देश को है फिर एक जे पी की जरूरत

आज लोकनायक जय प्रकाश नारायण (जे पी) की 110वीं जयंती है। जे पी के इस जीवन परिचय को जानना जे पी को समझने के लिए तथा उनसे प्रेरणा लेने के लिए आवश्यक है। पेश है डॉ सुनीलम कि यह रिपोर्ट;

जे पी का जन्म बलिया जिले के सिताब दियारा ग्राम में हुआ था। जनवरी 1922 में वे पहली बार गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन में शामिल हुए। उसी वर्ष पढ़ाई के लिए अमरीका चले गये। जहां से वे मार्क्सवादी होकर 7 वर्ष बाद भारत लौटे। गांधीजी से वर्धा में मुलाकात कर कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में भाग लिया तथा इलाहाबाद स्थित कांग्रेस कार्यालय में श्रमिक विभाग का उत्तरदायित्व संभाला। 1932 में मद्रास जेल गये। 1933 में नासिक जेल में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना को लेकर समाजवादी नेताओं के साथ परामर्श किया तथा अक्टूबर 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव बने। 

युद्ध विरोधी भाषण देने के कारण 1940 में 9 माह की सजा हुई। रिहा होने के बाद 1941 में उन्हें फिर बम्बई में गिरफ्तार किया गया। राजस्थान के देवली कैंप जेल में रहते हुए कैदियों बदतर स्थिति को लेकर उन्होंने 31 दिन तक उपवास किया। 42 में हजारीबाग जेल से जेल की दीवार फांद कर 9 नंबर 1942 को भूमिगत हो गये तथा नेपाल में आजाद दस्ते की स्थापना की। पुनः 18 सिंतंबर 1942 को उन्हें गिरफ्तार कर लाहौर जिला जेल ले जाया गया, जहां उनको भीषण तौर पर प्रताड़ित किया गया। 1945 में वे आगरा जेल में स्थानांतरित किये गये जहां से 19 अप्रैल 1946 को उनका अगस्त क्रांति नायक के तौर पर जबरदस्त इस्तकबाल किया गया। सोशलिस्ट पार्टी के निर्माण के बाद उन्होंने देशभर का दौरा किया। लेकिन चुनाव में समाजवादियों की करारी हार हुई। 30 मई 1952 को आचार्य बिनोवा भावे से उन्होंने मुलाकात की तथा भूदान-सर्वोदय आंदोलन में शामिल होने का मन बनाया। 5 मई 1954 को उन्होंने गया जिले में सोखोदवरा आश्रम की स्थापना की। अक्टूबर 1957 को प्रजा समाजवादी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर भूदान कार्यक्रम में शामिल हुए। 1965 में उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1967 में उन्हें राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने का प्रस्ताव मिला जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। 1971 में बांग्लादेश की आजादी के पक्ष में विश्व जनमत बनाने के लिए विदेश यात्रा की। अप्रैल 1972 में चंबल की घाटी में बागियों का ऐतिहासिक आत्मसमर्पण कराया। 1974 में गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन का समर्थन किया। छात्र आंदोलन के कार्यक्रमों में शामिल हुए। 9 अप्रैल 1974 को विद्यार्थियों द्वारा उन्हें लोकनायक घोषित किया गया। 5 जून 1974 को पटना की एक आमसभा में उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान किया। आपातकाल लगाये जाने पर 26 जून 1975 को उन्हें चण्डीगढ़ में नजरबंद किया गया। 4 दिसंबर 1975 को नजरबंदी के आदेश सरकार ने वापस लिये। लोकतंत्र की बहाली को लेकर फरवरी 1977 में उन्होंने जनता पार्टी का निर्माण किया। चुनावों में जीत हासिल होने पर प्रधानमंत्री पद के लिए मार्च 1977 में उन्होंने मोरारजी भाई देसाई के नाम का समर्थन किया। लंबी बीमारी के बाद पटना में 8 अक्टूबर, 1979 में जे पी का देहांत हुआ।

