खतरनाक विकिरण के साये में उत्तराखंड

caravan-the-cover-page-december-2010 कूडनकुलम और जैतापुर में परमाणु-विरोधी आंदोलन को एक तरफ सरकार अंधविश्वास से प्रेरित, अवैज्ञानिक और विदेशी हाथ से संचालित बता रही है, जबकि पूरे हिमालय को घातक विकिरण का शिकार बनाते विदेशी हाथों पर दशकों से चुप्पी साधे हुए है. भारतीय आमजन और हमारे पर्वतों-नदियों तक को अमेरिकी हितों की बलि चढाने पर आमादा सरकार की पोल इस लेख से खुलती है:
45 साल पहले एक गोपनीय अभियान की विफलता के बाद गायब हुई परमाणु ईंधन सामग्री के खतरों को लोग भुला चुके हैं। सरकार और सत्ता प्रतिष्ठान इस बारे में कोई बात करने को तैयार नहीं हैं। पिछले महीने अंग्रेजी की एक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘कारवान’ में विनोद के. जोस की एक रिपोर्ट ने इस रवैये पर सवाल खड़े किये हैं। यह रिपोर्ट उन लोगों को चौंका देने वाली है जो इस पुरानी घटना के बारे में कुछ नहीं जानते। रिपोर्ट में जो ब्यौरे दिये गए हैं, उन्हें संक्षेप में बयान करने पर भी इस बात को समझना कठिन नहीं होना चाहिए कि नन्दादेवी हिमनद क्षेत्र से लेकर गंगा के प्रवाह के मार्ग में भारी संख्या में रहने वाली आबादी कभी अचानक ही परमाणु विकिरण के दुष्प्रभावों की चपेट में आ सकती है। कारण स्पष्ट है, क्योंकि इस खतरे के स्रोत को ढूँढ कर समाधान निकालने के प्रयास बहुत पहले छोड़ दिये गए हैं।
इस खतरे की नींव तब पड़ी, जब 1965 में भारत और अमेरिका के एक संयुक्त पर्वतारोहण दल को अपना अभियान को मौसम की चुनौतियों के कारण अधूरा छोड़ना पड़ा। दरअसल यह ऐसा अभियान था, जिसमें देश के जाने-माने पर्वतारोहियों को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सी.आई.ए. और भारत के गुप्तचर ब्यूरो ने मिलकर एक खास मकसद हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया था। मकसद था, हिमालय की ऊँची चोटी पर ऐसे उपकरण स्थापित किये जाएँ जिनसे चीन के परमाणु परीक्षणों और ऐसी अन्य गतिविधियों के बारे में अमेरिका को समय से जानकारी मिल जाए। इन निगरानी उपकरणों के संचालन के लिए परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल करने की योजना थी। परमाणु ऊर्जा पैदा करने के लिए आवश्यक सामग्री के रूप में प्लूटोनियम और वांछित उपकरणों को पर्वतारोहियों की मदद से नन्दादेवी के शिखर पर पहुँचाया जाना था। इस कार्ययोजना को सी.आई.ए. ने इस तरीके से लागू किया कि किसी भी पर्वतारोही को अभियान के पीछे छिपे इरादों की भनक तक नहीं लगी।
sunday-tribune-of-23rd-may-1965-announcing-kohli-triumphदल का नेतृत्व एवरेस्ट विजेता मनमोहन सिंह कोहली ने किया।विनोद के. जोस ने अपने रोचक वृतांत में बताया है कि कैसे एक नाटकीय घटनाक्रम में कैप्टन कोहली को नेतृत्व सौंपा गया और किन परिस्थितियों में यह अभियान विफल हुआ। इस अभियान का बीज अमेरिकी पर्वतारोही बैरी बिशप के उस सुझाव से पड़ा, जिसमें उसने कहा था कि चीनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अमेरिका को हिमालय की कंचनजंगा चोटी का इस्तेमाल करना होगा। सी.आई.ए. ने इसके लिए योजना तैयार की और जब कैप्टेन कोहली को ब्यौरे दिये बिना इस मिशन में शामिल किया गया तो 8,579 मीटर ऊँची कंचनजंगा चोटी पर 125 पौंड वजन के पाँच बोझों को लेकर चढ़ाई के अव्यावहारिक इरादों का उन्होंने विरोध किया। तब तय हुआ कि कंचनजंगा के बजाय नन्दादेवी की चोटी पर चढ़ा जाए। कैप्टन कोहली को भारत के शीर्षस्थ गुप्तचर अधिकारियों- गुप्तचरों के पितामह भोला नाथ मलिक और बाद में रॉ के पहले मुखिया बनने वाले रामेश्वर नाथ काव, ने राष्ट्रहित के नाम पर इस अभियान में शामिल होने के लिए प्रेरित किया था।
