बीस साल बाद किसानों को मिला इंसाफ़

अभी हाल में आये बिलासपुर उच्च न्यायालय के एक फ़ैसले ने उन किसानों में इंसाफ़ मिलने की आस जगा दी है जिनकी ज़मीन किसी परियोजना के लिए अधिग्रहीत की गयी लेकिन नियमानुसार उन्हें उस परियोजना में नौकरी नहीं मिली। यह फ़ैसला ग्रासिम (अब अल्ट्रा टेक) सीमेंट संयंत्र के मामले में आया जिसमें प्रबंधन को आदेश दिया गया कि प्रभावित किसानों को अगर नौकरी देने की स्थिति नहीं तो उनकी ज़मीनें उन्हें वापस करो। पेश है इस पूरे मसले पर भगवती साहू की टिप्पणी; 

जिस मामले में बिलासपुर उच्च न्यायालय ने किसानों के पक्ष में फ़ैसला सुनाया, वह 20 साल पुराना है। बलौदा बाज़ार जिले के रावन गांव स्थित ग्रासिम सीमेंट संयंत्र (जो अब अल्ट्रा टेक के नाम से जाना जाता है) के लिए चुचरूपुर, सरसैनी, छिराही आदि गांवों की ज़मीनें अधिग्रहीत की गयी थी। संयंत्र में सीमेंट का उत्पादन भी शुरू हो गया लेकिन उन परिवारों के किसी सदस्य को संयंत्र में नौकरी नहीं मिल सकीं जिनकी खेती की ज़मीन इस परियोजना की भेंट चढ़ गयी थीं। ज़मीन के अधिग्रहण के साथ संयंत्र में नौकरी दिये जाने की शर्त शामिल थी। लेकिन ग्रासिम सीमेंट धोखेबाज निकला, ज़मीन लेने के बाद अपने इस वायदे से मुकर गया।

आख़िरकार, प्रभावित किसानों ने जिला कलेक्टर से फ़रियाद की। कलेक्टर ने मामले पर सख़्त रूख़ अपनाया। कंपनी प्रबंधन को आदेश दिया कि ज़मीनों के अधिग्रहण की इस शर्त का तत्काल प्रभाव से पालन किया जाये और अगर नौकरी देने की स्थिति नहीं है तो किसानों को उनकी ज़मीन लौटा दी जाये। यह 16 नवंबर 1992 की बात है। तब मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ अलग नहीं हुआ था। 

ग्रासिम प्रबंधन ने कलेक्टर के इस न्यायसंगत आदेश को नहीं स्वीकारा और इसके ख़िलाफ़ जबलपुर उच्च न्यायालय चला गया। यह क़ानूनी दांवपेंच में मामले को उलझा देने का हथकंडा था कि प्रभावित किसान आख़िर कब तक इतनी दूर अदालत के चक्कर लगायेंगे, कि थक कर एक दिन ख़ामोश हो जायेंगे। लेकिन यह सोचना ग़लत निकला। किसान इंसाफ़ के लिए डटे रहे। इस बीच छत्तीसगढ़ अलग राज्य बन गया और बिलासपुर में राज्य का अपना उच्च न्यायालय भी हो गया। इस तरह मामला जबलपुर से बिलासपुर उच्च न्यायालय के हवाले हो गया। उधर, ग्रासिम सीमेंट भी अल्ट्रा टेक सीमेंट हो गया। 

20 साल बाद प्रभावित किसानों को इंसाफ़ मिला जब गुज़री 18 सिंतबर को उच्च न्यायालय ने कलेक्टर के आदेश को सही ठहराते हुए उसे बहाल रखा। मतलब कि अब प्रभावित किसानों को अल्ट्रा टेक सीमेंट संयंत्र में नौकरी देनी होगी या उनकी ज़मीनें वापस करनी होंगी। छत्तीसगढ़ में ऐसे मामलों की लंबी सूची है जिसमें किसानों को भरमा कर कौड़ियों के भाव उनकी ज़मीनें हथियायी गयीं। इसके लिए उन्हें सुनहरे सपने दिखाये गये, उनसे मोहक वायदे किये गये। भोले-भाले किसान उनके बहकावे में फंसे और छले गये। उन्हें लगा था कि ज़मीन देकर उनकी क़िस्मत सुधर जायेगी। लेकिन सुनहरे सपने और मोहक वायदे हवा हो गये। न उन्हें नौकरी मिली और ना ही दूसरी सुविधाएं। ग्रासिम के मामले में भी यही हुआ। ज़मीन देना लोगों के लिए बहुत भारी पड़ा। उनकी आजीविका का इकलौता साधन छिन गया और इसके बदले उन्हें जो मुआवज़ा मिला, वह भी बहुत मामूली- बाज़ार दर से तीन गुना कम, कुल साढ़े तीन हज़ार रूपये प्रति एकड़।  

इंसाफ़ के लिए प्रभावित किसानों को 20 साल इंतज़ार करना पड़ा। तारीफ़ करनी होगी कि उन्होंने इतने लंबे समय में अपना धीरज और आत्मविश्वास नहीं खोया, और संघर्ष को जारी रखा। 

हैरत की बात है कि इतना महत्वपूर्ण अदालती फ़ैसला अख़बारों की सुर्ख़ियां नहीं बन सका। ज़ाहिर है कि इसलिए कि इस ख़बर का दूर तक पहुंचना कंपनियों और सरकार के हित में नहीं होगा। अदालती आदेश नज़ीर बन जायेगा। जगह-जगह ऐसे मामलों में प्रभावित किसानों के बीच इंसाफ़ मिलने की आस जगेगी। इंसाफ़ के लिए गहमागहमी बढ़ेगी। इससे निवेशकों को लुभाये जाने का माहौल बिगड़ेगा। राज्य सरकार का सबसे बड़ा इकलौता कार्यक्रम है निवेशकों के लिए लाल कालीन बिछाना, उन्हें हर तरह की सहूलियत और रियायत देने का रिकार्ड बनाना या कहें कि छत्तीसगढ़ को मुनाफ़े के लुटेरों के हवाले कर देना। इस ख़बर के दबने (या दबाये जाने) से पता चलता है कि छत्तीसगढ़ में मीडिया किस क़दर सरकारी धुन में रहता है। बताते चलें कि इस ख़बर को केवल पत्रिका में ही जगह मिल सकी। 

अभी अदालत से इंसाफ़ मिला है, अल्ट्रा टेक से नहीं। इसे हासिल करना आसान नहीं होगा। इसके लिए भी लड़ना-भिड़ना होगा। तो कहना चाहिए कि लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है, जारी है। 

बहरहाल, हम इस अदालती फ़ैसले का स्वागत करते हैं। यह उद्योगों से प्रभावित किसानों के पक्ष में है। इसका अधिक से अधिक प्रचार किया जाना चाहिए। ताकि दूसरी जगहों से भी आवाज़ उठे कि शर्तें पूरी करो वरना हमारी ज़मीन वापस करो। 

(लेखक प्रगतिशील सीमेंट श्रमिक संघ के अध्यक्ष हैं और उद्योग प्रभावित किसान संघ में भी सक्रिय हैं। अभी वह साढ़े तेरह महीने की जेल काट कर ज़मानत पर रिहा हुए हैं। बलौदा बाज़ार स्थित अंबुजा सीमेंट के प्रबंधन के इशारे पर उन्हें और उनके आठ साथियों पर फ़र्ज़ी मामले थोपे गये थे। यह सभी सीमेंट श्रमिकों के जुझारू नेता हैं। बाक़ी आठों साथी फ़िलहाल भूमिगत हैं।)
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