जे पी के जीवन पर कुछ गहराई से नजर डालें। जे पी जब अमरीका में रहे तब उन्होंने खेतिहर मजदूर के तौर पर अमरीका के खेतों में काम कर पैसा कमा कर उससे पढ़ाई की। अमरीका के किसानों तथा शहरी गरीबों की स्थिति व्यथित होकर वे इस नतीजे पर पहुंचे कि पूंजीवाद गरीबी का उन्मूलन नहीं कर सकता। अमरीका के विभिन्न विश्वविद्यालयों के मार्क्सवादी शिक्षकों तथा छात्र संगठनों के संपर्क में आकर वे मार्क्सवादी हो गये। स्वदेश लौटने पर वे आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। गांधीजी के प्रभाव में आकर वे कांग्रेस पार्टी से जुड़े। जल्दी ही उनका कांग्रेस के भीतर मार्क्सवादियों, लोकतांत्रिक समाजवादियों से संपर्क हो गया। तत्पश्चात् उन्होंने औपचारिक तौर पर भारत में समाजवादी आंदोलन को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई।

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन को लेकर जे पी ने समाजवादी आंदोलन के अध्येता स्व. हरिदेव शर्मा को बताया था कि हम गांधीजी के सिपाही बनकर आये थे लेकिन मैं मार्क्सवादी-समाजवादी था। गांधीजी के आंदोलन के मंद पड़ने पर हम कोई नया तरीका निकालना चाहते थे। जेल में बहस चलती थी कि जेल जाने तथा चरखा चलाने से कैसे स्वराज मिलेगा? हिंसा के बगैर कैसे अंग्रेजों से निपटेंगे? हम दिनरात यह बहस करते थे कि आजादी की लड़ाई को कैसे पेश किया जाय ताकि वह सफल हो तथा स्वराज्य जब आये तब उसकी क्या शक्ल हो? लेकिन हम एक बात में स्पष्ट थे कि हमें किसानों, मजदूरों, नौजवानों को समाजवादी सिद्धांतों के अनुसार संगठित करना है लेकिन कांग्रेस के भीतर रह कर। हम चाहते थे कि मार्क्सिस्ट-सोशलिस्ट तथा डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट के विचारों के लोगों को मिलाकर हम लोगों को एक कांग्रेस सोशलिस्ट ग्रुप बनाना चाहिए। हम लोगों ने मिल कर एक ड्राफ्ट तैयार किया। जेल में सर्कुलेट भी किया। ड्राफ्ट बाहर पुरूषोत्तम त्रिकमदास को बाहर भेजा तथा देशभर में उस पर चर्चा कराई। हमें मालूम था कि कांग्रेस के भीतर हमें सोशलिज्म विरोधी राजन बाबू राजाजी तथा सरदार पटेल से टक्कर लेनी पड़ेगी। हम कांग्रेस में काम करना चाहते थे लेकिन काम करते हुए कम्युनिस्टों की तरह आइसोलेट नहीं होना चाहते थे। हम मानते थे कि कांग्रेस एक मास मूवमंेट है। हम ईआईसीसी में बहस करते हुए अपने अमेंडमेंट पेश करते हुए अपने विचार को आगे बढ़ाना चाहते थे। मैं मार्क्सिस्ट तो था लेकिन कम्युनिस्टों की आइसोलेशनिस्ट पॉलिसी के खिलाफ था। हमारे इस विचार के चलते एक वक्त ऐसा आया जब ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्यों तथा समर्थकों की संख्या एक तिहाई हो गयी थी। हमारे लिए साधन और साध्य का सवाल महत्वपूर्ण था। इस कारण हिटलर और स्टालित का पेक्ट होने और हिटलर का रूस पर आक्रमण करने के बाद कम्युनिस्टों की जो स्थिति बनी थी, हमारी स्थिति वह नहीं थी। जे पी ने यह भी कहा था कि सोशलिस्ट पार्टी बनाने का श्रेय तो बिहार के लोगों को जाता है जिन्होंने 1931 में ही बिहार सोशलिस्ट पार्टी बना ली थी। पंजाब में भी सोशलिस्ट पार्टी बन चुकी थी।