kohli-and-bhola-nath-mullikअमेरिका 1964 में चीन द्वारा किये गए उस परमाणु परीक्षण से बौखला गया था, जिसकी उसे कोई भनक तक नहीं लग सकी थी। भारत भी 1962 के चीनी हमले के जख्मों से उबर नहीं पाया था। अक्तूबर 1965 में चले इस अभियान के दौरान दल के नेता कोहली का आर. एन. काव से निरन्तर रेडियो सम्पर्क बना रहा। जब मौसम के खतरनाक तेवर और अभियान दल के सदस्यों की जान पर आ रहे खतरों को देखते हुए 16 अक्तूबर को शिखर से 300 मीटर नीचे चौथे शिविर में ही परमाणु ईंधन और निगरानी उपकरणों के बोझ को छोड़ देने की अनुमति दे दी गई तो साथ चल रहे शेरपाओं ने चट्टानों के बीच एक गुफा खोज निकाली, जिसके भीतर आधा सामान रख दिया गया। बाकी सामान नाइलोन की रस्सी से एक चट्टान के साथ बाँध दिया गया। इरादा था कि अगले साल यहीं से उठा कर यह सामान आगे शिखर तक ले जाया जाए। परन्तु इस एक साल के भीतर चीन ने अपना तीसरा परमाणु परीक्षण भी कर लिया। जब अगले साल मई के आरंभ में कोहली का अभियान दल वापस नन्दादेवी के निकट पहुँचा तो उनके लिए घनघोर आश्चर्य की बात यह थी कि जिस स्थान पर उन्होंने सामान सुरक्षित रखा था, वह वहाँ नहीं था। असल में वह चट्टान ही नजर नहीं आ रही थी, जिसके आसपास सामान था। लगता यही था कि भारी बर्फबारी के बाद हिमस्खलन में पूरी चट्टान व सारा सामान ही कहीं दब गया है। जब यह सूचना रेडियो सम्पर्क से अधिकारियों को भेजी गई तो दिल्ली व वाशिंगटन में कँपकँपी फैल गई। एक अमेरिकी अधिकारी ने चेतावनी देते हुए कहा कि उसे ढूँढो वर्ना कलकत्ता तक की भारतीय आबादी को परमाणु विनाश का सामना करना पड़ेगा। इसके पीछे आशंका थी कि परमाणु सामग्री कहीं गंगा के प्रवाह में न चली जाए। यह अमेरिकी अधिकारी ही जान सकते थे कि परमाणु सामग्री को कितनी मुश्किल व गोपनीय तरीके से कैप्सूल में डाला गया था और शिखर तक पहुँचाने के प्रबंध किये गए थे। परन्तु लापता सामग्री नहीं मिली। अगले दो सालों में भी सी.बी.आई. और आई.बी. के नेतृत्व में अभियान दल अत्याधुनिक उपकरण लेकर वहाँ गए, परन्तु सफलता नहीं मिली।
rishi-ganga-which-originates-from-nanda-deviइस सारे गुप्त, मगर विफल अभियान के बारे में पहली बार जानकारी 1977 में अमेरिकी पत्रिका ‘आउटसाइड’ में आई तो भारत के सांसदों ने भी इस बारे में सवाल उठाये। तत्कालीन मोरारजी देसाई सरकार ने इसे स्वीकार किया और वरिष्ठ वैज्ञानिकों का एक दल नियुक्त किया, जिसे खतरों का आकलन कर अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया। इस दल ने जो रिपोर्ट दी, उसमें एक सुझाव यह था कि उस क्षेत्र में जल, जमीन और वनस्पति पर परमाणु विकिरण के असर के बारे में जाँच जारी रखी जाए।
पिछले साल क्षेत्रीय सांसद सतपाल महाराज ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर 45 साल पुरानी इस घटना की तरफ ध्यान खींच कर आवश्यक कदम उठाने की माँग की। परन्तु कुछ भी नहीं हुआ। स्थिति यह है कि परमाणु विकिरण की निगरानी भी नहीं हो रही है। लापता हुए पाँच किलोग्राम प्लूटोनियम व अन्य उपकरणों का इतने साल बाद भी पता नहीं लगा है। अब जबकि तकनीकी क्षमताओं और संसाधनों का बहुत विकास हो चुका है, लुप्त सामग्री की खोज का कोई प्रयास करने की जरूरत भी अनुभव नहीं की जा रही है। जबकि आज की परिस्थितियों में एक नया खोज अभियान चलाया जा सकता है, भले ही यह खर्चीला हो। परन्तु सरकारें आसानी से जागती नहीं हैं। सरकारी निद्रा के चलते नन्दादेवी से नीचे, उत्तराखंड के लोग अज्ञात खतरे से मुक्त नहीं हैं।
(साभार: नैनीताल समाचार)
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