने लगा उसे बदल दिया गया। किसानों को कानूनी मदद देने के लिए कोई ऐसी पार्टी, संस्था, संगठन, आगे नहीं आया जिसने किसानों की रोजमर्रा की कानूनी आवश्यकताओं को पूरा किया हो। एड. आराधना भार्गव ने स्वप्रेरणा से पूरे प्रकरणों को 15 साल तक लड़ा। फैसला 10 अक्टूबर को जो भी आये किसान 14 वर्षो से सजा भ्ुागत ही रहे है। मुलताई के किसान आज भी आंदोलन तथा गोलीचालन से उपजे सवालों के जबाव पाने के लिए संघर्षरत हैं।

आपका
डॉ.सुनीलम्                                                                                                
                                                                                    

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