गांधीजी को जब जे पी ने सोशलिस्ट प्रोग्राम बताया था तब उन्होंने एक प्रोग्राम पर हाथ रख कर कहा था कि जय प्रकाश तुम लोग यदि यह काम करो तो हम तुम्हारे साथ सौ टका रहेंगे। यह प्रोग्राम था प्रत्येक से उसक शक्ति अनुसार काम लेना और प्रत्येक को उसकी आवश्यकतानुसार दाम देना। उन्होंने पार्टी नहीं बनाने के लिए कभी नहीं कहा था। मुझे याद है कि जवाहरलाल जी ने पार्टी बनाने का स्वागत किया था लेकिन वे पार्टी में शामिल इसलिए नहीं हुए थे क्योंकि इससे कांग्रेस के ऊपर उनका असर कम हो जाता।

जे पी ने कहा था कि जब हम वर्धा में गांधीजी से मिले थे तब उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम लोग जब पैदा नहीं हुए थे तब से मैं सोशलिस्ट हूं। सोशलिज्म तो अपने आप से शुरू होता है। स्टेट के करने से नहीं होता। जे पी ने यह भी बताया था कि गांधीजी ने उनसे एक बार कहा था कि मैं तुमको कांग्रेस का प्रेसीडेंट बनाना चाहता हूं। तुम्हारी बहादुरी का फायदा लेना चाहता हूं। उस वक्त जवाहरलाल जी ने नरेन्द्र देव जी का नाम का सुझाव दिया। मैं फौरन पीछे हट गया। लेकिन कांग्रेस की कंजरवेटिव लीडरशिप में राजेंद्र बाबू को अध्यक्ष बना दिया। जे पी ने कहा कि जब हमारी कांग्रेस छोड़ने की बात हुयी तब मैंने गांधीजी से कहा कि हम कांग्रेस से अलग हो जायेंगे। यह गांधीजी की मृत्यु से एक-दो दिन पहले की बात है। 28 या 29 जनवरी 1948 की। गांधीजी ने कहा कि तुम लोगों के बहुत मुश्किल हो जायेगी। हमने कहा कि हम चाहते हैं कि आपकी जिंदगी में ही लोकतंत्र इिस तरह चले, लोकतंत्र में एक सत्तारूढ़ दल और विपक्ष किस प्रकार का हो ऐसा सबक देश को सिखाया जाय। जवाहरलाल भी नहीं चाहते थे। 

जे पी के सामने सत्ता से जुड़ने के प्रस्ताव लगातार आते रहे। चीनी हमले के बाद राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन पटना में जेपी से मिले तथा उनसे कहा कि आपको देश की बागडोर संभालने के लिए आगे आना चाहिए। यह काम आप ही कर सकते हैं। उसी समय के आसपास जब जे पी बीमार जवाहरलाल से मिलने गये तब उन्होंने कहा कि जयप्रकाश अब किसका इंतजार कर रहे हो इस वक्त देश को तुम्हारी जरूरत है। जे पी ने कहा था कि जवाहरलाल की कठिन स्थिति को अपने लिये मैं आसान अवसर मान लूं मैं इतना टुच्चा नहीं हूं। क्या आज के समाजवादी नेताओं से हम ऐसी उम्मीद कर सकते हैं कि वे अवसर मिलने के बाद भी पद ग्रहण न करें? 

जे पी ने लोकशक्ति और लोकतंत्र को मजबूत करने तथा समतावादी समाज की रचना के उद्देश्य से 1974 में संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया था जिसके लिए उन्हें आज पूरा देश और दुनिया जानती है। सत्ता देश और प्रांत की राजधानियों से निकल कर पंचायतों तक पहुंचे तथा गांधी के बताये रास्ते पर चल कर गांव आत्मनिर्भर एवं स्वावलंबी बनें। विद्यार्थी मैकाले की शिक्षा से मुक्त होकर स्वावलंबी एवं रोजगारोन्मुखी नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा ग्रहण कर सकें। यह जे पी का सपना था।

जे पी ने संपूर्ण क्रांति को बहुत सूक्ष्म तरीके से परिभाषित करने की बजाय उसे डॉ लोहिया द्वारा प्रतिपादित सप्तक्रांति बताया था। सप्तक्रांति का आह्वान सत्ता परिवर्तन में जरूर तब्दील हुआ लेकिन संपूर्ण क्रांति का मकसद आज भी सपना ही बना हुआ है। देश में जे पी को मानने वालों की कोई कमी नहीं है। देश के नागरिक समाजवादी विचार की विभिन्न पार्टियांे तथा उनकी सरकारों से उम्मीद करती हैं कि वेे संपूर्ण क्रांति तथा सप्तक्रांति की कसौटी पर खरा उतरें। यह मसला पार्टियों की या समाजवादी नेताओं की आलोचना का मसला नहीं है। यहां मूल सवाल यह है कि क्या पार्टियों के माध्यम से अथवा सरकारों के माध्यम से संपूर्ण क्रांति संभव है? इस विषय पर कम से कम जे पी जयंती के अवसर पर तो समाजवादियों को कम से कम सैद्धांतिक बहस तो करनी ही चाहिए। अगर वे इस नतीजे पर पहुंचे कि सरकारों के माध्यम से संपूर्ण क्रांति की दिशा में आगे नहीं बढ़ा जा सकता तो इस तथ्य को भी सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करना चािहए तथा संपूर्ण क्रांति की दिशा में आगे बढ़ने के तौर-तरीके खोजने चाहिए।

जे पी जब मार्क्सवादी थे तब हिंसा के बारे में उनकी समझ को लेकर कुछ कहने की जरूरत नहीं है लेकिन गांधीजी के प्रभाव में आकर तथा विनोबा जी के साथ रह कर जे पी ने अहिंसा को लेकर दो बड़े प्रयोग किये। जे पी ने न केवल भूदान-सर्वोदय आंदोलन में भाग लेकर जमीदारों से भूदान और ग्रामदान कराया बल्कि उन्होंने चंबल घाटी को डकैतों (बागियों) की समस्या से निजात दिलाने में अहम भूमिका का निर्वाह किया। इसी क्रम में उन्होंने बिहार के मुजफ्फरपुर के मुसहरी प्रखंड में नक्सलियों को हिंसात्मक आंदोलन से अलग करने का ऐतिहासिक कार्य करने में सफलता हासिल की। क्या समाजवादियों को आज फिर माओवादी और नक्सलवादी इलाकों में जाकर काम करने की जरूरत नहीं है? जरूरत तो समाजवादियों को खुलकर नक्सलवादियों और माओवादियों से संवाद करने की है। 

जे पी ने सिटीजन्स फॉर डेमोक्रेसी की ओर से 6 अगस्त 1974 तथा बाद में 13 अगस्त 1977 को चुनाव सुधारों को लेकर कमेटी बनाई थी। कमेटी ने 19 मार्च 1978 को रिपोर्ट दी थी। जस्टिस बी एम तारकुण्डे, एम आर मसानी, पी वी मावलंकर, सुरेन्द्र मोहन तथा के डी देसाई इसके सदस्य थे। चुनाव सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए इस रिपोर्ट को देश में लागू कराने को लेकर समाजवादियों द्वारा अभियान चलाने की भी जरूरत है।

जे पी ने भ्रष्टाचार को लेकर कहा था कि मैं एक ऐसी पूर्णतः स्वायत्त, आत्मप्रेरक प्रणाली की स्थापना करना चाहता हूं जिसके अधिकार क्षेत्र के बाहर कोई भी न हो-प्रधानमंत्री भी नहीं, जिससे जैसे ही भ्रष्टाचार की शिकायत आए उसकी समग्र एवं यथोचित जांच करके, निवारक कार्रवाई की जा सके। इसके आकार-प्रकार के निर्धारण की जिम्मेदारी संसद और सरकार की है। भ्रष्टाचार का प्रमुख स्रोत पार्टी के चंदा इकट्ठा करने के तरीके को बदलने की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने कहा था कि पार्टियां बड़े अनुदान न स्वीकार करके लोगों के पास आएं और छोटे-मोटे चंदा एकत्रित करें और दाता के नाम, चन्दे की राशि तथा सभी मदों में पूर्ण व्यय सब कुछ सार्वजनिक किया जाए। यह सभी के लिए अनिवार्य बना दिया जाए। दरअसल इस दिशा में संसद द्वारा पारित कानून इसे सभी पार्टियों के लिएअ निवार्य बना सकता है। इस कानून का उल्लंघन भ्रष्टाचार माना जाए और दोषी पार्टी को दण्डित किया जाए।

जे पी गरीबी और बेरोजगारी को देश की सर्वाधिक विकट समस्या मानते थे। उन्होंने कहा कि मैं तो चाहता हूं कि काम के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में संविधान में अविलंब शामिल किया जाय। यदि राज्य यह स्वीकार कर लें तो सभी के रोजगार के साधन विकसित किए जा सकते हैं यह बहुत मुश्किल नहीं है।

जे पी ने शिक्षा प्रणाली के बारे में कहा कि मैं कहता हूं कि एक साल के लिए सभी शिक्षा संस्थान बंद कर दिये जाएं और पूरा राष्ट्र देश के लिए एक उपयुक्त शिक्षाप्रणाली के विकास में लग जाय लेकिन मुझे मालूम है कि मेरा प्रस्ताव किसी को मान्य नहीं होगा। वे कहते थे कि संविधान निर्माताओं ने मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का जो वायदा दिया था उसे बिना विलंब के पूरा किया जाना चाहिए। वे चाहते थे कि शिक्षा केवल लोगों की आमदनी तक सीमित न हो, बल्कि उनके जीवन की गुणवत्ता को समृद्ध करे तथा उनमें राजनैतिक और सामाजिक चेतना का संचार करे। शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य देश के बेहतर नागरिक का निर्माण होना चाहिए। विद्यार्थियों ने सहयोग, भाईचारा और समानता जैसी हमारी परिकल्पनाओं का संचार होना चाहिए ताकि नई सामाजिक व्यवस्था का निर्माण हो सके।

जे पी पर तमाम लोग यह आरोप लगाते हैं कि उन्होंने गैरकांग्रेसवाद के नाम पर डॉ. लोहिया के विचार को आगे बढ़ाकर तथा जनता पार्टी में तत्कालीन जनसंघ को शामिल कर आरएसएस को वैधानिकता प्रदान करने का कार्य किया जबकि जे पी का प्रयास आरएसएस को राष्ट्र सेवा दल के साथ जोड़ कर राष्ट्रवादी सेकुलर संगठन में तब्दील करना था। वे चाहते थे कि आरएसएस हिंदू राष्ट्र की जगह भारत राष्ट्र के निर्माण के लिए कार्य करे। इस संबंध में उन्होंने तत्कालीन आरएसएस के नेताओं तथा जनसंघ के नेताओं से विस्तृत बातचीत भी की थी, जिसका व्यौरा जे पी पर लिखी गयी तमाम किताबों तथा लेखों में मिलता है। आज फिर यह सवाल खड़ा हो रहा है कि देश की भ्रष्टतम यूपीए-कांग्रेस सरकार से कैसे मुक्ति पाई जा सकती है? एक तरफ जहां जोर-शोर से गैरकांग्रेसवादी की बाद चल रही है वहीं दूसरी ओर किसी भी कीमत पर सांप्रदायिक ताकतों से परोक्ष या अपरोक्ष हाथ मिलाने को लेकर सेकुलरिस्टों का आग्रह बढ़ता चला जा रहा है। जरूरत तो एक बार फिर जे पी के प्रयोग को दोहराने की है। इसीलिए देश में जे पी की तलाश जारी है। कई लोग बी पी में जे पी देख कर एक प्रयोग कर चुके हैं। बहुत सारे लोग अन्ना में जे पी देखते हैं। लेकिन अन्ना स्वयं को राजनीति से अलग रखने की घोषणा बार-बार करते रहते हैं
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